भारत एक विविधतापूर्ण है,जहाँ पर्वत, मैदान, पठार और मरुस्थल शामिल हैं। दक्कन का पठार न केवल भारत के दक्षिणी भाग का सबसे बड़ा पठार है, बल्कि देश के इतिहास, संस्कृति, जल-संसाधन और आर्थिक विकास में भी इसकी अहम भूमिका निभाती है।
दक्कन का पठार कहां स्थित है
दक्कन का पठार भारत के दक्षिणी भाग में स्थित है और लगभग 4,22,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यह पठार दक्कन प्रायद्वीप का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसके उत्तर में सतपुड़ा और विंध्य पर्वतमालाएँ, दक्षिण में तमिलनाडु के उत्तरी क्षेत्र, पूर्व में पूर्वी घाट और पश्चिम में पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखलाएँ स्थित हैं। ये पर्वत श्रंखलाएँ दक्कन पठार को पूर्वी और पश्चिमी तटीय मैदानों से अलग करती हैं।
भौगोलिक रूप से दक्कन एक विशाल प्रायद्वीपीय पठार है, जो मुख्यतः कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित है। इसके उत्तर में विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाएँ इसकी प्राकृतिक सीमा बनाती हैं।
दक्कन शब्द की उत्पत्ति
दक्कन शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द दक्षिण से मानी जाती है, जिसका अर्थ है दक्षिण दिशा। समय के साथ दक्षिण शब्द दक्कन में परिवर्तित हो गया। ऐतिहासिक रूप से उत्तर भारत से दक्षिण भारत को अलग पहचान देने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाता है।
दक्कन का पठार कितने राज्यों में है
दक्कन का पठार भारत का एक विशाल और महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र है। दक्कन का पठार कुल 8 राज्यों में फैला हुआ है।
दक्कन का पठार मुख्य रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों में फैला है। इसके अतिरिक्त केरल, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के कुछ आंतरिक भाग भी इस पठार का हिस्सा हैं। तटीय क्षेत्रों को छोड़कर, यह पठार दक्षिण भारत का सबसे विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र है।
| क्रम संख्या | राज्य का नाम |
|---|---|
| 1 | महाराष्ट्र |
| 2 | कर्नाटक |
| 3 | तेलंगाना |
| 4 | आंध्र प्रदेश |
| 5 | तमिलनाडु |
| 6 | मध्य प्रदेश |
| 7 | छत्तीसगढ़ |
| 8 | ओडिशा |
दक्कन का पठार भारत के दक्षिणी भाग में स्थित एक विशाल त्रिकोणीय पठार है।
- उत्तर में सतपुड़ा पर्वतमाला और विंध्य पर्वतमाला,
- पश्चिम में पश्चिमी घाट,
- पूर्व में पूर्वी घाट,
- तथा दक्षिण में कन्याकुमारी के निकट तटीय मैदानों तक फैला हुआ है।
इस पठार का अधिकांश भाग बेसाल्ट चट्टानों से बना है, जिसे डेक्कन ट्रैप कहा जाता है। यह क्षेत्र प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोटों के कारण बना था।
- महाराष्ट्र में यह पठार सबसे अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है।
- कर्नाटक और तेलंगाना में यह पठार ऊँचे समतल मैदानों के रूप में दिखाई देता है।
- आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में यह पूर्व की ओर ढलान बनाता है, जहाँ से कई नदियाँ बहती हैं।
- मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में दक्कन पठार का उत्तरी भाग आता है, जो खनिज संपदा के लिए प्रसिद्ध है।
- ओडिशा में इसका छोटा हिस्सा पठारी और खनिजयुक्त क्षेत्र के रूप में मिलता है।
इस पठार से गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, तुंगभद्रा और भीमा जैसी प्रमुख नदियाँ निकलती हैं, जो दक्षिण भारत की कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ की काली मिट्टी कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
भौतिक संरचना
दक्कन का पठार एक प्राचीन चट्टानी पठार है, जिसकी औसत ऊँचाई लगभग 600 मीटर है। इसका भूगर्भीय इतिहास अत्यंत पुराना है। इस पठार की आधारशिला प्रीकैम्ब्रियन युग की मानी जाती है, जो पृथ्वी के सबसे पुराने भूगर्भीय कालों में से एक है।
दक्कन ट्रैप
दक्कन पठार का उत्तर-पश्चिमी भाग दक्कन ट्रैप के लिए प्रसिद्ध है। इसका निर्माण लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले ज्वालामुखी विस्फोट से हुआ था। इन विस्फोटों के कारण बेसाल्टिक लावा की मोटी परतें फैल गईं, जो ठंडी होकर चट्टानों में परिवर्तित हो गईं।
दक्कन ट्रैप की काली मिट्टी कृषि के लिए अत्यंत उपजाऊ मानी जाती है, विशेष रूप से कपास की खेती के लिए।
दक्कन के पठार को भौगोलिक आधार पर कई भागों में बाँटा गया है, जिनमें प्रमुख हैं:
- महाराष्ट्र का पठार
- कर्नाटक का पठार
- तेलंगाना का पठार
- रायलसीमा का पठार
प्रत्येक उप-पठार की भौगोलिक विशेषताएँ और कृषि पैटर्न अलग-अलग हैं।
जल-संसाधन
दक्कन का पठार भारत के जलसंसाधन के लिए मत्वपूर्ण है। यहाँ से निकलने वाली अधिकांश नदियाँ देश की जीवनरेखा मानी जाती हैं।
प्रमुख नदियाँ
- गोदावरी
- कृष्णा
- कावेरी
- भीमा
- तुंगभद्रा
दक्कन के पठार से गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी प्रमुख नदियाँ होकर बहती हैं, आमतौर पर बंगाल की खाड़ी की ओर बहती है, क्योंकि पठार पश्चिम से पूर्व की ओर ढलान अधिक है। इसलिए अधिकांश नदियाँ बंगाल की खाड़ी में जाकर मिलती हैं। कुछ छोटी नदियाँ पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती हैं।
जलवायु
दक्कन पठार की जलवायु मुख्यतः अर्ध-शुष्क होती है। पश्चिमी घाट मानसून की वर्षा लाने वाली हवाओं को रोक लेते हैं, जिससे पठारी क्षेत्र में तटीय इलाकों की तुलना में कम वर्षा होती है।
गर्मियों में यहाँ तापमान अधिक रहता है, जबकि सर्दियाँ अपेक्षाकृत हल्की होती हैं।
मिट्टी और कृषि
दक्कन पठार में मुख्यतः तीन प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं -
- काली मिट्टी – कपास के लिए प्रसिद्ध
- लाल मिट्टी – दालें और मोटे अनाज
- लेटेराइट मिट्टी – पहाड़ी क्षेत्रों में
यहाँ कपास, ज्वार, बाजरा, दालें, मूंगफली और तिलहन की खेती प्रमुख है। सिंचाई परियोजनाओं के विकास के बाद धान और गन्ने की खेती भी बढ़ी है।
प्राकृतिक संसाधन
दक्कन का पठार खनिज संसाधनों से भी समृद्ध है। यहाँ लोहा, मैंगनीज, बॉक्साइट, चूना पत्थर और अभ्रक जैसे खनिज पाए जाते हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में कई प्रमुख औद्योगिक नगर विकसित हुए हैं।
दक्कन का पठार प्राचीन काल से ही भारतीय इतिहास का केंद्र रहा है। यहाँ अनेक शक्तिशाली राजवंशों और साम्राज्यों का उदय और पतन हुआ।
दक्कन का पठार सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ मराठी, कन्नड़, तेलुगु और तमिल भाषाएँ बोली जाती हैं। नृत्य, संगीत, लोककला और त्योहार इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान हैं। दक्कनी संस्कृति में उत्तर और दक्षिण भारत दोनों का प्रभाव दिखाई देता है।
आज दक्कन का पठार भारत के औद्योगिक, कृषि और तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और नागपुर जैसे शहर इस क्षेत्र की आर्थिक शक्ति को दर्शाते हैं।
दक्कन का पठार केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि यह भारत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा है। इसकी प्राचीन चट्टानें पृथ्वी के इतिहास की कहानी कहती हैं, जबकि इसकी नदियाँ आज भी लाखों लोगों का जीवन संवार रही हैं। दक्कन का पठार वास्तव में भारत की आत्मा और रीढ़ दोनों है।
दक्कन का इतिहास
कार्बन डेटिंग से पता चलता है कि दक्कन क्षेत्र में मानव सभ्यता लगभग 8000 ईसा पूर्व रहते आ रहे हैं। उस समय यहाँ नवपाषाण संस्कृति के लोग रहते थे, जिनके बनाए राख के टीले आज भी पाए जाते हैं। लगभग 1000 ईसा पूर्व तक यहाँ लोहे का उपयोग शुरू हो गया था। आश्चर्य की बात यह है कि यहाँ पूर्ण विकसित कांस्य युग के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते।
प्राचीन और मध्यकालीन राजवंश
छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर चौदहवीं शताब्दी ईस्वी तक दक्कन पर कई शक्तिशाली राजवंशों का शासन रहा, जैसे:
- पांड्य -मदुरै
- चोल - तंजावुर
- सातवाहन - अमरावती
- पल्लव - कांची
- कदंब - बनवासी
- पश्चिमी गंग - कोलार
- राष्ट्रकूट - मान्यखेत
- चालुक्य - बादामी
- होयसाल - बेलूर
- काकतीय - ओरुगल्लू
इन राजवंशों ने दक्कन की संस्कृति, वास्तुकला, भाषा और व्यापार को समृद्ध बनाया।
विजयनगर और दक्कन सल्तनत काल
उत्तर मध्यकाल में विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिणी दक्कन के बड़े हिस्से पर शासन किया। वहीं ऊपरी दक्कन में बहमनी सल्तनत और बाद में दक्कन की सल्तनत का प्रभुत्व रहा। आगे चलकर यह क्षेत्र मैसूर साम्राज्य, मराठा संघ और हैदराबाद के निज़ाम के नियंत्रण में भी रहा।
