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Sunday, November 10, 2019

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Questions - Ans Bhakti Kal

HELLO Welcome my Friends मेरा नाम है खिलावन और आप देख रहे हैं हमारा ब्लॉग Rexgin.in जिस पर हम आपसे हर रोज बात करते हैं। इन्हीं ज्ञानवर्धक जानकारी से जुड़े विषयों के बारे में। आज जो टॉपिक हम आपके लिए लेकर आये हैं, वह हिंदी साहित्य के इतिहास से जो की इतिहास का दुसरा चरण है और इस चरण को भक्ति काल के नाम से जाना जाता है।




इससे पहले हमने एक पोस्ट लिखा था जिसमें मैंने आपको बताया था। आदिकाल के बारे में अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो निचे दिए लिंक पर क्लिक करें और पढ़ें आदिकाल और आदिकाल से पूछे गए प्रश्न के बारे में।

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भक्तिकाल की कवयित्री मीराबाई 


आदिकाल से महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
 


    चलिए शुरू करते हैं आज का विषय जिसमें हम आपसे चर्चा करेंगे भक्ति काल से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों के बारे में आज हमारे कॉलेज में टेस्ट हुआ जिसमें इस प्रकार के सवाल पूछे गए थे उसी को मैंने आपके सामने रखा है हो सकता है की ये आपके फाइनल एक्साम में भी आ जाए तो इसे अंत तक पढ़े और जाने भक्ति काल के बारे में।
    सहीं विकल्प वाले प्रश्न इस प्रकार से थे यहाँ मैं सिर्फ उत्तर को ही लिखने वाला हूँ उसके विकल्प को नहीं तो चलिए देखें।

    प्रश्न १. अवधि भाषा के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य का क्या नाम है ?
    उत्तर - रामचरित मानस

    प्रश्न २. हिंदी साहित्य का धर्मध्वज कवि किसे कहते हैं ?
    उत्तर - तुलसीदास।

    प्रश्न ३. फना का शाब्दिक अर्थ क्या होता है ?
    उत्तर -

    प्रश्न ४. सबसे प्राचीन वेद का नाम बताइये ?
    उत्तर - ऋग्वेद।

    प्रश्न -५. मुललादाऊ की प्रसिद्ध कृति का नाम बताइये।
    उत्तर - चंदायन।

    प्रश्न ६. मीराबाई कहाँ की कवियित्री थीं ?
    उत्तर - राजस्थान।

    प्रश्न ७. सूरदास जी के गुरु का नाम लिखिए।
    उत्तर - वल्ल्भाचार्य।

    प्रश्न ८. कबीरदास जी का जन्म कहाँ हुआ था ?
    उत्तर - मगहर, कांशी नामक स्थान पर इनका जन्म हुआ था।

    प्रश्न ९. संत सुन्दरदास के गुरु का नाम लिखिए।
    उत्तर - दादूदयाल उनके गुरु का नाम था।

    प्रश्न १०. मधुमालती के रचयिता कौन थे ?
    उत्तर - मंझन नामक कवि ने इसकी रचना की थी।

    प्रश्न ११. पद्मावत क्या है ?
    उत्तर - पद्मावत एक महाकाव्य है।

    प्रश्न १२. राघव, चेतन और पंडित किस कहानी के पात्र हैं ?
    उत्तर - ये सभी पात्र पद्मावती के हैं।

    प्रश्न १३. आखिरीकलाम और चित्ररेखा किसकी रचना है ?
    उत्तर - मलिकमुहमम्द जायसी की रचना है।

    प्रश्न १४. वैराग्य संदीपनी एवं कृष्ण गीतावली किसकी रचना है ?
    उत्तर - तुलसी दास ने इसकी रचना की थी।

    प्रश्न १५. कवित्त रत्नाकर किसकी रचना है ?
    उत्तर - यह सेनापती की रचना है।

    दीर्घ उत्तरीय प्रश्न जिसको की पांच नंबर के लिए पूछा गया था। इसके उत्तर आप अपने तरिके से भी लिख सकते हैं।




    प्रश्न १. भक्तिकाल के समाजिक परिस्थितियों को समझाइये।

    उत्तर - इस काल में हिन्दू समाज की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। यह असहाय, दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहा था। स्वार्थवश या बलात्कार के कारण हिन्दू मुस्लिम धर्म स्वीकार कर रहे थे। हिन्दू कन्याओं का यवनों से बलात विवाह का क्रम चल रहा था। दास प्रथा भी प्रचलित थी। सम्पन्न मुसलमान हिन्दू कन्याओं को क्रय रहे थे। कुलीन नारियों का अपहरण कराके अमीर लोग अपना मनोरंजन किया करते थे। परिणाम स्वरूप हिन्दू जनता ने इस सामाजिक आक्रमण से बचने के लिए अनेक उपाय किये। बाल विवाह और पर्दा प्रथा इस आक्रमण से बचने का ही उपाय था। वर्णाश्रम (जाति-प्रथा) व्यवस्था सुदृढ़ हो गई थी। रोजी-रोटी के साधन छीन जाने से वह गरीब होता गया और जीविकोपार्जन के लिए मुसलमानों के सम्मुख आत्मसमर्पण करता रहा।

    इस प्रकार भक्तिकाल राजनितिक दृष्टि से युद्ध, संघर्ष और अशांति का काल था। हिन्दू-समाज पर होने वाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों का समय था।

    टीप :- ध्यान रखें यह प्रश्न आपको पांच नंबर के लिए पूछा गया है तो इसे आपको उसके हिसाब से लिखना है।

    प्रश्न २. भक्तिकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिये।

    उत्तर - भक्तिकाल का समय संवत १३५० (1350) से सम्वत १७०० (1700) तक माना गया है। यह दौर युद्ध, संघर्ष और अशांति का समय था। मुहम्मद बिन तुगलक से लेकर शाहजहां तक का शासन काल इस समय में आता है।  इस अवधि में तीन प्रमुख मुस्लिम वंशों-पठान, लोदी और मुगल का साम्राज्य रहा। छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने और साम्राज्य विस्तार की अभिलाषा ने युद्धों को जन्म दिया। इस राज्य संघर्ष परम्परा का आरम्भ सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक से आरम्भ हुआ। तुगलक के बाद सुलतान मुहम्मद शाह गद्दी पर बैठा। सन 1412 में उसकी मृत्यु के साथ तुगलक वंश समाप्त हुआ। इसके बाद लोदी वंश के बादशाहों ने साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। अंतिम बादशाह इब्राहिम लोदी था, जिसका अंत सन 1526 में हुआ। इसके बाद मुगल वंश का शासन आरम्भ हुआ। जिसमें क्रमशः बाबर, हुमायूं, अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने राज्य किया।

    मुगलवंशीय बादशाह यद्द्पी काव्य और कला प्रेमी थे, किन्तु निरंतर युद्धों, अव्यवस्थित शासन-व्यवस्था और पारिवारिक कलहों से देश में अशांति ही रही। मुगलवंशीय शासकों में अकबर का राज्य सभी दृष्टियों  से सर्वोपरि और व्यवस्थित रहा। इसका प्रभाव उसके उत्तराधिकारी शासकों पर भी रहा।

    प्रश्न ३. ज्ञानमार्गी निर्गुण काव्य की प्रमुख विशेषताओं को समझाइये।

    उत्तर - इस ज्ञानमार्गी निर्गुण काव्यधार की विशेषता इस प्रकार है -

    1. गुणातीत की ओर संकेत - निर्गुण शब्द का अर्थ गुण रहित होता है। जब इस पंथ के संतों के संदर्भ में इसे देखते हैं तो यह गुणातीत की ओर संकेत करता है।

    2. परब्रम्ह को महत्व - यह किसी निषेधात्मक सत्ता का वाचक न होकर उस परब्रम्ह के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो सत्व, रजस और तमस तीनों गुणों से अतीत है।

    3. स्वरूप वर्णन में असमर्थ - वाणी उसके स्वरूप का वर्णन करने में असमर्थ है। जो रूप, रंग, रेखा से परे है। यह निर्गुण ब्रम्ह घट-घट वासी है फिर भी इन्द्रियों से परे है। वह अवर्ण होकर भी सभी वर्णों में है। अरूप होकर भी सभी रूपों में मौजूद है।

    4. समानता का संदेश - वह अवर्ण होकर भी सभी वर्णों में है। अरूप होकर भी सभी रूपों में मौजूद है। वह देशकाल से परे है, आदि- अंत से रहित है , फिर भी पिंड और ब्रम्हांड सभी में व्याप्त है। निर्गुण भक्ति ने  समानता का संदेश दिया। निर्गुण भक्त संतों का सपना एक ऐसे समाज का निर्माण करना था, जहां किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं है।

    5. हिन्दू मुस्लिम दोनों प्रभावित - मध्य काल में हिन्दू जाति वर्णाश्रम धर्म की जटिलताओं से युक्त थी , तो इस्लाम भी धार्मिक कटटरता की भावना से ग्रस्त था। उधर उत्तर भारत में सिद्धों, नाथों के कर्मकांड के कारण सच्ची धर्म भावना का हास हो रहा था। व्यवस्था के इस दुष्चक्र में सामान्य जन लगातार पीस रहा था। दक्षिण से आनेवाली भक्ति की लहर ने हिन्दू-मुसलमान दोनों को प्रभावित किया। दक्षिण भारत में भक्ति के प्रणेता रामानंद थे और इसे उत्तर में कबीर ने प्रसारित किया।

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    Saturday, November 9, 2019

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    भक्ति काल संवत 1350 से 1700 तक


    Hello and welcome guys आज हम बात करने वाले हैं, भक्ति काल के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में और उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के बारे में।

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    हिंदी साहित्य भक्तिकाल का इतिहास 

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

    अगर हम बात करें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की तो भक्ति काल का समय सम्वत 1350 से 1700 तक माना गया है। यह दौर युद्ध संघर्ष और अशांति का समय था। मोहम्मद बिन तुगलक से लेकर शाहजहां तक का शासन काल इस समय में आता है।




    भक्ति काल का इतिहास - हिंदी साहित्य
    इस अवधि में तीन प्रमुख मुस्लिम वंशों-पठान, लोदी और मुगल का साम्राज्य रहा। छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने और साम्राज्य विस्तार की अभिलाषा ने युद्धों को जन्म दिया। अर्थात जो बड़े राजा थे वह छोटे राज्यों को हड़पने की कोशिश किया करते थे जिससे कि उनका साम्राज्य बढ़ सके और इस कारण से वहां युद्ध होने लगे तो इस राज्य संघर्ष परंपरा का आरंभ मोहम्मद बिन तुगलक से हुआ था और तुगलक के बाद सुल्तान मोहम्मद साहब गद्दी पर बैठा था। सन 1412 में उनकी मृत्यु हुई जिसके साथ ही तुगलक वंश समाप्त हो गया। इसके बाद लोदी वंश के बादशाहों ने साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया और अंतिम बादशाह इब्राहिम लोदी था। जिसका अंत 1526 में हुआ इसके बाद मुगल वंश का शासन प्रारंभ होता है मुगल वंश के शासन में जैसे कि हम सभी जानते हैं अकबर के बारे में और आगरा के ताजमहल को किसने बनवाया था शाहजहां ने तो उसी के शासनकाल में बना था। यानी कि भक्ति काल के दौरान ही यह बना था। जिसमें मुगल वंश के शासक थे बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां तो इन सभी ने भक्ति काल के दौरान राज्य किए।


    मुगल वंश के बादशाह काव्य और कला के प्रेमी थे जिसमें से ताजमहल एक बहुत ही सुंदर उदाहरण है। लेकिन उस समय जो निरंतर युद्ध चल रहे थे और जो बड़े राजा थे वह छोटे राज्यो को हड़पने में लगे हुए थे। इस कारण अव्यवस्थित शासन व्यवस्था और परिवारों में भी कलह थी। तो इस कारण से परिवारिक कलहों से देश में अशांति ही रही मुगल वंश के शासकों में अकबर का राज्य सभी दृश्यों से सर्वोपरि और व्यवस्थित रहा मुगल वंश के सभी शासकों में से मुगल के शासक मुगल वंश के शासक अकबर का जो राज्य था सभी दृष्टि से अन्य शासकों की तुलना में इसका प्रभाव उनके उत्तराधिकारी शासकों पर भी रहा। साथ ही सुब्यवस्थित शासन व्यवस्था थी। तो यह तो थी भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।

    सामाजिक परिस्थितियां

    भक्ति काल में हिंदू समाज की स्थिति अत्यंत ही सोचने लायक थी और उस समय यह हिंदू समाज असहाय दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहे थे और स्वार्थ वश वहां पर बलात्कार के कारण हिंदू धर्म स्वीकार कर रहे थे। उनकी मजबूरी हो गई थी हिंदू धर्म को अपनाने की हिंदू कन्याओं का यवनों से बलात विवाह का क्रम चल रहा था। यानी की बाल्यकाल में ही विवाह का क्रम जारी था। दास प्रथा भी प्रचलित थी और संपन्न मुसलमान हिंदू कन्याओं को, क्रय कर रहे थे यानी कि उनको खरीद रहे थे। कुलीन नारियों का अपहरण करा के वहां जो अमीर मुसलमान जो थे वे लोग अपना मनोरंजन किया करते थे।

    परिणाम स्वरूप हिंदू जनता ने इस सामाजिक आक्रमण से बचने के लिए अनेक उपाय किए बाल विवाह और पर्दा प्रथा इस पर आक्रमण से बचने का उपाय था। जो बाल विवाह उस समय कराए जाते हैं और जो पर्दा प्रथा चल रही थी उससे बचने के लिए ही वहां पर यह सभी किए जाते थे। वर्णाश्रम यानी की जाति प्रथा व्यवस्था वहां पर सुदृढ़ हो गई थी और रोजी रोटी के साधन छिन जाने से वहां गरीब होता गया और जीवन गुजारने के लिए मुसलमानों के सम्मुख आत्मसमर्पण वे करते रहे।

    अर्थात इस काल में हिंदू समाज जो था वह अत्यंत ही दुखदाई स्थिति में था।

    अब इस प्रकार हम देखे तो भक्ति काल राजनीतिक दृष्टि से युद्ध संघर्ष और अशांति का काल रहा था और हिंदू समाज पर होने वाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों का समय भी इसे हम कह सकते हैं।
    अगर आपके कोई सुझाव हो तो कमेंट में बताएं अगर कोई जानकारी में त्रुटि हो तो हमें कमेंट करके अवश्य ही अवगत कराएं धन्यवाद।

    सारांश

    इस प्रकार देखा जाए तो भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उतनी सुदृण या सुरक्षित नहीं थी काव्य रचना (पद्ध), गद्य रचना कला के क्षेत्र में देखें तो। क्योंकि उस समय युद्ध और अशांति फैली हुई थी बड़े राजाओं द्वारा छोटे छोटे राज्यों को हड़पने के लिए और अपने साम्राज्य के विस्तार के अभिलाषा के कारण तो इस कारण से वहां काव्य और कला के क्षेत्र में कोई उन्नति देखने को हमें नहीं मिलती है और उस समय देश में अशांति व्याप्त रही। जिसके कारण भक्ति काल में वहां के कवि लोगों को भक्ति की ओर ले जाने का प्रयास करते रहे।

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    Tuesday, November 5, 2019

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    Jaishankar Prasad Jivan Prichay Aalochna Khand


    Hello and welcome आप सभी पाठकों का एक बार फिर से स्वागत आज हम बात करने वाले हैं जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य कामायनी के बारे में इसमें उसकी आलोचना खंड की चर्चा हम इस पोस्ट के माध्यम से करेंगे। मतलब यहां पर जयशंकर प्रसाद के जीवन और व्यक्तित्व के बारे में बताया गया है।

    jaishankar Prasad

    आलोचना खंड 

    जयशंकर प्रसाद : जीवन और व्यक्तित्व

    कवि का जीवन उसकी कृतियों में परोक्ष रूप से झांका करता है। जो कार्य साधारण व्यक्ति व्याख्या से करता है, उसे वह संकेत मात्र से कर लेता है। वह जिस संसार से अनुप्राणित होता है, उसकी व्याख्या भी अपने आदर्शों के अनुसार करता है। प्राचीन युग का ऋषि कवि तथा आज का स्वच्छंदतावादी कलाकार, दोनों ही अनुभूति और कल्पना से अपनी कृति का निर्माण करते हैं। विश्व के सभी महान कवियों के काव्य में उनके जीवन की छाया परोक्ष रूप से दिखाएं देती है।

    कवि प्रसाद की पितामह बाबू शिवरतन साहू काशी के अत्यधिक प्रतिष्ठित नागरिक थे। वे तंबाकू के बड़े व्यापारी थे और एक विशेष प्रकार की सुरती बनाने के कारण "सुंघनी साहू" के नाम से विख्यात थे। धन-धान्य से परिवार भरा पूरा रहता था। कोई भी धार्मिक अथवा विद्वान काशी में आता तो साहू जी उसका बड़ा स्वागत करते। उनके यहां पर प्रायः कवियों, गायकों, कलाकारों की गोष्ठी होती रहती थी। वे इतने अधिक उदार थे कि मार्ग में बैठे हुए भिखारी को अपने वस्त्र उतार कर देना साधारण सी बात समझते थे। लोग उन्हें "महादेव" कहकर प्रणाम करते थे। कवि के पिता बाबू देवी प्रसाद साहू ने पितामह का-सा ही ह्रदय पाया था।


    ऐसे वैभव पूर्ण और सर्वसंपन्न वातावरण में प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल दशमी, 1946 विक्रम संवत को हुआ था। उस समय व्यापार अपने चरम उत्कर्ष पर था, किसी प्रकार का कोई अभाव ना था। तीसरे वर्ष में केदारेश्वर के मंदिर में प्रसाद का सर्वप्रथम क्षौर संस्कार हुआ। उनके माता-पिता तथा समस्त परिवार ने पुत्र के लिए इष्ट देव शंकर से बड़ी प्रार्थना की थी। वैधनाथधाम के झारखंड से लेकर उज्जयिनी के महाकाल तक के ज्योतिर्लिंगों की आराधना के फल-स्वरूप पुत्र रत्न का जन्म हुआ।

    शिवप्रसाद के शिव के प्रसाद स्वरूप इस महान कवि का जन्म हुआ था। जीवन के प्रथम चरण में ही अपने पाणि-पल्ल्वों के लेखनी उठा लेना उसके आगामी विकास का परिचायक है। 5 वर्ष की अवस्था में संस्कार संपन्न कराने के लिए प्रसाद को जौनपुर सौंदर्य ने कवि की शैशवकालीन स्मृतियों पर अपनी छाया डाल दी। सुंदर पर्वत श्रेणियां, बहते हुए निर्झर, प्रकृति नव-नव रूप सभी ने उनके नादान ह्रदय में कुतूहल और जिज्ञासा भर दी।

    नौ वर्ष की अवस्था में प्रसाद ने 1 लंबी यात्रा की। चित्रकूट, नैमिषारण्य, मथुरा, ओमकारेश्वर, धारा क्षेत्र, उज्जैन तक का पर्यटन किया। इस अवसर पर परिवार के अधिकांश व्यक्ति भी साथ थे। चित्रकूट की पर्वतीय शोभा, नैमिषारण्य का निर्जर वन, मथुरा की वनस्थली तथा अन्य क्षेत्रों के मनोरम सौंदर्य पर वे अवश्य रीझ उठे होंगे।

    कवि के विशाल भवन के सम्मुख ही एक शिवालय है, जिसे उनके पूर्वजों ने बनवाया था। उनका परिवार शैव था। उनके अनेक अवसरों पर मंदिर में नृत्य हुआ करते थे। बालक प्रसाद भी भागवद भक्ति में तन्मय होकर भक्तों का स्तुतिपाठ करना देखते रहते थे। प्रातः काल वातावरण को मुखरित कर देने वाली घंटे की ध्वनि उनके लिए उस समय केवल एक जिज्ञासा, कुतूहल का विषय था। जीवन के आरंभ में शिव की भक्ति करने वाला कवि अंत में शैव दर्शन से प्रभावित हुआ।




    आरम्भ से ही प्रसाद की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। पिता ने घर पर संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, फारसी आदि भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था कर दी। कवि की प्रारंभिक शिक्षा प्राचीन परिपाटी के अनुसार हुई। घर पर उन्हें कई अध्यापक पढ़ाने आया करते थे।

    प्रसाद लगभग 12 वर्ष के ही थे कि 1921 में उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। घर का समस्त भार बड़े भाई शम्भुरतन पर आ पड़ा वे स्वतंत्र इच्छा के निर्भीक व्यक्ति थे। हृष्ट-पुष्ट शरीर के साथ ही उन्हें पहलवानी का शौक था। सायंकाल अपनी टमटम पर घूमने निकल जाते। रोब के कारण यदि कोई दौड़ लगाता, तो उसे पछाड़ देते। उनका ध्यान व्यवसाय की ओर अधिक न था। धीरे-धीरे उसे व्यापार में हानि पहुंचने लगी और पूर्वजों की थाती को संभालना भी कठिन हो गया।

    प्रसाद जी के पिता देवीप्रसाद की मृत्यु के पश्चात ही गृहकलह आरंभ हो गया। कुछ समय तक प्रसाद की माता ने इसे रोका, पर वह उग्र रूप धारण करता गया। शंभूरतन जी ने अपनी उदारता और सहृदयता से उसे कम करने का पूर्ण प्रयत्न किया, किंतु वह बढ़ता ही गया। अंत में प्रसाद के चाचा और बड़े भाई में मुक्केबाजी हुई। यह मुकदमा लगभग 3 से 4 वर्ष तक चलता रहा। अंत में शंभूरतन जी की विजय हुई। समस्त संपत्ति का बंटवारा हो गया। इस बीच ध्यान न देने के कारण सारा पैतृक व्यवसाय भी चौपट हो गया। अन्य व्यक्ति लूट मचा रहे थे, जब शंभूरतन जी ने बंटवारे के पश्चात अपने घर में प्रवेश किया, तब वहां भोजन आदि के पात्र न थे। इस अवसर पर प्रसाद जी ने अपने एक चित्र को बताया था कि जब कभी घर से कोई काम-काज होता था, तो दुकान का टाट उलट दिया जाता था। उसके नीचे बिखरी हुई पूंजी मात्र से वह कार्य भली-भांति संपन्न हो जाता था। जिस घर में रजत पात्रों में भोजन किया जाता था, वहीं शंभूरतन जी ने एक नवीन की हस्ती का निर्माण किया।




    दुकान के साथ ही लाखों के ऋण का भार भी शंभूरतन जी पर आ पड़ा। एक-एक करके सम्पत्ति विक्रय की जाने लगी। बनारस में चौक पर खड़ी हुई भारी इमारत भी बेंच देनी पड़ी। इन्हीं झंझटों के बीच प्रसाद की कॉलेज-शिक्षा भी छूट गई। वे आठवीं तक पढ़ सके। अब प्रसाद जी को प्रायः नारियल बाजारवाली दुकान पर बैठना पड़ता था। घर पर अब भी शिक्षा का क्रम बराबर चल रहा था। अपने गुरु रसमयसिद्ध ने उन्हें उपनिषद पुराण, वेद, भारतीय दर्शन का अध्ययन करने की प्रेरणा मिला। प्रसाद का समस्त साहित्य इसी का विस्तृत अध्ययन और चिंतन से अनुप्रमाणित है।

    बनारस चौक से दाल मंडी में जो गली दाईं ओर मुड़ती है, उसी में लगभग चार हाथ पर नारियल बाजार में  सुंघनीसाहू की दुकान थी। उसी पर प्रसाद को बैठना पड़ता।

    शंभूरतन जी शरीर की ओर ध्यान देते थे। स्वयं प्रसाद जी भी खूब कसरत करते थे। वह उन इने-गिने साहित्यकारों में से थे, जिन्हें स्वस्थ शरीर में एक स्वस्थ मस्तिष्क प्राप्त हुआ था। प्रसाद जी के पास सौंदर्य, धन और यश तीनों ही थे।

    अब प्रसाद जी का परिवार एक वैभवशाली परिवार न रह गया था। ऋण के कारण सभी कुछ समाप्त हो गया था। किसी प्रकार शम्भुरतन जी बिखरे हुए व्यापार को सुधारने का प्रयास कर रहे थे। इसी समय प्रसाद जी की माता का देहांत हो गया। कवि माता के पुनीत दुलार और स्नेह से भी वंचित हो गया। संघर्षों के बीच भी प्रसाद जी का अध्ययन चल रहा था। इसी बीच उन्होंने ब्रजभाषा में सवैया, धनाक्षरी आदि लिखना आरंभ कर दिया था।

    जयशंकर प्रसाद की अवस्था इस समय केवल सहस्त्र वर्ष वर्ष की थी। उन्हें जीवन का अधिक अनुभव न था। वे अपनी भावक्ता का आनंद हि ले रहे थे कि उन पर यह ब्रजपात हुआ। इस प्रकार केवल 5-6 वर्षों के भीतर ही प्रसाद ने तीन अवसान देखें पिता, माता और भाई। स्नेह-देवालय के महान श्रृंग गिर गए। वे अकेले ही रह गए, निः सहाय। ऐसे संकट काल में भारतीय दर्शन ने प्रसाद जी को नवीन प्रेरणा दी। सम्भवतः कामायनी का "शक्तिशाली हो विजयी बनो" उनके मस्तिष्क में उस समय गूंज उठा होगा। उनके चारों ओर विषमताएं खेल रही थी। लोग उन्हें अल्पावस्था का जानकर लूट लेना चाहते थे, पर उनके हाथों में यश था। उन्हें स्वयं अपना विवाह भी करना पड़ा। इसके अनन्तर उनके दो और विवाह हुए।

    17 वर्ष की अल्पायु में ही एक भारी व्यवसाय और परिवार का उत्तरदायित्व भावुक प्रसाद पर आ पड़ा प्रसाद जी ने अपने व्यवसाय को देखना आरंभ किया। बाहर जब भी कोई व्यापारी आता तो वे स्वयं उससे बातचीत करते।  इत्र आदि बनाने के समय वह जाकर उनका पाग देख लिया करते और इसमें तो वे कन्नौज के व्यापारियों को भी मात दे देते थे। अपने पैतृक व्यापार को संभालने का उन्होंने भरसक प्रयास किया। गृह-कलह के पश्चात व्यापार की दशा बड़ी जर्जर हो गई थी। सुँघनी साहू का काशी में अब भी वही नाम था, किंतु व्यवसाय की दृष्टि से निःसंदेह वह पीछे था। प्रसाद जी ने आजीवन अपने विगत वैभव को पाने का प्रयास किया और अंत में सभी कुछ नियति के भरोसे पर छोड़ दिया। उन्होंने धीरे-धीरे समस्त ऋण चुका दिए थे।

    बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात ही उन्होंने अपने जीवन में अनेक परिवर्तन कर लिए थे। किसी प्रकार का कोई व्यसन उन्हें नहीं था। प्रातः काल उठकर वे गंगा नदी की ओर भी भ्रमण के लिए निकल जाते थे। यदि उतना समय न होता, तो बेनियाबाग तक ही चले जाते। वहां से लौटकर कसरत करने के पश्चात ही नियमित रूप से लिखने बैठ जाते। स्नान-पूजन के पश्चात दुकान चले जाते। यहां पर भी रसिकों की मंडली जमा रहती। इसी दुकान के सामने प्रसाद जी ने एक खाली बरामदा अपने मित्रों के बैठने के लिए ले लिया था। नित्यप्रति संध्या समय वहीं पर बैठक होती थी। अच्छा खासा दरबार जमा रहता था। दुकान से लौटकर वे रात को देर तक लिखा करते थे। उनकी अधिकांश साहित्य-साधना संसार के प्रमुख कलाकारों की भांति रजनी के प्रहरों में ही निर्मित हुई।




    कवि-जीवन के आरंभ में जिन व्यक्तियों से उन्होंने विशेष प्रेरणा ली, उनमें से एक उनके पड़ोसी मुंशी कालिन्दी प्रसाद और दूसरे रीवा निवासी श्री रामानंद थे। मुंशी कालिंदी प्रसाद उर्दू-फारसी के अच्छे विद्वान थे। प्रसाद ने इन विषयों के अध्ययन में उनसे प्राप्त पर्याप्त सहायता ली थी।

    प्रसाद का साहित्यिक जीवन "इंदु" पत्रिका से प्रकाश में आया। इंदु मासिक पत्रिका थी जिसका समस्त कार्य प्रसाद की योजना के अनुसार होता था। इसके संपादक और प्रकाशक उनके भांजे अंबिका प्रसाद गुप्त थे।

    प्रसाद जी का जीवन एक साधक के समान था। किसी प्रकार की सभा आदि में जाना उन्हें प्रिय ना था। इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि वे अभिमानी थे। वास्तव में वे संकोचशील व्यक्ति थे प्रायः घर अथवा दुकान पर ही अपने मित्रों के साथ बैठकर बातचीत किया करते थे। नियमित रूप से साहित्यिक व्यक्ति उनके पास आ जाते और फिर देर रात को देर तक कार्यक्रम चलता रहता। प्रसाद दूसरों को प्रायः उत्साहित करते रहते। वे मित्रों के साथ कभी-कभी नौका विहार के लिए चले जाते और सारनाथ भी घूम आते। उनके यहां बैठे हुए व्यक्ति प्रायः एक दूसरे से हास-परिहास किया करते और उन्हें कभी-कभी बिलकुल दरबारी ढंग से काम होने लगते। इस अवसर पर भी प्रसाद जी सदा मुस्कुराया करते। स्वयं हास-परिहास अथवा बातचीत में प्रायः खुलकर भाग नहीं लिया करते थे। भांग-बूटी नित्यप्रति ही छनती थी, किंतु वे प्रायः उसका सेवन नहीं करते थे। उनमें शिष्टता और शालीनता अधिक थी। वह संयत स्वभाव के व्यक्ति थे और उनके मित्रों का कथन है कि प्रायः मुखर नहीं होते थे।

    अपने राजनीतिक जीवन में प्रसाद पूर्ण देशभक्त थे। उन्होंने स्वयं राजनीति में सक्रिय भाग नहीं लिया, किंतु अपने विचारों में वे पूर्णतया देशप्रेमी थे। कांग्रेस की अपेक्षा गांधी जी के व्यक्तित्व ने उन्हें अधिक प्रभावित किया था। वह देश भक्ति के साथ ही सांस्कृतिक उत्थान के भी पक्षपाती थे। अपने ऐतिहासिक नाटकों के द्वारा उन्होंने इसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पुनरुत्थान का प्रयास किया। भारतीय संस्कृति के प्रति मोह रखते हुए भी वे रूढ़िवादी नहीं थे जीवन में दीर्घ समय तक शुद्ध खद्दर पहनते रहे। जाती-पाती, छुआछूत, पाखंड आदि से वे कोसों दूर थे। एक बार जब उनकी जाति के व्यक्तियों ने उन्हें सभापति बना दिया तब उन्होंने उसे ऊपरी मन से स्वीकार कर लिया और बाद में तार दे दिया कि मैं न आ सकूंगा। काशी में अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर उन्होंने गांधी जी के दर्शन किए थे। शक्ति के उपासक होते हुए भी वे अहिंसा के पुजारी थे और बौध्द दर्शन की ओर अधिक झुके थे। उनकी धारणा थी कि करुणा ही मानव का कल्याण कर सकती है। आंसू में (आंसू उनके काव्य का नाम है) उन्होंने अपनी भावना का प्रतिपादन किया है। प्रसाद के संपूर्ण साहित्य में करुणा ममता का स्वर मिलता है।

    प्रसाद के सम्पूर्ण जीवन की प्रेम-घटना को लेकर विद्वानों में पर्याप्त वाद विवाद हो चुका है। कुछ लोग तो अनर्गल धारणाएं बना लेते हैं। इसमें संदेह नहीं कि "आंसु" के वियोग-वर्णन के मूल में कोई अलौकिक आलंबन है। उसकी अनुभूति इतनी प्रत्यक्ष है कि उससे कवि की व्यक्तिक भावना का स्पष्ट परिचय मिल जाता है। उनके साहित्य में बिखरी हुई प्रेम और अतृप्ति की भावना इसका प्रमाण है कि जीवनानुभूति में कोई ऐसा प्रसंग अवश्य था, किंतु प्रसाद के काव्य में उक्त भावना का उदात्तीकरण भी होता गया है और अंत में वह वैयक्तिक घटना उच्चतर मानसिक और दार्शनिक भूमि पर रखी जा सकी है। उनके परवर्ती काव्य को देखने से पता चलता है कि सौंदर्य और प्रेम के विषय में उनकी बड़ी उदात्त भावना थी। प्रसाद ने अपने जीवन में अनेक उत्थान-पतन देखे थे। वैभव और अकिंचनता एक साथ उनके जीवन में आए थे। रजतपात्रों में भोजन करने वाले प्रसाद को अनेक वर्ष तक ऋणी रूप में रहना पड़ा। उनके आंतरिक जीवन में भी यही स्थिति थी। तीन-तीन नारियों का उनके जीवन में समावेश हुआ था। माता का दुलार उनसे यौवन के आरंभ के पूर्व ही विदा ले चुका था। मां के चले जाने के पश्चात जीवन पर्यंत उन्होंने अपनी भाभी की पूजा की। कवि के साहित्य पर दृष्टिपात से इतनी करने से इतना अनुमान अवश्य होता है कि उसे अपने जीवन में अधिक प्रेम और स्नेह मिला था।

    प्रसाद जी की रचनाएं-

    • कानन कुसुम 
    • प्रेम पथिक
    • आंसू
    • झरना
    • लहर
    • कामायनी
    इन्हें भी पढ़ें अगर मन है तो-

    Thursday, October 31, 2019

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    मेरे सभी पाठकों का एक बार फिर से स्वागत है आज हम आपको हमारे कॉलेज में लिए गए परीक्षा में पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर के बारे में बताने वाले हैं हो सकता है ये आपके लिए उपयोगी हों और यह मुख्य परीक्षा में भी पूछे जा सकते हैं। तथा यह आपके कॉम्पिटिशन परीक्षा के लिए भी उपयोगी हो सकता है। ये प्रश्न इस प्रकार है -




    aadikal veergatha kal ke mahatvpurn prashn uttar

    आदिकाल या वीरगाथाकाल से लिए गए प्रश्न और उनके उत्तर 

    अति लघु उत्तरीय प्रश्न

    प्रश्न 1. हिंदी का आदि कवि किसे माना जाता है?
    उत्तर - स्वयंभू।

    प्रश्न 2. हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य किसे कहा जाता है।
    उत्तर - पृथ्वीराज रासो।

    प्रश्न 3. देवताओं की लिपि किसे कहा जाता है?
    उत्तर - देवनागरी लिपि।

    प्रश्न 4. संसार की सबसे प्राचीन भाषा का नाम क्या है?
    उत्तर - संस्कृत।

    प्रश्न 5. रामचंद्रिका किसकी रचना है?
    उत्तर - केशवदास।

    प्रश्न 6. नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक किसे माना जाता है?
    उत्तर - आदिनाथ।

    प्रश्न 7. हिंदी साहित्य का प्रथम कवि किसे माना गया है?
    उत्तर - स्वयंभू।

    प्रश्न 8. हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का पहला सफल प्रयास किसने किया ?
    उत्तर - जॉर्ज ग्रियर्सन।

    प्रश्न 9. हिंदी साहित्य का इतिहास किसने लिखा?
    उत्तर - आचार्य रामचंद्र शुक्ला




    प्रश्न 10. त्रिपिटक किनका महाग्रंथ है?
    उत्तर -  बौद्ध धर्म का।

    प्रश्न 11. कौटिल्य ने किस ग्रंथ की रचना की थी?
    उत्तर - अर्थशास्त्र।

    प्रश्न 12. आधुनिक हिंदी भाषा का विभव किससे माना जाता है?
    उत्तर - अपभ्रंश के द्वारा

    प्रश्न 13. अपभ्रंश का दुलारा छंद कौन सा है?
    उत्तर - दोहा चौपाई।

    प्रश्न 14. अधिकार का राजनीतिक परिवेश कैसा था?
    उत्तर - पतन का।

    प्रश्न 15. श्रावक 4 किसकी रचना है?
    उत्तर - आचार्य समन्तभद्र।

    प्रश्न 16. महामुद्रा किसे कहते हैं?
    उत्तर -  
    महामुद्रा बौद्ध धर्म के साधकों द्वारा की जाने वाली एक कठिन साधना है। जिसमें स्त्रियों का उपभोग किया जाता था। 
    प्रश्न 17. विजयपाल रासो किसकी रचना है?
    उत्तर - नल्लसिंह भाट

    प्रश्न 18. खम्माण रासो के रचयिता कौन थे?
    उत्तर - दलपति विजय।




    प्रश्न 19. संदेश रासो के रचयिता क्या है नाम बताइए।
    उत्तर - अब्दुर्रहमान।

    प्रश्न 20. उपदेश रसायन रास के रचयिता के नाम बताइए
    उत्तर -  श्री जिनदत्त सूरी।  

    लघु उत्तरीय प्रश्न

    प्रश्न 1. इतिहास की पुनर्लेखन की समस्या पर अपना विचार व्यक्त कीजिए !
    उत्तर -

    प्रश्न 2. वीरगाथा काल की प्रमुख प्रवृत्तियों का वर्णन कीजिए।
    उत्तर - चाटुकारिता - इस काल में कवि धन, उपहार एवं सम्मान के लालच में आश्रयदाता राजाओं की चाटुकारिता की प्रवित्ति पायी जाती थी जो की उस समय की रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।
    कल्पना की प्रधानता - इस काल के कवियों में राष्ट्रीय भक्ति का आभाव था लेकिन उनमें कल्पना करने की प्रवित्ति बहुत ज्यादा मात्रा में व्याप्त थी।
    आंखोदेखा रचना - इस काल के कवि केवल वीर रस की रचना ही नहीं किया करते थे बल्कि वे युद्ध के स्थान पर जाकर वहां कि स्थिति को देखकर उनका वैसा ही वर्णन किया करते थे।

    प्रश्न 3. आदिकाल की सांस्कृतिक परिवेश को समझाइए
    उत्तर - हर्षवर्धन के समय हिंदू संस्कृति की उन्नति अपने शिखर पर थी सभी कलाओं में धार्मिक छाप देखी जा सकती थी। मुसलमानों के आगमन के साथ ही भारतीय संस्कृति पर मुस्लिम प्रभाव भी देखा जाने लगा था, हिंदू मुस्लिम साथ रहते हुए भी एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखते थे किंतु उत्सव और सांस्कृतिक प्रमुख पर्वों में हिंदू संस्कृति का प्रभाव अधिक था। इस प्रकार जहां एक और परंपराओं का मिलाजुला रूप उभर कर सामने आ रहा था वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति और साहित्य के लिए सुदृढ़ पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी।
    इस प्रकार का सुखद परिवेश उस समय देखने को मिलता है।




    प्रश्न 4. सिद्ध साहित्य पर प्रकाश डालिए।
    उत्तर - सिद्ध साहित्य का तात्पर्य वज्रयानी परंपरा के उन सिद्ध आचार्य के साहित्य से है जो अपभ्रंश दोनों तथा चर्यापदों के रूप में उपलब्ध हैं और जिन्होंने बौद्ध तांत्रिक सिद्धांतों को मान्यता दी है। शैव नाथपंथियों को भी सिद्ध कहा जाता था जो उन्हीं के समकालीन थे। किंतु बाद में शैव  योगियों के लिए नाथ और बौद्ध तांत्रिकों के लिए सिद्ध कहा जाने लगा। सिद्धों की रचनाएं प्रायः दोहा कोश और चर्यापदों के रूप में मिलती है। दोहा कोश दोहों से युक्त चतुष्पदियों की कड़क शैली में मिलते हैं।  कुछ दोहे टिकाओं में उपलब्ध हैं और कुछ दोहागीतियां बौद्ध तंत्रों और साधनाओं में मिलते हैं। चर्यापद बौद्ध तांत्रिक चर्या के समय गाए जाने वाले पद हैं जो विभिन्न सिद्धाचार्यों के द्वारा लिखे गए हैं।
    सिद्धों का संबंध बौद्ध धर्म की ब्रजयानी शाखा से है।  यह भारत के पूर्वी भाग में सक्रिय थे।  इनकी संख्या 84 मानी जाती है जिनमें सरहप्पा, शबरप्पा, लुइप्पा, डोम्भिप्पा, कुक्कुरिप्पा आदि मुख्य हैं।  सरहप्पा प्रथम सिद्ध कवि थे।  उन्होंने ब्राह्मणवाद, जातिवाद और बाह्यचारों पर प्रहार किया।  देहवाद का महिमा मंडन किया और सहज साधन पर बल दिया।  यह महासुख वाद द्वारा ईश्वरत्व की प्राप्ति पर बल देते हैं।

    प्रश्न 5. रासो साहित्य से आप क्या समझते हैं?
    उत्तर - हिंदी साहित्य में 'रास' या 'रासक' का अर्थ लास्य से है जो नृत्य का एक भेद है।  अतः इसी अर्थ के आधार पर गीत नृत्य परक रचनाएँ 'रास' के नाम से जानी जाती हैं ' रासो ' या ' राउस ' में विभिन्न प्रकार के अडिल्ल, ढूसा, छप्पर, कुंडलियां पद्धटिका आदि छंद प्रयुक्त होते हैं इस कारण ऐसी रचनाएं ' रासो ' के नाम से जानी जाती हैं।
    रासो गानयुक्त परम्परा से विकसित होते होते उपरूपक और  उपरूपक से वीर रस से पद्यात्मक प्रबंधों में परिवर्तित हो गया है। इस रासो काव्य में युद्ध वर्णन से भरा हुआ रचना है।

    दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

    प्रश्न 1. आदिकाल के नामकरण की समस्या पर प्रकाश डालिए।
     उत्तर - हिंदी साहित्य के इतिहास के काल विभाजन के नामकरण को देखा जाए तो इसे नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा आचार्य रामचंद्र के द्वारा किये गए काल विभाजन को स्वीकार किया गया और उन्होंने इसे चार भागों में बांटा था। आदिकाल प्रथम भाग है तथा शेष क्रमश: भक्तिकाल , रीतिकाल और आधुनिक काल हैं। और इसी प्रकार के काल विभाजन को इस सभा ने मान्य किया।
    काल विभाजन के संबंध में विद्वानों के मत
    जार्ज ग्रियरसन - इन्होंने ने ही सबसे पहले काल विभाजन का प्रयास किया और इनके अनुसार इन्होने आदिकाल को चारण काल का नाम दिया और इन्होने ने इसका आरम्भिक समय 700 से 1300 ई. तक माना है।
    मिश्रबंधुओं के अनुसार - मिश्रबंधुओं ने इस काल को आरम्भिक काल का नाम दिया और यह ग्रियरसन के काल विभाजन से कहीं अधिक प्रोढ़ था। इन्होने इसे आरम्भिक काल का नाम दिया था।
    इसके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे 1920 में वीरगाथा काल का नाम दिया और यह आज भी उपयोग में लाया जाता है।
    साहित्य के इतिहास के प्रथम काल का नामकरण विद्वानों ने इस प्रकार किया है -
    1. डॉ. ग्रियर्सन - चारणकाल
    2. मिश्रबन्धु - प्रारम्भिक काल
    3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल - वीरगाथाकाल
    4. राहुल संकृत्यायन - सिद्ध सामंत युग
    5. महावीर प्रसाद द्वेदी - बीजवपन काल
    6. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र - वीरकाल
    7. हजारी प्रसाद द्वेदी - आदिकाल
    8. रामकुमार वर्मा - चारण काल




    इस प्रकार सभी विद्वानों के मत अलग अलग हैं जैसे की आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने इसे वीरगाथा काल इसलिए कहा क्योकि इस समय वीरगाथात्मक ग्रंथों की प्रधानता थी। आचार्य ने यहां पर 12 रचनाओं का वर्णन किया जिसमें कुछ इस प्रकार हैं -

    1. विजयपाल रासो - नल्लसिंह कृत सं. 1355 
    2. हम्मीर रासो - शार्ङधर की रचना 1357 
    3. कीर्तिलता - जिसके रचनाकार हैं -विद्यापति सं. 1460 
    4. कीर्तिपताका - विद्यापति 1460 की रचना है। 
    5. खुमाण रासो - दलपति विजय ने इसकी रचना 1180 
    6. बीसलदेव रासो - नरपति नाल्ह ने इसकी रचना 1212 में की थी। 
    7. पृथ्वीराज रासो - चंद बरदाई ने इसकी रचना 1225-1249 के लगभग किया था। 
    8. जयचंद्र प्रकाश - भट्ट केदार के द्वारा रचित सन 1225 में प्रकाशित काव्य। 
    9. जयमयंक जस चंद्रिका - मधुकर कवि ने इसकी रचना की थी यह 1240 सम्वत की रचना हैं। 
    10. परमाल रासो - की रचना जगनिक ने की थी यह सं. 1230 की रचना है। 
    11. खुसरों की पहेलियाँ - इसकी रचना अमीर खुसरो ने की थी सं. 1350 में 
    12. विद्यापति की पदावली - इसे खुद विद्यापति ने सं. 1460 में लिखा था। 
    इस प्रकार इस काल को लेकर विद्वानों में इश्पष्ठ्ता का आभाव है। आचार्य महाविर प्रसाद द्वेदी के अनुसार।
    यह काल तो पूर्ववर्ती परिनिष्ठित अपभृंश की साहित्य प्रवित्तियों का विकास है। 

    आज इस लेख में बस इतना ही मिलते हैं अगले पोस्ट के साथ कोई सुझाव हो तो अवश्य बताएं। 

    Wednesday, October 30, 2019

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    Hello and Welcome Friends मेरा नाम है खिलावन और आप पढ़ रहें हैं Rexgin.in जिसपर आपको मिलता है पढ़ाई लिखाई से जुड़े टॉपिक के बारे में ज्ञानवर्धक जानकारियां और कल मैंने आपके लिए पोस्ट किया था मैथिलीशरण गुप्त के द्वारा लिखा गया साकेत महाकाव्य का आलोचना खण्ड और आज हमने पोस्ट किया है आपके लिए साकेत का ही टॉपिक 
    Maithilisharan Gupt Dwara Likhit Saket ki Kathavastu

    मैथिलीशरण गुप्त द्धारा रचित साकेत की कथावस्तु 

    जैसा कि हम सभी जानते हैं मैं तो मैथिलीशरण गुप्त जी हिंदी साहित्य भारतीय समाज और इतिहास के दुवेदी युग के कवि हैं और कोई भी कवि या साहित्यकार अपने युग से असंतृप्त रहकर नहीं लिख सकता। अतः गुप्त जी की रचनाएं भी युग सापेक्ष संवेदना और वस्तु को लिए हैं। उनका युग सुधार और इतिवृत्तात्मक  संवेदना का युग है। अतः गुप्त जी के साहित्य में भी यह प्रवृत्ति और संवेदना उभर कर सामने आती है। कवि ने पौराणिक रामकथा के कुछ स्थलों को लेकर उनके आधार पर साकेत के कथानक की रचना की। है कुछ परंपरागत विद्वानों ने साकेत की विशेषता को आपेक्ष के रूप में प्रस्तुत किया है कि गुप्तजी ने साकेत में रामायण के परित्यक्त, विस्मृत एवं उपेक्षित प्रसंगो व पात्रों को ही प्रकाश मिलाने का प्रयास किया है। तथाकथित विद्वानों का यह आक्षेप युगीन प्रभाव और कवि की समसामयिक प्रतिबद्धता की ओर संकेत करता है। विद्वानों का यह भी कहना है कि एक और कवि ने संपूर्ण राम-कथा भी कह देनी चाही और दूसरी ओर उपेक्षित स्थलों तथा पात्रों को भी उभारने की चेष्टा की है। इस दुवनदु में कथानक का संतुलन बिगड़ गया है और उसके सुनिश्चित प्रवाह में गतिरोध आ गया है। यह आरोप परंपराग्राही लोगों द्वारा लाया गया है जो कि युग की सापेक्षता को नहीं समझ पाते। यह भारत के इतिहास का वह समय था जब उपेक्षित इंसान को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के लिए पूरा देश संघर्ष कर रहा था और गांधीजी इसका नेतृत्व कर रहे थे तब एक राष्ट्र कवि का दायित्व इस संवेदना और समय की आवश्यकता को अभिव्यक्त करना था ना कि रामकथा को पुनर्जीवित करना। इस नुक्ते नजर-से साकेत को पढ़ा जाना चाहिए।

    जब तुलसी ने वाल्मीकि रामायण में परिवर्तन करके अपने युगीन प्रभाव और संवेदनाओं को अपने रामचरित मानस का विषय बनाया तो उन पर यह आक्षेप नहीं लगा। कृतिवास ने अपनी रामायण में बहुत से नए और अपने परिवेश और मूल्यों से संबंध प्रसंग रामायण में अनुस्यूत किए तो उन पर यह आक्षेप नहीं लगा। दरअसल रामायण और राम कथा की रूढ़ मनोवृत्ति से देखने पर इस तरह के आक्षेप जन्म लेते हैं। राम का चरित्र विकासशील है और वह निराला और दुष्यंत कुमार या दुष्यंत कुमार तक विकसित होता रहा है। राम युग नायक हैं, तो हर युग में उनका महत्व तभी कायम रह सकता है जबकि हम उसे समय की आवश्यकता के अनुसार विकसित और परिवर्तित करें। मैथिलीशरण ने भी यही किया था। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में आम उपेक्षित जनता की व्यापक भागीदारी आवश्यक थी। उसे वैधता देने के लिए पौराणिक आधार देना आवश्यक था।

    प्रथम सर्ग-
    साकेत के प्रथम सर्ग में मैथिलीशरण गुप्त जी ने प्राचीन साहित्य परंपरा के अनुसार देवी शारदा की स्तुती से आरंभ किया है। इसके बाद कवी ने साकेत नगरी की भव्यता का वर्णन किया है। यह नगरी अवनी की अमरावती। और यहाँ इंद्र के समान दशरथ का शासन है। राजा और प्रजा का पारस्परिक संबंध सौमनस्य एवं सद्भाव का है। राजा के पुत्र- राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न हैं और उनकी एकमात्र अभिलाषा श्रीराम के शीघ्र अति शीघ्र राज्याभिषेक की है। 
    रात्रि अपने अंतिम चरण में है और प्रभात का आगमन हो रहा है। राजप्रासाद में अरुण वस्त्रों को धारण किए हुए उर्मिला खड़ी है। तभी लक्ष्मण वहां आते हैं और तरुण दंपत्ति के मध्य हास-परिहास प्रेम वार्ता चलने लगती है। लक्ष्मण उर्मिला को राम राज्याभिषेक की सूचना देते हैं। 
    प्रथम सर्ग से ही गुप्त जी हमें आधुनिक युग की विशेषता से परिचित कराने लगते हैं। इसमें लक्ष्मण और उर्मिला के बीच जो बातचीत होती है, वह आधुनिक नारी के प्रतीक है न कि प्राचीन और मध्यकालीन आर्य लक्ष्मण और उर्मिला के इस सुखी दांपत्य जीवन के चित्र में हमें उर्मिला के प्रेम, वाक्चातुर्य एवं लोकप्रियता का परिचय मिलता है। उर्मिला के चरित्र का यह पहलू हमें आधुनिक नारी से परिचित कराता है। प्राचीन काव्य नायिकाएँ एक गाम्भीर्य से ढकी रहती थी और उनके दांपत्य जीवन का हास्य-विनोद भी एक सीमा के भीतर रहता था, जबकि आधुनिक युग की वाक्चतुरा नारी इस दृष्टि से बहुत आगे बढ़ी हुई है। उर्मिला का यह रूप हमें इसी की झलक दिखलाता है और यही साकेत के प्रथम सर्ग की विशेषता है।

    द्वितीय सर्ग-
                  द्वितीय सर्ग में रामकथा का विकास होता है और राम के राज्याभिषेक की सूचना से मंथरा का चिंतित होना दिखाया गया है क्योंकि यहीं से कथा का अगला विकास होगा इस वर्ग में मंथरा कैकई का प्रसंग एवं राजा दशरथ के वरदान का प्रसंग है। राम के राज्याभिषेक की सूचना से पूरा वातावरण हर्षोल्लासमय है, परंतु दासी मंथरा खुश ना होकर चिंतित हैं, मंथना को इस दशा में देख कैकयी उसकी उदासी का कारण पूछती हैं मंथरा कैकयी के मन में संशय पैदा करती हुई कहती हैं कि भरत जैसा भाई की अनुपस्थिति में राम का राज्याभिषेक यह सिद्ध करता है कि उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा गया है। चुकी मंथरा राजनीति की समझ और चेतना से परिपूर्ण है इसलिए वह राजनीति के दांवपेच के संदर्भ में इस घटना को देखती हैं और कहती हैं की इसके मूल में राजनीतिक षड्यंत्र है जो कि आपकी सरलता के कारण रचा गया है। इस बात को सुनकर कैकयी बहुत क्रोधित होती हैं और मंथरा को डांट-फटकार कर भगा देती है। मंत्रा के जाने पर भी उसके यह शब्द कैकेयी मानस से हटते नहीं-
    भरत से सूत पर भी संदेह।
    बुलाया तक न उसे जो गेह। 
    कैकई के संपूर्ण तन-मन में क्रोध अग्नी सुलग उठती है। दशरथ के वहाँ आने पर वह उनसे राम के 14 वर्षों के वनवास एवं भरत के राज्याभिषेक की मांग करती है। राजा दशरथ ने कैकेयी को वचन दिए थे इसलिए वे अपने वचन को झुठला नहीं पाते और इसी द्वंद पूर्ण परिस्थिति में रात्रि व्यतीत होती है।
    गुप्तजी ने मंथरा के प्रसंग में तत्कालीन राजनीतिक षडयंत्रों को भी उजागर किया है और भारतीय राजाओं की वचनबद्धता को राज्य के विकास में बाधक भी बताया है।

    तृतीय सर्ग-
    तीसरे सर्ग में मंथरा द्वारा लगाई गई आग की लपटें राम और लक्ष्मण तक पहुंचती है। लक्ष्मण उर्मिला से विदा ले, राम के पास जाते हैं इसके बाद दोनों भाई पिता की वंदना के लिए जाते हैं। दशरथ भी उस समय अत्यंत द्वंद पूर्ण दशा में थे। वह बहुत दुखी मन से मंथरा और  कैकेयी के द्वारा की गई मांग संपूर्ण घटना की जानकारी राम-लक्ष्मण को देते हैं। इसे राम तो अत्यंत सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं परंतु लक्ष्मण क्रोध अग्नि में जल उठते हैं। राम बहुत कठिनाई से उन्हें शांत कर पाते हैं। लक्ष्मण का क्रोध तो शांत हो जाता है, परंतु वे राम के साथ वन जाने का प्रस्ताव रखते हैं और इस पर दृढ रहते हैं। इस प्रस्ताव को प्रस्ताव को राम द्वारा स्वीकार कर लिए जाने पर दशरथ बार-बार मूर्छित होते हैं तो राम और लक्ष्मण पिता को अपने सामने क्षण-क्षण मूर्छित एवं कातर होता देख वहां से चले जाते हैं।

    चतुर्थ सर्ग-
    चौथे सर्ग का आरंभ कौशल्या और सीता के देवार्चन की तैयारियों से होता है। इसी समय राम और लक्ष्मण वहाँ आते हैं और वहाँ राम माँ को संपूर्ण घटना और अपने निर्णय से अवगत कराते हैं। कौशल्या को सहसा विश्वास नहीं होता, परंतु लक्ष्मण का रुदन देख वे आशंकित हो उठती हैं। कौशल्या राजनीति में पटु नहीं है, वह एक माँ हैं अतः उन्हें भरत के राज्य-भार सँभालने में कोई आपत्ति नहीं है, परंतु वे राम के वन गमन को रोकना चाहती हैं और इसके लिए वह भीख मांगने को भी तैयार हो जाती हैं। इसी समय सुमित्रा वहां आ जाती है और कौशल्या द्वारा भीख मांगने को वे उचित नहीं मानती और उनके इस कार्य से गुस्से से भर उठती हैं। राम उन्हें समझाते हैं और शांत करते हैं। इसके बाद सीता वन में स्वर्ग रचाने की कल्पना करने लगती हैं और लक्ष्मण दोनों माताओं से राम के साथ वन जाने की आज्ञा प्राप्त करते हैं। तभी राजसी वस्त्र त्याग कर वल्कल वस्त्र धारण करके का प्रसंग आता है। सीता जैसे ही वल्कल वस्त्रों को लेने को हाथ बढ़ाती है, कौशल्या इसे सहन नहीं कर पातीं और बिलख उठती हैं। कौशल्या सीता के वन गमन से अत्यधिक पीड़ित हैं और राम भी सीता को बहुत समझाते हैं। ताकि वे वन जाने का विचार त्याग दें, परंतु सीता नहीं मानती और कहती हैं-
    मेरी यही महामति है,
    मति ही पत्नी की गति। 
    तथा- अथवा कुछ भी न हो वहाँ, 
    तुम तो हो जो नहीं यहां। 
     साकेत का यह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है, क्योंकि यहां पर उर्मिला की स्थिति अत्यंत करूण एवं उपेक्षित है। लक्ष्मण भाई और भाभी की सेवा के लिए अपनी पत्नी की उपेक्षा करते हैं और उसे छोड़कर जा रहे हैं। वह इस स्थिति में क्या करें और क्या कहें ? गुप्त जी यहां पत्नी को हाड़-माँस युक्त चित्रित करते हैं, न कि त्याग और समर्पण की देवी, वह एक देह है और देह पति से कुछ और चाहती है परंतु कर्तव्य की महत्ता उसे महान बना देती है और वह अपनी भावनाओं को अपने अंदर ही दफन कर देती है और अपने मन को समझाती है-
    ,,,,,,,,,,, है मन!

     तू प्रिय पथ का विघ्न न बन।
    यह पंक्ति स्त्री के समर्पण और त्याग की टेक की तरह इस्तेमाल होती है। हमारा पितृसत्तात्मक समाज और परिवार व्यवस्था में स्त्री का इस्तेमाल इसी तरह के आदर्शों के माध्यम से होता है। वह त्याग और समर्पण की मूर्ति बना दी जाती हैं हाड़-माँस की देह की जगह। उसके अंदर की स्त्रीत्व चेतना और देह की चेतना को मन के अंधेरे कोने में दफन कर दिया जाता है। उर्मिला के माध्यम से कवि ने स्त्री की इसी स्थिति की ओर संकेत करना चाहा है।
     उर्मिला देखती है कि सीताराम के साथ वाद-विवाद और तर्क वितर्क करने में जीत गई उन्हें साथ चलने की अनुमति मिल गई। उर्मिला भी उसी सीता की बहन है, उर्मिला भी पत्नी-धर्म से परिचित हैं, उर्मिला भी पति के लिए राज्य-वैभव को ठुकराकर वन में जीवन बिता सकती है। वह जानती है कि यदि वह साथ चलने की जिद्द करेगी तो लक्ष्मण उसे नहीं ले जाएंगे। वह बड़े भाई राम की असुविधा को ध्यान में रखकर उसे साथ न चलने की बात कहेंगे। इस स्थिति में संभव है कि लक्ष्मण को भी रोक दिया जाए। यहाँ देखने लायक बात यह है की तर्क लक्ष्मण ने नहीं दिया उर्मिला ने स्वयं तर्क कर लिया और साथ चलने की बात ही नहीं की यह उस युग की सीमा है जिस युग में कभी लिख रहा है। कवि उर्मिला से साथ चलने की जिद करवा सकता था और लक्ष्मण मना करते तब उर्मिला नहीं जाती, पर ऐसा करके वे लक्ष्मण को छोटा नहीं बना सकते थे अतः उर्मिला ने स्वयं अपने मन में सोच लिया की वह पति की भ्रात्री-भक्ति में और कर्तव्य भावना में बाधा क्यों बने? उर्मिला के विवश भाव से सारी परिस्थिति को स्वीकार तो कर लेती हैं किंतु हृदय में उमड़ता स्त्रीत्व की चेतना का तूफान उसे संभलने नहीं देता, वह 'हाय' कहकर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ती है। उर्मिला की दुर्दशा देख सीता के मुख से भी निकल पड़ता है-

    आज भाग्य जो है मेरा,
    वह भी हुआ न हा तेरा। 
    यहां हम देखते हैं कि सीता ने भी उर्मिला को साथ ले चलने की बात नहीं की। जबकि उर्मिला साथ होती तो वन में सीता को अधिक सुविधा होती। राम की असुविधा के कारण लक्ष्मण और उर्मिला को साथ नहीं ले गए, पर सीता की सुविधा का ध्यान और उर्मिला की आवश्यकता का ध्यान कवि को नहीं आया।
    वस्तुतः यह प्रसंग साकेत का एक अत्यंत भावपूर्ण स्थल है और इसमें युग युग से उपेक्षित उर्मिला की महानता कवि ने अत्यंत सहृदयता से अंकित की है। उर्मिला की महानता का अंकन करके उर्मिला के प्रति करुणा पैदा करने में कवि सफल हुआ पर उसने भी उर्मिला के साथ न्याय नहीं किया। महान आदर्शों की परंपरा में एक आदर्श और जुड़ गया। यहां आवश्यकता थी उर्मिला की पीड़ा को अभिव्यक्ति देने की और उर्मिला की देह की चेतना को सार्थकता प्रदान करने की। दो स्त्रियों की पीड़ा और आवश्यकता को साथ-साथ एक ही भावभूमि पर प्रतिष्ठित करने की और उन्हें समान न्याय दिलाने की।
    अंत में राम, सीता, लक्ष्मण तीनों को माता कौशल्या विवश भाव से वन-गमन की अनुमति प्रदान करती हैं।

    पंचम सर्ग-
    पंचम सर्ग में कथा के विकास को राम के वन में विचरण और निवास की दिशा में मोड़ दिया गया है। राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर चढ़कर वन की ओर जा रहे हैं। नगर-वासी पथ पर इधर-उधर खड़े अश्रु-पूरित नेत्रों से उन्हें विदाई दे रहे हैं और कैकेयी के कुटिल-कर्म की निंदा कर रहे हैं। राम उन्हें बार-बार समझा-बुझाकर वापस भेज देते हैं। अयोध्या की सीमा पार कर तमसा नदी के किनारे पहुंचता है। वहां से गोमती और फिर गंगा तट पहुंचा। वहां से राम लक्ष्मण और सीता को निषादराज ने गंगा पार कराई। वहां से राम लक्ष्मण सीता प्रयाग और तत्पश्चात चित्रकूट पहुंचे। लक्ष्मण ने वहाँ विश्राम कुटिया बनाई और वासियों ने उनका स्वागत किया।

    षष्ठम सर्ग-
    छठे सर्ग का आरंभ विरहिणी उर्मिला की करुणकातर दशा से होता है। वह मूर्छित पड़ी हैं और सखियां उसे धैर्य बँधाती हैं। राजा दशरथ और उनकी रानियां भी शोक-संतृप्त हैं दशरथ का अनुमान है कि मेरी दारुण दशा का वर्णन करके अवश्य ही पुत्र राम को सुमंत अपने साथ वापस लौटा लाएगा, परंतु जब सुमंत अकेले लौटते हैं तो दशरथ के शोक का पारावार सीमा का अतिक्रमण कर जाता है और प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। सर्वत्र हाहाकार मच जाता है। मुनिवर वशिष्ठ सबको धैर्य बांधते हैं।

    सप्तम सर्ग-
    भरत शत्रुघ्न की साथ आ रहे हैं, किन्तु ज्यों-ज्यों वे नगर के निकट पहुंचते हैं तो किसी अमंगल की आशंका से बेचैन हो उठते हैं। महल में आकर उनके भिन्न-भिन्न प्रश्नों व जिज्ञासाओं का शमन कैकेयी ही करती है -
    तो सुनो यह क्यों हुआ परिणाम -
    प्रभु गए सुर-धाम वन को राम। 
    मांगे मैने ही लिया कुल-केतु,
    राजसिंहासन तुम्हारे हेतु। 

    यह सुनकर भरत पर वज्र-प्रहार होता है। अपने अंतर् का सम्पूर्ण आक्रोश कैकेयी पर व्यक्त करके भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती। वहाँ आत्मग्लानि से आपूर्ण हृदय से स्वयं को दण्ड का भागी स्वीकार करते हैं। कौशल्या उन्हें निर्दोष मानती हैं। भरत शोक के कारण अचेत हो जाते हैं। गुरू वशिष्ट उसी समय आते हैं और सबको धैर्य बंधाते हैं। इस शोक-संतृप्त रात्रि के बाद अगले दिन राजा दशरथ का दाह-संस्कार होता है।

    अष्टम सर्ग-
    चित्रकूट का दृश्य है। राम एक वृक्ष की छाया में पड़ी हुई शीला पर बैठे है और पर्णकुटी के वृक्षों को सींचती हुई सीता को निहार रहें हैं। सीता के मुख पर श्रमजन्य स्वेद कण झिलमिला उठते हैं तो राम उनसे विश्राम करने को कहते हैं। अभी पति पत्नी में वार्ता चल रही है कि सीता वन के खग-मृग को भयभीत होकर भागता देखती हैं और कोलाहल की उत्तरोत्तर तीव्र होती हुई ध्वनि की और इंगित करती हैं। लक्ष्मण आशंका व्यक्त करते हैं कि सम्भवतः भरत दल बल के साथ आक्रमण करने आ रहें हों। राम इसका निषेध करते हैं। तभी भीड़ नजदीक आ जाती है, भरत, शत्रुघ्न दौड़कर राम और सीता के पाँव तले लोट जाते हैं तभी राम की दृष्टी पड़ती है निराभरण श्वेत वस्त्र धारिणी माँ के ऊपर और वे करूण चीत्कार कर उठते हैं। वशिष्ट उन्हें धैर्य बंधाते हैं। फिर राम अपने दिवंगत पिता को श्रद्धांजली समर्पित करते हैं।
    ततपश्चात रात्रि के समय सभा बैठती है और राम भरत से उनकी मनोकांछा पूछते हैं। यह सुनते ही भरत के अंदर का आवेश बाँध तोड़कर बह उठता है। उनकी ग्लानि, उनका शोक, उनका उत्पीड़न मार्मिक शब्दों में व्यक्त होने लगता है। कैकेयी भी राम से वापस लौटने का अनुरोध करती है। शोक और आत्मग्लानि से परिपूर्ण कैकेयी के अंतर् की व्यथा इन शब्दों में बह उठती है -
    युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी,
    रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी। 
    कैकेयी का यह पश्चाताप उसके पाप की कालिमा को धो देता है और राम के मुख से ये शब्द निकल पड़ते हैं -
    सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
    जिस जननी ने है जना भरत सा भाई। 
    भरत के अभिलाषा है की राम साकेत लौटकर राज्य-भार संभालें और उनके स्थान पर भरत वनवास का जीवन व्यतीत करे। किन्तु राम के तर्कों के आगे उन्हें परास्त होना पड़ता है और अंततः राम की चरण पादुका लेकर ही भरत वापिस लौटने को विवस हो जाते हैं।
    इसके बाद सीता, लक्ष्मण एवं उर्मिला का कुटी में क्षणिक मिलन करवा देती हैं पर दोनों में से कोई अपने अंतर के ज्वार-भाटे से, दूसरे को अवगत नहीं करा पाते। मिलन अल्पकालीन ही रहता हैं।

    नवम एवं दशम सर्ग-
    इन सर्गों में कथा परवाह की गति अवरुद्ध है। उर्मिला का विरह निवेदन ही इनमें व्यंजित हुआ है। वस्तुतः इस समय कथा में कोई ऐसा महत्वपूर्ण विषय था ही नहीं। राम-लक्ष्मण-सीता का वन्य जीवन एवं शेष सब का नगर-जीवन एक निश्चित गति से अग्रसर होने लगा था। केवल विरहिणी उर्मिला ही उन सबमें एक ऐसी थी जिसके भाग्य में चौदह वर्षों की विरह अवधि लिखी गई थी। अस्तु, कवि ने विविध छंदों में उसके अंदर की पीड़ा और आंसुओं को ही अभिव्यक्त किया।

    एकादश सर्ग- राजभवन के बराबर में एक पर्ण-कुटी बनी हुई है जो की भरत का आवास है। वहां एक स्वर्ण-निर्मित मंदिर में मणिमय पाद-पीठ पर राम की दोनों चरण-पादुकाएँ रखी हैं और उनके समक्ष पुजारी रूप में भरत बैठे हैं। तभी पीतांबर धारिणी और मस्तक पर सिंदूर-बिंदु लगाए मांडवी एक थाल में फलाहार लेकर यहाँ प्रविष्ट होती है। वह भी यथेष्ट उदास है, क्योकि बहन उर्मिला को आज वह जल तक पिलाने में समर्थ नहीं हो सकी है। भरत यह बात सुनकर अत्यंत दुखी हो जाते हैं और स्वयं भी उपवास करने का विचार करते हैं, परन्तु मांडवी का कथन है की इससे प्रभु प्रसाद का तिरस्कार होगा, अतएव वे सबके साथ प्रसाद ग्रहण करने का निश्चय करते हैं। तभी शत्रुघ्न आते हैं और भरत को विविध समाचारों से अवगत कराते हैं। वे यह भी बताते हैं कि नगर में लौटकर आये हुए एक व्यवसायी ने उन्हें राम के चित्रकूट से चले जाने, दण्डक वन में विराध को जीवित गाड़ने, मुनिवर अगस्त्य से दिव्यास्त्र की प्राप्ति करने, शूर्पणखा के नाक-कान काटने तथा खर और दूषण राक्षसों के वध करने, की सूचना दी जाती है। राक्षसों के छल-बल का अनुमान कर भरत अभी आशंकित हो ही रहें हैं, तभी आकाश मार्ग से उन्हें एक मायावी राक्षस जाता प्रतीत होता है। भरत उसकी और बाण छोड़ते हैं और वह ' हा लक्ष्मण ' , ' हा सीते ' कहता हुआ भूमि पर आ गीरता है। भरत यह सोचकर व्याकुल  होते हैं की उन्होंने किसी रामभक्त को आहत तो नहीं किया है। मांडवी एक महात्मा से प्राप्त संजीवनी बूटी की परीक्षा करने को कहती है। उस उपचार से हनुमान होश में आते हैं और शत्रुघ्न और माण्डवी को वे राम, लक्ष्मण और सीता जान हर्षित हो उठते हैं। परन्तु जब तीनों का सच्चा परिचय पाते हैं, तो तेजी से उठकर संजीवनी लाने के लिए कैलास जाने को उद्धत हो जाते हैं। यह जानने पर की संजीवनी यहीं पर है वे निश्चिन्त होकर भरत आदि को सीता-हरण,जटायु संस्कार, शबरी का आतिथ्य, सुग्रीव की मैत्री, बालि का वध, प्रभु की मुद्रिका लेकर अशोक वाटिका में सीता जी के दर्शन, लंका-दहन, विभीषण का राम की शरण में आना, राम-रावण युद्ध, कुम्भकरण वध और लक्ष्मण शक्ति लगने का प्रसंग आदि संक्षेप में बताते हैं। इसके पश्चात भरत से संजीवनी ले आकाश मार्ग से वे उड़ जाते हैं।

    द्वादश सर्ग-
    भरत सम्पूर्ण समाचारों से अवगत हो चिंतित, दुःखी एवं कातर हो उठे हैं। मांडवी उन्हें समझाती है। भरत शत्रुओं का सामना करने के लिए तत्पर हो उठते हैं और शत्रुघ्न को सैन्य-सज्जा करने के लिए कहते हैं। शत्रुघ्न जब पहुंचते हैं तब तक मांडवी सबको सारे समाचारों से अवगत करा चुकी होती हैं। कौशिल्या अधीर एवं अशांत हैं जबकि सुमित्रा इस स्थल पर वीर क्षत्राणी का रूप प्रदर्शित करती हैं और पुत्र को आदर्श पथ का अनुगमन करने का आदेश देती है। समस्त साकेतवासी रणभूमी की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार हैं। उर्मिला भी सेना के साथ चलने के कहती है। इस पर शत्रुघ्न कहते हैं-
    क्या हम सब मर गए है ! जो तुम जाती हो,
    या हमको तुम आज दीन दुर्बल पाती हो। 
     उर्मिला उत्तर देती है कि वह युद्ध में आहत सैनिकों की परिचर्या करेंगीं। तभी वशिष्ट का आगमन होता है और वे सुचना देते हैं कि लंका तो प्रायः जीत ही ली गई है। वे योग-दृष्टि से सबको युद्ध के दृश्य दिखाते हैं - राम अपने स्नेह एवं करुनासिक्त स्वरों से लक्ष्मण को जगाने की चेष्टा में रत हैं तभी हनुमान संजीवनी लेकर उपस्थित होते हैं और संजीवनी से लक्ष्मण शीघ्र ही उठ बैठते हैं। राम आनंद विभोर हो उठते हैं और लक्ष्मण को विश्राम करने को कहते हैं, परन्तु लक्ष्मण शीघ्र ही युद्धोत्शाह में भरकर, सेना एकत्र कर, लंका में आक्रमण देते हैं। रावण की मोर्चा बंदी भी पर्याप्त सुदृढ़ है। लक्ष्मण मेघनाथ का वध कर देते हैं। तत्पश्चात रावण का वध होता है। गुरु वशिष्ट साकेत वासियों को आज्ञा देते हैं कि शीघ्र ही राम के स्वागत हेतु साकेत को सजाओ हर्ष और प्रसन्नता के आवेग से उल्ल्सित साकेतवासी स्वागतसाज सजाते हैं, राम और भरत का मिलाप होता है। राम अयोध्या आते हैं। माताएं अपने पुत्रों का हर्षमग्न हो स्वागत करती है। सीता अपनी बहनों से मिल प्रफुल्लित हो उठती हैं। सखी उर्मिला से इस सुअवसर पर नूतन वस्त्राभरण धारण कर प्रिय का स्वागत करने को कहती हैं, परन्तु उर्मिला कहती हैं-
     नहीं नहीं प्राणेश मुझी से छले न जावे; मैं जैसी हूँ नाथ मुझे वैसा ही पावें। 
    उर्मिला को अपनी यौवन-निधि के लूट जाने का दुःख है, यौवन की खिलखिल करती बेला के चले जाने पर संताप है, किन्तु तभी लक्ष्मण आते हैं और उसे अपने धीर-गंभीर स्वर में समझाते हैं -
    वह वर्षा की बाढ़ गई, उसको जाने दो। 
    शुचि -गंभीरता प्रिये, शरद की यह आने दो। 
    इस तरह कर्तव्य और प्रेम में जीवन की सार्थकता को तलाशती है साकेत की कथा।  एक और राष्ट्रीय मुक्ति का दायित्व है तो दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन के सुख को भोगने की लालसा। इनमें विजय राष्ट्रीय मुक्ति की भावना की होती है तत्पश्चात व्यक्तिगत जीवन की सफलता संकेतिक है।  यही मूल उद्देश्य है इस कथा का जिस्मने कवि सफल हुआ है। इस तरह एक लम्बे अंतराल के बाद युगल-दम्पत्ति का मिलन होता है और साकेत की कथा का अंत हो जाता है।

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    Monday, October 28, 2019

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    साकेत आलोचना खंड

    maithalisharan gupt
    Maithilisharan jivan parichaya




    राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को चिरगांव, जिला झांसी में हुआ। इनके पिता का नाम रामचरण और मां का सरयूदेवी था। सेठ रामचरण जी कविता के बड़े प्रेमी थे और 'कनकलता' नाम से छंद-रचना करते थे। सेठ जी के पाँच पुत्र हुए- महरामदास, रामकिशोर, मैथिलीशरण, सियारामशरण और चारुशिलाशरण। इनमें मैथिलीशरण और सियारामशरण ने साहित्य रचना के क्षेत्र में अपना योगदान दिया। काव्य के संस्कार तो गुप्त जी में जन्मजात थे, पर सृजन के लिए विशेष प्रेरणा आचार्य महावीर प्रसाद दुवेदी से मिली। सन 1906 से ही इनकी रचनाएँ 'सरस्वती' में प्रकाशित होने लगी थी। 'रंग में भंग' इनका प्रथम काव्य-ग्रंथ है, जो सन 1909 में प्रकाशित हुआ। प्रारंभ में मुंशी अजमेरी से, जिन्हें ये अपने भाई के समान मानते थे, इन्हें बहुत प्रोत्साहन मिला। द्वेदी जी को तो गुप्त जी ने अपना काव्य-गुरु ही स्वीकार किया है, अजमेरी जी के प्रति भी अपनी कृतज्ञता 'साकेत' के 'निवेदन' में व्यक्त की है। उनकी मृत्यु पर 'समाधि' शीर्षक से एक कविता भी इन्होंने लिखी, जो 'उच्छ्वास' नामक काव्य-संग्रह में संकलित है।

    मैथिलीशरण ह्रदय से भक्त थे और स्वभाव से उदार, विनम्र और मिलनसार। साहित्य-साधना के पवित्र कर्म में वे निरंतर संलग्न रहे। अपने जीवन के आदर्श मूल्य उन्होंने राम, बुद्ध और गांधी से ग्रहण किए थे। 12 दिसंबर 1964 को हृदय की गति बंद हो जाने से इनकी मृत्यु हो गयी।

     गुप्त जी के मौलिक एवं अनुदित काव्य-ग्रंथ नाटक इस प्रकार हैं-

      साकेत, जयभारत, यशोधरा, कुणालगीत, द्वापर, सिद्धराज, रत्नावली, विष्णुप्रिया, जयद्रथ वध, पंचवटी, नहुष, वन वैभव, वक संहार, सैरंध्री, मंगलघट, झंकार, उच्छ्वास, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, अंजलि और अर्ध्य, भारत भारती, स्वदेश संगीत, वैतलिक शक्ति गुरुकुल, हिंदू, रंग में भंग, विकट भट, पद्द प्रबंध, पत्रावली, शकुंतला, हिडिंबा, विश्ववेदना, किसान, पृथ्वीपुत्र, राजा प्रजा, अजीत, तिलोत्तमा, चंद्रहास, अनध, लीला, भूमि भाग, युद्ध। स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, अविमारक, मेघनाद वध, पलासी का युद्ध, वृत्रसंहार, वीरांगना, विरहिणी ब्रजजङ्ग्ना और रूबाइयत उमरखैयाम।

    गुप्त जी की प्रमुख रचनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि आप राम के अनन्य भक्त और कट्टर हिंदू हैं। 'साकेत' में तो राम का स्तवन है ही, पर जो ग्रंथ कृष्ण के चरित्र या महाभारत की घटनाओं से संबंधित है, वहां भी मंगलाचरण में राम ही की वंदना है जैसे वक संहार में, परंतु मैथिलीशरण गुप्त जी की यह खासियत है कि उन जैसा उदार और विशाल हृदय व्यक्ति चिराग लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेगा। जिस लेखनी ने पंचवटी, और 'साकेत' का निर्माण किया, उसी ने बौद्धों की करुणा का उद्घोष करने के लिए 'अनघ', 'यशोधरा' और 'कुणाल गीत' की रचना की, उसी ने मुसलमानों के चरित्र की महानता और सहन-शीलता को अंकित करने के लिए हृदय को हिलाने वाली 'कर्बला' की कहानी हमें सुनायी। दरअसल वे मानवता के गायक थे। धर्म निरपेक्षता और सहिष्णुता का मूल्य उनकी रग रग में समाहित था। 'विश्व वेदना' की रचना उन्होंने धर्म और राष्ट्रीय-भावना से ऊपर उठकर विश्व-बंधुत्व का गीत गाने के लिए की।

    गुप्त जी हमारे देश और युग के प्रतिनिधि कवि हैं। हमारा देश अखंड है और उसे अखंडता की भावना मैथिलीशरण गुप्त ने दी। उनके राजनीतिक विचार अनेक ग्रंथों-विशेष रूप से 'भारत-भारती' और स्वदेश संगीत में बिखरे पड़े हैं। राजनीति में मैथलीशरण गुप्त ने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का प्रचार किया है। सन 1921 से 1947 तक महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस जिस मार्ग पर चली है, उन समस्त आंदोलनों की ध्वनि उनके काव्य में पाई जाती है।




    मैंथलीशरण गुप्त ने बीस से ऊपर सफल प्रबंध काव्य रचें हैं। उनके 'जयभारत' और 'साकेत' दोनों हिंदी महाकाव्यों की परंपरा में बहुत ऊंचा स्थान रखते हैं। 'यशोधरा' भी उनकी बड़ी ही लोकप्रिय रचना है। ऐसी ही मार्मिक कृतियां 'विष्णुप्रिया' और रत्नावली हैं। उनके खंड काव्यो में 'जयद्रथ वध', 'पंचवटी' और 'नहुष' की गणना निश्चित ही सफल कृतियों में होगी।  इन सभी काव्य-ग्रंथों में कुल मिलाकर कई ऐसे मार्मिक स्थल हैं जहां पाठकों का ह्रदय बार-बार अभिभूत होता है।

    यही पर इस साकेत का आलोचना खंड समाप्त होता है, आपको जानकारी कैसे लेगी मेरे साथ जरूर शेयर करें। किस प्रकार की जानकारी अगले पोस्ट में आपको चाहिए जरूर लिखें।

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