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Thursday, January 31, 2019

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छत्तीसगढ़ी गद्य की तुलना में छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन की परम्परा अधिक प्राचीन है और विकसित भी। हमें गद्य की जानकारी दन्तेवाड़ा शिलालेख ( 1703 ई. ), कलचुरी शिलालेख ( 1724 ई. ) एवं 1890 ई. में प्रकाशित हीरालाल कावयोपाध्याय के छत्तीसगढ़ी बोली व्याकरण में छत्तीसगढ़ी गद्य का उन्मेष अनेक विद्वानों ने स्वीकार किया है। जबकि विनय कुमार पाठक सन 1724 के कलचुरियों के अंतिम नरेश राजा अमरसिंह के आरंग शिलालेख को छत्तीसगढ़ी गद्य का सर्वप्रथम स्वरूप निर्दिष्ट करते हैं। तथापि हम उपरोक्त साक्ष्यों के आधार पर कह सकते हैं की छत्तीसगढ़ी का गद्य , पद्य की तुलना में अल्प परिणाम में है।



छत्तीसगढ़ी नाटक -

छत्तीसगढ़ी नाट्य साहित्य एक ओर जहां छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य परम्परा को संजोकर रखता है वहीं दूसरी छत्तीसगढ़ी में नाटक में एकाँकी की विधा शैशवावस्था में है। पण्डित लोचन प्रसाद पाण्डेय द्वारा लिखित ' कलिकाल ( 1905 ) ' से छत्तीसगढ़ी के प्रथम नाटककार - लोचन प्रसाद पाण्डेय द्वारा लिखित ' कलिकाल ( 1905 ) ' से छत्तीसगढ़ी के प्रथम नाट्यकार - लोचन प्रसाद पाण्डेय को माना जाता है।
अन्य छत्तीसगढ़ी नाटक इस प्रकार है-

नाटककार और नाटक के नाम इस प्रकार से हैं-

पण्डित लोचन प्रसाद पाण्डेय -  कलिकाल ( 1905 ) - प्रथम छत्तीसगढ़ी नाटक
डॉ. खूबचन्द बघेल - करम छैडहा बेटवा विवाह, ऊँच नीच, लेड़गा सुजान
श्री नन्दकिशोर तिवारी  -  परेमा ( 1986 ई. )
जनरैल सिंह  -   बेटवा बिहान , किसान के करलई
कपिलनाथ कश्यप - अंधियारी रात ( 1992 ई. ) , नवा बिहाव ( 1994 ई. ), पूजा के फूल ( 1997 ई. )  , गुरआवत बिहाव ( 1998 ई. )
टिकेंद्र टिकरिया  -   साहूकार से छुटकारा ( 1963 ई. )
श्री नारायणलाल परमार - मतवार अऊ दूसर एकाँकी ( 1977 )
श्री रामलाल कश्यप  -  श्री कृष्णार्जुन युद्ध।
श्री लखन लाल गुप्त कृत - बेटी के मनसूबा और बर के खोज में।
श्री परदेशीराम वर्मा - मय बइला नोहंव ( 1987 ई. 

छत्तीसगढ़ी उपन्यास -

छत्तीसगढ़ी उपन्यास की प्रकृती लोक जीवन पर आधारित और सार्वदेशिक तथा अपने अंचल की संस्कृति को अपने ऊपर समांए हुए है।
छत्तीसगढ़ी उपन्यास हिंदी से प्रभावित और आंचलिकता पर आधारित है। छत्तीसगढ़ी में कुछ उपन्यास इस प्रकार है-

उपन्यासकार और उपन्यास के नाम इस प्रकार है -

शिवशंकर शुक्ल - दियना के अंजोर ( 1964 ) प्रथम उपन्यास, मोंगरा ( द्वितीय उपन्यास - 1965 )
पं. कृष्ण कुमार शर्मा - छेरछेरा ( 1983 ई. ) ( विनोबा भावे का आदर्श एवं अशिक्षित ग्रामीण परिवेश पर आधारित है। )
केयूर भूषण -   फुटहा करम ( 1970 ई. ) ( एक नारी की नियति पर आधारित उपन्यास )
परदेशी राम वर्मा - आवा
श्री लखनलाल गुप्त  -    चन्दा अमरित बरसाईस ( 1965 ई. )

छत्तीसगढ़ी कहानी -

छत्तीसगढ़ी लोककथाएं अत्यन्त समृद्ध है, छत्तीसगढ़ी में कहानी लेखन की परम्परा भारतेंदु युग से मिलती है -
कहानीकार और उनकी कहानी इस प्रकार है-




बंशीधर पांडे - हीरु के कहानी ( प्रथम कहानी )
डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा - सुसक झन कुररी सुरता ले, तिरिया जनम झनि देय।
पं. श्यामलाल चतुर्वेदी - भोलवा, भोलाराम बनिस ( 1955 ई. ), पर्राभर लाई
श्री रंजनलाल पाठक - स्वतन्त्र - स्वतन्त्र सन्देश, छत्तीसगढ़ गौरव, चिंगारी के फूल
श्री शिवशंकर शुक्ल - रधिया ( 1969 ई. )
कपिलनाथ कश्यप - डहर के कांटा
डॉ. विनय कुमार पाठक - छत्तीसगढ़ी लोक-कथा
श्री लखनलाल गुप्ता    

Friday, January 25, 2019

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साथियों आप सभी का सवागत है मेरे इस ब्लॉग पर आज मैं बात करने वाला हूँ छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के बारे में जिसमें मैं आपको बताने वाला हूँ इनके पदाधिकारियों के बारे में और छत्तीसगढ़ी राजभाषा के लागू होने के समय के बारे में साथ ही छत्तीसगढ़ी राजभाषा के उद्देश्य और लक्ष्य के बारे में बताने वाला हूँ छत्तीसगढ़ी राजभाषा की योजनाएँ क्या-क्या हैं। इसके अन्य कार्य तथा इसके कुछ विशेष कार्य के बारे में भी मैंने यहां पर बताने का प्रयास किया है। 

Chhattisgarhi rajbhasha aayog hindi me www.rexgin.in

इसके पहले मैंने एक पोस्ट लिखा था जिसमें मैंने छत्तीसगढ़ी वर्णमाला के बारे में बताया था अगर आप वो पोस्ट पढ़ना चाहते हैं तो पढ़ सकते हैं।
तो चलिए शुरू करते हैं आज का टॉपिक

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग एक प्रकार का संगठन है जो की छत्तीसगढ़ी भाषा को एक विशेष दर्जा दिलाने के लिए बनाया गया है। और ये अभी भी सक्रिय है। छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग विधेयक को 28 नवम्बर 2007 को पारित किया गया तथा इसके पास होने कर ही उपलक्ष्य में हर साल 28 नवम्बर को राजभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस राजभाषा का प्रकाशन 11 जुलाई 2008 को राजपत्र में किया गया। इस आयोग का कार्य 14 अगस्त 2008 से चालू हुआ इस आयोग के प्रथम सचिव - पद्मश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे जी रहे।

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग सरांस इस प्रकार से है -

विधेयक का नाम - छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग अधिनियम
विधेयक पारित - 28 नवम्बर 2007 को
राजभाषा दिवस - 28 नवम्बर को प्रतिवर्ष
राजपत्र में प्रकाशन - 11 जुलाई 2008 को किया गया।
आयोग का कार्य प्रारम्भ कब हुआ - 14 अगस्त 2008 को
छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के प्रथम सचिव - पद्मश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे रहें।

अब इनके अध्यक्ष की बात करें तो इनके अध्यक्ष इस प्रकार से रहें हैं-
प्रथम अध्यक्ष - पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी।
द्वितीय अध्यक्ष - श्री दानेश्वर शर्मा।
तृतीय अध्यक्ष - विनय कुमार पाठक।

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के उद्देश्य क्या था इस आयोग को गठित करने का , वो इस प्रकार से है -


आज आप कहीं भी जाये आपको संवाद करने के लिए किसी ना किसी भाषा की आवश्यकता होती है बिना भाषा के कोई देश अच्छे से कार्य का सञ्चालन नहीं कर सकता है शायद इसी कारण इसकी आवश्यकता हुई।

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के उद्देश्य और लक्ष्य :-

आयोग के प्राथमिक लक्ष्य एवं उद्देश्य इस प्रकार हैं-
1. राजभाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्जा दिलाना इसका पहला उद्देश्य रहा।
2. छत्तीसगढ़ी भाषा को राजकाज की भाषा में उपयोग में लाना इसका दूसरा उद्देश्य है।
3. त्रिभाषायी भाषा के रूप में शामिल पाठ्यक्रम में शामिल करना।

छत्तीसगढ़ी भाषा को आगे बढ़ाने के लिए इस आयोग ने कई योजनाएं चलाई जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं -

योजनाएं :- * माई कोठी योजना - लेखकों से उनकी छत्तीसगढ़ी में प्रकाशित रचनाओं की दो-दो प्रति खरीदना।
* बिजहा योजना - विलुप्त हो रहे छत्तीसगढ़ी शब्दों को संकलित करने के लिए चलाया गया अभियान।
इसके अलावा इस राजभाषा आयोग ने और भी बहुत सारे काम किये छत्तीसगढ़ी बोली को आगे बढ़ाने के लिए जो की इस प्रकार से है-

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अन्य कार्य :-

शब्द कोश -
हिंदी - छत्तीसगढ़ी शब्दकोश।
छत्तीसगढ़ी - हिन्दी शब्दकोश।
प्रकाशन - पांडुलिपि प्रकाशन।
शोध - राम चरित मानस में छत्तीसगढ़ी शोध।

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग की विशेषता क्या है ?  

इस आयोग में कुछ ऐसी भी बाते हैं जिनके कारण यह बहुत ही प्रसिद्ध हुआ है जो की इस प्रकार है-

* छत्तीसगढ़ी भाषा को लोकप्रिय बनाने के राज-काज के दिशा में इसके लिए कार्य किया गया।

* अनेक विधायकों द्वारा विधानसभा में छत्तीसगढ़ी भाषा में शपथ ग्रहण किया गया।

* कुसाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि.वि. में छत्तीसगढ़ी पाठक्रम चालू करने की घोषणा।

आपको ये जानकारी कैसे लगी मेरे साथ जरूर शेयर करें और आपको किस टॉपिक पर जानकारी चाहिए कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

मैं छत्तीसगढ़ का रहने वाला हूँ और मैं भी चाहता हूँ की छत्तीसगढ़ी भाषा को सभी जाने करके इसलिए मैंने छत्तीसगढ़ी में भी की पोस्ट लिखे हैं जैसे - छत्तीसगढ़ी मुहावरा छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति और भी बहुत कुछ तो छत्तीसगढ़ी भाषा को आगे बढ़ाएं शेयर करें अपना छत्तीसगढ़ी कमेंट मेरे साथ शेयर करें ।

मेरे साथ जुड़े रहने के लिए तहे दिल से धन्यवाद!
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साथियों आपका स्वागत है मेरे इस ब्लॉग पर आज हम बात करने वाले हैं। छत्तीसगढ़ी वर्णमाला के बारे में और इससे पहले हमने पढ़ा था छत्तीसगढ़ी विलोम शब्द के बारे में और आज हम बात करने वाले हैं छत्तीसगढ़ी वर्णमाला के बारे में तो चलिए शुरू करते हैं

Chhattisgarhi varnamala

छत्तीसगढ़ी वर्णमाला के स्वर 

* स्वर - छत्तीसगढ़ी बोली में भी हिन्दी के ही समान स्वर वर्ण होते हैं  जो की इस प्रकार से हैं -
( डॉ. नरेंद्रदेव वर्मा के अनुसार )  -  अ, आ, इ, ई, उ, ऊ,ए, ओ.
संध्य अक्षर (02)  -  ऐ , औ.

स्वर को भी दो प्रकारों में बांटा गया जो की इस प्रकार  है
1) दीर्घ स्वर - इस में निम्न शब्द आते है - आ, ई, ऊ,ए, ओ
2) हस्व स्वर - अ,इ,उ

छत्तीसगढ़ी वर्णमाला के व्यंजन 

छत्तीसगढ़ी में व्यंजन शब्द की बात करें तो यहां पर इसके 29 प्रकार हैं - जो की व्यंजन के रूप में प्रयुक्त होते हैं ये व्यंजन वर्ण इस प्रकार से डॉ. नरेंद्रदेव वर्मा के अनुसार
क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड,ढ,ण, त, थ,द,ध,न,प,फ,ब,भ,म,य,र,ल,व,स,ह

व्यंजनों में - कुछ और वर्ण जोड़ने से इनकी संख्या 35 हो गई वे शब्द इस प्रकार से हैं - नह् , म्ह्, रह्,ल्ह्, ङ्, ढ़्।
व्यंजनों को और प्रकारों में इस प्रकार बांटा गया है डॉ. नरेंद्र वर्मा के अनुसार वे प्रकार -

छत्तीसगढ़ी उच्चारण स्थान के आधार पर -

1) कंठव्य ( कंठ व जीभ ) - क्, ख् , ग् , घ् , अ (अर्ध अ) आ(अर्ध आ), ङ्, ह,
2) तालव्य (तालु और जीभ) - च् , छ् , ज् ,झ् , इ(अर्ध इ) , ई (अर्ध ई) , य्
3) मुर्द्दान्य (मुधा और जीभ) - ट् , ठ् , ड् , ढ् , र्
4) दंत्य (दांत और जीभ) - त् , थ् , द् , ध् , न् , ल् , स्
5) ओष्ट्य (दोनों होठ) - प् , फ् , ब् , भ् , म्
6) नासिक्य  -  न् , न्ह् , म् , म्ह्
7) उक्षिप्त - ड् , ढ्
8) संघर्षी - स् , ह्
9) अर्ध स्वर - य, व

प्रयत्नों के आधार पर -

1) अल्पप्राण - वर्ग 1 व 3 का व्यंजन जैसे - क , ग, च , ट् , ण् , त् , द् , प् , ब् , म् ,र्  आदि।
2) महाप्राण - वर्ण 2 व 4 के व्यंजन जैसे - ख, घ, छ, झ, ठ , ढ , थ , ध , फ, भ, न, न्ह , ल, रह्, व, स आदि।

विशेष - 

छत्तीसगढ़ी भाषा में सामान्य बोलचाल की व्यवहार में श, ष, त्र , ज्ञ, क्ष, ऋ अक्षरों का प्रयोग नहीं होता है,
इनके स्थान पर - (हीरालाल काव्योपाध्याय के अनुसार)
1. श, ष के लिए - "स" (जैसे, शीत-सीत , देश-देस)
2. ज्ञ के लिए  -  "गिय" (जैसे - ज्ञान के लिए गियान, विज्ञान- बिगियान)
3. ऐ के लिए  -  "अई" का (जैसे- ऐसन-अइसन)
4. त्र के लिए - "तर" (जैसे - त्रिशुल के लिए तिरसूल, त्रेता- तरेता)
5. क्ष के लिए  -  "छ" (जैसे - क्षमा के लिए छिमा, क्षण - छन, क्षणिक- छनिक)
6. ऋ के लिए - रि (जैसे - ऋतु के लिए रितु , ऋषि - रिसि)
7. श्र के लिए  - सर (जैसे - श्रवण के लिए सरवन , श्रम- सरम)



आपको ये जानकारी कैसे लगी मेरे साथ शेयर जरूर करें धन्यवाद !

Wednesday, January 23, 2019

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आपका स्वागत है मेरे ब्लॉग www.rexgin.in में आज मैं आपके लिए लेकर आया हूँ छत्तीसगढ़ी विलोम शब्द को जिसमें मैंने इन शब्दों का हिन्दी अर्थ भी बताया है तो चलिए शुरू करते हैं-




जिस शब्द से किसी दूसरे शब्द के विपरीत अर्थ का धोत्तक हो , उसे विलोम शब्द कहते हैं विलोम शब्द को विपरार्थी , प्रतिलोमार्थी एवं विरूद्धार्थी शब्द कहते हैं।

संज्ञा शब्दों में -

कुकरा (मुर्गा) - कुकरी (मुर्गी)
गोसई (पति,स्वामी) - गोसईन (पत्नी,स्वामिनी)
ठाकुर - ठकुराइन
बछरू (गाय का नर बच्चा) - बछिया ( गाय का मादा बच्चा)
भइसा (भैंसा) - भइसी (भैंस)
लिंग के आधार पर -
मरद (पुरुष) - तिरिया (स्त्री)
बइला (बैल) - गइया / गाय (गाय)
बबा (दादा) - दाई (दादी)
कुकुर (कुत्ता) - कुतनिन (कुतिया)
बाबू (लड़का) - नोनी (लड़की)

स्वतंत्र शब्द -

अपन (अपना) - बिरान (पराया)
अम्मट (खट्टा) - मीठ (मीठा)
कमी (कम) - बेसी (अधिक)
जुन्ना (पुराना) - नवाँ (नया)
झुक्खा (सूखा) - गिल्ला (गीला)
संझा (संध्या) - बिहिनियाँ (प्रातः)
मोंटठ (मोटा) - पातर (पतला)
निमारना (छांटना) - मिंझारना (मिलाना)
उठना (उठना) - बइठना (बैइना)
उज्जर (स्वच्छ) - मइलहा (गंदा)
ओग्गर (गोरा) - सांवर (सांवला)
गोरिया - करिया
जुन्ना (पुराना) - नवां (नया)
नरक (नर्क) - सरग (स्वर्ग)
लक्ठा (निकट) - दुरिहा (दूर)


न्यूनार्थक या ऊनार्थक शब्द द्वारा - 

जिससे किसी वस्तु की लघुता का ज्ञान हो उसे ऊनार्थक या न्यूनार्थक शब्द कहते हैं। न्यूनार्थक शब्द भी आकारवाची विलोमार्थक शब्द होते हैं। जैसे -
अंगेठा - अंगेठी (जलती हुई पतली लकड़ी)
आरा - आरी (लकड़ी चिरने का एक औजार)
कंसा - कंसी (धान की बाली का छोटा-छोटा टुकड़ा)
कटोरा - कटोरी (एक छोटा पात्र)
कुरचा - कुरचुल (लकड़ी,लोहा,काँच आदि का टुकड़ा)
खटिया - माँची (छोटी खाट)
खाँचा - खंचकुल (छोटा गड्ढा)
खूँटा - खूँटी (कील)
खेकसा - खेकसी (सब्जी के काम आने वाला एक फल)
गट्ठा - गठरी (गठ्ठर)
गाड़ा - गाड़ी (बैलों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी)
गैता - गैती (कुदाली)
गोरसा - गोरसी (मिट्टी का बना कटोरानुमा पात्र)
चरखा - चरखी (तकली)
टुकना - टुकनी (टोकरी)
चँवरा - चँवरी (चबूतरा)
जाँता - जतली (चक्की)
डोर - डोरी (रस्सी)
ढोरगा - ढोरगी (प्राकृतिक रूप से बनी नाली)
हँसिया - हँसली (छोटा हँसिया)
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अन्य जानकारी


Friday, December 28, 2018

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साथियों आप सभी का स्वागत है मेरे इस ब्लॉग पर पिछले पोस्ट में मैंने बात किया था छत्तीगसढ़ी गद्य साहित्य के बारे में और आज बात करने वाले छत्तीसगढ़ी निबन्ध के बारे में इस पोस्ट में हम तीन टॉपिक को एक साथ पढ़ेंगे क्योकि ये थोड़ा-थोड़ा सा है इस पोस्ट में मैंने आपको छत्तीसगढ़ी निबन्ध के नाम और उसके रचनाकार के नाम बताये हैं-
इसमें पत्रिका का वर्णन इसलिए किया गया है क्योकि छत्तीसगढ़ी निबन्धों के प्रकाशन का शुभारम्भ छत्तीसगढ़ी की पत्र-पत्रिकाओं से हुआ है। केयुर भूषण कृत - रांड़ी ब्राम्हण के दुरदसा ( 1968 ई. ) को प्रथम निबन्ध मानी गयी है।

  • केयुर भूषण - रांड़ी ब्राम्हण के दुरदसा ( 1968 ई. ) - प्रथम निबन्ध।
  • गयाराम साहू - जानो अतका बात ( 1970 ई.)
  • डॉ. पालेश्वर शर्मा - गुंडी के गोठ  (cgpsc 2013)
  • लखनलाल गुप्त - सोनपान ( 1968 - ग्यारह निबन्धों का सन्ग्रह ), सुरता के सोनकिरन, गोठ-बात
  • कपिलनाथ कश्यप - निसेनी धान की आत्मकथा
  • बृजलाल बंछोर - कुरमी
  • भूषण परगनिया - मरार, लोहार,कंगला
  • नारायण परमार - दरिया,जंवार, सोहर
  • हेमनाथ यदु - छत्तीसगढ़ अऊ छत्तीसगढ़िया।

अब एकाँकी के नाम और उसके रचनाकार के नाम इस प्रकार है-

  • लखन लाल गुप्त - सरग ले डोला आइस
  • नंद किशोर तिवारी - परेमा
  • नारायण लाल परमार - मतवार अउ दूसर एकाँकी,सुरुज नई भरे
  • टिकेंद्र टिकरिहा - सउत के डर
  • शुकलाल प्रसाद पाण्डेय - उपसहा दमाद बाबू , केकरा धरैया, सीख देवैया
  • धनंजय - पंच परमेश्वर

छत्तीसगढ़ी में पत्रकारिता इस प्रकार है-


कुछ विद्वान छत्तीसगढ़ी पत्रकारिता का प्रारम्भ मुक्तिबोध द्वारा सम्पादित ' छत्तीसगढ़ी ' से मानते हैं जबकि अधिकांश विद्वान माधवराव सप्रे द्वारा पेंड्रा रोड बिलासपुर से सम्पादित ' छत्तीसगढ़ मित्र ' (1900) को मानते हैं।
डॉ . विनय पाठक - भोजली ( बिलासपुर ), धान का कटोरा
सुशील वर्मा - मयारू माटी ( रायपुर )
डॉ. विमल पाठक - चिंगारी के फूल
रंजनलाल पाठक - छ.ग. गौरव
दुर्गा प्रसाद पाटकर - धरोवर ( मासिक )
नंदकिशोर तिवारी - लोकाक्षर ( छत्तीसगढ़ी त्रिमासिक पत्रिका )
जगेश्वर प्रसाद - छत्तीसगढ़ी सेवक ( छतीसगढ़ी साप्ताहिक पत्रिका )
देशबन्धु का विशेषांक - मड़ई ( छत्तीसगढ़ी विशेषांक )
परदेशी राम वर्मा - कहिरी नलिनी तू कुंहलानी ( छत्तीसगढ़ी अनियतकालिव पत्रिका )
याद रखें - छत्तीसगढ़ी लोक-भिलाई . लोकाक्षर- बिलासपुर, मड़ई - बिलासपुर , रऊताही-बिलासपुर से प्रकाशित होती है।
आपको ये जानकारी कैसे लगी मेरे साथ शेयर जरूर करें और अन्य टॉपिक के बारे में जानने के लिए कमेंट बॉक्स में लिखें। 
धन्यवाद!
छत्तीसगढ़ी कवि और उनकी रचनाएँ

Tuesday, December 25, 2018

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साथियों आपका स्वागत करता हूँ मेरे ब्लॉग में आज मैं आपके लिए छत्तीसगढ़ सामान्य ज्ञान से जुड़ी एक जानकारी लेकर आया हूँ जिसमें में कम्पीटीशन परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न से सम्बंधित कुछ टॉपिक के बारे में बताया है तो चलिए शुरू करताहूँ इससे पहले की मैं इस टॉपिक की शुरुआत करूँ आपको बता दूँ इससे पहले मैंने एक छत्तीसगढ़ी व्याकरण के बारे में बताया था। जिसमें मैंने छत्तीसगढ़ी भाषा में साहित्य के विकास के बारे में बताया था।  छत्तीसगढ़ की बोलियाँ। 
छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्भव एवं विकास के बारे में बताया था।

exam structure basde  

छत्तीसगढ़ी भाषा प्रथम व्याकरणाचार्य - हीरालाल काव्योपाद्याय।
छत्तीसगढ़ी भाषा का शास्त्रीय अध्ययन  -   शंकरनाथ शेष।
छत्तीसगढ़ी भाषा का उदविकास  -  आचार्य नरेंद्र देव
छत्तीसगढ़ी बोली व्याकरण एवं कोष  -  कांतिकुमार।
छत्तीसगढ़ी शब्दकोष रमेश चन्द्र मेहरोत्रा
छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि   -   नरसिंह दास वैष्णव। 
छत्तीसगढ़ी की प्रथम कवयित्री  -  निरुपमा शर्मा ( सोना बाई )
छत्तीसगढ़ी के व्याकरणाचार्य   -   हीरालाल कावयोपाध्याय ( 1890 )
छत्तीसगढ़ी के पाणिनी  -   हीरालाल कावयोपाध्याय।
छत्तीसगढ़ी बाल्मिकी  -   गोपाल मिश्र।
छत्तीसगढ़ी के नीलकण्ठ  -   गजानंद माधव मुक्तिबोध।
छत्तीसगढ़ी के विद्यासागर - रामदयाल तिवारी
छायावाद के जनक  -   मुकुटधर पाण्डेय। ( कुर्री के प्रति )
छत्तीसगढ़ी के प्रथम कहानीकारबंशीधर पाण्डेय। ( हीरु के कहनीज )
छत्तीसगढ़ी के प्रथम नाटककार  -   लोचन प्रसाद पाण्डेय  ( कलिकाल 1905 )
छतीसगढ़ी के प्रथम निबन्धकार केयूर भूषण ( रांडी ब्राम्हण की दुर्दशा )
छत्तीसगढ़ी के प्रथम गद्धलेखन की शरुआत   -   लोचन प्रसाद पाण्डेय।
छत्तीसगढ़ी के प्रथम व्यंग्य लेखन की शुरुआत  -  शरद कोठारी।
शब्दकोश
छत्तीसगढ़ी-हिंदी शब्दकोशछत्तीसगढ़ी राज्य भाषा आयोग।
हिंदी-छत्तीसगढ़ी शब्दकोश  - छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग।
छत्तीसगढ़ी शब्दकोश  -  डॉ . चन्द्रकुमार चन्द्राकर
छत्तीसगढ़ी हिंदी शब्दकोष - डॉ. पालेश्वर शर्मा।
छत्तीसगढ़ी व्याकरण और कोष  के लेखक - डॉ. क्रांतिकुमार
छत्तीसगढ़ी भाषा का शास्त्रीय अध्ययन - शंकर शेष।
छत्तीसगढ़ी में लोक साहित्य का अध्ययन के लेखक  - दयाशंकर शुक्ल।
हल्बी बोली में लोक कथाओं का संग्रह   -   लाला जगदलपुरी।
मेरे हिसाब से छत्तीसगढ़ी भाषा बोली के रचनाकार को उन्हें विभेदकर ( काव्य रचनाकार , उपन्यास, कहानी, नाटक आदि ) अध्ययन करें।

नोट - व्यक्ति आधार पर रचनाकार का विस्तृत वर्णन हमारी वेबसाइट में आगे प्रकाशित करेंगे इसलिए आप इस पोस्ट को पढ़ने के बाद अच्छा लगे तो सब्सक्राइब जरूर करें ताकि आपके पास हमारा पोस्ट जल्दी पहुंच सके।

इसके साथ ही छत्तीसगढ़ी महाकाव्य - श्री रामकथा, श्री कृष्णकथा , श्री महाभारत कथा के रचनाकार श्री प्रणयन जी हैं तथा कपिलनाथ कश्यप जी ने भी छत्तीसगढ़ी में महाकाव्य की रचना किये हैं।
अगले पोस्ट में पढ़े छत्तीसगढ़ी के काव्यकार एवम् उनकी रचनाएँ।
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साथियों आप सभी का स्वागत है मेरे इस ब्लॉग कल हमने जाना परीक्षा में पूछने लायक  छत्तीसगढ़ी व्याकरण से सम्बंधित प्रश्न उत्तर के बारे में आज हम जानने वाले हैं। छत्तीसगढ़ी के कवि और रचनाओं के बारे में चलिए शुरु करता हूँ-
नरसिंह दास वैष्णव - शिवायन ( 1904 )
पं. सुंदरलाल शर्मा  -   दानलीला ( 1942 )

C.G. का प्रथम प्रबन्ध काव्य या खण्ड काव्य

दुलरवा ( छत्तीसगढ़ी पत्रिका )
प्यारेलाल गुप्त  -   गांव मां फूल घलो गोठीयाथे
धान लुआई, प्राचीन छ.ग.
लोचन प्रसाद पाण्डेय  -  भुतहा मण्डल , कृषक बाल सखा।
हरी ठाकुर -  ' छत्तीसगढ़ी गीत अउ कविता ' ( हरी नारायणसिंह )
कुंजबीहारी चौबे  -    बीयासी गीत और बियासी के नगर
अंग्रेज तें हमला बनाये कंगला।
गयाराम साहू  -  जागीस छत्तीसगढ़ के माटी , रखिया
द्वारिका प्रसाद तिवारी ' विप्र ' - कुछु काहीं, धमनीहाट, सुराजगीत,फागुन गीत, गांधी गीत , राम अउ केंवट संवाद
शुकलाल प्रसाद पाण्डेय - छत्तीसगढ़ी ग्रामगीत , गीयों  ( बाल साहित्य ) , पुरुझरू ( शेक्सपीयर के कॉमेडी ऑफ एरर्स का छत्तीसगढ़ी अनुवाद )
कपिलनाथ मिश्र - खुसरा चिरई के बिहाव
दानेश्वर शर्मा - छत्तीसगढ़ के लोक गीत , बेटी के विदा
भगवती सेन  -  नदिया मरे पियास
नारायणलाल परमार - सूरज नई मरै, कांवर भर धूप
रामेश्वर वैष्णव - नोंनी बेंदरी
अखेल चन्द क्लांत  -  नवा सूरज के नवा अंजोर
लखनलाल गुप्ता  -  सनझौती के बेरा
हेमनाथ यदु  -  छत्तीसगढ़ी रामायेन
लक्ष्मण मस्तुरिया - सोनाखान के आगी
कपिलनाथ कश्यप - रामकथा
विमल पाठक - गंवई के गीत
निरंजन लाल गुप्ता - किसान के करलाई
पं. शेषनाथ शर्मा ' शील ' - तिरिया के जात

छत्तीसगढ़ी खण्ड काव्य -

पं. सुंदरलाल शर्मा - छत्तीसगढ़ी दानलीला
गोविंदराव विट्ठल - नागलीला।
कुंवर दलपत सिंह - रामयश मनोरंजन
गया प्रसाद बसेरीया - महादेव के बिहाव
बुलनदास कुर्रे - महाभारत चक्रव्यूह
मदनलाल चतुर्वेदी - राम बनवास
कपिलनाथ कश्यप - सीता की अग्नि परीक्षा, हीरा कुमार।
डॉ. विनय कुमार पाठक - सीता के दु:ख
मनिलाल कटकवार - लीलागर।
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छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्भव एवं विकास
छत्तीसगढ़ी बोल्लीयों का विकास
छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य का इतिहास

धन्यवाद!
    

Sunday, December 23, 2018

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साथियों आप सभी का स्वागत है मेरे इस ब्लॉग पर आज मैं आपके लिए लेकर आया हूँ छत्तीसगढ़ी व्याकरण से जुड़ा एक और टॉपिक जो की छत्तीसगढ़ के भाषा साहित्य के विकास को बताता है। इस टॉपिक में मैंने ये बताने का प्रयास किया है की छत्तीसगढ़ के भाषा का साहित्य का इतिहास एवं विकास किस प्रकार हुआ है। सामान्य भाषा में कहूँ तो इसका साहित्य के क्षेत्र में इसका विकास कैसे हुआ इसके बारे में यहां पर बताया है। छत्तीसगढ़ी भाषा के उद्भव एवं विकास के बारे में मैंने अपने पिछले पोस्ट में बताया था इसके साथ ही मैंने एक और पोस्ट लिखा था जिसमें  छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली बोलियों के बारे में बताया था। तो चलिए शुरू करता हूँ आज का  टॉपिक 

छत्तीसगढ़ के भाषा साहित्य का इतिहास एवम् विकास -

छत्तीसगढ़ में भाषा का विकास इसा पूर्व छठी शताब्दी से माना जाता है क्योकि मागधी प्राकृतिक भाषा पूर्वी दिशा में और शौरसेनी प्राकृत के शिलालेख उत्तर-पश्चिम दिशा में मिलते हैं। इन भाषाओं के मिलने से एक और मगधी भाषा का जन्म हुआ जिसे अर्धमागधी भाषा कहा जाता है और अर्धमागधी भाषा से ही वर्तमान छत्तीसगढ़ी भाषा का विकास हुआ है। छत्तीसगढ़ी भाषा पर आदिवासियों के द्वारा बोली जाने वाली बोलियों के अलवा निम्न जातियों का भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ा वे जातियां हैं- गोंडी, उड़िया और मराठी। छत्तीसगढ़ी भाषा में साहित्य की रचना लगभग 1000 वर्ष से प्रारम्भ हो चुकी थी जिसे डॉक्टर नरेंद्र देव वर्मा ने कालकर्मों में

निम्नानुसार विभाजित किया है-

(1.) गाथा युग - ( संवत 1000 से 1500 )
(2.) भक्ति युग   ( संवत 1500 से 1900 )
(3.) आधुनिक युग   ( संवत 1900 से वर्तमान तक )

(1.) गाथा युग - 

संवत 1000 से 1500 तक छ. ग. में विभिन्न गाथाओं की रचना हुई। ये गाथाएं प्रेम व वीरता के भाव से परिपूर्ण रही है। इन यह गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और यह लिपीब्ध परम्परा नहीं थी बल्कि मौखिक परम्परा थी और और यह आधुनिक युग में लिपिबद्ध किया गया।
छत्तीसगढ़ की प्राचीन गाथाओं को देखा जाये तो इन ग्रन्थों में केवला रानी . अहिमन रानी, रेवा रानी और वीर राजा वीर सिंह की गाथाये प्रमुख हैं। छत्तीसगढ़ की प्रमुख गाथाओं जिनको दो भागों में बांटा गया है पौराणिक और धार्मिक कथाओं में फूलबासन और पण्डवानी आते हैं।
फुलबासन में सीता और लक्ष्मण की गाथा है, जिसमें सीता लक्ष्मण को स्वप्न में देखे गए फुलबासन नामक फ़ूल को लाने का अनुरोध करती है और लक्ष्मण कठिनाईयों को सहते हुए इस कार्य को करता है।
पण्डवानी में द्रौपदी के जरिये हस्तालिका या तीजा के अवसर पर छत्तीसगढ़ की नारी के मायके जाने की इच्छा को निरूपित करती है। अर्जुन द्रौपती को मायके पहुचाने जाते है तो मार्ग में उन्हें बंदी बना लिया जाता है। इस प्रकार से इसका विकास होता जा रहा है धीरे धीरे।

छत्तीसगढ़ी आदिकालीन साहित्य की प्रमुख विशेषता इस प्रकार है-

1.) प्रेम प्रधान, नारी प्रधान, और वीर गाथा का वर्णन इस काल में देखने को मिलता है।
2.) इस काल की गाथाओं को प्रबन्ध शैली में रखा गया है।
3.) आदिकालीन की गाथाये नारी प्रधान एवं नारी जीवन के असहाय दुखपूर्ण क्षणों को विशेष महत्व देती है।
4.) तन्त्र-मन्त्र और पारलौकिक शक्तियों का विस्तृत वर्णन इस आदिवासी काल में किया गया है।
5.) धार्मिक एवम् पौराणिक गाथाओं के मध्य से लोक जीवन की मैलिक इच्छाओं का वर्णन किया गया है।




2.) भक्ति युग ( संवत 1800 से 1900 तक ) -

इस दौरान छत्तीसगढ़ी भाषा में हिंदी भाषा के ही समान भक्ती तथा मुस्लिम आक्रमण को दर्शाने वाली रचनाओं की रखना हुई। क्योकि इस समय भारत के समान ही यहां की भी स्थिती ऐसे ही राजनीतिक दृष्टी से उलट फेर होता रहा।
मध्य युग की वीर गाथाओं में फुलकुंवर देवी गाथा और कल्याण साय की वीरगाथा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त गोपल्ला गीत, रायसिंह के पावरा, धोलामारू और नगेसर कइना के नाम से छोटी गाथाये भी लिखी गयी थी। साथ ही इस दौर में लोरिक चन्दा व सरवन गीत के नाम से गाथाओं की रचना हुई।

छत्तीसगढ़ी मध्यकालीन साहित्य की प्रमुख विशेषतायें -

1.) प्रमुख गाथाएं वीर रस एवं श्रृंगार रस से ओतप्रोत हुआ करती थीं।
2.) फुलकुंवर की गाथाओं में मुसलमानों से वीरंगना फुलकुँवर के युध्द का चित्रण किया गया है।
3.) इस काल की एक और विशेषता कबीर पंथी की स्थापना रही है।
4.) इस काल में भक्ति आंदोलन की धारा प्रवाहित हुई, जिससे भक्तिपरक साहित्य का सृजन हुआ।
5.) इस युग में धार्मिक एवं सामाजिक गीत धारा शुभारम्भ कबीर प्रभावित आंचलिक सम्प्रदायों एवं पन्थों के माध्यम से होता है।

प्रमुख मध्यकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य के रचनाकार -

1.) सन्त धर्मदास -
2.) गोपाल मिश्र - कलचुरी वंशीय राजा राजसिंह के दरबारी कवि रहे थे।
रचनाएं  -  खूब तमाशा, सुदामा चरित्र, भक्ति चिंतामणि, रातप्रताप (अधूरी), रतनपुर माहात्म्य,
3.) माखन मिश्र  -   गोपाल मिश्र के मित्र के पुत्र थे।
गोपाल मिश्र की अधूरी काव्य ' रामप्रताप ' को पूरा किया।
4.) बाबू रेवाराम - छत्तीसगढ़ी में भजनों की रचना गीता माधव, गंगा लहरी, सार रामायण, दीपिका, ब्रम्ह स्त्रोत ( सभी संस्कृत में)
विक्रम विलास, रत्न परीक्षा ( हिन्दी में ) एवं तरीख हैहैवंशीय।
5.) प्रह्लाद दुबे  -   इनकी रचना में छत्तीसगढ़ी का प्राजरीतिक स्वरूप अभिव्यक्त हुआ है।
ये सारंगढ़ निवासी और इनकी रचना जय चन्द्रिका है।

3.) आधुनिक छत्तीसगढ़ी साहित्य ( 1900 से अब तक ) -

हिंदी के आधुनिक काल के साहित्य की ही तरह छतीसगढ़ी में भी आधुनिक काल में काव्य साहित्य गध , साहित्य , उपन्यास, कहानी , निबन्ध, नाटक आदि का सम्यक विकास हुआ।

छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य के उद्भव एवं विकास -

छत्तीसगढ़ी काव्य, छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य की संस्कृति व हिंदी के शिष्ट काव्य की सभ्यता का समन्वित स्वरूप है। छत्तीसगढ़ी शिष्ट साहित्य का प्रारम्भ 20 वीं शताब्दी से माना जाता है। यद्धपि छत्तीसगढ़ी के प्रथम प्रमाणित कवी को लेकर समिक्षोंको में मतभेद है तथापि छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य की परम्परा को अलग कर दिया जाये तो छत्तीसगढ़ी - कविता का इतिहास सौ वर्षों से अधिक का नहीं है।

छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम कवि कौन हैं इसके मनांतर विभिन्न प्रकार मतभेद हैं विदद्वानों और समालोचकों के बीच जो की इस प्रकार है-


1. श्री हेमनाथ के अनुसार - उन्होंने कबीरदास के शिष्य धर्मदास को कहा है जिसका ( खण्डन- डॉ. विनय पाठक द्वारा किया गया। )
2. डॉ. नरेंद्र देव वर्मा - पं. सुंदरलाल शर्मा को
जिनकी रचना -  दानलीला , प्रह्लाद चरित्र, करुणा पच्चीसी, सतनामी , भजन माला आदि। )
3. श्री नन्दकिशोर तिवारी - पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय को ( छत्तीसगढ़ी कविता के लिए )
4. श्री दयाशंकर शुक्ल
5. डॉ. विनय कुमार पाठक  - नरसिंह दास वैष्णव को शिवायन ( 1904 ) की रचना के लिए।
इस आधार पर डॉ. विनय एवं अधिकांश छत्तीसगढ़ी और इसके रचनाकार नरसिंह दास को छत्तीसगढ़ी का प्रथम कवि मानते हैं। 

छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य को प्रमुखतः तीन कालों में विभाजित किया जा सकता है-

1.) शैशव काल - ( सन 1900 - 1925 तक )
प्रमुख काव्य साहित्यकार - पं. सुंदरलाल शर्मा, नरसिंह दास वैष्णव, लोचन प्रसाद पाण्डेय , शुकलाल पाण्डेय आदि।
2.) छत्तीसगढ़ी साहित्य का विकास काल - ( 1925 - 1950 तक )
इस काल के अंतर्गत- प्यारेलाल गुप्त, द्वारिका प्रसाद तिवारी 'वीप्र' आदि आते हैं।
3.) छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रगति प्रयोगवादी युग - ( 1950 से अब तक )
इस काल के अंतर्गत-
कुंजबिहारी चौबे, हेमनाथ यदु , हरी ठाकुर , विनय कुमार पाठक आदि आते हैं।
हिंदी के आधुनिक काल की ही तरह छत्तीसगढ़ी में भी आधुनिक काल में कव्य साहित्य व गद्य साहित्य का सम्यक विकास हुआ।     
  

Wednesday, December 19, 2018

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आप सभी का स्वागत है मेरे इस ब्लॉग पर आज मैं बताने वाला हूं


छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्भव और विकास कैसे हुआ 


तो चलिए शुरू करते हैं,,, भाषा शब्द की उत्पत्ति भाष धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है बोलना कहना या अपनी वाणी से कुछ कहना भाषा कहलाता है। जिन का कुछ अर्थ निकलता है भाषा का निर्माण जिन व्यक्त ध्वनियों से होता है उसे वर्ण कहते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा का विकास भी अन्य आधुनिक भाषाओं की तरह ही प्राचीन आर्य भाषा से हुआ है। आर्यों की भाषा प्राचीन भाषा समय के साथ साथ परिवर्तित होती गई और उसे अन्य उप भाषाओं का विकास होता गया। उन भाषाओं के विकास में छत्तीसगढ़ी भाषा भी एक बोली के रूप में पनपी भाषाओं तथा बोलियों के इस विकास की यात्रा को हम इस प्रकार से समझ सकते हैं और उन्हें इसे प्रकार से समझाने का प्रयास मैंने यहां पर किया है- 

भारतीय भाषाओं के विकास क्रम को व्याकरण आचार्यो ने तीन भागों में विभाजित किया है-


  1.  प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल जो 1580 500 ईसा पूर्व तक चला।
  2.  मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा काल 500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व।
  3.  आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल जो कि 1000 ईसा पूर्व से अब तक चल रहा है।


 अब चलिए इसको हम विस्तार से जानते हैं कि
प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल मध्यकालीन आर्य भाषा काल और आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल के बारे में,,   

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल 1500 से 500 ईसा पूर्व

 इस युग के भारतीय आर्यों के भाषाओं के उदाहरण हमें प्राचीनतम ग्रंथों में देखने को मिलता है प्राचीन युग के अंतर्गत वैदिक और लौकिक दोनों भाग आते हैं संस्कृत सिस्ट समाज के प्रश्न पर विचार विनिमय की भाषा हुआ करती थी उस समय वह यह काम कई सदी तक करती रही संस्कृत का प्रथम शिलालेख हमें 150 ईसवी रुद्रदामन का गिरनार शिलालेख है तब से प्रायः 12 वीं सदी तक इसको राज दरबारों से विशेष प्रश्रय मिलता रहा.
 बौद्ध धर्म के उदय के साथ ही स्थानीय बोलियों को महत्व मिला भगवान बुद्ध ने धर्म प्रचार को प्रभावी बनाने के लिए जन बोलियों को चुना जिसमें पाली सर्वोपरि थी। पाली में जन भाषा और साहित्यिक भाषा का मिश्रित रूप मिलता है। 

 मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा काल जो कि 500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक चला

 इस पाली भाषा का प्रतिनिधि उदाहरण हमें अशोक की धर्म लिपियों और पाली ग्रंथों से मिलती है। और धीरे-धीरे हमारे भारत में प्रादेशिक विभिन्नता बढ़ती गई जिसके कारण अलग-अलग प्राकृतिक भाषाओं का विकास होता गया।संस्कृत ग्रंथों में भी विशेषतः नाटकों में इन प्राकृतिक भाषाओं का प्रयोग हमें देखने को मिलता है और सामान्य जनता द्वारा इनका प्रयोग हुआ इन प्राकृतिक भाषाओं में शौरसेनी माग्धी अर्धमगधी महाराष्ट्री पैशाची आदि प्रमुख रहीं ।साहित्य में प्रयुक्त होने पर व्याकरण आचार्य ने प्राकृतिक भाषाओं को कठिन अस्वाभाविक नियमों से बांध दिया किंतु जिन मूल्यों के आधार पर उनकी रचना हुई वह व्याकरण के नियमों से नहीं बांधी जा सकी। व्याकरण आचार्य ने इन बोलियों को अपभ्रंश नाम दिया।

अपभ्रंश:- मध्यकालीन भारतीय भाषा का चरण विकास अपभ्रंश से हुआ। आधुनिक आर्य भाषा और हिंदी ,मराठी, पंजाबी , उड़िया आदि भाषा की उत्पत्ति इन ही अपभ्रंश भाषाओं से हुई है।इस प्रकार यह अपभ्रंश भाषा में प्राकृतिक भाषाओं और आधुनिक भाषाओं के बीच की कड़ियां हैं। 

1. मागधी अपभ्रंश भाषा से बिहारी, उड़िया, बंगाली, असमिया इन भाषाओं का उद्भव हुआ है। 
2.अर्धगधी अपभ्रंश:- से पूर्वी हिंदी, अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी, आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। 3.शौरसेनी:- से पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, ब्रजभाषा ,खड़ी बोली का विकास हुआ।
4.पैशाची अपभ्रंश से लहंदा पंजाबी भाषा अस्तित्व में आए। 
5.ब्राचड़ अपभ्रंश से सिंधी भाषा बना है। 
6.खस अपभ्रंश से पहाड़ी कुमाऊनी भाषा बना है। 
7.महाराष्ट्री अपभ्रंश से मराठी भाषा का विकास हुआ है या मराठी भाषा अस्तित्व में आया है। 
इस प्रकार की आर्य भाषा को एक सारणी के रूप में मैं यहां पर बता रहा हूं , 

3.आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल जो कि 1000 ई. से वर्तमान तक चल रहा है, 

भारतीय आर्य भाषा के वर्तमान युग का प्रारंभ कराया 1000 इससे माना जाता है जिसमें महत्त्व की दृष्टि से आर्य परिवार की भाषाएं सर्वोपरि हैं इनके बोलने वालों की संख्या भारत में सबसे अधिक है बोलने वालों कोबोलने वालों को संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो धर्मेंद्र परिवार की भाषाएं इसके बाद आती हैं। 
पैशाची शौरसेनी महाराष्ट्र अर्धमगधी आदि अपभ्रंश भाषा ओं ने क्रमशः आधुनिक सिंधी पंजाबी हिंदी राजस्थानी गुजराती मराठी पूर्वी हिंदी बिहारी बांग्ला उड़िया भाषाओं को जन्म दिया। 
शौरसेनी प्राकृत अपभ्रंश से हिंदी की पश्चिमी शाखा का जन्म हुआ.

 इसकी दो प्रधान बोलियां हैं-

 पहला ब्रज और दूसरी खड़ी बोली।हिंदी की दूसरी शाखा है पूर्वी हिंदी जिसका विकास अर्धमागधी से हुआ है। इसकी तीन प्रमुख बोलियां हैं अवधि बघेली व छत्तीसगढ़ी। अवधि में साहित्यिक परंपरा रही है तुलसी व जायसी ने इसमें अमर काव्य लिखे हैं बघेली और छत्तीसगढ़ी में प्राचीन समय में उल्लेखनीय साहित्य सृजन नहीं हुआ जिसकी क्षतिपूर्ति अब हो रही है। मतलब कि अब उल्लेखनीय साहित्य सृजित किए जा रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ी की पड़ोसी भाषाएं उड़िया, मराठी, बिहारी आदि हैं साथ ही छत्तीसगढ़ में अनेक आदिवासी बोलियां भी बोली जाती हैं जिनकी वजह से छत्तीसगढ़ी में अनेक विषमताओं उत्पन्न हो गई है.
 उसी को सुधारने के लिए अब छत्तीसगढ़ी व्याकरण बनाया गया है। 

पूर्वी हिंदी में छत्तीसगढ़ी के साथ साथ कौन सी दो बोलियां सम्मिलित हैं ?

यह प्रश्न पीएससी मैंस 2012 में पूछा गया था। तो चलिए जानते हैं इसका अर्थ या उत्तर  

भारतीय आर्य भाषाओं की मध्यवर्ती शाखा के अर्धमगधी से पूर्वी हिंदी का विकास हुआ जो आगे चलकर - 
अवधि बघेली एवं हिंदी में विभक्त हो गई अर्थात पूर्वी हिंदी के अंतर्गत 3 बोलियां अवधि बघेली एवं छत्तीसगढ़ी आते हैं। 
पुर्वी हिंदी को भाषाओं का नहीं बल्कि बोलियों का समुदाय माना गया और ग्रियर्सन के अनुसार भारतीय आर्य भाषाओं की मध्यवर्ती शाखा भाशाओ का नहीं वरन गोलियों का एक समुदाय है। 
इस अध्ययन का विषय पूर्वी हिंदी की प्रमुख बोली छत्तीसगढ़ी से है बघेली तो अवधि के बहुत निकट भाषा है ग्रियर्सन के अनुसार तो बघेली केवल स्थानीय प्रेम के कारण अलग-अलग बोली मानी जाती है अन्यथा यह अवधि का ही दक्षिणी रूप है। 
तुलसीदास की अमर कृति रामचरितमानस एवं जायसी कृत पद्मावत किस भाषा की अमर कृति है पूर्वी हिंदी की तीन गोलियां एक दूसरे से बहुत मिलती-जुलती हैं 
जैसे कि 
यहां पर मैं बताने जा रहा हूं अब मैं आपको छत्तीसगढ़ी भाषा का वर्गीकरण बताने जा रहा हूं जिसमें वर्तमान में छत्तीसगढ़ी कहनी क्षेत्रीय स्वरों प्रचलित हो गए हैं जिन्हें हम निम्नानुसार अधिकृत कर सकते हैं

 1.केंद्रीय छत्तीसगढ़ी -छत्तीसगढ़ी मानक हिंदी के प्रभावों से युक्त है इस पर स्थानीय बोलियों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ा है इसे ही कुल 18 नामों से जाना जाता है जिनमें कवर्धा कांकेर ई खैरा गिरी बिलासपुरी रतनपुरी रायपूरी धमतरी पारदी बहेलिया बेगानी सतनामी इस समूह में सर्वोपरि मानी गई है छत्तीसगढ़ी। 

2.पश्चिमी छत्तीसगढ़ी- छत्तीसगढ़ी बुंदेली व मराठी का प्रभाव पड़ा है कमारी खलहाटी पनकी मुरारी आदि इन में आती हैं जिनमें सर्वोपरि खल्ताही है। 

3.उत्तरी छत्तीसगढ़ी इस पर बघेली भोजपुरी और उरांव जनजाति की बोली कुडुख का प्रभाव पड़ा है। इन में कुल 5 नाम शामिल है पन्नों सदरी कोरबा जस पुरी सरगुजिया व नागवंशी इस समूह में सर्वोपरि मानी जाती है. सरगुजिया। 

4.पूर्वी छत्तीसगढ़ी- इस पर उड़िया का व्यापक प्रभाव पड़ा है इसमें कुल 6 नाम शामिल है कलंगा, कलनजिया, बिहारी, भूरिया चर्मशिल्पी, लरिया इसमें प्रमुख लरिया भाषा है। 
5.दक्षिणी छत्तीसगढ़ी -  इस पर मराठी उड़िया और गोंडी का प्रभाव पड़ा है जिसमें कुल 9 नाम शामिल है - अद्कुरी चंदारी, जोगी, धाकड़, बस्तरी, मगरी , मिर्गनी और हल्दी। इनमें सर्वोपरि हल्बी है। 

 तो आज के पोस्ट में बस इतना ही कल मिलेंगे एक नए छत्तीसगढ़ी व्याकरण टॉपिक के साथ जिसमें हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ की बोलियों के बारे में।

 धन्यवाद।

Wednesday, October 17, 2018

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छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से मुहावरे हैं जो की बहुत ही प्रसिद्ध हैं मुहावरा संक्षिप्त वाक्य होता है जो की पूर्ण अर्थ को प्रकट करता है। छत्तीसगढ़ में मुहावरों का भी महत्व उतना ही है जितना की हिन्दी का है। तो चलिए जानते हैं की छत्तीसगढ़ी मुहावरे होते कैसे हैं और उनका प्रयोग कैसे किया जाता है।

1. कनिहा ढील होना - कमजोर होना।

वाक्य में प्रयोग- बुता करत-करत राजू के कनिहा ढील होंगे।

2. चित ले उतरना- मन से उतर जाना।

वाक्य- एक दिन ऐसे रिहिस की वो मोला रोज शुरता करे लेकिन अब लागथे की वो मोला चित से उतार दिस।

3. तिड़ी-बिड़ी होना-नष्ट होना।

वाक्य- पैसा पाये के चक्कर म सब तिड़ी-बिड़ी होगे लागथे।


4. जिउ देना - प्राणप्रिय होना।

वाक्य - एक झन खातिर बर सबो झन जिउ देबर तैयार होगे।

5. पानी ढील होना - ड़र जाना।

वाक्य - गुण्डा मन ल आत देख मोहन के पानी ढील होगे।

6. डांड़ देना - जुर्माना देना।

वाक्य - भगतु ल खेत ल बोए हस कके सियनहा मन हा डांड़ दिस।

7. डेहरी खूंदना - किसी के घर जाना।

वाक्य - झगरा होए के बाद बुधारू ह दिनेश के घर के डेहरी ल नई खुन्दीश।

8. दाँत निपोरना - लज्जित होना।

वाक्य - स्कूल मे डांस ल देख के राकेश दाँत निपोरने लगा था।

9. छाती फटना - अत्यंत ईर्ष्या करना।

वाक्य - सोनू ल देख मोनू के छाती फाटन लागीश।

10. छानी में होरा भुंजना - अत्याचार करना।

वाक्य - रामु ह महेश के छानी में होरा भुज दिस।

11. चाउर छीचना - जादू करना।

वाक्य- मंगलू ह ऐसे चाउर छिचिस की सबो झन मोहा गे।

12. छुछुवा के रहना - निराश होना।

वाक्य - मोहन ह गाव चल दिस त सोहन ह छुछुवात ले रगे।

13. तीन पांच करना - उठा-पटक करना,फरेब करना।

वाक्य - लोन ले के खातीर जोसिला हा बैंक वाला मन संग तीन पांच करन लागिस।

14. जुच्छा हाथ होना - विधवा होना।

वाक्य - जोवाना के पती ह मर गे त वो ह झुच्छा हाथ होंगे।

15. नाउ राऊत बन्द करना - सामाजिक बहिष्कार करना।

वाक्य - साहनु के टुरी ह टुरा ल धर के भाग गे जेकर कारन वोकर नाउ-राऊत ल बन्द कर दे गीस।

16. अंगना खंचवा करना - अधिक खशामद करना।

वाक्य - मोना ल मनात-मनात अंगना खचवा होंगे लेकिन वो ह नई मानिस त काय कारों।

17. अरई लगाना - हाथ धोकर पीछे पड़ना।

वाक्य - मोहन ह सोहन के पाछु म अरई लयाए बागीर घूमत रथे ऐसे लागथे।

18. आंसू ढ़राना - रोने का अभिनय करना।

वाक्य - गोलू ल आत देखिस तहान मोनिका ह आँशु ढ़ारे लागीश त मे ह समझ गेव की कुछु गड़बड़ हाबे क के।

19. आगी में मूतना - अन्याय करना।

वाक्य - श्याम ह बने कहिस की उपई टुरा-टुरी मन सदा आगी मे मुतथे।

20. गोड़ किटकना - किसी के द्वारा याद करना।

वाक्य - सीता ह राम बर गोड़ किटकत र गे लेकिन वो ल नई पाइस।

21. लोटा धरना - भिखारी बनना।

वाक्य - प्रमोद के एक दिन ऐसे आईस की ओला लोटा धरे ल पड़ गे।

22. अंगठी चावाना - आश्चर्य मे पड़ना।

वाक्य - ताजमहल ल देख के बाद मनोहर कका ह अंगठी चबा डारिस।

23. अंगरी देखाना - धमकाना।

वाक्य - राम ह श्याम ल कहत हाबे की तै मोला अंगरी मत देखा मैं जानत हवव तोरो बारे म।

24. आँखी चढ़ाना - आँख से गुस्सा देखाना।

वाक्य - मोला देखत ही मन्नू ह आँखी चढ़ा लिस।

25. कहे मा आना - बहकावे में आना।

वाक्य - अबड़ अकन चांदी के दाम ल सुन के रामबती ह कहे में आ गे ,और सबो रुपया ल दे दिस।

26. गंगा जल उचाना -  कसम खाना।

वाक्य - वोकर कहे म तहुं ह गंगा चल उठा देस।

27. गडई करना - चापलूसी करना।

वाक्य - झंग्लू ह मंग्लू के गडई करत-करत नई थकिस।

28. घांठा परना - आदी होना।

वाक्य - जानु जानु क के रेशमा के घांटा पर गे।

29. छाती म चघना - पीछे पड़ना।

वाक्य - चोर मन ह सोहन के छाती मे चड़ के मार ड़ालिस।

30. जान के जंजाल होना - एकदम दुखी होना।

वाक्य - पानी के कमी के कारण जान के जंजाल हो गे।

31. धकर-धकर होना - एकदम कमजोर होना।

वाक्य - स्वाइन फ्लू के कारण मोरो गी ह धकर-धकर करे बर धरत है। 

32. धारे धारे बोहाना - विनाश होना।

वाक्य - वो ह धारे-धार बोहागे

33. बघनिन के दूध - बहुत कठिन कार्य करना।

वाक्य - रामु ह बाघिन के दुध्द पी ड़ारे हाबे

34. बादर छूना - असम्भव कार्य करना।

वाक्य - इसरो वाला मन चाँद मे खोज करके बादर ल छु डारिस।

              ये जानकारी आपको कैसे लगी। पढ़ने के लिए धन्यवाद।
thanks so much for supporting me