अरल सागर एशिया में कज़ाख़स्तान और उज़्बेकिस्तान के बीच स्थित एक विशाल खारे पानी की झील है, जिसे इसके विशाल आकार के कारण सागर कहा जाता है। कभी यह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अंतर्देशीय झील थी, लेकिन 1960 के दशक के बाद सिंचाई परियोजनाओं के लिए अमु दरिया और सिर दरिया का पानी मोड़ दिए जाने से इसका अधिकांश भाग सूख गया।
आज अरल सागर पर्यावरणीय विनाश का एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है। इसके सिकुड़ने से स्थानीय जलवायु, मत्स्य उद्योग, जैव विविधता और लाखों लोगों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
अरल सागर कहां स्थित है
अरल सागर उत्तर में कज़ाकिस्तान और दक्षिण में उज़्बेकिस्तान के बीच स्थित एक खारे पानी की झील थी, जो 1960 के दशक में सिकुड़ने लगी थी और 2010 के दशक तक काफी हद तक सूखकर रेगिस्तान में तब्दील हो गई थी। यह कज़ाकिस्तान के अकतोबे एवं क्यज़िलोर्दा क्षेत्रों तथा उज़्बेकिस्तान के कराकल्पकस्तान क्षेत्र में फैली हुई थी।
मंगोल और तुर्किक भाषाओं में नाम का अर्थ द्वीपों का सागर है, जो कभी इसके जल में बिखरे हुए 1,100 से ज़्यादा द्वीपों की विशाल संख्या को दर्शाता है। अरल सागर का जल निकासी बेसिन उज़्बेकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, कज़ाकिस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के कुछ हिस्सों को शामिल करता है।
अरल सागर क्यों सूख गया
पहले इस झील का क्षेत्रफल लगभग 68,000 वर्ग किलोमीटर था। जो अरल सागर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी झील बनाता था। किंतु 1960 के दशक में सोवियत संघ की विशाल सिंचाई परियोजनाओं के लिए इसे पोषित करने वाली अमू दरिया और सिर दरिया नदियों का जल मोड़ दिए जाने से इसका जलस्तर तेजी से गिरने लगा।
इसके परिणामस्वरूप झील लगातार सिकुड़ती गई और 2007 तक यह अपने मूल क्षेत्रफल के केवल लगभग 10% तक सिमट गई। इसी दौरान अरल सागर चार अलग-अलग जलाशयों में विभाजित हो गया - उत्तरी अरल सागर, दक्षिणी अरल सागर का पूर्वी बेसिन, दक्षिणी अरल सागर का पश्चिमी बेसिन, तथा बार्सकेल्मेस झील।
यह घटना विश्व के सबसे गंभीर पर्यावरणीय संकटों में से एक मानी जाती है, जिसने क्षेत्र की जलवायु, जैव विविधता, मत्स्य उद्योग और स्थानीय लोगों के जीवन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला।
2009 तक अरल सागर का दक्षिण-पूर्वी भाग पूरी तरह सूख चुका था, जबकि दक्षिण-पश्चिमी भाग सिकुड़कर पूर्व के दक्षिणी अरल सागर के पश्चिमी किनारे पर एक संकरी जलधारा के रूप में रह गया था। इसके बाद के वर्षों में अमू दरिया से कभी-कभार जल प्रवाह होने के कारण दक्षिण-पूर्वी भाग में कुछ समय के लिए फिर से पानी भर जाता था, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं रही।
अगस्त 2014 में नासा द्वारा जारी उपग्रह चित्रों ने पुष्टि की कि आधुनिक इतिहास में पहली बार अरल सागर का पूर्वी बेसिन पूरी तरह सूख गया था। इसके बाद यह क्षेत्र विशाल रेतीले मैदान में बदल गया, जिसे आज अरालकुम रेगिस्तान के नाम से जाना जाता है। यह दुनिया की सबसे नई मानव-निर्मित मरुस्थलीय भूमि में से एक है, जो जल संसाधनों के असंतुलित उपयोग और पर्यावरणीय कुप्रबंधन का एक प्रमुख उदाहरण मानी जाती है।
अरल सागर के संरक्षण और पुनर्जीवन के प्रयास
उत्तरी अरल सागर को बचाने और उसके जलस्तर को पुनः बढ़ाने के उद्देश्य से कज़ाकिस्तान सरकार ने 2005 में कोकराल बाँध का निर्माण पूरा किया। इस परियोजना के सकारात्मक परिणाम सामने आए और कुछ ही वर्षों में उत्तरी अरल सागर का जलस्तर बढ़ने लगा।
2013 तक यहाँ की लवणता में उल्लेखनीय कमी आई, जिससे मछलियों की कई प्रजातियाँ वापस लौटने लगीं। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय मत्स्य उद्योग को भी नया जीवन मिला और सीमित स्तर पर व्यावसायिक मछली पकड़ना फिर से संभव हो सका।
2011 में मुयनाक की यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की-मून ने अरल सागर के सिकुड़ने को "पृथ्वी की सबसे भीषण पर्यावरणीय आपदाओं में से एक" बताया। कभी समृद्ध और जीवंत मत्स्य उद्योग के लगभग समाप्त हो जाने से लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई।
इसके कारण व्यापक बेरोज़गारी, आर्थिक संकट और स्थानीय आबादी का बड़े पैमाने पर पलायन देखने को मिला। दूसरी ओर, सीर दरिया नदी का जल आज भी फ़रगना घाटी में लगभग 20 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
अरल सागर का क्षेत्र आज अत्यधिक प्रदूषित माना जाता है। सूखे हुए समुद्री तल से उड़ने वाली धूल, नमक तथा कृषि रसायनों के अवशेष वायुमंडल में फैलकर श्वसन रोगों, कैंसर, आँखों की बीमारियों और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रहे हैं।
इस ऐतिहासिक पर्यावरणीय त्रासदी के महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने अरल सागर से संबंधित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों को अपने "मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर" में शामिल किया है, ताकि भविष्य में इनके माध्यम से इस संकट का अध्ययन और संरक्षण किया जा सके।
अरल सागर का जलस्तर प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारणों से समय-समय पर बदलता रहा है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और कमी के कई चरण देखे गए हैं। अमू दरिया और सीर दरिया नदियों का प्रवाह उनके उद्गम क्षेत्रों में हिमनदों के पिघलने तथा नदी घाटियों में होने वाली वर्षा पर निर्भर करता है।
ठंडी और शुष्क जलवायु इन दोनों प्रक्रियाओं को सीमित कर देती है, जिससे नदियों में जल की मात्रा घट जाती है। इसके अतिरिक्त, अमू दरिया के प्रवाह मार्ग में हुए भूगर्भीय परिवर्तन तथा सिंचाई परियोजनाओं के लिए अमू दरिया और सीर दरिया के जल का बड़े पैमाने पर मानवजनित दोहन भी अरल सागर के जलस्तर में निरंतर उतार-चढ़ाव का प्रमुख कारण रहा है।
अरल सागर का इतिहास
अरल सागर का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है और यह मध्य एशिया की सभ्यताओं, सिंचाई प्रणालियों तथा व्यापारिक मार्गों से गहराई से जुड़ा रहा है। इस क्षेत्र में कृत्रिम सिंचाई प्रणालियों का विकास प्राचीन काल से ही शुरू हो गया था और इनका उपयोग आज भी किया जाता है।
रूसी पुरातत्त्वविद् सर्गेई टॉल्स्टोव के सिद्धांत के अनुसार, प्राचीन समय में अमु दरिया नदी का जल कैस्पियन सागर तक पहुँचता था। लगभग 2,500 वर्ष पहले स्थानीय लोगों ने सिंचाई की आवश्यकता को पूरा करने के लिए नदी का प्रवाह बदल दिया, जिससे उसका कैस्पियन सागर से संपर्क टूट गया।
इसके बाद अमु दरिया का जल अरल सागर तथा खोरेज़म, खिवा और आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई व्यवस्था के लिए उपयोग होने लगा।
तांग राजवंश 618–907 ई. के समय अरल सागर का क्षेत्र चीनी साम्राज्य की पश्चिमी सीमा के निकट माना जाता था और यह मध्य एशिया के व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संपर्कों का महत्वपूर्ण केंद्र था।
13वीं शताब्दी में मंगोल आक्रमणों ने इस क्षेत्र की जल-व्यवस्था को गहरा नुकसान पहुँचाया। मंगोल सेनाओं ने अनेक नगरों, नहरों और जल-संरचनाओं को नष्ट कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप अमु दरिया के प्रवाह में परिवर्तन आया।
माना जाता है कि इस बदलाव के कारण नदी की कुछ धाराएँ पुनः सर्यकामिश झील और आगे कैस्पियन सागर की ओर बहने लगीं। उस समय अरल सागर का क्षेत्र तीन प्रमुख मंगोल राज्यों जोची, इल्खानिड और चगताई ख़ानत के बीच विभाजित था।
1417 ई. में प्रसिद्ध मुस्लिम भूगोलवेत्ता हाफ़िज़-ए-अब्रू ने अपने लेखों में उल्लेख किया कि अमु दरिया और सीर दरिया के जल प्रवाह में बदलाव के कारण अरल सागर का आकार घटने लगा था। उनके विवरण इस बात के प्रमाण हैं कि अरल सागर में जलस्तर के उतार-चढ़ाव की प्रक्रिया आधुनिक काल से बहुत पहले भी देखी जा चुकी थी।
आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन की शुरुआत 1848 में हुई, जब रूसी नौसेना अधिकारी अलेक्सी बुटाकोव के नेतृत्व में अरल सागर का पहला व्यवस्थित सर्वेक्षण किया गया। इस अभियान ने झील के भूगोल, गहराई और नौवहन संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई। इसके तीन वर्ष बाद अरल सागर में पहला स्टीमर चलाया गया, जिससे इस क्षेत्र में जल परिवहन का विकास हुआ।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अरल सागर का मत्स्य उद्योग तेजी से विकसित हुआ। रूसी व्यापारियों लापशिन, रितकिन, कसीलनिकोव और मेकेव ने यहाँ व्यावसायिक स्तर पर मछली पकड़ने की शुरुआत की और बाद में बड़े मत्स्य संघों की स्थापना की। इसके परिणामस्वरूप अरल सागर मध्य एशिया के प्रमुख मत्स्य उत्पादन केंद्रों में शामिल हो गया और हजारों स्थानीय लोगों की आजीविका का आधार बना।