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Sunday, September 8, 2019

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Hello and welcome साथियों आपने Global Warming के बारे में तो सुना होगा। आज मैं इसी के बारे में बातें करने वाला हूँ क्या होता है? ग्लोबल वार्मिंग? और इससे कैसे निपटना है? क्या कारण है Global Warming का और इससे कैसे नुकसान पहुंच रहा है। इन सभी तमाम बातों पर आज मैं चर्चा करने वाला हूँ तो lets Start baby






ग्लोबल वार्मिंग (Kya hai Global Warming)

Hey Friends आपने अनुभव किया होगा की हर साल हमारे लिए गर्मी का दिन बहुत ही तकलीफ वाला होता जा रहा है जिसके कारण धूप में भी निकलना बहुत कठिन होता जा रहा है। और साथ ही साथ प्रदूषण भी इतना ज्यादा होता जा रहा है की जीना मुश्किल होता जा रहा है आपने कई बार दिल्ली मुम्बई जैसे शहरों के प्रदूषण के बारे में भी सुना होगा की वहां कितना ज्यादा प्रदूषण का स्तर पहुंच चुका है लोगों को गर्मी के दिनों में बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
तो ग्लोबल वार्मिंग हमारे पृथ्वी पर पड़ने वाला ऐसा रभाव है जिसके कारण न तो प्रदूषण में कमी आ रही है और न ही तापमान में कमी आ रही है।
तो इस प्रकार से ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) को परिभाषित किया जा सकता है-
जैसे की हमारे क्षेत्र का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है उसी प्रकार पूरे विश्व का या कहें लगातार पृथ्वी के तापमान में भी लगातार वृध्दि होती जा रही है।
"इस प्रकार साल दर साल पृथ्वी का तापमान का बढ़ना Global Warming कहलाता है।"

क्या कारण है Global Warming का
(What is the Reasion of Global Warming)





दोस्तो आपको बता दें की ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) का मुख्य कारण कार्बन-डाइऑक्साइड, मेथेन तथा क्लोरो-फ्लोरो कार्बन की मात्रा में अनावश्यक वृद्धि है। जिसके कारण Global Warming बढ़ते जा रहा है। पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ते जा रहा है। जिसके कारण लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त होता जा रहा है।

कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा क्यो बढ़ रही है?

दोस्तो जैसे की आप जानते है की अब बढ़ती जनसंख्या तथा अन्य कारणों के कारण पेड़-पौधों की संख्या लगातार कम होती जा रही जिसके कारण कार्बन-डाइऑक्साइड का उपयोग पौधों की संख्या कम होने से उचित मात्रा में नहीं हो पाता है और सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है। इसके साथ ही और भी बहुत से कारण है जैसे हमारे द्वारा गन्दगी को बढ़ावा देना और साफ सफाई न रखना।

मेथेन की मात्रा क्यों बढ़ रही है?

हमारे द्वारा समुद्रों से निकाले जाने वाले विभिन्न प्रकार के ईंधनों के द्वारा इसका उत्पादन किया जाता है और यह वायुमण्डल में तेजी से फैल रहा है जिसके कारण यहां के वातावरण में बहुत ही ज्यादा वृद्धि हो रही है आप जब खाना बनाते है किसी सिलेंडर में भरे गैस से तब आपने उसकी गर्मी जरूर महसूस की होगी की वह कितना गर्म होता है थी उसी प्रकार यही गैस पृथ्वी के तापमान को भी गर्म कर रहा है। इसका उत्पादन जानवरों द्वारा जैसे गाय और बैल के अपशिष्ट के द्वारा भी निकलता है और भी बहुत सारे कारण है जैसे की कारखाने के जल के द्वारा तथा उसके धुंए के कारण भी मेथेन गैस का निष्काशन किया जाता है।

CFC यानी क्लोरो फ्लोरो कार्बन

इस प्रकार के गैस का उत्पादन हमारे ओजोन परत के कम होने के कारण और अधिक बढ़ता जा रहा है। और ओजोन परत को हानि कार्बन डाईऑक्साइड तथा मेथेन से सबसे ज्यादा हो रहा है।

ग्लोबल वॉर्मिंग से बचने के उपाय
Protection For Global Warming


  1. इससे बचने के लिए गन्दगी कम करना होगा। 
  2. औद्योगिक उत्पादन को ज्यादा बढ़ावा न देते हुए मानव निर्मित वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। 
  3. कार्बन-डाईऑक्साइड की मात्रा को कम करने के लिए पौधे लगाए जाने चाहिए। 
  4. मेथेन गैस का उत्पादन सबसे ज्यादा द्रव्य ईंधन द्वारा होता इस कारण इसको कम करने के लिए उचित व्यवस्था करना चाहिए। 

Conclusion :-





  • यह सिर्फ हमारे देश की ही समस्या नहीं है बल्कि यह पूरे विश्व की समस्या है इसको लेकर पूरे विश्व के द्वारा संगठन भी बनाये गए है और कई सारे ऐसे भी देश है जो की इसे अपने लिए बहुत ही ज्वलन्त समस्या बता रहे हैं। 
  • आपको बता दूँ की चीन में वायु प्रदूषण इस हद तक पहुच गया है की अब वहां शुद्ध हवा के लिए कैन का इस्तेमाल होने लगा है। अगर ऐसे ही स्थिति बनी रही तो वो दिन दूर नहीं है जब भारत जैसे देश में भी इसी प्रकार के कैन बिकने लगे।  
  • भारत में ऐसे तो अन्य देशों के हिसाब से बहुत ज्यादा मात्रा में खेती की जाती है जिसके कारण यहाँ अभी यह परेशानी सबसे ज्यादा गर्मियों के मौसम में देखने को मिलता है।
  • ग्लोबल वार्मिंग के कारण आज बड़े-बड़े बर्फ से बने ग्लेशियर पिघलने लगे हैं।  







Thursday, February 7, 2019

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साथियों आप सभी तो जानते ही है की वर्ष 2018 में अभी हाल में राज्यसभा का चुनाव हुआ उसमें कई मामले सामने आये थे तो उसी से निपटने के लिए या कहें चुनाव में होने वाले हेरफेर को रोकने के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने एक एप्पलीकेशन लॉन्च किया है जिसमें आप अपनी प्रतिक्रया किसी साजिस के विरुद्ध दे सकते हैं।
तो चलिए इसके बारे में पूरे Detail से जानते हैं -
C vigil app image

क्या है, C-VIGIL APP ?


दोस्तों C-VIGIL app एक एंड्रॉइड मोबाइल एप्प है जिसको भारत निर्वाचन आयोग द्वारा लॉन्च किया गया है। ये एप्प सिर्फ एंड्रॉइड मोबाइल के लिए है।

C-VIGIL app की खास बात क्या है ?






दोस्तो इस एप्प की खास बात इस प्रकार से है -
1. इस एप्प की सहायता से कोई भी चुनाव के चलते हो रहे आचार सहिंता उल्लंघन की शिकायत कर सकते हैं।
2. इस एप्प की मदद से आप सिर्फ ताजा तस्वीरें ही इस एप्प में अपलोड कर सकते हैं। पहले से ली तस्वीर को आप इसमें उपलोड नहीं कर सकते हैं।
3. ये जीपीएस द्वारा ट्रैक किया जाने वाला एप्प है जिस कारण से आप जिस जगह पर किसी घटना की खबर देते हैं तो वहां के रिकॉर्ड ( उस जगह ) के बारे में आसानी से पता लगाया जा सकता है।
4. सी-विजिल एप्प के द्वारा जब आप शिकायत करते हैं तो उस शिकायत का निराकरण 100 मिनट के अंदर किया जाना है।
5. सी-विजिल एप्प की मदद से किसी भी प्रकार के अफसर के पास जाकर शिकायत नहीं करना पड़ेगा।   
6. आचार सहिंता के उल्लंघन की खबर देर से मिलने के कारण दोषी बच जाते थे लेकिन इस एप्प की मदद से अब शिकायत जल्दी होगा और वह सबूत के उपस्थिति से जल्दी निराकरण भी होगा।
7. दोस्तों अभी चार राज्यों में आचार सहिंता लागु है जिसको मद्देनजर रखते हुए इसे लॉन्च किया गया है।
8. इस एप्प में आपको शिकायत फोटो लेने के 5 मिनट के अंदर किया जाना है।
9. इस एप्प की मदद से आम आदमी भी इसकी शिकायत कर सकते हैं।
10. सी-विजिल एप्प में कार्यवाई के बाद शिकायत का स्टेट्स अपडेट किया जायेगा और शिकायत करता ऐप के माध्यम से भी उसका स्टेट्स चेक कर सकेगा।
11. अकाउंट बनाने के लिए User का Mobile Number, राज्य , जिला , विधानसभा और निवास का पता दर्ज करना होता है।
12. इस एप के माध्यम से कोई User शिकायत करता है तो उसकी जानकारी गोपनिय रखी जाती है।
13. C-VIGIL App के माध्यम से रिपोर्ट करने पर आपको एक पंजीयन नम्बर दिया जाता है जिसे आप बाद में भी युज कर सकते हैं। इस नम्बर के माध्यम से वह आपने कम्प्लेन की स्थिति चेक कर सकता है।
14. शांतिपूर्ण तरीके से मतदान के लिए इस एप्प का निर्माण किया गया है।
15. इस एप्प की और अधिक जानकारी के लिए इस एप्प के लॉन्च के समय हुए कॉन्फ्रेन्स का वीडियो देखें। जिसका लिंक नीचे है।


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Saturday, December 22, 2018

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              इलेक्ट्रॉन का प्रवाह

इलेक्ट्रोन हमेसा पोसिटिव से नेगेटिव की ओर बहता है इसको समझने के लिए एक

एक प्रयोग करे जिसकि जानकारी निम्नानुसार है ...

आवश्यक सामग्री - 

1. दो बिकर 2. एक कॉपर रॉड                                 3.एक सिल्वर रॉड 4.वायर  5.साल्ट ब्रिज(KNO3(aq)) 6.NO3                              सल्युसन 7.U रॉड 8.वोल्ट मीटर ।

प्रयोग विधि- 


सबसे पहले दोनो  बिकर मे no3 का                          घोल ले अब उसमें एक एक करके                                कॉपर तथा सिल्वर रॉड डालें अब दोनो                       रॉड के ऊपरी सिरे से एक एक
                    वायर निकालेऔर उस वायर को                                गैलवेनो मीटर से जोड दें । दोनो               विलन का समागन करने के लिये सल्ट ब्रिज KNO3(aq) का प्रयोग करें ।
परिणाम- आप देखेंगे की गैल्वेनो मीटर मे धारा प्रवाहित होने लगता है ।
सावधानी- सम्हलकर प्रयोग करें ।


what is electronic cell
electric cell

electronic cell diagram
electric cell
 चित्र धारा प्रवाह ।How to work a electric sell

              

Monday, October 29, 2018

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साथियों कल हमें बात किया था , के बारे में आज मैं आपको न्यूटन के गति के नियम के बारे में बताने वाला हूँ तो चलिए शुरू करता हूँ। न्यूटन के गति के नियम की विशेषता इस प्रकार है-
Newtons first, second and third law

Newtons law for motion


न्यूटन के गति के प्रथम नियम की विशेषता -


(i) वस्तुओं की आरम्भिक अवस्था ( गति या विराम की अवस्था ) में स्वतः परिवर्तन नहीं होता है।
(ii) प्रथम नियम को " जड़त्व का नियम " भी कहा जाता है।
(iii) प्रथम नियम से बल की परिभाषा प्राप्त होती है।
उदाहरण -
1. चलती हुई गाड़ी के अचानक रुकने पर उसमें बैठे यात्री का आगे की ओर झुक जाना ।
2. रुकी हुई गाड़ी के अचानक चल पड़ने पर उसमें बैठे यात्री का पीछे की ओर झुक जाना।
3. गोली मारने पर कांच में गोल छेद हो जाना ।
4. कम्बल को डंडे से पीटने पर धूल-कणों का झड़ना।

इसी प्रकार से दूसरा नियम इस प्रकार है-

(i) वस्तु के संयोग में परिवर्तन की दर उस पर लगने वाले बल के समानुपाती होती है तथा परिवर्तन बल की दिशा में होता है ।
(ii) द्वितीय नियम से बल का व्यंजक ( F=m*a ) प्राप्त है ।

उदाहरण-

(1) तेज गति से आती हुई गेंद को कैच करते समय क्रिकेट खिलाड़ी अपने हांथों को पीछे की ओर खींचता है ।
(2) गाड़ियों में स्प्रिंग एवं शॉक एब्जॉरबर का लगाया जाना।
(3) कील को अधिक गहरे तक गड़ाने के लिए भारी हथौड़े का प्रयोग किया जाता है।
(4) कराटे खिलाड़ी द्वारा हाँथ के प्रहार से ईंटों की पट्टी तोड़ना।

Khairagar vishvvidhalaya

न्यूटन के गति के तृतीय नियम -

(i) प्रत्येक क्रिया के बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
(ii) तृतीय नियम को ' क्रिया-प्रति क्रिया का नियम ' भी कहते हैं।

उदाहरण-

1. रॉकेट का आगे की ओर बढ़ना ।
2. बन्दूक से गोली निकलने पर पीछे की ओर झटका लगना।
3. नाव से जमीन पर कूदने पर नाव का विपरीत दिशा में अथवा पीछे हटना।

साथियों आपको ये जानकारी कैसे लगी मेरे साथ share करें -
अन्य जानकारियों के लिए नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें

सिलेंडर hed ke prkar

डीजल मैकेनिक कोर्स क्यों करें

पिस्टन क्या है।

engine-cylender-head
thanks so much for supporting me

Friday, October 26, 2018

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ऐस्कैरिस लंब्रीकॉइड़ीज

प्रकृति एवं वास ( Habit and Habitat )-
ऐस्कैरिस लंब्रीकॉइडीज मनुष्य की आंत का अंतः परजीवी है। यह विश्वव्यापी है। वितरण( Distribution )-
1. यह संसार के सभी क्षेत्रों में मिलने वाला निमेटोड है। विशेषतया यह भारत , चीन, फिलीपीन्स, कोरिया और पैसीफिक आइलैण्ड में मिलता है।
लक्षण ( Character )
1. यह प्रचलित भाषा में राउंड वर्म कहलाता है।
2. इसका शरीर लम्बा, बेलनाकार तथा तर्कुआकार होता है।
3. मादा सदैव नर से बड़ी होती है।
4. नर का पश्च सिरा सदैव मुड़ा हुआ होता है।
5. इसके शरीर की सतह पर धारियां दिखाई देती हैं जो की मोटी तथा लचीली उपचर्म की अनुप्रस्थ स्ट्रियेशन्स के कारण होती है।
6. इसके शरीर पर चार अनुदैधर्य वर्ण रेखाएं या स्ट्रीक्स या लकीरें होती हैं, जो कि पूर्ण लम्बाई में फैली रहती हैं।
7. इनको पृष्ठीय,अधर तथा पाशर्व स्ट्रीक्स कहते हैं।
8. इनके अग्र भाग में मुख स्थित होता है,जो तीन होंठों से घिरा रहता है।
9. शरीर के पश्च सिरे से लगभग 2 मि.मी. ऊपर एक चक्राकार छिद्र स्थित होता है,जिसे गुदा कहते हैं।
10. नर में क्लोयका से दो पतले पीनियल सीटी निकले रहते हैं।
11. मादा की अधर सतह पर अग्र सिरे से लगभग एक तिहाई दूरी पर छिद्र स्थित होता है, जिसे मादा छिद्र कहते हैं।

                     टीनिया सोलियम 


ये एक कृमि के समान जीव है जिसका निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है-वर्गीकरण( classification ) 
प्रकृति एवं वास ( Habit and habitat ) 
( i ) टीनिया सोलियम एक बहुत ही प्रचलित टेप वर्म है,जो कि सुअर का मांस खाने वाले प्रदेशों में पाया जाता है।
( ii ) इसका प्रौढ़ कृमि मनुष्य की आंतों की भित्ति में एक सिर से चिपका हुआ पाया जाता है तथा बाँकी शरीर स्वतन्त्रतापूर्वक आंतों की गुहा में लटका रहता है।वितरण ( Distribution )यह भारत,चीन,चेकोस्लोवाकिया और जर्मनी में पाया जाता है। लक्षण ( Characters )-( i ) टीनिया सोलियम फिते के समान होता है,जिसके अग्र सिरे पर एक गांठ सी पायी जाती है,जिसे सिर या स्कोलैक्स कहते हैं।
( ii ) स्कोलैक्स नाशपाती के आकार का होता है जिसका अग्र सिरा एक प्रवर्ध के रूप में बाहर निकला रहता है,जिसे रॉस्टेलम कहते हैं। इसके आधार के चारों तरफ दो पंक्तियों में लगभग 28 मुड़े हुए नुकीले हुक्स पाये जाते हैं।
( iii ) रॉस्टेलम आगे की ओर निकला हुआ तथा आकुंचनशील होता है। ये चिपकने का एक अंग होता है।
( iv ) चार प्यालेनुमा चिपकाने वाले अंग स्कोलेक्स के चारों तरफ पाये जाते हैं जिन्हें चुषक कहते हैं।
( v ) सिर के पीछे एक छोटी तथा संकरी गर्दन होती है।
( vi ) बाँकी का शरीर स्ट्रोबिला कहलाता है।
( vii ) सट्रोबिला बहुत से देहखण्डों का होता है।
( viii ) इनका जीवन चक्र जटिल होता है। इसका माध्यमिक पोषक सुअर होता है।
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                   सर्पगन्धा ( Serpentine )

वानस्पतिक नाम - रोल्फिया सरपेण्टाइना

कुल - ऐपोसाइनेसी
इस पौधे की जड़ें सर्प के समान होती है। अतः इसका साधारण नाम सर्पगन्धा है। सर्पगन्धा औषधि का प्रयोग भारत में मस्तिष्क के विकारों के उपचार के लिए किया जा रहा है।  सोलहवीं शताब्दी में जर्मनी के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. लियोनार्ड रोवोल्फ के नाम पर ही इस पौधे का नाम रोल्फिया रखा गया है। यह भारत में भी उगाया जा रहा है। यह औषधीय पौधा पाकिस्तान, बर्मा, जावा तथा नेपाल एवं श्रीलंका में भी पाया जाता है।
        रोल्फिया सरपेण्टाइना का पौधा लगभग 1/2 मीटर ऊंचा झाड़ीनुमा होता है। इसकी जड़ें पूर्ण विकसित होती हैं, जिनका आकार सर्प के समान होता है, जो 10-10 इंच लम्बे होते हैं। तना पीले रंग के होते हैं, जिससे लेटेक्स निकलता है। पत्तियां भालाकार, चकनी होती है, जो चक्रों में विन्यस्त होती है। पुष्पक्रम साइमोज प्रकार का होता है,जिस पर सफेद अथवा गुलाबी रंग के गेमोपेटलस पुष्प लगे होते हैं। पौधें में पुष्पन अप्रैल से नवम्बर तक होता है।
औषधि का स्त्रोत
पौधे की सुखी हुई जड़ें तथा जड़ की छाल बहुत महत्वपूर्ण होती है। जिससे औषधि प्राप्त की जाती है। दो से तीन वर्ष पुराने पौधे की जड़ों को जमीन से निकाल कर पृथक कर लिया जाता है। और फिर सुखाकर संग्रहित कर लिया जाता है और औषधि प्राप्त की जाती है। आयुर्वेदिक औषधि के रूप में सुखी जड़ों को पाउडर बनाकर उपयोग में लिया जाता है। एलोपैथी में इनके जड़ों से रेसरपीन नामक एलकेलॉइड निकाली जाती है, जिसका उपयोग अनेक प्रकार से औषधि के रूप में किया जाता है।
औषधीय महत्व -
1. यह औषधि ब्लड प्रेशर को कम करती है। अतः मानसिक तनाव एवं ब्लड प्रेशर वाले रोगियों का इलाज इसके द्वारा किया जाता है।
2. इस औषधि का उपयोग पागलपन तथा नींद न आने के उपचार के लिए किया जाता है।
3. पत्तियों का सत्व आँखों के रोग को दूर करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
4. इनकी जड़ों से निकले सत्व का प्रयोग आंत में पाये जाने वाले कृमि को नष्ट करने के लिए औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।
इनके पौधों से निम्न दवाइयाँ प्राप्त की जाती हैं-
1. रोल्फिया सरपेण्टाइना से गोलियां ग्लूकोनेट लि. कलकत्ता में बनाई जाती है।
2. इस पौधे से रेल्फिन नामक गोलियां तथा टॉनिक- बंगाल केमीकल एण्ड फार्मेस्युटीकल वर्क्स, कलकत्ता द्वारा बनाई जाती है।
3. सरपिना या S 117 नामक दवा हिमालिया ड्रग कम्पनी देहरादून द्वारा तैयार की जाती है।
4. रोडिक्सिन नामक गोलियां - साराभाई कैसीबामिकल्स, अहमदाबाद द्वारा तैयार की जाती है।
5. एड़ेल्फेन नामक दवा सीबा, इंडिया लि. बम्बई द्वारा तैयार किया जाता है।
6. सरपेसिल नामक दवा , फारमा लि. बासले , स्वीट्जरलैंण्ड द्वारा तैयार की जाती है।
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                 प्लैनेरिया या डयूँजीसिया ( PLANARIA OR DUGESIA ) 

प्रकृति एवं वास 
( 1.) प्लैनेरिया स्वच्छ पानी के तालाबों, स्रोतों तक रूके हुए पानी एवं खारे पानी में पाये जाते हैं।
( 2.) अधिकतर ये पत्थरों के नीचे , पौधों के ऊपर तथा पत्तियों के नीचे नम स्थानों पर पाये जाते हैं।

वितरण (Distribution) 


( 1.) सामान्यतः यह गर्म देशों में पाया जाता है। विशेषकर यह भारत, यु.एस. ए. और यु.के. में पाया जाता है।

लक्षण ( Characters ) 

( 1.) इनके शरीर का आकार लम्बा एवं चपटा जिसका अग्र सिरा कोणीय या गोल तथा पश्च सिरा नुकीला होता है।
( 2.) इसके सिर के पाशर्व तरफ से थोड़ा या बहुत कोणीय प्रवर्धन निकला रहता है, जिन्हें ऑरीकल्स कहते हैं तथा रनगहीं भाग में एक जोड़ी आँखें पायी जाती है।
( 3.) मुख शरीर के केंद्र में स्थित होता है, जिसके पीछे एक जनन छिद्र पाया जाता है।
( 4.) शरीर का रंग काला या कत्थई होता है।
( 5.) इसमें बहुत से वृषण पाये जाते हैं, जो कि फैरिंक्स के पीछे तक फैले रहते हैं।
( 6.) कभी-कभी इनमें एसेसरी इन्टेस्टाइनल ट्रन्क्स भी पाये जाते हैं।
( 7.) इनकी ओवीडकट्स बुर्सा के वृन्त में प्रवेश करती है।
( 8.) इनका भोजन छोटे-छोटे क्रस्टेशियंस, स्नेल्स, जलीय कीट तथा अन्य छोटे-छोटे जन्तु होते हैं, ये कभी-कभी मरे हुए जन्तुओं को भी भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं।
( 9.) इनके अंदर पुनर्जनन की शक्ति पाई जाती है तथा प्रजनन खण्डन के द्वारा होता है।
(10.) अण्डे कोकून्स के अंदर दिए जाते हैं जो पत्थरों तथा पौधों से चपके रहते हैं।

Monday, October 22, 2018

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दोस्तों सभी जानतें हैं की सभी जंतुओं में श्वसन की क्रिया होती है और श्वशन के माध्यम से ही सभी जीव जीवित रहते हैं। लेकिन श्वशन के साथ पानी भी आवश्यक होता है। तो आज हम बात करते हैं पौधों में जल अवशोषण के बारे में सबसे पहले हम आपको बताते हैं

पौधों के जल अवशोषक अंग 

प्रायः पौधों में जल का अवशोषण मूल(जड़) के द्वारा होता है,लेकिन कुछ पौधों में जल का अवशोषण पत्तियों तथा तनों के द्वारा भी होता है। जलोदभीद(hydrophyte) पादपों(पौधों) में जल का अवशोषण प्रायः सामान्य सतह के द्वारा होता हैं।

वुड(wood,1925) के अनुसार कुछ पौधों जैसे कोचिका बेवोसिया (kochia baosia) तथा रेगोडिया(rhagodia) आदि जल अवशोषण वायुमण्डल से करते हैं। इसी प्रकार का जल अवशोषण अंगूर(vits),चुकन्दर(beta), मूंग(phaseolus), बैगन(solanum), तथा मिर्च (Lycopersicum) में भी पाया जाता है।






इस प्रकार पत्तियों द्वारा जल का अंतर्ग्रहण(uptake) निम्न बिंदुओं द्वारा प्रभावित होता है--

( i ) एपिडर्मिस तथा क्यूटिकिल की संरचना एवं पारगम्यता(permeability)
( ii ) पत्ती की सतह पर रोमों की उपस्थिति।
( iii ) एपिडर्मिस के समीप स्थित मृदुतक ( Parenchyma ) कोशिकाओं में जल की कमी।
जल अवशोषित करने वाले अंग ( Water Absorbing Organs )
पौधों में जल का अवशोषण जड़ की सम्पूर्ण सतह द्वारा नहीं होता है,अपितु मूल के सिरे ( ROOT TIP ) के समीप मूल रोमों (ROOT HAIR ) से होता है। मूल के सिरे को चार भागों में बाँटा जा सकता है।

( 1 ) मूल टोपी प्रदेश ( Root cap zone ) - 
 यह मूल के सिरे पर एक आवरण के रूप में उपस्थित होता है जो मूल को मिट्टी के कणों से रक्षा करता है।

( 2 ) परविभाजी प्रदेश ( meristemetic zone ) - 
इस प्रदेश (क्षेत्र ) की कोशिकाएं लगातार विभाजित होती रहती हैं तथा विभाजित होकर नई कोशिकाएं बनती रहती हैं। इस प्रदेश की कोशिकाओं द्वारा श्वशन तथा खनिज लवणों का अवशोषण तीव्र गति से होता है।

( 3 ) दीर्घ प्रदेश (Zone of Elongation)
इस प्रदेश की कोशिकाएं जड़ की लम्बाई बढाती है।

( 4 ) मूल रोम प्रदेश ( root hair zone )-
यह प्रदेश(भाग) दीर्घी प्रदेश के ठीक पीछे होता है,जिस पर अनेक एक कोशिकीय मूल रोम पाए जाते हैं। इसी प्रदेश में मूल रोमों द्वारा सबसे अधिक जल का अवशोषण होता है। इस प्रदेश के ऊपर परिपक्व प्रदेश स्थित होता है।

जल अवशोषण की क्रिया विधि

पौधों में जल अवशोषण की क्रिया मूल रोमों द्वारा होती है। यह मूल रोम मिट्टी के कणों के सम्पर्क में रहते हैं तथा परासरण क्रिया से कोशिका जल का अवशोषण करते हैं। प्रत्येक मूल रोम में एक रिक्तिका होती है जो कोशिका रस से भरी रहती है। मूल रोम का कोशिका द्रव्य एक प्रकार की अर्धपारगम्य झिल्ली का कार्य करता है जिसमें होकर भूमि जल तथा लवणों के आयन अंदर विसरित होते हैं।



मूल रोम कोर्टेक्स कोशिकाओं से सम्बंधित रहते हैं।  ये एंडोड़र्मिस तक फैले रहते हैं एण्डोर्मिस के भीतर की ओर पेरीसायकिल कुछ स्थानों पर प्रोटोजाइलम से जुड़ी रहती है। इस प्रकार मूल रोमों द्वारा जाइलम तक जल की गति होती रहती है।

ये अवशोषण की क्रिया दो प्रकार की होती है---

( 1. ) सक्रिय अवशोषण -

यह प्रायः उन पौधों में होता हैं जिनकी मिट्टी में पानी की पर्याप्त मात्रा होती है अथवा पौधों में वाष्पोत्सर्जन बहुत कम होता है। सक्रिय अवशोषण निम्नलिखित दो विधियों द्वारा होता है

( i ) सक्रिय अवशोषण के प्रासरणीय सिद्धांत --

  मूल रोम मिट्टी से अन्तः परासरण द्वारा जल अवशोषण करते हैं जिससे मूल दाब बढ़ जाता है। परासरण सिद्धांत के अनुसार जल अवशोषण, प्रसरण दाब की प्रवणता के अनुसार होता है। यदि जाइलं रस का परासरण विभव , मृदा विलयन से अधिक है तो जल अवशोषण मूल के जाइलम द्वारा होने लगता है। इस सिद्धांत को सर्व प्रथम अटकिन्स 1916 तथा प्रीस्टले 1922 ने दिया था। उन्होंने बताया की जल का अवशोषण मृदा जल तथा कोशिका रस के परासरणीय अंतर के फलस्वरूप होता है। प्रायः मृदा जल का परासरण दाब कम 1.ATM तथा कोशिका रस का अधिक 2 ATM होता है, अतः जल का अवशोषण स्वतः होता रहता है और कोई उपापचयी ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती तथा कोशिका रस का अधिक DP ( परासरण दाब ) होने से अर्धपारगम्य झिल्ली से अंतः परासरण द्वारा मृदा जल कोशिका रस में आ जाता है।

इस मत को अनेक वैज्ञानिकों ने मान्यता नहीं दिया क्योकि इस मत के अनुसार ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है, किन्तु कोशिका में लवणों का सन्तुलन रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

         विभिन्न वैज्ञानिकों का मत है की जल अवशोषण परासरण की क्रियाविधि द्वारा होता है, क्योंकि मूल दाब तथा जाइलम रस के उच्च परासरण दाब में घनिष्ट सम्बन्ध होता है। अटकीन्स 1916 का कथन है कि समीपस्थ परिन्काइमी कोशिकाएं जाइलम वेसिकल्स में शर्करा स्त्रावित करती है। प्रीस्टले 1922 के अनुसार कोशिकाओं के पदार्थ जो जाइलम अवयव को पृथक करते हैं आवश्यक विलय प्रदान करता है। एंडरसन एवं हाउस 1967 के अनुसार जीवित कोशिकाओं के जाइलम अवयवों द्वारा लवणों का अवशोषण होता है।






( ii ) सक्रिय अवशोषण का अपरासरण सिद्धान्त

प्रसिद्ध वैज्ञानिको, बेनट क्लार्क आदि 1936 थीमेन 1951 ,बोगेन एवं प्रेल 1953 के अनुसार पौधों में सक्रिय जल अवशोषण नॉन ऑस्मोटीक विधि द्वारा होता है। उन्होंने बताया की जल का अवशोषण , सांद्रण प्रवणता के विपरीत होता है। इस प्रकार के सक्रिय अवशोषण के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पौधों की जड़ों को यह ऊर्जा, मूल कोशिकाओं की सक्रिय उपापचयी क्रियाओं जैसे श्वसन द्वारा प्राप्त होती है।

( 2 ) निष्क्रिय अवशोषण  --

निष्क्रिय अवशोषण पौधों में जल की कमी तथा अधिक वाष्पोत्सर्जन  वाली दशाओं में होता है जिससे पत्ती की कोशिकाओं का DPD अधिक हो जाता है। अतः ये कोशिकाएं जाइलम कोशिकाओं से जल खीचने लगती है जिसके फलस्वरूप जाइलम कोशिकाओं में तनाव उत्पन्न हो जाता है तथा कोर्टेक्स की  कोशिकाओं में पानी खींचने लगता है। इस क्रिया द्वारा कोर्टेक्स की कोशिकाओं में खिंचाव  उत्पनन हो जाता है जो मिट्टी से पानी खींचने लगती है अर्थात निष्क्रिय अवशोषण में जल परासरण द्वारा अवशोषन नहीं होता है वरन् उत्पन्न तनाव के कारण जल का अवशोषण होता है। अतः जड़ों मे DPD उत्पन्न हो जाता है जो जड़ की एपीडर्मल कोशिकाओं से जाइलम कोशिकाओं तक बढ़ता चला जाता है।

उपरोक्त परिस्थितियों में जड़ रोम के कोशिका रस में कमी -3 से -5 तक बढ़ जाती है जबकि मृदा जल का DPD सदैव -1 bar से कम रहता है। मूल रोम के उच्च DPD के फलस्वरूप अन्तः प्रसारण द्वारा जल अवशोषण होता है।

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संयोजकता बन्ध सिद्धांत का परिचय 

संयोजकता बन्ध सिद्धांत का प्रतिपादन लाइनस पॉलिंग तथा जे. एल. सलेटर (1935) ने किया। यह सिद्धांत आद्य अवस्था के मध्य धातु आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, बन्धन के प्रकार तथा प्राप्त संकुल की ज्यामिति एवं उनके चुम्बकीय गुणों की व्याख्या करने में समर्थ है, किन्तु इसके उपरांत भी इस सिद्धांत में निम्नलिखित दोष हैं।

संयोजकता बन्ध सिद्धांत की सीमाएं





( i ) यह सिद्धांत चार उपसहसंयोजक संख्या के संकुलों की ज्यामिति की भविष्यवाणी करने में असफल है। उदाहरण के लिए [Cu(NH3)4]2+ तथा [Zn(NH3)4]2+ संकुल लेते हैं, संयोजकता बन्ध सिद्धांत के आधार पर दोनों संकुल चतुष्फ़लकीय होने चाहिए 

किन्तु इन दोनो की संरचना चतुष्फलकीय नहीं है तथा [Cu(NH3)4]2+ की संरचना समतलीय है। इसमें Cu2+ का एक इलेक्ट्रॉन 3d से 4p आर्बिटल में प्रोन्नत हो जाता है जिससे एक 3d आर्बिटल रिक्त होकर dsp2 संकर आर्बिटल बनाता है। 

( ii ) VBT सभी उपसहसंयोजक यौगिकों के स्पेक्ट्रा की व्याख्या नहीं कर सकता है, क्योंकि इसमें       संकुलों या उनके केंद्रीय धातु परमाणु की उत्तेजित अवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

( iii ) VBT द्वारा संकुलों में विकृति नहीं समझायी जा सकती है। उदाहरणार्थ सभी Cu (II) तथा Ti       (III) संकुल विकृत होते हैं।

( iv ) VBT में संकुलों या उनके धातु परमाणु की उत्तेजित अवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। अतः यह उष्मागतिक गुणों की व्याख्या नहीं कर सकता।

( v ) VBT में धातु आयन की प्रकृति पर अधिक बल दिया गया है, जबकि लीगेण्डों के महत्व की नितांत उपेक्षा की गयी है।

( vi ) VBT द्वारा बाह्य कक्षक संकुलों की आयनिक प्रकृति का उचित स्पष्टीकरण नहीं मिलता है।

( vii ) Cr (III) तथा आंतर कक्षक Co (III) अष्टफलकिय संकुलों को गतिक अक्रियता का VBT से सहीं उत्तर नहीं मिलता है अर्थात इस सिद्धांत द्वारा अभिक्रिया की गति तथा उनकी क्रियाविधि का स्पष्टीकरण नहीं होता है। 

अगर आपको ये जानकारी अच्छी लगी तो comment कर जरूर बताये 



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पौधों में भोज्य पदार्थों का स्थानान्तरण की क्रिया विधि-
Introduction-
पत्तियों द्वारा निर्मित भोज्य पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए जिस पदार्थ का प्रयोग किया जाता है, उसे फ्लोएम कहते हैं। पत्तियों द्वारा निर्मित कार्बनिक भोज्य पदार्थ एक विलयन के रूप में तने एवं जड़ में स्थानांतरित किया जाता है। पौधों में खाद्य पदार्थों के जलीय घोल का एक अंग से दूसरे अंग में परिसंचरण होना ही विलेयों या पोषक पदार्थों का स्थानांतरण ( Tranlocation of organic solutes ) कहलाता है।
      इस प्रकार से पौधों में कार्बनिक भोज्य पदार्थों एवं विलेयों के स्थानांतरण का वर्णन दो प्रकार से किया जा सकता है जो की निम्न है -
(A) स्थानांतरण की दिशा 
(B) स्थानांतरण की क्रिया-विधि
(A) स्थानांतरण की दिशा( Direction of translocation )-
इसके आधार पर खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण तीन दिशाओं में निम्न प्रकार से होता है-
( 1 ) आरोही स्थानांतरण ( Upward translocation )-
जैसे की इसके नाम से ही ज्ञात होता है की इसका स्थांतरण नीचे से ऊपर की ओर होता है अर्थात आरोही स्थानांतरण होता है। यह स्थांतरण अंकुरण के समय बीज में सञ्चित भोज्य पदार्थों से प्रांकुर की ओर होता है। इस प्रकार के स्थानांतरण की क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक की निर्मित नए पौधे में प्रकाश संश्लेषण की क्षमता विकसित नहीं हो जाती है।
( 2 ) अवरोही स्थानांतरण ( Downward translocation ) -
इसके नाम से स्पष्ट है की इस प्रकार का स्थानांतरण ऊपर से नीचे की ओर होता है अर्थात पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण के फलस्वरूप बनने वाले कार्बनिक भोज्य पदार्थ विलयन के रूप में तने एवं जड़ों की ओर स्थानांतरित होते हैं,इसे ही अवरोही स्थानांतरण कहते हैं।
(3) पाश्र्वीय स्थानांतरण ( Lateral translocation )-
हमें पता है की पौधों में तीन प्रकार से विकास होता है सबसे पहले उसका अंकुरण होता है उसके बाद उसका विकास और फिर आखरी में पुष्प एवं फल का निर्माण होता है। तो इस हिसाब से अभी तक हमने अंकुरण और विकास तक के भोज्य पदार्थों का स्थानांतरण को देख लिया है। अब पाश्र्वीय स्थानांतरण बीजों एवं फलों के निर्माण के समय तथा कोर्टेक्स एवं पीथ में संग्रहित होने हेतु कार्बनिक पदार्थों के स्थानांतरण को पाश्र्वीय स्थानांतरण कहते हैं।
( B ) कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया-विधि-
कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया-विधि को स्पष्ट करने के लिए दिए गए महत्वपूर्ण सिद्धांत दिए गए जो की आपके समक्ष इस प्रकार से प्रस्तुत है -
( 1 ) विसरण परिकल्पना (Diffusion hypothesis)-
डी व्रीज ( de Vries, 1885 ) के अनुसार, खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण अधिक सांद्रता वाले भाग से कम सांद्रता वाले भाग की ओर विसरण प्रक्रिया के द्वारा होता है। पौधों के आपूर्ति भाग ( Supply end ) में भोज्य पदार्थ बनते हैं, जहां पर इसकी सांद्रता अधिक होती है। यहां से यह पौधों के उन भागों में स्थानांतरित होता है, जहां पर इनका उपयोग होता है। इसे उपभोगी सिरा ( Consumption end ) कहते हैं। अतः भोज्य पदार्थों का स्थानांतरण आपूर्ति सिरा से उपभोगी सिरा की ओर होता है।
( 2 ) सक्रिय विसरण परिकल्पना ( Activated Diffusion hypothesis )-
मैसन एवं फिलिस (1936 ) के अनुसार, खाद्य पदार्थों का अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर स्थानांतरण उनके सक्रियता ( Activation ) पश्चात ही होता है। पदार्थों के सक्रियण के लिए आवश्यक ऊर्जा श्वसन से प्राप्त होती है।
( 3 ) इलेक्ट्रोऑस्मोटिक सिद्धांत -
फेंसन (1957 ) एवं स्पैनर के अनुसार , चालनी प्लेट्स के आर-पार एक विद्युत विभव उत्पन्न होता है, जिसके प्रभाव में जल के साथ कार्बनिक विलेयों का भी प्रवाह होता है। स्पैनर के अनुसार, चालनी पटलिका की ध्रुवणता का प्रमुख कारण , उसके पास स्थित सखी कोशिकाओं से चालनी पटलिका के एक ओर पोटेशियम + आयनों के अवशोषण एवं दूसरी ओर इनके स्त्रावण के परिणामस्वरूप ही होता है। इस क्रिया में पोटेशियम + आयन चालनी पटलिका के नीचे की ओर स्थित कोशिका से उसकी अनुदैधर्य भित्ति में रिसाव होता है तथा ऊपर की ओर स्थित कोशिका में पोटेशियम पम्प के माध्यम से चालनी नलिका अथवा सखि कोशिकाओं में पम्प कर दिए जाते हैं। इस क्रिया के लिए ऊर्जा A.T.P. से ली जाती है। पोटेशियम + आयनों के प्रवाह के साथ-साथ कार्बनिक विलेयों का भी स्थानांतरण हो जाता है।
     बॉउलिंग ( 1968 ) ने वाइटिस विनिफेरा के प्राथमिक फ्लोएम में उपस्थित चालनी पटलिकाओं के विद्युत विभवांतर का मापन किया तथा इसका मापन 4-48  mV पाया। इन्होंने बताया की वह मान आवश्यक दर के अनुसार पदार्थों के विद्युतीय परासरण के लिए  पर्याप्त होता है।
स्पैनर के अनुसार , चालनी नलिका में शर्करा के अणु पोटेशियम + आयनों के साथ बंधे रहते हैं। अतः विद्युत विभवांतर के प्रभाव के कारण शर्करा के अणु K+ आयनों के साथ गति करते हैं यह सिद्धांत विलेयों के स्थानांतरण सम्बन्धी अनेक समस्याओं को समझाने मे असमर्थ रहा है।
( 4 ) मुंच की द्रव्य प्रवाह या दाब प्रवाह परिकल्पना ( Mnch's mass or pressure flow hypothesis ) -
इस परिकल्पना को मुंच ने सन 1927-30 में प्रतिपादित किया था। मुंच के अनुसार, पौधों में विलेयों का स्थानांतरण जल के द्रव्यमान प्रवाह या दाब प्रवाह के कारण होता है।
  इस सिद्धांत के अनुसार , खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण उनके निर्माण स्थल से उपयोग स्थल तक फ्लोयम के माध्यम से सांद्रण प्रवणता के अनुसार होता है।
पत्तियों प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा भोज्य पदार्थों ( शर्करा ) का निर्माण करती हैं , जिसके कारण, पत्तियों की मीजोफिल कोशिकाओं में इनकी सांद्रता बढ़ जाती है। अतः इनका परासरण दाब बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए परासरण दाब के कारण मीजोफिल कोशिकाएं पत्तियों की जायलम कोशिकाओं से जल का अवशोषण करती हैं, अतः इनका स्फीति दाब बढ़ जाता है। इस स्फीति दाब के प्रभाव से कुछ कोशिकीय विलयन फ्लोएम की चालनी नलिका द्वारा जड़ में संग्रहित हो जाता है अथवा उपभोगी सिरे के द्वारा उपयोग कर लिया जाता है अथवा यह अविलेय रूप में बदल कर संग्रहित कर लिया जाता है। अतः यहाँ का O.P. एवं T.P. कम हो जाता है। ऐसी अवस्था में आपूर्ति सिरे एवं उपभोगी सिरे के मध्य स्फीति दाब प्रवणता उत्पन्न हो जाता है। अतः यहाँ उपस्थित जल का द्रव्यमान प्रवाह, जिसमें विभिन्न प्रकार के विलेय होते हैं, फ्लोएम के ऊपरी भाग से नीचे तक चला जाता है।
उपभोगी सिरे में इन कार्बनिक पदार्थों का उपयोग हो जाता है।
अतः फ्लोएम कोशिकाओं का जल जायलम कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है, अतः जायलम का O.P. कम हो जाता है। यह जल जायलम कोशिकाओं की वाहिनियों के द्वारा पुनः पत्ती की मिजोफिल कोशिकाओं में पहुंच जाता है। चूँकि पत्तियों की मिजोफिल कोशिकाएँ प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा निरन्तर भोजन बनाती रहती हैं। अतः इनका O.P. अधिक हो जाता है और जायलम से जल इन मीजोफिल कोशिकाओं में पहुँच जाता है। मीजोफिल कोशिका में यह जल कार्बनिक विलेयों को घोलकर पुनः आपूर्ति सिरे से उपभोगी सिरे की ओर प्रवाहित होते रहता है।
मुंचवाद की आपत्तियाँ -
मुंच की द्रव्य प्रवाह परिकल्पना निम्नलिखित तथ्यों की पुष्ठी करने में असमर्थ है -
( i ) इस परिकल्पना के अनुसार फ्लोएम की चालनी नलिकाएं सम्पूर्ण क्रिया में निष्क्रिय भूमिका अदा करती हैं, जबकि विभिन्न वैज्ञानिकों ने इस क्रिया में A.T.P.  की भूमिका प्रमाणित किया है।
( ii ) इस परिकल्पना में सामान्य रूप से पाये जाने वाले द्विदिशीय स्थानांतरण को स्पष्ट नहीं किया गया है।
( iii ) मुलरोमों एवं मिजोफिल कोशिकाओं के परासरण दाब को उस प्रकार सत्यापित नहीं किया जा सकता, जैसे की इस परिकल्पना के लिए आवश्यक होता है।  
( 5 ) जीवद्रव्य भ्रमण या जीवद्रव्य प्रवाह परिकल्पना ( Streaming of protoplasm hypothesis )
डी. व्रीज ( de Vries, 1885 ) के अनुसार, प्रत्येक चालनी नलिका एवं अन्य कोशिकाओं का कोशिकाद्रव्य जीवद्रव्य भ्रमण करता है तथा चालनी नलिका के एक सिरे से दुसरे की ओर कार्बनिक विलेयों का स्थानांतरण जीवद्रव्य की परिभ्रमण गति के कारण होता है। इस क्रिया के पश्चात ये कार्बनिक विलेय एक चालनी नलिका से दूसरी चालनी नलिका में चालनी छिद्रों के माध्यम से विसरीत हो जाता है। इस प्रकार इन पदार्थों का स्थानांतरण जीवद्रव्य भ्रमण एवं विसरण क्रिया के सम्मिलित प्रभाव के परिणामस्वरूप होता है। यह क्रिया द्विदिशीय होती है।
ऊपर वर्णित सभी सिद्धांतों में आजकल मुंच का द्रव्य या दाब प्रवाह सिद्धांत ही सबसे ज्यादा माना जाता है।
स्थानांतरण को प्रभावित करने वाले कारक
( 1 ) 25 से 30°c तापमान पर कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया सर्वाधिक होती है तथा इससे ऊपर या नीचे के तापमान होने की स्थिति में स्थानांतरण की दर कम हो जाती है।
( 2 ) प्रकाश अप्रत्यक्ष रूप से स्थानांतरण की प्रक्रिया को प्रभावित करता है,क्योकि अधिक प्रकाश संश्लेषण होने की स्थिति में कार्बनिक विलेयों का अधिक स्थानांतरण होता है।
( 3 ) नमी प्रतिबल ( Moisture stress ) की स्थिति कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण को निरुद्ध करती है।
( 4 ) कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया कार्बोहाइड्रेट के सांद्रण पर भी निर्भर करती है। उच्च सांद्रण क्षेत्र से निम्न सांद्रण क्षेत्र की ओर स्थानांतरण होता है।
      
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बिन्दुस्त्रावण क्या है ये किस प्राकार होता है ? इसके बारे में आज हम बात करने वाले हैं।

पेड़ पौधों की पत्तियों के किनारे पर उपस्थित छिद्र के माद्यम से पानी का बूंदों के रूप स्त्रावित होना ही बिन्दुस्त्रावण कहलाता है। और यह क्रिया जिन छिद्रों के माध्यम से होती है उस छहिदर को हाइडेथोड कहते हैं।


  • 1. बिंदुस्त्रावण मूल दाब के कारण होता है।
  • 2. इस क्रिया में भाग लेने वाले हायड़ेथोड पत्तियों के किनारे पर ग्रन्थियों के रूप में पाए जाते हैं।
  • 3. ये छिद्र पत्तियों के एपिडर्मल कोशिकाओं में पाये जाते हैं तथा अत्यंत पतली भित्ति वाली कोशिकाओं के द्वारा घिरे रहते हैं।
  • 4. प्रत्येक छिद्र के नीचे ढ़ीले रूप ( Loosely )से व्यवस्थित कोशिकाओं का एक समूह होता है, जिसे एपिथेम (Epithem) कहते हैं।
  • 5. Epithem में बहुत से अन्तराकोशिकीय अवकाश पाये जाते हैं।
  • 6. एपिथेम के नीचे जायलम तत्व ( Xylem elements ) पाये जाते हैं, जिन्हें ट्रेकीड (Tracheid ) कहते हैं।
  • 7. इस प्रकार प्रत्येक हाइडेथोड़ एक अपूर्ण स्टोमेटा ( Incomplete stomata ) के समान संरचना होती है, लेकिन इसमे खुलने एवं बन्द होने की क्षमता नहीं पायी जाती है।
  • उदाहरण के रूप आप नास्टरशियम एवं जौ की तरुण पत्तियों को ले सकते हैं।
  • 8. बिन्दु स्त्रावित जल में कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ अत्यधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
  • 9. इस जल में विभिन्न प्रकार के एन्जाइम, अमीनो अम्ल, शर्करा, कार्बनिक अम्ल, विटामिन एवं खनिज पदार्थ पाये जाते हैं।


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दोस्तों आज में आपके सामने वनस्पति विज्ञान से जुड़ी एक जानकारी शेयर कर रहा हूँ, आज हम दीप्तिकालिता के बारे में बात करने वाले हैं तो चलिए जानते हैं की दिप्तिकालिता होता क्या है ?
                           दिप्तिकालिता
इसके नाम से स्पष्ट है की दिप्त यानी की प्रकाश और कालिता यानी उसका समय इस प्रकार इसको इस प्रकार से ब्यक्त किया जा सकता है चूंकि यह पुष्पन में मुख्य भूमिका निभाता है इस कारण यह पौधों के लिये अतिआवश्यक हो जाता है। पौधों में पुष्पन की क्रिया को सम्पादित करने के लिए आवश्यक होता है। इसकी एक समयावधि होती है जिसे दिप्तिकालिता कहते हैं।
          इस प्रकार पुष्पन क्रिया के रूप में पौधों का दीप्तिकालिता के प्रति अनुक्रिया प्रदर्शित करना ही दीप्तिकालिता कहलाता है।
इसकी खोज गार्नर एवं ऐलार्ड ( 1920 ) नामक दो वैज्ञानिको ने किया था। इन्होंने इसको तम्बाकू के पौधे में देखा था, इन्होंने देखा की तम्बाकू की मैरीलैंड मैमोथ एवं सोयाबीन की बीलॉक्सी प्रजाति अपनी अच्छी कायिक वृद्धि या शारीरिक वृद्धि के बाद भी पुष्पन नहीं कर पाती है। लेकिन इन्ही पौधों को शीत ऋतु में या ग्रीन हाउस में उगाने पर वो अच्छे से पुष्पित हो जाता है एवं फलों का विकास भी अच्छे से होता है। इस प्रयोग के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे की पौधों में पुष्पन एवं फल की वृद्धि के लिए दिन की लम्बाई ही उत्तरदायी होता है तथा तम्बाकू की इस प्रजाति का पुष्पन जिसका इन वैज्ञानिकों ने किया था इनमें पुष्पन छोटे दिन वाली अवस्थाओं में ही होता है।
           इस प्रकार से पौधों की दीप्तिकालिता के आधार पर गार्नर एवं एलार्ड ने पौधों को तीन समूहों में वर्गीकृत किया जो इस प्रकार है-
( 1.) छोटे दिन वाले पौधे 
( 2.) लम्बे दिन वाले पौधे 
( 3.) दिवस निरपेक्ष पौधे
छत्तीसगढ़ के नदियों के किनारे बसे राज्य
       अब हम बात करें इन छोटे , लम्बे एवं दिवस निरपेक्ष पौधों के बारें में तो इनके बारे जानकारी इस प्रकार है-
                 ( 1.) छोटे दिन वाले पौधे
इसके नाम के अनुसार इन्हें कम प्रकाश यानी की कम समय के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। इनके लिए अपेक्षाकृत छोटे दीप्तिकाल ( 8 से 10 घण्टे ) की आवश्यकता होती है एवं सतत् 14 से 16 घण्टे के अंधकार की आवश्यकता होती है। इस प्रकार इन पौधों को छोटे दिन वाले पौधे कहते हैं।
उदाहरण- तम्बाकू, सोयाबीन, कॉकलेबर, चावल, कपास, चीनोपोसियम आदि।
( 2.) लम्बे दिन वाले पौधे ( Long day plants=L.D.P. )
ऐसे पौधे जिनको पुष्पन के लिए अधिक लम्बे समय के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है , उसे हम लम्बे दिन वाले पौधे कहते हैं। अथवा दीरघदीप्तिकाली पौधे कहा जाता है। इसमें लगभग 14-16 घण्टे प्रकाश की आवशयकता पड़ती है।
उदाहरण के रूप में गेंहूँ , मटर, जई, चुकन्दर,मूली, हेनबेन के पौधो को लिया जा सकता है जो की दीरघदीप्तिकाली पौधों की श्रेणी में आते हैं।
लम्बे दिन वाले पौधों में कुछ विशेष लक्षण पाये जाते हैं जो की निम्न हैं:-
* लम्बे दिन वाले पौधों में प्रकाश अवस्था क्रांतिक होती है।
* लम्बे दिन वाले पौधों को रात्रि की किसी भी अवस्था में प्रकाश में अनावरित करने अथवा प्रकाश की अवधि में वृद्धि करने से पुष्पन की क्रिया उद्दीपित होती है। 
( 3.) दिवस निरपेक्ष पौधे ( Day Neutral Plants )
ऐसे पौधे जिन्हें पुष्पन के लिए किसी विशेष दीप्तिकाल की आवश्यकता नही होती है तथा वे किसी भी प्रकाश काल की उपस्थिति में पुष्प उत्पन्न करने में सक्षम होती हैं, उन्हें दिवस निरपेक्ष पौधे कहते हैं।
दिवस निरपेक्ष पौधे 5 घण्टे के प्रकाश से लेकर 24 घण्टो के सतत् प्रकाश में भी पुष्पन करते हैं।
उदाहरण:- टमाटर , सूर्यमुखी,कद्दू, कपास इनमें इस प्रकार का पुष्पन का गुण पाया जाता है की ये किसी भी समय अपना पुष्पन प्रारम्भ कर सकते हैं।
तो ये तो थी मेरे तरफ से पौधों में पाये जाने वाले दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों के प्रकार और दीप्तिकालिता के बारे में कुछ हल्की फुल्की जानकारियाँ अन्य जानकारियों के साथ बने रहे good baye
जनवरी 2012 को बनाए नए जिलों सम्बन्धी विशेष तथ्य
छत्तीसगढ़ में कौन-कौन से खनिज पाये जाते हैं
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           जल चक्र क्या है और क्यों होता है ?
दोस्तों आप सभी जानते ही होंगें की हमारी पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में जल पाया जाता है। जिसकी प्रतिशत मात्रा 70% है। लेकिन क्या आप जानते हैं की इसका इसका कुछ ही प्रतिशत जल का उपयोग हम कर पाते हैं क्योंकि पृथ्वी का ज्यादातर जल समुद्री है जो की समुद्र में पाया जाता है।
जल हमारे जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है और पेड़ पौधों के लिए भी क्योंकि पेड़ पौधे इनका उपयोग करके ही अपना भोजन बनाते हैं और उन पौधों को भोजन के रूप में जन्तुओं द्वारा किया जाता है।
तो पानी हमारे पृथ्वी में कहाँ से आता है दोस्तों इसका जवाब साइंस के किताब में ढूंढा जाये तो यह 1 मोल ऑक्सीजन तथा 2 मोल हाइड्रोजन के मिलने से बनता है।
जल का भूमि में मुख्य स्रोत वर्षा और जलवाष्प का अवक्षेप है। अतः इससे स्पष्ट है की भूमि में वर्षा का जल ओस तथा बर्फ के रूप में अवक्षेपित होता है। यह बर्फ या वर्षा का जल जो की तालाबों व झीलों में पाया जाता है इसका सबसे पहले वाष्पीकरण होता है और यह वाष्पीकरण के माध्यम से जलवाष्प के रूप में वायुमण्डल में चला जाता है।
अब तलाबों , झीलों और समुद्रों के बाद बारी आती है हमारे जीव जन्तुओं की इनके द्वारा लिया गया पानी भी वाष्पीकरण की क्रिया द्वारा वायुमण्डल में चला जाता है। पौधों में लिया गया पानी उसमें उपस्थित स्टोमेटा के द्वारा वाष्पोत्सर्जन करके वायुमण्डल में चला जाता है।
अब ये वायुमण्डल में उपस्थित जल वाष्प बादल का रूप ले लेता है तथा ठंडे होने एवं संघनन के पश्चात यह जल की बूंदें , ओस अथवा बर्फ के रूप में पुनः भूमि पर वापस आ जाता है। इस प्रकार इस जल का कुछ भाग बहकर नदी , तालाबों,पोखरों एवं समुद्र में एकत्रित हो जाता है तथा शेष भाग भूमि के द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। पौधे इसी भूमिगत जल का उपयोग करते हैं अपने भीजन के निर्माण में तथा जीव-जन्तु भूमिगत जल का एवं भूमि में उपस्थित जल स्त्रोतों के जल का उपयोग करते हैं अपने दैनिक जीवन में और इस प्रकार उनका उनके शरीर से फिर वाष्पीकरण और उत्सर्जन की क्रिया होती है जिससे वह पानी प्रकृति में मिल जाता है। तालाबों के जल की हानि का मुख्य कारण वाष्पोत्सर्जन ही है। इस प्रकार यह जल चक्र इस प्रकार निरन्तर चलती रहती है।    
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जैविक कारक होते क्या हैं और किसे हम जैविक कारक कहते हैं ?
दोस्तों चूंकि ये सवाल हमारे विज्ञान से जुड़ा हुआ है इस कारण मैं इसका जवाब विज्ञान के शब्दों में दे रहा हूँ लेकिन फिर भी मैं ये कोशिश करूँगा की इसमें ज्यादा से ज्यादा आम भाषा का ही प्रयोग करूँ तो आओ चलते हैं टॉपिक की ओर -
हमारी प्रकृति में विभिन्न प्रकार के जीव जन्तु पेड़ पौधे रहते हैं। ये एक स्थान विशेष में रहते हैं जिनकों सम्मिलित रूप से उस स्थान का बायोटा कहते हैं। जाहिर सी बात है की जो एक स्थान पे रहते तो एक दूसरे को तो प्रभावित करते ही हैं। तथा एक दूसरे के विकास को प्रभावित करने वाले कारकों में भी जीव ही सामिल होते हैं।
अतः इसको इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं, ऐसे समस्त कारक जो की सीधे जीवों की क्रियाओं पर निर्भर करते हैं,जैविक कारक कहलाते हैं।
दूसरे शब्दों में , किसी भी जीवधारी के क्रियाकलापों से वातावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को जैविक -कारक कहते हैं।
तो अब चलिए आपको प्रमुख जैविक कारक और उनके प्रभावों यानी की पर्यावरण पर प्रभाव के बारे में बताते हैं-   
वातावरण में पाये जाने वाले प्रमुख कारक को देखे तो प्रमुख कारक हैं , पेड़-पौधे, जीव-जन्तु,और मनुष्य जो की अपनी जैविक क्रियाओं के माद्यम से पर्यावरण को प्रभावित करती है।
तो इसको हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं-
( 1.) पौधों का प्रभाव
( 2.) जन्तुओं का प्रभाव
( 3.) मनुष्य का प्रभाव
सर्प-गन्धा क्या है
( 1.) पौधों का प्रभाव 
किसी स्थान पर पादप समुदाय में विभिन्न प्रकार के पौधे पाये जाते हैं जो की एक दूसरे को निम्न प्रकार से प्रभावित करते हैं।
(a) प्रतिस्पर्धा-
                     जब एक ही स्थान पर विभिन्न प्रकार के पौधे उपस्थित रहते हैं तो उनमें प्रकाश , खनिज पदार्थ के लिए संघर्ष होता है। क्योंकि ज्यादा संख्या के कारण उनकी पुर्ति नही हो पाती है। इस प्रकार जहां पर पौधों की जनसंख्या ज्यादा होती है वहां पर ज्यादा संघर्ष होता है। और जहां पर इनकी संख्या कम होती है वहां कोई संघर्ष नहीं होता है। इस प्रकार इनमें दो प्रकार का संघर्ष होता है-
अंतरजातीय और अंतराजातिय संघर्ष-
* अंतरजातिय  संघर्ष ये संघर्ष अपने एक जाती के जीवो के मध्य पाये जाते क्योकि सभी एक ही प्रकार के खनिज एवं क्रिया प्रदर्शित करते हैं जिसके कारण इनको खनिज पदार्थों की कमी हो जाती है और पौधे धीरे-धीरे विलुप्त होने लगते हैं और उनकी जनसंख्या कम हो जाती है।
* अंतराजातिय संघर्ष यह उन विभिन्न प्रजातियों के पौधों के मध्य होता है जिनका अलग-अलग पदार्थ से सम्बन्ध होता है अर्थात जो की एक प्रकार खनिज पदार्थों व जल ,प्रकाश पर आश्रित नही होते हैं और इनकी आवश्यकताए अलग-अलग होती हैं।
  ( b ) मृतोपजीविता
                      मुख्यतः कवक मृतोपजीवी होते हैं,परन्तु कुछ पौधे भी मृतोपजीवी होते हैं।
उदाहरण - निओशिया एवं मोनोट्रोपा।
कुछ कवक पौधों की जड़ों के साथ सम्बन्ध स्थापित कर कवकमुल एवं माइकोराइजा का निर्माण करते हैं जो मृदा से जल एवं पोषक पदार्थों का अवशोषण करते हैं तथा इनकी अनुपस्थिति पर पौधों में जीवन-करने की क्षमता का हास होता है या असमर्थ हो जाते हैं।
( c ) कीटभक्षिता
                      इस प्रकार के पौधों क्लोरोफिल होता है जिसके कारण ये अपना भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं और ये दलदली स्थानों पर पाये जाते हैं जिसके कारण इनमें नाइट्रोजन की कमी होती है। और इसकी पूर्ति के लिए ये कीटों को अपनी ओर आकर्षित करके नाइट्रोजन की पूर्ति करती हैं। जैस कलश पादप, ड्रोसेरा, युट्रिकुलेरिया, डायोनीया आदि। इनमें नाइट्रोजन की पूर्ती के लिये संघर्ष होता है।
( d ) सहजीविता
                    इस प्रकार के पौधों की जड़ों में विभिन्न प्रकार के जीवाणु पाये जाते हैं जो की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं और पौधों के साथ ही जीते रहते हैं। इस प्रकार के जीवाणु संवहन की क्रिया में भी भाग लेते हैं जिसके कारण ये अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस प्रकार पौधों के तथा जन्तुओं के मध्य सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इन जीवाणुओं के उदाहरण निम्न है - राइजोबियम, लाइकेन्स तथा कवकमुल भी।
( e ) परजीविता
                        ऐसे पौधे एवं जन्तु जो की अपने पोषण के लिए अन्य पौधों एवं जीव-जन्तुओं पर आश्रित रहते हैं, उन्हें परजीवी तथा उनके पोषण प्राप्त करने की विधि को परजीविता कहते हैं। यह अधिकांश जीवाणु , कवकों में पायी जाती है। जीवाणु कवक पोषक पौधों से पोषण प्राप्त करते हैं और विभिन्न प्रकार से रोग फैलाते हैं। जिनके कारण पौधों की संख्या कम हो जाती हैं।
   इस प्रकार पौधों में संघर्स पाया जाता है कुछ ऐसे भी पौधे हैं जो की किसी भी प्रकार से किसी दूसरे पर आश्रीत नहीं होते हैं और अपना पोषण स्वयं करते हैं  जैसे लिआनास का पौधा।
जल का परिस्थितिक तंत्र के में जाने
( 2 ) जन्तुओं का प्रभाव- 
किसी स्थान स्थित जन्तु अपने पर्यावरण को निम्न प्रकार से प्रभावित करता है-
( a ) चारण -
               जन्तुओ द्वारा जीवित रहने के लिए जन्तु पर्यावरण को प्रभावित करते हैं और भूख मिटाने के लिए चरते रहते हैं। जिससे पौधों की संख्या उनके द्वारा खा लेने के कारण कम हो जाती है। इनके द्वारा सबसे अधिक नुकसान होता है। मिट्टी आ अपरदन होने लगता है।
( b ) मृदा जीव -
                   इनमें उन जीवों को रखा गया है जो की मृदा में रहकर जवन यापन करते हैं और पौधों को भी पोषण देते हैं। जो जैविक तन्त्र बनाते हैं। मृदा का अपना प्राणी जात तथा वनस्पति जात होता है। कई नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भाग लेते हैं। और कुछ कार्बनिक पदार्थों के अपघटन द्वारा भूमि में खनिज पदार्थों की वापसी की क्रिया से सम्बंधित रहते हैं।
( c ) परागण -
                   प्रकृति में उपस्थित विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु कीट आदि पौधों के पुष्पों से भोजन , मकरन्द , परागकण आदि प्राप्त करते हैं। ठीक इसी समय इन कीटों एवं जीव-जन्तुओं के द्वारा एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प अथवा अन्य पुष्प की स्टिग्मा तक पहुंच जाते हैं। इस क्रिया को परागण कहते हैं। जन्तुओं के द्वारा होने वाले परागण को जन्तु परागण कहते हैं। जन्तु परागण की विधि के आधार पर पुष्प निम्नलिखत प्रकार के होते हैं-
( i ) एंटोमोफिलस ( Entomophilous ) - इनमें परागण कीटों के द्वारा होता है।
( ii ) ऑर्निथोफिलस ( Ornithophilous ) - इनमें परागण पक्षियों के द्वारा होता है।
( iii ) चिरोप्टेरीफीलस ( chiropteriphilous ) - इनमें परागण चमगादड़ों के द्वारा होता है।
( d ) प्रकीर्णन-
                   विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु, जैसे- पक्षी , बन्दर, गिलहरी एवं पशु आदि विभिन्न प्रकार के शुष्क, मांसल, एवं रसीले फलों को खाने के साथ-साथ अन्य स्थानों पर पहुंचाया जाता है जिसे प्रकीर्णन कहते हैं। कुछ पौधों में प्रकीर्णन के लिए। विशेष उपांग पाये जाते हैं जिससे प्रकीर्णन आशानी से हो जाता है।
( 3 ) मनुष्य का प्रभाव- 
                            मनुष्य प्रकृति में पाया जाने वाला सबसे अधिक विकसित एवं बुद्धिमान प्राणी है। मनुष्य में चिंतन शक्ति होती है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वातावरण को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्राणी है। अतः इसका वातावरण एवं वनस्पतियों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। वनों की कटाई , वनों में आग लगना , खेती तथा पर्यावरण प्रदूषण आदि प्रमुख क्रियाएँ मनुष्य के द्वारा की जाती है।
                     इस प्रकार प्रकृति में विभिन्न प्रकार के कारक प्रकृति को प्रभावित करते हैं।

जैव भू-रासायनिक चक्र   
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               धात्विक विशाक्तता के कारण

जीवों के कोशिकिय ढांचे के प्रोटीन, एंजाइम व कलाओं के साथ धातुओं के आयनों द्वारा रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण धात्विक विषाक्तता विकसित होती है।

                       विष 

विष ( Poison ) के बारे में आप थोड़ा बहुत जानते ही होंगे क्योंकि ये हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले विभिन्न पदार्थों से भी सम्बधित होता है आज मैं धात्विक विषाक्तता के बारे में बताने जा रहा हूँ -

                     परिचय 

हमारे दैनिक जीवन एवं उद्दोगों में बढ़ते हुए धातुओं के प्रयोग को देखते हुए धात्विक विषाक्तता आज अपने चरम सीमा पर है, इन सभी धातुओं में भारी धातु सबसे ज्यादा हानिकारक होते है तो आओ जानते हैं की भारी धातु क्या होते हैं -

                   भारी धातु 

अधिकांश भारी धातु या अकेले या कुछ यौगिक के रूप में प्राणियों एवं मनुष्य पर घातक प्रभाव डालते हैं। पारा, लैड, निकिल,कैडमियम व आर्सेनिक आदि धातु मनुष्य के लिए हानिकारक होते हैं। इन धातुओं से निर्मित पेस्टिसाइड या यह धातु , मनुष्य एवं जन्तुओं में तीव्र एवं दीर्घकालिक विषाक्तता उत्पन्न करती है। मुख्यतः भारी धातुओं एवं उनके पेस्टिसाइड के विषाक्तता एवं प्रभाव का वर्णन निम्नप्रकार से है -

1. पारा( mercury )

पारा विभिन्न क्षेत्रों में काम आता है मुख्य क्षेत्र जैसे वैज्ञानिक एवं इलेक्ट्रॉनिक उद्धोगों, कास्टिक सोडा एवं क्लोरीन बनाने वाले कारखानो, हरबिसाइद, फंगीसाइड, विस्फोटक पदार्थों , फार्माकोलॉजी में काम आता है। अपशिष्ट पदार्थों द्वारा पारा को मेथील व एथिल में बदल दिया जाता है , जो की अत्यधिक विषैले होते हैं। यह मरक्यूरिक क्लोराइड, मरक्युरिक सायनाइड , मरक्यूरिक सल्फाइड , नाइट्रेट के रूप में पाया जाता है।  

2. आर्सेनिक :

                यह सस्ता होने के कारण आसानी से उपलब्ध हो जाता है और इसमें स्वाद नहीं होता है जिसके कारण इसका प्रयोग विभीन्न प्रकार के कीटनाशकों में किया जाता है। यह सभी प्राणियों के लिये विषाक्त होता है। तथा इसके यौगिक भी पूर्ण विषाक्तता प्रदर्शित करते हैं। इसमें लेड़ आर्सेनाइट, कॉपर आर्सेनाइट, आर्सेनिक ऑक्साइड, सोडियम आर्सिनाईट, जिंक आर्सीनाईट, जिंक आर्सेनेट एवं आर्सेनुरेटेड हाइड्रोजन गैसे मुख्य होते हैं। आर्सेनिक यौकिग की विषाक्तता तीक्ष्ण या दीर्घकालिक हो सकती है।
पारा शरीर में प्रवेश करके किस प्रकार अपनी क्रिया प्रदर्शित करता है आओ जाने
दोस्तों पारा सामान्य ताप पर वाष्पीकृत हो जाता है तथा साँस व त्वचा के साथ शरीर में प्रवेश करता है। यह रुधिर द्वारा ऑक्साइड के रूप में शरीर में परिवहन करता है। यह मष्तिष्क में विशेष रूप से सञ्चित रहता है। पारे के यौगिक आहार नाल व त्वचा द्वारा सरलता से अवशोषित हो जाते हैं। कार्बनिक पारा फेफड़ों व त्वचा द्वारा अवशोषित होता है। 

Sunday, October 21, 2018

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                अम्ल और क्षार क्या है?
what is acid and what is base

आप ने अपनी कक्षा में कई बार पढ़ा होगा की अम्ल क्या होता है लेकिन फिर भी मैं अम्ल के बारे में कुछ बेसिक चीजें आपको बता देता हूँ की अम्ल क्या होता है ;
अम्ल को अगर आर्हीनियस धारणा के अनुसार देखा जाये तो ये वे हाइड्रोजन परमाणु युक्त पदार्थ होते हैं, जो जल में विलय होकर हाइड्रोजन आयन देते हैं। तथा क्षार वे पदार्थ हैं जो जल में घुलकर हाइड्रॉक्सिल आयन बनाते हैं।
लेकिन ये धारणा सभी जगह मान्य नहीं है क्योकि कई जगहों पर इस नियम के अनुसार तो क्रिया नहीं करा सकते हैं जैसे सभी को तो जल में घोलकर टेस्ट नही कर सकते ना इसलिए ये नियम कई जगह लागू नहीं होता है। और इसके वैज्ञानिक तर्क के हिसाब से भी कई अपवाद हैं जैसे HCL  बात करें तो ये जल में आसानी से विलेय हो जाता है। यह धारणा केवल जलीय विलयनों पर लागू होती है।

अम्ल की पहचान कैसे करेंगे

       अम्ल की पहचान करने के लिए आप लिटमस पेपर का यूज कर सकते है आपको यह पता ही होगा की लिटमस पेपर पर जब अम्ल को छुआते है तो उसका रंग लाल हो जाता है।
इसके स्वाद से भी इसका पता लगाया जा सकता है इसका स्वाद ईमली के के समान खट्टा होता है।

क्षार की पहचान कैसे करेंगे

             क्षार को हम पहचाने के लिए अगर लिटमस पेपर का यूज करते हैं तो लिटमस पेपर का रंग नीला हो जाता है। और इसके स्वाद की बात करें तो इसका स्वाद थोड़ा कस्सा होता है।
इनको मापने के लिए ph मीटर का भी उपयोग किया जाता है। इस मीटर में 1-7 तक अंक होते हैं। और इन अंको के माध्यम से ही हमें पता चलता है की अम्लीय है या कोई पदार्थ क्षारीय है। इसमे 7 अंक उदासीन होता है अर्थात ये ना तो तीखा होता है और ना ही अम्लीय होता है। जिन पदार्थों का मान सात से कम आता है उसे अम्लीय और जिन पदार्थों के ph मान सात से अधिक होता है उसे क्षारीय कहा जाता है जो पदार्थ का मान जितना कम होता है वह पदार्थ उतना ही अम्लीय होता है, और जिन पदार्थों का ph मान जितना अधिक होता है वह पदार्थ उतना ही ज्यादा क्षारीय होता है।
             तो ये तो थी अम्ल और क्षार को पहचानने के तरीके के बारे में कुछ विशेष तर्क और अब हम बताते है की ये

 अम्ल और क्षार कितने प्रकार के होते हैं -

इनकी प्रकृति के आधार पर दोनों अम्लों को दो - दो प्रकारों में बांटा गया है। कठोर और मृदु इस प्रकार ये चार प्रकार के हुए

अम्ल के प्रकार -

   1 कठोर अम्ल 2. मृदु अम्ल

क्षार के प्रकार -

     1. कठोर क्षार   2. मृदु क्षार

कठोर और मृदु क्या है ?


 ये एक प्रकार से वस्तुओं में पाये जाने वाले गुण के अनुसार ही ठोस और द्रव के गुण के समान ही हैं। यहां कठोर का मतलब है। आसानी से अभीक्रिया ना करने वाला और मृदु का अर्थ है किसी यौगिक के साथ तुरन्त क्रिया करने वाला।
इस प्रकार इनको इनके गुणों के आधार पर ही परिभाषित किया जा सकता है।
अर्थात जो अम्ल किसी यौगिक के साथ आसानी से क्रिया कर लेते हैं तो उसे मृदु अम्ल कहते हैं और जो अम्ल आसानी से क्रिया नहीं करते हैं उन्हें कठोर क्षार कहते हैं।
अब इसी प्रकार क्षार को भी परिभाषित किया जा सकता है की वे क्षारीय पदार्थ जो अन्य यौगिक के साथ आसानी से क्रिया कर लेते हैं उन्हें मृदु क्षारीय पदार्थ कहते हैं। और जो पदार्थ आसानी से क्रिया प्रदर्शित नहीं करते उन्हें कठोर क्षारीय पदार्थ कहा जाता है।
                                 अगर कोई त्रुटि हो तो comment box में लिखे धन्यवाद।    
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Saturday, October 20, 2018

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   हीमोग्लोबिन और मायोग्लोबिन में अंतर क्या है

सबसे पहले हीमोग्लोबिन और मायोग्लोबिन के बारे में बेसिक जानकारी को जान लेना चाहिए क्योंकि जब तक आप किसी भी चीज के बेसिक जानकारी के बारे में नहीं जानेंगे तो हमें आगे का समझ नही आएगा तो आओ जानते हैं उन बेसिक जानकारियों के बारे में।
               हीमोग्लोबिन और मायोग्लोबिन एक प्रकार के हिम प्रोटीन हैं। अब ये हीम प्रोटीन क्या है ?
हीम एक धातु पोरफायरीन संकुल है , जो की विभिन्न प्रोटीन अणुओं के साथ संलग्न रहता है। इस प्रकार हीम अणु युक्त प्रोटीन कहते हैं। इसके और दो उदाहरण है 1. साइटोक्रोम्स 2. एन्ज़ाइम- केटालेज व परॉक्सीड़ेज।
अंतर-
1 . सबसे पहला अंतर ये है की, हीमोग्लोबिन में चार हीम समूह तथा चार प्रोटीन श्रृंखला पायी जाती है।
और मायोग्लोबिन में एक ही हीम समूह तथा एक प्रोटीन श्रृंखला पायी जाती है।
2. हीमोग्लोबिन का अणुभार लगभग 64500 होता है। जबकि
मायोग्लोबिन का अणुभार लगभग 17000 होता है।
3. हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति बन्धुता घट जाती है कम PH होने पर।
जबकि कम PH पर मायोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति बन्धुता नहीं घटती है।
4. हीमोग्लोबिन कम दाब में ऑक्सीजन को मुक्त कर देता है।
और मायोग्लोबिन कम दाब पर ऑक्सीजन को ग्रहण करता है।
5. हीमोग्लोबिन में ऑक्सीजन बन्धन क्षमता परिवर्तनशील होती है।
मायोग्लोबिन की ऑक्सीजन बन्धन क्षमता सरल होती है।
6. हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को प्रबलता से बन्धित रखता है।
मायोग्लोबिन, हीमोग्लोबिन की तुलना में अधिक प्रबलता से ऑक्सीजन को बन्धित रखता है।
     तो दोस्तों ये तो थे मेरे द्वारा दि गयी जानकारी अगर आपके पास इसी प्रकार की जानकारी हो तो कॉमेंट बॉक्स में लिखें।
                  
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        हीमोग्लोबिन के लक्षण का कारण

हीमोग्लोबिन एक हीम प्रोटीन है जो की हेमी और ग्लोबिन नामक प्रोटीन से बनी होती है। ये तो आप जानते ही हैं लेकिन हीमोग्लोबिन में कुछ विशेष लक्षण पाये जाते हैं जिसके कारण उसकी पहचान आसानी से की जा सकती है। तो आओ जानते हैं उन सवालों और जवाबों को -
1. हीमोग्लोबिन का रंग लाल क्यों होता है ?
उत्तर- आप जानते ही हैं की हीमोग्लोबिन को चारों ओर से पोरफायरीन के अणु घेरे रहते हैं। तो इसके लाल रंग का भी यही कारण होता है की -
हीमोग्लोबिन अणु में पोरफायरीन चक्र संयुगमित तथा समतलीय होता है। इसका अभिलाक्षणिक लाल रंग चक्र एवं आयरन पर स्थायी पाई तथा स्थित पाई * आर्बिटलों के बीच आवेश स्थानांतरण  के कारण उत्पन्न होता है।
2. हरी सब्जियों में हीमोग्लोबिन नहीं पाया जाता है लेकिन डॉक्टरों के द्वारा खून की कमी वाले मरीजों को इसे खाने को कहा जाता है।
उत्तर- आपको ये पता ही होगा की हीमोग्लोबिन का निर्माण हेमी और प्रोटीन से मिलकर होता है। और सब्जियों में क्लोरोफिल पाया जाता है।
हेमी तथा क्लोरोफिल की रासायनिक संरचना समान होती है। क्लोरोफिल की उपस्थिति में फोरबिन वलय तंत्र की संरचना हेमी के पोरफायरीन वलय के समान होती है। शरीर में क्लोरोफिल आसानी से हेमी में परिवर्तित हो जाता है। सम्भवतः क्लोरोफिल का मैग्नीशियम परमाणु शरीर की ऑक्सीजन द्वारा आयरन में परिवर्तित हो जाता है।
आहार में हरी सब्जीयाँ खाने पर क्लोरोफिल प्राप्त होता है। यह क्लोरोफिल हीमोग्लोबिन में वृद्धि करता है। अतः मानव शरीर में हीमोग्लोबिन उपयुक्त मात्रा में बन जाता है, यदि रक्त अल्पता वाले मरीज हरी सब्जियों का सेवन करें।
3. PH कम होने पर होमोग्लोबिन की ऑक्सीजन बन्धुता कम हो जाती है क्यों ?
उत्तर- हीमोहलोबिन की ऑक्सीजन के प्रति आकर्षण , दबाव एवं PH के मान के पर निर्भर करता है। मांसपेशियों में कार्बनडाइऑक्साइड मुक्त होने के कारण PH मान में कमी हो जाती है, जिससे हीमोग्लोबिन का ऑक्सीजन के प्रति आकर्षण घटता है। मांसपेशियों की सक्रियता एवं गतिविधियों से अधिक ऑक्सीजन मुक्त होती है, जिससे ऑक्सीजन की मांग में वृद्धि होती है। ऊतक से कार्बनडाइऑक्साइड की अधिकता विलेय HCO3 ऋण आयनों के रूप होती है। PH परिवर्तन मायोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति आकर्षण क्षमता को कम नही करती है। इसके विपरीत कम PH पर हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन मुक्त करता है। अतः हीमोग्लोबिन PH परिवर्तन के प्रति संवेदनशील है जबकि मायोग्लोबिन नहीं। PH परिवर्तन की यह संवेदनशीलता बोर प्रभाव कहलाता है।  
thanks so much for supporting me