अंडमान सागर भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, म्यांमार और थाईलैंड के बीच स्थित है। यह बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पूर्वी भाग से जुड़ा हुआ है। अंडमान सागर का क्षेत्रफल लगभग 8 लाख वर्ग किलोमीटर है।
यह समुद्र समुद्री व्यापार, मत्स्य पालन और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहाँ प्रवाल भित्तियाँ, मैंग्रोव वन और विभिन्न प्रकार के समुद्री जीव पाए जाते हैं। अंडमान सागर का अधिकांश भाग अपेक्षाकृत गहरा है और इसके आसपास कई छोटे-बड़े द्वीप स्थित हैं।
अंडमान सागर कहाँ है
अंडमान सागर, हिंद महासागर के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित पानी का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह मुख्य रूप से भारत, म्यांमार, थाईलैंड और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के बीच फैला हुआ है।
इसके पश्चिम में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह उत्तर और पूर्व में म्यांमार और दक्षिण-पूर्व में थाईलैंड और मलय प्रायद्वीप स्थित हैं। दक्षिण की ओर, यह समुद्री क्षेत्र मलक्का जलडमरूमध्य से जुड़ता है, जो हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण रास्ता है।
भारत के लिए अंडमान सागर का विशेष महत्व है, क्योंकि अंडमान-निकोबार द्वीप समूह इसी क्षेत्र में स्थित हैं। इसकी भौगोलिक स्थिति भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया के करीब लाती है।
अंडमान सागर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच समुद्री संपर्क के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र समुद्री व्यापार, मछली पकड़ने, पर्यटन और रणनीतिक गतिविधियों में मदद करता है।
अंडमान सागर में प्राकृतिक गैस
अंडमान सागर में प्राकृतिक गैस के भंडार होने की संभावना है। समुद्री तेल और गैस की खोज के नज़रिए से अंडमान-निकोबार क्षेत्र को भारत के महत्वपूर्ण संभावित क्षेत्रों में से एक माना जाता है।
अंडमान सागर की तलहटी के नीचे तलछटी बेसिन मौजूद हैं। इन क्षेत्रों में लाखों वर्षों से जमा कार्बनिक पदार्थ दबाव और तापमान के प्रभाव से तेल और प्राकृतिक गैस में बदल सकते हैं।
इसी कारण से, भारत ने अंडमान और निकोबार के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज के लिए कई गतिविधियाँ शुरू की हैं।
भारत सरकार ने अंडमान क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन की संभावना को बढ़ाने के लिए अपतटीय ब्लॉकों की नीलामी और खोज को बढ़ावा दिया है। हालाँकि, किसी क्षेत्र में संभावित संसाधनों की मौजूदगी और वहाँ से बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन के बीच अंतर होता है।
समुद्र की गहराई, भूकंपीय गतिविधि और पर्यावरणीय संवेदनशीलता जैसी स्थितियों के कारण अंडमान सागर में गैस की खोज तकनीकी रूप से भी चुनौतीपूर्ण है।
- प्राकृतिक गैस के घरेलू स्रोतों को बढ़ाने की संभावना
- आयातित ऊर्जा पर निर्भरता कम करने में मदद
- अंडमान और निकोबार क्षेत्र का आर्थिक विकास
- समुद्री ऊर्जा संसाधनों की खोज को बढ़ावा देना
- दक्षिण-पूर्व एशिया के पास भारत की ऊर्जा और रणनीतिक स्थिति को मजबूत करना
अंडमान सागर में प्राकृतिक गैस की संभावनाएँ होना और किसी बड़े गैस क्षेत्र से व्यावसायिक उत्पादन होना, ये दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए, किसी विशेष गैस भंडार के विस्तार का पता लगाने के लिए नवीनतम आधिकारिक खोज डेटा को देखना महत्वपूर्ण है।
अंडमान सागर में नाव दुर्घटना
26 जनवरी 2014 को, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पोर्ट ब्लेयर के पास एमवी एक्वा मरीन नाम की एक टूरिस्ट नाव डूब गई थी। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, नाव में 48 यात्री और दो क्रू सदस्य सवार थे; 22 लोगों की मौत हो गई, जबकि 26 यात्रियों और दो क्रू सदस्यों को बचा लिया गया। जांच में पता चला कि नाव में क्षमता से ज़्यादा लोग सवार थे।
अप्रैल 2026 में अंडमान सागर में एक दुखद नाव हादसा हुआ, जब रोहिंग्या शरणार्थियों और बांग्लादेशी नागरिकों को ले जा रही एक नाव पलट गई। यह नाव दक्षिणी बांग्लादेश के टेकनाफ इलाके से मलेशिया की ओर जा रही थी।
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के अनुसार, नाव पर लगभग 250 से 280 लोग सवार थे, जिनमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे शामिल थे।
अंडमान सागर कब बना
अंडमान सागर के बनने की कोई एक खास तारीख नहीं है। यह लाखों सालों तक चली भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के कारण धीरे-धीरे बना। हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में स्थित अंडमान सागर के पश्चिम में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह हैं और पूर्व में म्यांमार और थाईलैंड के तटीय इलाके हैं।
अंडमान सागर के बनने में इंडियन प्लेट, बर्मा माइक्रोप्लेट और यूरेशियन प्लेट की हलचल ने सबसे अहम भूमिका निभाई। भू-वैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो उत्तर की ओर बढ़ रही इंडियन प्लेट एशियाई प्लेटों से टकराई। इस इलाके में प्लेटों की हलचल, समुद्र तल के फैलने और फॉल्ट एक्टिविटी के कारण पृथ्वी की ऊपरी परत में कई बदलाव हुए।
खासकर, अंडमान सागर का मध्य भाग समुद्र तल के फैलने वाले ज़ोन से जुड़ा है। सबूत बताते हैं कि इस इलाके में समुद्र तल के फैलने की प्रक्रिया लगभग 4 से 5 मिलियन साल पहले शुरू हुई थी।
इसके परिणामस्वरूप, पृथ्वी के अंदर से ऊपर आने वाला पदार्थ ठंडा होकर नया समुद्र तल बना, जिससे समुद्री बेसिन धीरे-धीरे फैलने लगा। हालाँकि, अंडमान सागर का कुल भू-वैज्ञानिक विकास इस एक प्रक्रिया की तुलना में कहीं अधिक पुराना और जटिल है।
अंडमान सागर केवल समुद्र तल के फैलने से नहीं बना; आसपास के इलाकों में भूकंपीय गतिविधि, फॉल्टिंग, ज्वालामुखी गतिविधि और प्लेटों की हलचल ने भी इसके विकास को लगातार प्रभावित किया है। यही कारण है कि अंडमान और निकोबार क्षेत्र भूकंप और समुद्र के नीचे होने वाली भू-वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है।
अंडमान सागर की मौजूदा भौगोलिक संरचना अपेक्षाकृत हाल के भू-वैज्ञानिक काल में विकसित हुई। समुद्र तल की गहराई और बनावट अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग है, जिसमें गहरे समुद्र वाले क्षेत्र, द्वीप, समुद्र के नीचे के पहाड़ और खाइयाँ शामिल हैं।
सुंडा ट्रेंच इस क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। यहाँ, इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट बर्मा सुंडा प्लेट के नीचे धंसती है। प्लेट टेक्टोनिक गतिविधि के कारण, इस क्षेत्र को दुनिया के अत्यधिक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक माना जाता है। 26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर में आया भूकंप और सुनामी भी इस क्षेत्र में प्लेट गतिविधि से जुड़ी एक बड़ी घटना थी।
