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संयोजकता बंध सिद्धांत क्या है - sanyojakta band siddhant

संयोजकता बंध सिद्धांत क्या है

रसायन विज्ञान में, वैलेंस बॉन्ड सिद्धांत या संयोजकता बंध सिद्धांत दो आणविक कक्षीय सिद्धांतों में से एक है, जो रासायनिक संबंध को समझाने के लिए क्वांटम मैकेनिक (Quantum mechanics) के तरीकों का उपयोग करने के लिए विकसित किए गए हैं। 

यह इस बात पर ध्यान केंद्रित करता है, कि एक अणु के बनने पर अलग-अलग रासायनिक बंधों के विघटित होने से परमाणुओं के परमाणु कक्षा में कैसे संयोजित होते हैं। इसके विपरीत, आणविक कक्षीय सिद्धांत में ऑर्बिटल्स होते हैं, जो पूरे अणु को कवर करते हैं।

संयोजकता बंध सिद्धांत क्या है -VBT Theory in Hindi

अणु में इलेक्ट्रॉन आणविक कक्षा के बजाय परमाणु कक्षा पर कब्जा कर लेते हैं। और यह परमाणु कक्षा बांड के गठन से बड़ा और मजबूत हो जाता हैं। 

संयोजकता बंध सिद्धांत क्या है - sanyojakta band siddhant
अणु में इलेक्ट्रॉन 

संयोजकता बंध सिद्धांत को अंग्रेजी में Valence Bond Theory कहा जाता है। या सक्षिप्त रूप में VBT थ्योरी भी कह देते है। संयोजकता बन्ध सिद्धांत का प्रतिपादन लाइनस पॉलिंग तथा जे. एल. सलेटर ने 1935 में किया था। यह सिद्धांत आद्य अवस्था के मध्य धातु आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, बन्धन के प्रकार तथा प्राप्त संकुल की ज्यामिति एवं उनके चुम्बकीय गुणों की व्याख्या करने में समर्थ है। किन्तु इसके उपरांत भी इस सिद्धांत में निम्नलिखित दोष हैं।

संयोजकता बंध सिद्धांत की सीमाएं

1. यह सिद्धांत चार उप-सहसंयोजक संख्या के संकुलों की ज्यामिति की भविष्यवाणी करने में असफल है। उदाहरण के लिए [Cu(NH3)4]2+ तथा [Zn(NH3)4]2+ संकुल लेते हैं। लेकिन संयोजकता बन्ध सिद्धांत के आधार पर दोनों संकुल चतुष्फ़लकीय होने चाहिए। 

किन्तु इन दोनो की संरचना चतुष्फलकीय नहीं है तथा [Cu(NH3)4]2+ की संरचना समतलीय है। इसमें Cu2+ का एक इलेक्ट्रॉन 3d से 4p आर्बिटल में प्रोन्नत हो जाता है। जिससे एक 3d आर्बिटल रिक्त होकर dsp2 संकर आर्बिटल बनाता है। 

2. VBT सभी उपसहसंयोजक यौगिकों के स्पेक्ट्रा की व्याख्या नहीं कर सकता है, क्योंकि इसमें संकुलों या उनके केंद्रीय धातु परमाणु की उत्तेजित अवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

3. VBT द्वारा संकुलों में विकृति नहीं समझायी जा सकती है। उदाहरणार्थ सभी Cu (II) तथा Ti संकुल विकृत होते हैं।

4. VBT में संकुलों या उनके धातु परमाणु की उत्तेजित अवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। अतः यह उष्मागतिक गुणों की व्याख्या नहीं कर सकता।

5. VBT में धातु आयन की प्रकृति पर अधिक बल दिया गया है, जबकि लीगेण्डों के महत्व की नितांत उपेक्षा की गयी है।

6. VBT द्वारा बाह्य कक्षक संकुलों की आयनिक प्रकृति का उचित स्पष्टीकरण नहीं मिलता है।

7. Cr (III) तथा आंतर कक्षक Co (III) अष्टफलकिय संकुलों को गतिक अक्रियता का VBT से सहीं उत्तर नहीं मिलता है अर्थात इस सिद्धांत द्वारा अभिक्रिया की गति तथा उनकी क्रियाविधि का स्पष्टीकरण नहीं होता है।  

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