जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय - biography of jaishankar prasad

आप सभी पाठकों का एक बार फिर से स्वागत आज हम बात करने वाले हैं जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय के बारे में जयशंकर एक महान कवि हैं। जिसकी रचनाएं 5 वी से लेकर कॉलेज तक के पाठ्यक्रम में होते हैं। इस पोस्ट में जयशंकर प्रसाद के जीवन और व्यक्तित्व के बारे में बताया गया है।

जयशंकर प्रसाद का संक्षिप्त जीवन परिचय

छायावादी काव्य धारा के कीर्ति स्तंभ महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी सन 1890 में काशी के प्रतिष्ठित घराने में हुआ था। उनकी शिक्षा घर पर ही हुई, उन्होंने रामायण, महाभारत एवं संस्कृत का गहन अध्ययन किया। आपका निबंध 15 जनवरी 1937 में हुआ। 

आरम्भ से ही प्रसाद की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। पिता ने घर पर संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, फारसी आदि।  भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था कर दी। कवि की प्रारंभिक शिक्षा प्राचीन शिक्षा के अनुसार हुई। घर पर उन्हें कई अध्यापक पढ़ाने आया करते थे। 

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय - biography of jaishankar prasad

जयशंकर प्रसाद की रचना

  • महाकाव्य - कामायनी। 
  • खंडकाव्य - आंसू, लहर, झरना, प्रेम पथिक, पेशोला की प्रतिध्वनि, महाराणा का महत्व।  
  • नाटक - चंद्रगुप्त, स्कंद गुप्त, ध्रुवस्वामिनी। 
  • कहानी - संग्रह, आकाशदीप, आंधी, इंद्रजाल, छाया प्रतिध्वनि, कंकाल, तितली, इरावती। 

जयशंकर प्रसाद की सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है

कामायनी जयशंकर प्रसाद की सर्वश्रेष्ठ और अंतिम काव्य रचना हैं। जिसको 1936 ई. में प्रकाशित किया गया था। यह आधुनिक छायावादी युग का श्रेष्ठ  महाकाव्य है। इस महाकाव्य में मानव मन की विविध चिंता से आनंद तक 15 सर्गों की विवेचना किया गया है। 

  1. चिंता 
  2. आशा 
  3. श्रद्धा 
  4. काम
  5. वासना 
  6. लज्जा 
  7. कर्म 
  8. ईर्ष्या
  9. तर्क
  10. सपना
  11. संघर्ष
  12. त्याग
  13. दर्शन
  14. रहस्य 
  15. आनंद

कामायनी छायावादी काव्यकला का सर्वोत्तम प्रतीक है। मानव भावों की अभिव्यक्ति इस महाकाव्य की प्रमुख विशेषता हैं। इसमें लज्जा, सौंदर्य और श्रद्धा जैसे गुण दिखाई देते है।

कामायनी पौराणिक रूपकों को लेकर मानवीय भावनाओं, विचारों और कार्यों को दर्शाती है। कामायनी में मनु , इला और श्रद्धा जैसे व्यक्तित्व हैं जो वेदों में पाए जाते हैं। कविता में वर्णित महान जलप्रलय की उत्पत्ति शतपथ ब्राह्मण में हुई है।

जयशंकर प्रसाद भावपक्ष और कलापक्ष

भाव पक्ष इनकी कविताओं में प्राचीन भारतीय संस्कृति का दर्शन तो हुआ ही है साथ ही ऐतिहासिक एवं काल्पनिक रूपों में सहज मोहक झाकी परिलक्षित होती है। मनोभाव के चित्रण में प्रसाद जी अद्वितीय हैं। प्रकृति का मोहक चित्रण की मौलिकता का स्वयं परिचय देती है। 

कला पक्ष प्रसाद जी ने अपनी रचनाओं में रूपक उपमा उत्प्रेक्षा संदेह विरोधाभास आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। आपके चरणों में लयात्मक के साथ-साथ भावों को हृदय तक पहुंचाने की अद्भुत क्षमता भी है। इतना ही नहीं प्रशंसा अनुसार प्रतीक शैली एवं बिंब विधान की छटा सर्वत्र प्रतिबंधित होती है।

साहित्य में स्थान निसंदेह प्रसाद जी हिंदी के युग प्रवर्तक साहित्यकार एवं छायावादी काव्यधर के अगम गायक एवं शीर्षस्थ कवि हैं। 

काव्यगत विशेषताएं – दार्शनिक विचारधारा प्रेम और सौंदर्य की व्यंजना अनुभूति की घनता एवं तीव्रता वेदना का प्रधान ने कल्याण का अतिरेक रहस्यवादी भावनाएं प्रकृति चित्रण नारी के प्रति श्रद्धा का भाव। 

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिच

आधुनिक हिंदी साहित्य से जुड़े सबसे प्रसिद्ध व्यक्तित्व जयशंकर प्रसाद एक महान भारतीय कवि, उपन्यासकार और नाटककार थे। जिनका जन्म वाराणसी, उत्तरप्रदेश हुआ था। जयशंकर प्रसाद को अपने परिवार में कुछ वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने कम उम्र में अपने पिता को खो दिया था। 

आर्थिक तंगी के कारण वह आठवीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। हालाँकि, वे कई भाषाओं और इतिहास व हिंदी साहित्य को जानने के लिए इतने उत्सुक थे।  इसलिए उन्होंने घर पर ही अपनी पढ़ाई जारी रखी। जैसे-जैसे उन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा, वे उन वेदों से बहुत प्रभावित हुए।

उन्होंने बहुत कम उम्र से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। उन्हें अपने घर पर शतरंज खेलने और बागवानी का काम करने का भी शौक था। वे वेदों में काफी हद तक रुचि रखते थे, जिसने उन्हें अपनी कविता, नाटक, कहानियां और उपन्यास लिखने के लिए बेहद प्रभावित किया। 

उन्होंने हिंदी के ब्रज भाषा में चित्रधार के रूप में जानी जाने वाली कविता संग्रह की अपनी पहली पुस्तक लिखी है जो उस समय उत्तर प्रदेश राज्य में व्यापक रूप से उपयोग की जाती थी। उनकी कविताओं को लोगों ने बहुत पसंद किया क्योंकि वे दिल को छू लेने वाली, कोमल, सरल भाषा और भावुक करने वाली थीं।

उन्होंने कविताओं की भाषा के साथ-साथ दार्शनिक सामग्री पर भी बहुत ध्यान दिया था। इसलिए उन्हें विश्वस्तरीय हिंदी साहित्यकार, दार्शनिक और महान लेखक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने प्रेम से लेकर देशभक्ति तक की कई कविताएँ लिखीं हैं। उनके करियर की उनकी सबसे प्रमुख देशभक्ति कविता हिमाद्रि तुंग श्रृंग से के नाम से जानी जाती है। जिसे उन्होंने देश की आजादी से पहले लिखा था।

जिसके बाद उपन्यास, नाटक और कविताएँ लिखी। उन्होंने कुछ नाटक फारसी और बंगाली भाषाओं में लिखे थे। अपने ने स्वयं को संस्कृत और संस्कृत से संबंधित अन्य भाषाओं से अत्यधिक प्रभावित पाया।

जयशंकर प्रसाद के पिता का नाम क्या था

कवि जयशंकर प्रसाद के पिता का नाम देवकी प्रसाद था। वे तंबाकू के बड़े व्यापारी थे और एक विशेष प्रकार की सुरती बनाने के कारण सुंघनी साहू के नाम से विख्यात थे। 

धन-धान्य से परिवार भरा पूरा रहता था। कोई भी धार्मिक अथवा विद्वान काशी में आता तो साहू जी उसका बड़ा स्वागत करते। उनके यहां प्रायः कवियों, गायकों और कलाकारों का सम्मेलन हुआ करता था। 

वे इतने अधिक उदार थे कि मार्ग में बैठे हुए भिखारी को अपने वस्त्र उतार कर देना साधारण सी बात समझते थे। लोग उन्हें महादेव कहकर प्रणाम करते थे। कवि के पिता बाबू देवकी प्रसाद साहू ने पितामह सा ह्रदय पाया था।

जयशंकर प्रसाद का जन्म कब हुआ था

प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल दशमी 1890 विक्रम संवत को हुआ था। उस समय व्यापार अपने चरम उत्कर्ष पर था। किसी प्रकार का कोई अभाव ना था। तीसरे वर्ष में केदारेश्वर के मंदिर में प्रसाद का सर्वप्रथम संस्कार हुआ। उनके माता-पिता तथा समस्त परिवार ने पुत्र के लिए इष्ट देव शंकर से बड़ी प्रार्थना की थी।

वैधनाथधाम के झारखंड से लेकर उज्जयिनी के महाकाल तक के ज्योतिर्लिंगों की आराधना के फल-स्वरूप पुत्र रत्न का जन्म हुआ। शिव के प्रसाद स्वरूप महान कवि का जन्म हुआ था। जीवन के प्रथम चरण में ही लेखनी उठा लेना उसके आगामी विकास का परिचायक था।

5 वर्ष की अवस्था में संस्कार संपन्न कराने के लिए प्रसाद को जौनपुर में भेज दिया गया। सुंदर पर्वत श्रेणियां, बहते हुए निर्झर, प्रकृति प्रसाद के ह्रदय में कुतूहल और जिज्ञासा भर देती थी।

जयशंकर प्रसाद का करियर

उन्होंने अपनी पहली कविता को चित्रधर संग्रह के रूप में जानी जाती है। यह ब्रज भाषा में लिखी है, लेकिन जल्द ही उन्होंने लेखन भाषा को खादी और संस्कृत में बदल दिया है। उन्होंने संस्कृत भाषा में नाटक लिखना शुरू कर दिया, लेकिन बाद में उन्होंने बंगाली और फारसी भाषाओं में भी नाटक लिखे है। उनके द्वारा लिखे गए कुछ प्रसिद्ध नाटक चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और ध्रुवस्वामी हैं।

वह हिंदी साहित्य के क्षेत्र में प्रसिद्ध व्यक्तित्व हैं। उन्होंने अपने लेखन में कला और दर्शन को मिश्रित किया था। उन्होंने अपने महान लेखन के माध्यम से शास्त्रीय हिंदी कविता के सार का वर्णन किया था। 'हिमाद्री तुंग श्रृंग से' उनके द्वारा लिखी गई राष्ट्रवादी कविता है, जो बहुत प्रसिद्ध हुई जिसने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अवधि में बहुत सारे पुरस्कार जितवाए थे। कामायनी उनकी एक और लिखित कविता है जो उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती हैं।

उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से प्राचीन भारत की कई महान हस्तियों और कहानियों के जीवन इतिहास को दिखाया है। उनके लिखित नाटक हिंदी में सबसे अग्रणी साबित हुए। 1960 के दशक के आसपास, उनके नाटकों का चयन प्राचीन भारतीय नाटक के प्रोफेसर शांता गांधी ने आधुनिक भारतीय रंगमंच के लिए किया था। उन्होंने वर्ष 1928 में अपना सबसे महत्वपूर्ण लेखन स्कंदगुप्त लिखा है।

उन्होंने कई दिलचस्प लघु कथाएँ भी लिखी हैं, जिनमें से शीर्षक ऐतिहासिक से लेकर पौराणिक और समकालीन और सामाजिक दोनों से संबंधित हैं। ममता नाम की उनकी एक लघुकथा में मातृ प्रेम और मुगल बादशाह की कहानी का वर्णन किया गया है। एक और छोटी कहानी है छोटा जादूगर उस बच्चे के जीवन का इतिहास बताता है जिसने सड़कों पर छोटे खिलौनों के साथ प्रदर्शन करके पैसा कमाना सीखा है।

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