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भ्रमर गीत सार पद 30

कहतें हरि कबहूँ न उदास। राति खवाय पिवाय अधरस क्यों बिसरत सो ब्रज को बास।। तुमसों प्रेम कथा को कहिबो मनहुं काटिबो घास। बहिरो तान-स्वाद कहँ जानै, गूंगो-बात-मिठास। सुनु री सखी, बहुरि फिरि ऐहैं वे सुख बि…

भ्रमर गीत सार पद 29

पूरनता इन नयनन पूरी। तुम जो कहत स्रवननि सुनि समुझत, ये यही दुख मरति बिसूरी।। हरि अन्तर्यामी सब जानत बुद्धि विचारत बचन समूरी। वै रस रूप रतन सागर निधि क्यों मनि पाय खवावत धूरी।। रहु रे कुटिल , चपल , मध…

भ्रमर गीत सार पद 28

हम तो दुहूँ भॉँति फल पायो। को ब्रजनाथ मिलै तो नीको , नातरु जग जस गायो।। कहँ बै गोकुल की गोपी सब बरनहीन लघुजाती। कहँ बै कमला के स्वामी संग मिल बैठीं इक पाँती।। निगमध्यान मुनिञान अगोचर , ते भए घोषनिवास…

भ्रमर गीत सार पद 27

27. राग मलार हमरे कौन जोग व्रत साधै ? मृगत्वच, भस्म अधारी, जटा को को इतनौ अवराधै ? जाकी कहूँ थाह नहिं पैए , अगम , अपार , अगाधै। गिरिधर लाल छबीले मुख पर इते बाँध को बाँधै ? आसन पवन बिभूति मृगछाला ध्या…
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