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Sunday, November 10, 2019

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Questions from Bhakti kal Hindi Sahitya

HELLO Welcome my Friends मेरा नाम है खिलावन और आप देख रहे हैं हमारा ब्लॉग REXGIN.IN जिस पर हम आपसे हर रोज बात करते हैं। इन्हीं ज्ञानवर्धक जानकारी से जुड़े विषयों के बारे में। आज जो टॉपिक हम आपके लिए लेकर आये हैं, वह हिंदी साहित्य के इतिहास से जो की इतिहास का दुसरा चरण है और इस चरण को भक्ति काल के नाम से जाना जाता है।
इससे पहले हमने एक पोस्ट लिखा था जिसमें मैंने आपको बताया था। आदिकाल के बारे में अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो निचे दिए लिंक पर क्लिक करें और पढ़ें आदिकाल और आदिकाल से पूछे गए प्रश्न के बारे में।

bhaktikal ki kavitri mira bai
भक्तिकाल के कृष्ण भक्ति शाखा कवियित्री मीरा बाई 


चलिए शुरू करते हैं आज का विषय जिसमें हम आपसे चर्चा करेंगे भक्ति काल से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों के बारे...

आज हमारे कॉलेज में टेस्ट हुआ जिसमें इस प्रकार के सवाल पूछे गए थे उसी को मैंने आपके सामने रखा है हो सकता है की ये आपके फाइनल एक्साम में भी आ जाए तो इसे अंत तक पढ़े और जाने भक्ति काल के बारे में।



सहीं विकल्प वाले प्रश्न इस प्रकार से थे यहाँ मैं सिर्फ उत्तर को ही लिखने वाला हूँ उसके विकल्प को नहीं तो चलिए देखें।

प्रश्न १. अवधि भाषा के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य का क्या नाम है ?
उत्तर - रामचरित मानस।

प्रश्न २. हिंदी साहित्य का धर्मध्वज कवि किसे कहते हैं ?
उत्तर - तुलसीदास।

प्रश्न ३. फना का शाब्दिक अर्थ क्या होता है ?
उत्तर -

प्रश्न ४. सबसे प्राचीन वेद का नाम बताइये ?
उत्तर - ऋग्वेद।

प्रश्न -५. मुललादाऊ की प्रसिद्ध कृति का नाम बताइये।
उत्तर - चंदायन।

प्रश्न ६. मीराबाई कहाँ की कवियित्री थीं ?
उत्तर - राजस्थान।

प्रश्न ७. सूरदास जी के गुरु का नाम लिखिए।
उत्तर - वल्ल्भाचार्य।

प्रश्न ८. कबीरदास जी का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर - मगहर, कांशी नामक स्थान पर इनका जन्म हुआ था।

प्रश्न ९. संत सुन्दरदास के गुरु का नाम लिखिए।
उत्तर - दादूदयाल उनके गुरु का नाम था।

प्रश्न १०. मधुमालती के रचयिता कौन थे ?
उत्तर - मंझन नामक कवि ने इसकी रचना की थी।

प्रश्न ११. पद्मावत क्या है ?
उत्तर - पद्मावत एक महाकाव्य है।

प्रश्न १२. राघव, चेतन और पंडित किस कहानी के पात्र हैं ?
उत्तर - ये सभी पात्र पद्मावती के हैं।

प्रश्न १३. आखिरीकलाम और चित्ररेखा किसकी रचना है ?
उत्तर - मलिकमुहमम्द जायसी की रचना है।

प्रश्न १४. वैराग्य संदीपनी एवं कृष्ण गीतावली किसकी रचना है ?
उत्तर - तुलसी दास ने इसकी रचना की थी।

प्रश्न १५. कवित्त रत्नाकर किसकी रचना है ?
उत्तर - यह सेनापती की रचना है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न जिसको की पांच नंबर के लिए पूछा गया था। इसके उत्तर आप अपने तरिके से भी लिख सकते हैं।

प्रश्न १. भक्तिकाल के समाजिक परिस्थितियों को समझाइये।

उत्तर - इस काल में हिन्दू समाज की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। यह असहाय, दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहा था। स्वार्थवश या बलात्कार के कारण हिन्दू मुस्लिम धर्म स्वीकार कर रहे थे। हिन्दू कन्याओं का यवनों से बलात विवाह का क्रम चल रहा था। दास प्रथा भी प्रचलित थी। सम्पन्न मुसलमान हिन्दू कन्याओं को क्रय रहे थे। कुलीन नारियों का अपहरण कराके अमीर लोग अपना मनोरंजन किया करते थे। परिणाम स्वरूप हिन्दू जनता ने इस सामाजिक आक्रमण से बचने के लिए अनेक उपाय किये। बाल विवाह और पर्दा प्रथा इस आक्रमण से बचने का ही उपाय था। वर्णाश्रम (जाति-प्रथा) व्यवस्था सुदृढ़ हो गई थी। रोजी-रोटी के साधन छीन जाने से वह गरीब होता गया और जीविकोपार्जन के लिए मुसलमानों के सम्मुख आत्मसमर्पण करता रहा।

इस प्रकार भक्तिकाल राजनितिक दृष्टि से युद्ध, संघर्ष और अशांति का काल था। हिन्दू-समाज पर होने वाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों का समय था।

टीप :- ध्यान रखें यह प्रश्न आपको पांच नंबर के लिए पूछा गया है तो इसे आपको उसके हिसाब से लिखना है।

प्रश्न २. भक्तिकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिये।

उत्तर - भक्तिकाल का समय संवत १३५० (1350) से सम्वत १७०० (1700) तक माना गया है। यह दौर युद्ध, संघर्ष और अशांति का समय था। मुहम्मद बिन तुगलक से लेकर शाहजहां तक का शासन काल इस समय में आता है।

इस अवधि में तीन प्रमुख मुस्लिम वंशों-पठान, लोदी और मुगल का साम्राज्य रहा। छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने और साम्राज्य विस्तार की अभिलाषा ने युद्धों को जन्म दिया। इस राज्य संघर्ष परम्परा का आरम्भ सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक से आरम्भ हुआ। तुगलक के बाद सुलतान मुहम्मद शाह गद्दी पर बैठा। सन 1412 में उसकी मृत्यु के साथ तुगलक वंश समाप्त हुआ। इसके बाद लोदी वंश के बादशाहों ने साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। अंतिम बादशाह इब्राहिम लोदी था, जिसका अंत सन 1526 में हुआ। इसके बाद मुगल वंश का शासन आरम्भ हुआ। जिसमें क्रमशः बाबर, हुमायूं, अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने राज्य किया।

मुगलवंशीय बादशाह यद्द्पी काव्य और कला प्रेमी थे, किन्तु निरंतर युद्धों, अव्यवस्थित शासन-व्यवस्था और पारिवारिक कलहों से देश में अशांति ही रही। मुगलवंशीय शासकों में अकबर का राज्य सभी दृष्टियों  से सर्वोपरि और व्यवस्थित रहा। इसका प्रभाव उसके उत्तराधिकारी शासकों पर भी रहा।

प्रश्न ३. ज्ञानमार्गी निर्गुण काव्य की प्रमुख विशेषताओं को समझाइये।

उत्तर - इस ज्ञानमार्गी निर्गुण काव्यधार की विशेषता इस प्रकार है -

1. गुणातीत की ओर संकेत - निर्गुण शब्द का अर्थ गुण रहित होता है। जब इस पंथ के संतों के संदर्भ में इसे देखते हैं तो यह गुणातीत की ओर संकेत करता है।

2. परब्रम्ह को महत्व - यह किसी निषेधात्मक सत्ता का वाचक न होकर उस परब्रम्ह के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो सत्व, रजस और तमस तीनों गुणों से अतीत है।

3. स्वरूप वर्णन में असमर्थ - वाणी उसके स्वरूप का वर्णन करने में असमर्थ है। जो रूप, रंग, रेखा से परे है। यह निर्गुण ब्रम्ह घट-घट वासी है फिर भी इन्द्रियों से परे है। वह अवर्ण होकर भी सभी वर्णों में है। अरूप होकर भी सभी रूपों में मौजूद है।

4. समानता का संदेश - वह अवर्ण होकर भी सभी वर्णों में है। अरूप होकर भी सभी रूपों में मौजूद है। वह देशकाल से परे है, आदि- अंत से रहित है , फिर भी पिंड और ब्रम्हांड सभी में व्याप्त है। निर्गुण भक्ति ने  समानता का संदेश दिया। निर्गुण भक्त संतों का सपना एक ऐसे समाज का निर्माण करना था, जहां किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं है।

5. हिन्दू मुस्लिम दोनों प्रभावित - मध्य काल में हिन्दू जाति वर्णाश्रम धर्म की जटिलताओं से युक्त थी , तो इस्लाम भी धार्मिक कटटरता की भावना से ग्रस्त था। उधर उत्तर भारत में सिद्धों, नाथों के कर्मकांड के कारण सच्ची धर्म भावना का हास हो रहा था। व्यवस्था के इस दुष्चक्र में सामान्य जन लगातार पीस रहा था। दक्षिण से आनेवाली भक्ति की लहर ने हिन्दू-मुसलमान दोनों को प्रभावित किया। दक्षिण भारत में भक्ति के प्रणेता रामानंद थे और इसे उत्तर में कबीर ने प्रसारित किया।

इन्हें भी पढ़ें
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Saturday, November 9, 2019

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भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हिंदी साहित्य और 

सामाजिक परिस्थितयाँ 

भक्ति काल संवत 1350 से 1700 तक

भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि 

Hello and welcome guys आज हम बात करने वाले हैं, भक्ति काल के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में और उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के बारे में।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि-

अगर हम बात करें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की तो भक्ति काल का समय सम्वत 1350 से 1700 तक माना गया है। यह दौर युद्ध संघर्ष और अशांति का समय था। मोहम्मद बिन तुगलक से लेकर शाहजहां तक का शासन काल इस समय में आता है।




इस अवधि में तीन प्रमुख मुस्लिम वंशों-पठान, लोदी और मुगल का साम्राज्य रहा। छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने और साम्राज्य विस्तार की अभिलाषा ने युद्धों को जन्म दिया। अर्थात जो बड़े राजा थे वह छोटे राज्यों को हड़पने की कोशिश किया करते थे जिससे कि उनका साम्राज्य बढ़ सके और इस कारण से वहां युद्ध होने लगे तो इस राज्य संघर्ष परंपरा का आरंभ मोहम्मद बिन तुगलक से हुआ था और तुगलक के बाद सुल्तान मोहम्मद साहब गद्दी पर बैठा था। सन 1412 में उनकी मृत्यु हुई जिसके साथ ही तुगलक वंश समाप्त हो गया। इसके बाद लोदी वंश के बादशाहों ने साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया और अंतिम बादशाह इब्राहिम लोदी था। जिसका अंत 1526 में हुआ इसके बाद मुगल वंश का शासन प्रारंभ होता है मुगल वंश के शासन में जैसे कि हम सभी जानते हैं अकबर के बारे में और आगरा के ताजमहल को किसने बनवाया था शाहजहां ने तो उसी के शासनकाल में बना था। यानी कि भक्ति काल के दौरान ही यह बना था। जिसमें मुगल वंश के शासक थे बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां तो इन सभी ने भक्ति काल के दौरान राज्य किए।




मुगल वंश के बादशाह काव्य और कला के प्रेमी थे जिसमें से ताजमहल एक बहुत ही सुंदर उदाहरण है। लेकिन उस समय जो निरंतर युद्ध चल रहे थे और जो बड़े राजा थे वह छोटे राज्यो को हड़पने में लगे हुए थे। इस कारण अव्यवस्थित शासन व्यवस्था और परिवारों में भी कलह थी। तो इस कारण से परिवारिक कलहों से देश में अशांति ही रही मुगल वंश के शासकों में अकबर का राज्य सभी दृश्यों से सर्वोपरि और व्यवस्थित रहा मुगल वंश के सभी शासकों में से मुगल के शासक मुगल वंश के शासक अकबर का जो राज्य था सभी दृष्टि से अन्य शासकों की तुलना में इसका प्रभाव उनके उत्तराधिकारी शासकों पर भी रहा। साथ ही सुब्यवस्थित शासन व्यवस्था थी। तो यह तो थी भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।

सामाजिक परिस्थितियां

भक्ति काल में हिंदू समाज की स्थिति अत्यंत ही सोचने लायक थी और उस समय यह हिंदू समाज असहाय दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहे थे और स्वार्थ वश वहां पर बलात्कार के कारण हिंदू धर्म स्वीकार कर रहे थे। उनकी मजबूरी हो गई थी हिंदू धर्म को अपनाने की हिंदू कन्याओं का यवनों से बलात विवाह का क्रम चल रहा था। यानी की बाल्यकाल में ही विवाह का क्रम जारी था। दास प्रथा भी प्रचलित थी और संपन्न मुसलमान हिंदू कन्याओं को, क्रय कर रहे थे यानी कि उनको खरीद रहे थे। कुलीन नारियों का अपहरण करा के वहां जो अमीर मुसलमान जो थे वे लोग अपना मनोरंजन किया करते थे। परिणाम स्वरूप हिंदू जनता ने इस सामाजिक आक्रमण से बचने के लिए अनेक उपाय किए बाल विवाह और पर्दा प्रथा इस पर आक्रमण से बचने का उपाय था। जो बाल विवाह उस समय कराए जाते हैं और जो पर्दा प्रथा चल रही थी उससे बचने के लिए ही वहां पर यह सभी किए जाते थे। वर्णाश्रम यानी की जाति प्रथा व्यवस्था वहां पर सुदृढ़ हो गई थी और रोजी रोटी के साधन छिन जाने से वहां गरीब होता गया और जीवन गुजारने के लिए मुसलमानों के सम्मुख आत्मसमर्पण वे करते रहे।

अर्थात इस काल में हिंदू समाज जो था वह अत्यंत ही दुखदाई स्थिति में था।

अब इस प्रकार हम देखे तो भक्ति काल राजनीतिक दृष्टि से युद्ध संघर्ष और अशांति का काल रहा था और हिंदू समाज पर होने वाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों का समय भी इसे हम कह सकते हैं।




अगर आपके कोई सुझाव हो तो कमेंट में बताएं अगर कोई जानकारी में त्रुटि हो तो हमें कमेंट करके अवश्य ही अवगत कराएं धन्यवाद।

सारांश

इस प्रकार देखा जाए तो भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उतनी सुदृण या सुरक्षित नहीं थी काव्य रचना (पद्ध), गद्य रचना कला के क्षेत्र में देखें तो। क्योंकि उस समय युद्ध और अशांति फैली हुई थी बड़े राजाओं द्वारा छोटे छोटे राज्यों को हड़पने के लिए और अपने साम्राज्य के विस्तार के अभिलाषा के कारण तो इस कारण से वहां काव्य और कला के क्षेत्र में कोई उन्नति देखने को हमें नहीं मिलती है और उस समय देश में अशांति व्याप्त रही। जिसके कारण भक्ति काल में वहां के कवि लोगों को भक्ति की ओर ले जाने का प्रयास करते रहे।

इन्हें भी पढ़ें

Tuesday, November 5, 2019

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Jaishankar Prasad Jivan Prichay Aalochna Khand

Hello and welcome आप सभी पाठकों का एक बार फिर से स्वागत आज हम बात करने वाले हैं जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य कामायनी के बारे में इसमें उसकी आलोचना खंड की चर्चा हम इस पोस्ट के माध्यम से करेंगे। मतलब यहां पर जयशंकर प्रसाद के जीवन और व्यक्तित्व के बारे में बताया गया है।

jaishankar Prasad

आलोचना खंड 

जयशंकर प्रसाद : जीवन और व्यक्तित्व

कवि का जीवन उसकी कृतियों में परोक्ष रूप से झांका करता है। जो कार्य साधारण व्यक्ति व्याख्या से करता है, उसे वह संकेत मात्र से कर लेता है। वह जिस संसार से अनुप्राणित होता है, उसकी व्याख्या भी अपने आदर्शों के अनुसार करता है। प्राचीन युग का ऋषि कवि तथा आज का स्वच्छंदतावादी कलाकार, दोनों ही अनुभूति और कल्पना से अपनी कृति का निर्माण करते हैं। विश्व के सभी महान कवियों के काव्य में उनके जीवन की छाया परोक्ष रूप से दिखाएं देती है।

कवि प्रसाद की पितामह बाबू शिवरतन साहू काशी के अत्यधिक प्रतिष्ठित नागरिक थे। वे तंबाकू के बड़े व्यापारी थे और एक विशेष प्रकार की सुरती बनाने के कारण "सुंघनी साहू" के नाम से विख्यात थे। धन-धान्य से परिवार भरा पूरा रहता था। कोई भी धार्मिक अथवा विद्वान काशी में आता तो साहू जी उसका बड़ा स्वागत करते। उनके यहां पर प्रायः कवियों, गायकों, कलाकारों की गोष्ठी होती रहती थी। वे इतने अधिक उदार थे कि मार्ग में बैठे हुए भिखारी को अपने वस्त्र उतार कर देना साधारण सी बात समझते थे। लोग उन्हें "महादेव" कहकर प्रणाम करते थे। कवि के पिता बाबू देवी प्रसाद साहू ने पितामह का-सा ही ह्रदय पाया था।




ऐसे वैभव पूर्ण और सर्वसंपन्न वातावरण में प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल दशमी, 1946 विक्रम संवत को हुआ था। उस समय व्यापार अपने चरम उत्कर्ष पर था, किसी प्रकार का कोई अभाव ना था। तीसरे वर्ष में केदारेश्वर के मंदिर में प्रसाद का सर्वप्रथम क्षौर संस्कार हुआ। उनके माता-पिता तथा समस्त परिवार ने पुत्र के लिए इष्ट देव शंकर से बड़ी प्रार्थना की थी। वैधनाथधाम के झारखंड से लेकर उज्जयिनी के महाकाल तक के ज्योतिर्लिंगों की आराधना के फल-स्वरूप पुत्र रत्न का जन्म हुआ।

शिवप्रसाद के शिव के प्रसाद स्वरूप इस महान कवि का जन्म हुआ था। जीवन के प्रथम चरण में ही अपने पाणि-पल्ल्वों के लेखनी उठा लेना उसके आगामी विकास का परिचायक है। 5 वर्ष की अवस्था में संस्कार संपन्न कराने के लिए प्रसाद को जौनपुर सौंदर्य ने कवि की शैशवकालीन स्मृतियों पर अपनी छाया डाल दी। सुंदर पर्वत श्रेणियां, बहते हुए निर्झर, प्रकृति नव-नव रूप सभी ने उनके नादान ह्रदय में कुतूहल और जिज्ञासा भर दी।

नौ वर्ष की अवस्था में प्रसाद ने 1 लंबी यात्रा की। चित्रकूट, नैमिषारण्य, मथुरा, ओमकारेश्वर, धारा क्षेत्र, उज्जैन तक का पर्यटन किया। इस अवसर पर परिवार के अधिकांश व्यक्ति भी साथ थे। चित्रकूट की पर्वतीय शोभा, नैमिषारण्य का निर्जर वन, मथुरा की वनस्थली तथा अन्य क्षेत्रों के मनोरम सौंदर्य पर वे अवश्य रीझ उठे होंगे।

कवि के विशाल भवन के सम्मुख ही एक शिवालय है, जिसे उनके पूर्वजों ने बनवाया था। उनका परिवार शैव था। उनके अनेक अवसरों पर मंदिर में नृत्य हुआ करते थे। बालक प्रसाद भी भागवद भक्ति में तन्मय होकर भक्तों का स्तुतिपाठ करना देखते रहते थे। प्रातः काल वातावरण को मुखरित कर देने वाली घंटे की ध्वनि उनके लिए उस समय केवल एक जिज्ञासा, कुतूहल का विषय था। जीवन के आरंभ में शिव की भक्ति करने वाला कवि अंत में शैव दर्शन से प्रभावित हुआ।




आरम्भ से ही प्रसाद की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। पिता ने घर पर संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, फारसी आदि भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था कर दी। कवि की प्रारंभिक शिक्षा प्राचीन परिपाटी के अनुसार हुई। घर पर उन्हें कई अध्यापक पढ़ाने आया करते थे।

प्रसाद लगभग 12 वर्ष के ही थे कि 1921 में उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। घर का समस्त भार बड़े भाई शम्भुरतन पर आ पड़ा वे स्वतंत्र इच्छा के निर्भीक व्यक्ति थे। हृष्ट-पुष्ट शरीर के साथ ही उन्हें पहलवानी का शौक था। सायंकाल अपनी टमटम पर घूमने निकल जाते। रोब के कारण यदि कोई दौड़ लगाता, तो उसे पछाड़ देते। उनका ध्यान व्यवसाय की ओर अधिक न था। धीरे-धीरे उसे व्यापार में हानि पहुंचने लगी और पूर्वजों की थाती को संभालना भी कठिन हो गया।

प्रसाद जी के पिता देवीप्रसाद की मृत्यु के पश्चात ही गृहकलह आरंभ हो गया। कुछ समय तक प्रसाद की माता ने इसे रोका, पर वह उग्र रूप धारण करता गया। शंभूरतन जी ने अपनी उदारता और सहृदयता से उसे कम करने का पूर्ण प्रयत्न किया, किंतु वह बढ़ता ही गया। अंत में प्रसाद के चाचा और बड़े भाई में मुक्केबाजी हुई। यह मुकदमा लगभग 3 से 4 वर्ष तक चलता रहा। अंत में शंभूरतन जी की विजय हुई। समस्त संपत्ति का बंटवारा हो गया। इस बीच ध्यान न देने के कारण सारा पैतृक व्यवसाय भी चौपट हो गया। अन्य व्यक्ति लूट मचा रहे थे, जब शंभूरतन जी ने बंटवारे के पश्चात अपने घर में प्रवेश किया, तब वहां भोजन आदि के पात्र न थे। इस अवसर पर प्रसाद जी ने अपने एक चित्र को बताया था कि जब कभी घर से कोई काम-काज होता था, तो दुकान का टाट उलट दिया जाता था। उसके नीचे बिखरी हुई पूंजी मात्र से वह कार्य भली-भांति संपन्न हो जाता था। जिस घर में रजत पात्रों में भोजन किया जाता था, वहीं शंभूरतन जी ने एक नवीन की हस्ती का निर्माण किया।




दुकान के साथ ही लाखों के ऋण का भार भी शंभूरतन जी पर आ पड़ा। एक-एक करके सम्पत्ति विक्रय की जाने लगी। बनारस में चौक पर खड़ी हुई भारी इमारत भी बेंच देनी पड़ी। इन्हीं झंझटों के बीच प्रसाद की कॉलेज-शिक्षा भी छूट गई। वे आठवीं तक पढ़ सके। अब प्रसाद जी को प्रायः नारियल बाजारवाली दुकान पर बैठना पड़ता था। घर पर अब भी शिक्षा का क्रम बराबर चल रहा था। अपने गुरु रसमयसिद्ध ने उन्हें उपनिषद पुराण, वेद, भारतीय दर्शन का अध्ययन करने की प्रेरणा मिला। प्रसाद का समस्त साहित्य इसी का विस्तृत अध्ययन और चिंतन से अनुप्रमाणित है।

बनारस चौक से दाल मंडी में जो गली दाईं ओर मुड़ती है, उसी में लगभग चार हाथ पर नारियल बाजार में  सुंघनीसाहू की दुकान थी। उसी पर प्रसाद को बैठना पड़ता।

शंभूरतन जी शरीर की ओर ध्यान देते थे। स्वयं प्रसाद जी भी खूब कसरत करते थे। वह उन इने-गिने साहित्यकारों में से थे, जिन्हें स्वस्थ शरीर में एक स्वस्थ मस्तिष्क प्राप्त हुआ था। प्रसाद जी के पास सौंदर्य, धन और यश तीनों ही थे।

अब प्रसाद जी का परिवार एक वैभवशाली परिवार न रह गया था। ऋण के कारण सभी कुछ समाप्त हो गया था। किसी प्रकार शम्भुरतन जी बिखरे हुए व्यापार को सुधारने का प्रयास कर रहे थे। इसी समय प्रसाद जी की माता का देहांत हो गया। कवि माता के पुनीत दुलार और स्नेह से भी वंचित हो गया। संघर्षों के बीच भी प्रसाद जी का अध्ययन चल रहा था। इसी बीच उन्होंने ब्रजभाषा में सवैया, धनाक्षरी आदि लिखना आरंभ कर दिया था।

जयशंकर प्रसाद की अवस्था इस समय केवल सहस्त्र वर्ष वर्ष की थी। उन्हें जीवन का अधिक अनुभव न था। वे अपनी भावक्ता का आनंद हि ले रहे थे कि उन पर यह ब्रजपात हुआ। इस प्रकार केवल 5-6 वर्षों के भीतर ही प्रसाद ने तीन अवसान देखें पिता, माता और भाई। स्नेह-देवालय के महान श्रृंग गिर गए। वे अकेले ही रह गए, निः सहाय। ऐसे संकट काल में भारतीय दर्शन ने प्रसाद जी को नवीन प्रेरणा दी। सम्भवतः कामायनी का "शक्तिशाली हो विजयी बनो" उनके मस्तिष्क में उस समय गूंज उठा होगा। उनके चारों ओर विषमताएं खेल रही थी। लोग उन्हें अल्पावस्था का जानकर लूट लेना चाहते थे, पर उनके हाथों में यश था। उन्हें स्वयं अपना विवाह भी करना पड़ा। इसके अनन्तर उनके दो और विवाह हुए।

17 वर्ष की अल्पायु में ही एक भारी व्यवसाय और परिवार का उत्तरदायित्व भावुक प्रसाद पर आ पड़ा प्रसाद जी ने अपने व्यवसाय को देखना आरंभ किया। बाहर जब भी कोई व्यापारी आता तो वे स्वयं उससे बातचीत करते।  इत्र आदि बनाने के समय वह जाकर उनका पाग देख लिया करते और इसमें तो वे कन्नौज के व्यापारियों को भी मात दे देते थे। अपने पैतृक व्यापार को संभालने का उन्होंने भरसक प्रयास किया। गृह-कलह के पश्चात व्यापार की दशा बड़ी जर्जर हो गई थी। सुँघनी साहू का काशी में अब भी वही नाम था, किंतु व्यवसाय की दृष्टि से निःसंदेह वह पीछे था। प्रसाद जी ने आजीवन अपने विगत वैभव को पाने का प्रयास किया और अंत में सभी कुछ नियति के भरोसे पर छोड़ दिया। उन्होंने धीरे-धीरे समस्त ऋण चुका दिए थे।

बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात ही उन्होंने अपने जीवन में अनेक परिवर्तन कर लिए थे। किसी प्रकार का कोई व्यसन उन्हें नहीं था। प्रातः काल उठकर वे गंगा नदी की ओर भी भ्रमण के लिए निकल जाते थे। यदि उतना समय न होता, तो बेनियाबाग तक ही चले जाते। वहां से लौटकर कसरत करने के पश्चात ही नियमित रूप से लिखने बैठ जाते। स्नान-पूजन के पश्चात दुकान चले जाते। यहां पर भी रसिकों की मंडली जमा रहती। इसी दुकान के सामने प्रसाद जी ने एक खाली बरामदा अपने मित्रों के बैठने के लिए ले लिया था। नित्यप्रति संध्या समय वहीं पर बैठक होती थी। अच्छा खासा दरबार जमा रहता था। दुकान से लौटकर वे रात को देर तक लिखा करते थे। उनकी अधिकांश साहित्य-साधना संसार के प्रमुख कलाकारों की भांति रजनी के प्रहरों में ही निर्मित हुई।




कवि-जीवन के आरंभ में जिन व्यक्तियों से उन्होंने विशेष प्रेरणा ली, उनमें से एक उनके पड़ोसी मुंशी कालिन्दी प्रसाद और दूसरे रीवा निवासी श्री रामानंद थे। मुंशी कालिंदी प्रसाद उर्दू-फारसी के अच्छे विद्वान थे। प्रसाद ने इन विषयों के अध्ययन में उनसे प्राप्त पर्याप्त सहायता ली थी।

प्रसाद का साहित्यिक जीवन "इंदु" पत्रिका से प्रकाश में आया। इंदु मासिक पत्रिका थी जिसका समस्त कार्य प्रसाद की योजना के अनुसार होता था। इसके संपादक और प्रकाशक उनके भांजे अंबिका प्रसाद गुप्त थे।

प्रसाद जी का जीवन एक साधक के समान था। किसी प्रकार की सभा आदि में जाना उन्हें प्रिय ना था। इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि वे अभिमानी थे। वास्तव में वे संकोचशील व्यक्ति थे प्रायः घर अथवा दुकान पर ही अपने मित्रों के साथ बैठकर बातचीत किया करते थे। नियमित रूप से साहित्यिक व्यक्ति उनके पास आ जाते और फिर देर रात को देर तक कार्यक्रम चलता रहता। प्रसाद दूसरों को प्रायः उत्साहित करते रहते। वे मित्रों के साथ कभी-कभी नौका विहार के लिए चले जाते और सारनाथ भी घूम आते। उनके यहां बैठे हुए व्यक्ति प्रायः एक दूसरे से हास-परिहास किया करते और उन्हें कभी-कभी बिलकुल दरबारी ढंग से काम होने लगते। इस अवसर पर भी प्रसाद जी सदा मुस्कुराया करते। स्वयं हास-परिहास अथवा बातचीत में प्रायः खुलकर भाग नहीं लिया करते थे। भांग-बूटी नित्यप्रति ही छनती थी, किंतु वे प्रायः उसका सेवन नहीं करते थे। उनमें शिष्टता और शालीनता अधिक थी। वह संयत स्वभाव के व्यक्ति थे और उनके मित्रों का कथन है कि प्रायः मुखर नहीं होते थे।

अपने राजनीतिक जीवन में प्रसाद पूर्ण देशभक्त थे। उन्होंने स्वयं राजनीति में सक्रिय भाग नहीं लिया, किंतु अपने विचारों में वे पूर्णतया देशप्रेमी थे। कांग्रेस की अपेक्षा गांधी जी के व्यक्तित्व ने उन्हें अधिक प्रभावित किया था। वह देश भक्ति के साथ ही सांस्कृतिक उत्थान के भी पक्षपाती थे। अपने ऐतिहासिक नाटकों के द्वारा उन्होंने इसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पुनरुत्थान का प्रयास किया। भारतीय संस्कृति के प्रति मोह रखते हुए भी वे रूढ़िवादी नहीं थे जीवन में दीर्घ समय तक शुद्ध खद्दर पहनते रहे। जाती-पाती, छुआछूत, पाखंड आदि से वे कोसों दूर थे। एक बार जब उनकी जाति के व्यक्तियों ने उन्हें सभापति बना दिया तब उन्होंने उसे ऊपरी मन से स्वीकार कर लिया और बाद में तार दे दिया कि मैं न आ सकूंगा। काशी में अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर उन्होंने गांधी जी के दर्शन किए थे। शक्ति के उपासक होते हुए भी वे अहिंसा के पुजारी थे और बौध्द दर्शन की ओर अधिक झुके थे। उनकी धारणा थी कि करुणा ही मानव का कल्याण कर सकती है। आंसू में (आंसू उनके काव्य का नाम है) उन्होंने अपनी भावना का प्रतिपादन किया है। प्रसाद के संपूर्ण साहित्य में करुणा ममता का स्वर मिलता है।

प्रसाद के सम्पूर्ण जीवन की प्रेम-घटना को लेकर विद्वानों में पर्याप्त वाद विवाद हो चुका है। कुछ लोग तो अनर्गल धारणाएं बना लेते हैं। इसमें संदेह नहीं कि "आंसु" के वियोग-वर्णन के मूल में कोई अलौकिक आलंबन है। उसकी अनुभूति इतनी प्रत्यक्ष है कि उससे कवि की व्यक्तिक भावना का स्पष्ट परिचय मिल जाता है। उनके साहित्य में बिखरी हुई प्रेम और अतृप्ति की भावना इसका प्रमाण है कि जीवनानुभूति में कोई ऐसा प्रसंग अवश्य था, किंतु प्रसाद के काव्य में उक्त भावना का उदात्तीकरण भी होता गया है और अंत में वह वैयक्तिक घटना उच्चतर मानसिक और दार्शनिक भूमि पर रखी जा सकी है। उनके परवर्ती काव्य को देखने से पता चलता है कि सौंदर्य और प्रेम के विषय में उनकी बड़ी उदात्त भावना थी। प्रसाद ने अपने जीवन में अनेक उत्थान-पतन देखे थे। वैभव और अकिंचनता एक साथ उनके जीवन में आए थे। रजतपात्रों में भोजन करने वाले प्रसाद को अनेक वर्ष तक ऋणी रूप में रहना पड़ा। उनके आंतरिक जीवन में भी यही स्थिति थी। तीन-तीन नारियों का उनके जीवन में समावेश हुआ था। माता का दुलार उनसे यौवन के आरंभ के पूर्व ही विदा ले चुका था। मां के चले जाने के पश्चात जीवन पर्यंत उन्होंने अपनी भाभी की पूजा की। कवि के साहित्य पर दृष्टिपात से इतनी करने से इतना अनुमान अवश्य होता है कि उसे अपने जीवन में अधिक प्रेम और स्नेह मिला था।

प्रसाद जी की रचनाएं-

  • कानन कुसुम 
  • प्रेम पथिक
  • आंसू
  • झरना
  • लहर
  • कामायनी
इन्हें भी पढ़ें अगर मन है तो-

Saturday, November 2, 2019

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WhatsApp Update Hindi

WhatsApp fingerprint lock for Android smartphones now rolling out with update Hindi.

Android Phone के लिए WhatsApp Lock अब नये Update के साथ Roll Out हो गया है।
WhatsApp Update के साथ Android Phone पर Security के लिए Finger Print Lock विकल्प को Roll-out कर रहा है। Feature iPhones पर TouchID और FaceID Lock के समान काम करता है।

WhatsApp fingerprint lock
Finger Print Lock Option On WhatsApp


Highlights

  1. Android Smart Phone पर WhatsApp Users अब App Lock करने के लिए Finger Print Lock का उपयोग कर सकते हैं।
  2. Whats-App के अंदर से अलग-अलग Lock Setting दे रहा है।
  3. FingerPrint Lock Feature नवीनतम Update के साथ उपलब्ध है।





हम लंबे समय से और Beta Test के महीनों के बाद से इसके लिए WhatsApp New Version पूछ रहे हैं, यह अंत में यहां है। Android पर WhatsApp अब उपयोगकर्ताओं को App के लिए एक Fingerprint Unlock Authentication सेट करने की अनुमति देता है। इसका मतलब है कि अब आप अपने WhatsApp Chat को Biometric Security की एक अतिरिक्त Afresh के साथ Secure कर सकते हैं। और इसका मतलब यह भी है कि आप उन सभी Third Party App Lock को अलविदा कह सकते हैं या इस Feature की खातिर iPhone पर Switch करने की सोच सकते हैं।

अपने Current Blog Post में, WhatsApp ने घोषणा की है कि सभी Android User के लिए FingerPrint Lock प्रमाणीकरण। यह New Feature मूल रूप से Users को हर बार जब कोई व्यक्ति Phone पर App खोलता है, तो अपने FingerPrinting Data के साथ अपने WhatsApp को सुरक्षित करने की अनुमति देगा। Feature को पहले iPhones में रोल आउट किया गया था जहां WhatsApp ने अपने Users को Touch ID या Face ID Authentication के साथ App को Lock करने की अनुमति दी थी। Android Devise के लिए, WhatsApp ने अभी के लिए केवल FingerPrint प्रमाणीकरण का समर्थन किया है।

How To Enable FingerPrint Lock on WhatsApp

यदि आप अपने WhatsApp Chat के लिए Security की एक Advance Option चालू करना चाहते हैं, तो आपको Google Play Store से App को Update करना होगा। एक बार Update हो जाने के बाद, Users को Setting पर जाना होगा और Feature को Access करने के लिए Account Section के तहत Privacy Setting में जाना होगा। आपको Fingerprint Lock On करने का Option दिखाई देगा। उसे On कर देना है।

WhatsApp New Fingerprint Unlock Feature के संबंध में अधिक विकल्प दे रहा है। जैसे ही कोई App Close करता है या कोई विशिष्ट समय सीमा निर्धारित कर सकता है, उपयोगकर्ता WhatsApp को FingerPrint Authentication के लिए पूछना चुन सकते हैं। इसके अतिरिक्त, App सुरक्षा बढ़ाने के लिए सूचनाओं में संदेशों की सामग्री को छिपाने का विकल्प भी दिया गया है।

क्या होगा जब इसे चालु करेंगे ?





एक बार यह सुरक्षित (Save) हो जाने के बाद, जैसे ही कोई व्यक्ति इसे Open करेगा, WhatsApp Fingerprint डेटा मांगेगा। एक बार सत्यापन हो जाने के बाद, ऐप खुल जाएगा और उपयोगकर्ता सभी चैट और संदेशों का उपयोग कर सकता है। फीचर में आधुनिक इन-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट सेंसर के साथ पारंपरिक Capasitive FingerPrint Sensor वाले फोन पर काम करना चाहिए। अफसोस की बात है, अगर आपके फोन में फेस अनलॉक सिस्टम हैं, तो आप व्हाट्सएप को सुरक्षित करने के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं।

i Phone पर, WhatsApp उपयोगकर्ताओं को व्हाट्सएप Chat को सुरक्षित करने के लिए Touch ID के साथ-साथ Face ID पर भरोसा करने की अनुमति देता है। Face ID आधुनिक आईफोन मॉडल पर एकमात्र बायोमेट्रिक विकल्प है और इसलिए, IOS पर अभी के लिए समर्थन मौजूद है।


Conclusion -
यह Whatsapp का बहुत ही अच्छा Feature है जिसका उपयोग आप अपने डाटा के सुरक्षा के लिए कर सकते हैं। यह आपके एंड्राइड मोबाइल के लिए लॉन्च किया गया उपडेट है यह अपडेट 28 October 2019 को किया गया।

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Friday, November 1, 2019

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Hello and welcome friends इस पहले हमने बात किया था खोलने एवं बनने वाले औजार और नापने वाले औजारों के बारे में जो कि डीजल मैकेनिक में बहुत ही ज्यादा प्रयोग के लिए उपयोगी हैं।
आज हमें यहां पर बात करनी है नट बोल्ट वॉशर एवं locking युक्तियों के बारे में तो चलिए शुरू करते हैं।
Nut bolt washer and locking method

Nut bolt washer and locking method

Introduction
किसी भी मशीन में छोटे-बड़े अनेक भाग हो सकते हैं।  इन भागों को उनकी कार्य स्थिति के अनुसार आपस में जोड़कर एक मशीन का रूप दिया जाता है।  मशीन के इन भागों को आपस में जोड़ना या बांधना फास्टनर कहलाता है यह तीन प्रकार के होते हैं-

Types of Fasteners

  1.  अस्थाई फास्टनर, 
  2. अर्ध स्थाई  फास्टनर, 
  3. स्थाई फास्टनर 






अस्थाई फास्टनर


अस्थाई फास्टनर अस्थाई में किसी मशीन के भागों को बिना किसी तरह के हानि पहुंचाए पुरी तरह खोला व जोड़ा जा सकता है। इन कार्यों के लिए नट बोल्ट स्क्रू लॉकिंग तथा वासर आदि का प्रयोग किया जाता है तथा इन साधनों को ही फास्टनर या बंधक कहा जाता है।

अर्ध स्थाई फास्टनर 

में बोल्ट आता है जिसको की कसकर फिर से निकाला जा सकता है।
अर्ध स्थाई इस प्रकार के फास्टनर की बात करें तो यहां अस्थाई होता है यानी कि इसे भी अलग किया जा सकता है तथा इससे मशीन को हानि पहुंच सकती है वह यहां निकालते समय बहुत ज्यादा सावधानी रखने की जरूरत पड़ती है और अर्ध स्थाई फास्टनर में जैसे कि नट है उसका उपयोग नहीं कर सकते नट के जगह पर ऐसी चीजों का उपयोग किया जाता है जैसे रिपीट का प्रयोग किया जा सकता है ठीक है

स्थाई फास्टनर

इस प्रकार के फास्टनर का प्रयोग किसी मशीन को स्थाई रूप से जोड़ने के लिए किया जाता है और यहां एक प्रकार से वेल्डिंग करते हैं उसी प्रकार से होता है और यहां बहुत मुश्किल से अलग होते हैं अगर इससे किसी पार्ट दो पाठक को जोड़ दिया जाता है तो उसे निकालना मुश्किल हो जाता है या तो उसे तोड़ना पड़ता है या उसे किसी कटिंग टूल से काटने की आवश्यकता हमें पड़ती है




सारांस 

इस प्रकार हमने इस पोस्ट में आज पढा बंधक टूल के बारे में जिसे हम फास्टनर टूल के नाम से भी जानते हैं।  आपको यह जानकारी कैसी लगी मेरे साथ जरुर शेयर करें अगले पोस्ट में हम आपको बताने वाले हैं इसी फास्टनर से जुड़ी अस्थाई फॉरस्टनर के बारे में तो बने रहे मेरे साथ आज के लिए बस इतना ही धन्यवाद।

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