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Wednesday, December 11, 2019

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रीढ़ की हड्डी : जगदीश चंद्र माथुर

सुपरिचित नाटककार जगदीश चंद्र माथुर का जन्म सन 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा, जिला बुलंदशहर में हुआ। उन्होंने ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक लिखें हैं और उनकी प्रमुख रचनाएं भोर का तारा, ओ मेरे सपने जो एकांकी है शारदिया कोणार्क, पहला राजा (नाटक), जिन्होंने जीना सीखा तथा 10 तस्वीरें जो रेखा चित्र है आदि रचनाओं को उन्होंने लिखा। जगदीश चंद्र माथुर का निधन 14 मई 1978 को हुआ।
रीड_की_हड्डी

रीड की हड्डी पात्र परिचय

रीड की हड्डी के एकांकी का पात्र परिचय इस प्रकार है-

उमा - लड़की
रामस्वरूप - लड़की का पिता
प्रेमा - लड़की की माता
शंकर - लड़का
गोपाल प्रसाद - लड़के का बाप
रतन - रामस्वरूप का नौकर

( नाटक का परिदृश्य इस प्रकार है मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे में आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आती है वह अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं। एक तख़्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं और तख्त का दूसरा सिरा उनके नौकर ने पकड़ रखा है। )

रामस्वरूप : अबे धीरे धीरे चल। .....  अबे तख्त को उधर मोड़ दे... उधर।
..... बस। ( तख़्त को रखने की आवाज आती है। )

नौकर : बिछा दूँ साहब ?

रामस्वरूप : (जरा तेज आवाज) और क्या करेगा ? परमात्मा के यहां जब अक्ल बांट रही थी, तो तू देर से पहुंचा था क्या ? ........ बिछा दूँ साब....  और यह पसीना किसलिए बहाया है ?

नौकर : तख्त बिछाता है ही-ही-ही।

रामस्वरूप : हंसता क्यों है ?.....अबे हमने भी जवानी में कसरत की है। कलसों से नहाता था लोटों की तरह। तख्त क्या चीज है ?.... उसे सीधा कर.... यों बस और सुन, बहू जी से दरी माँग ला, इसके ऊपर बिछाने के लिए। .....चद्दर भी, कल जो धोबी के यहां से आई है , वही। ( नौकर जाता है बाबू साहब इस बीच में मेजपोश ठीक करते हैं। एक झाड़न से गुलदस्ता साफ करते कुर्सियों पर भी दो-चार हाथ लगाते हैं। सहसा घर की मालकिन प्रेमा का आना। गंदूमी रंग, छोटा कद, चेहरे की आवाज से जाहिर होता है कि किसी काम में बहुत व्यस्त हैं। उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह नौकर आ रहा है।.... खाली हाथ। बाबू रामस्वरूप दोनों की तरफ देखने लगते हैं। )

प्रेमा : मैं कहती हूं, तुम्हें इस वक्त धोती की क्या जरूरत पड़ गई ? एक तो वैसे ही जल्दी जल्दी में.......

रामस्वरूप : धोती ?

प्रेमा : हाँ , अभी तो बदलकर आए हो और फिर न जाने किसलिए.....

रामस्वरूप : लेकिन धोती माँगी किसने ?

प्रेमा : यही तो कह रहा था रतन ?

रामस्वरूप : क्यों बे रतन, तेरे कानों में डाट लगी है ? मैंने कहा था- धोबी के यहां से जो चादर आई है, उसे मांग ला। .... अब तेरे लिए दिमाग कहां से लाऊं। उल्लू कहीं का !

प्रेमा : अच्छा जा, पूजावाली कोठरी में लकड़ी के बॉक्स के ऊपर भूले हुए कपड़े रखे हैं न, उन्हीं में से चद्दर उठा ला।

रतन : और दरी ?

प्रेमा : दरी तो यही रखी है कोने में। वह पड़ी तो है।

रामस्वरूप : ( दरी उठाते हुए। ) और बीबी के कमरे में से हारमोनियम उठाला और सितार भी। ....  जल्दी जा। ( रतन जाता है। पति-पत्नी तख्त पर दरी बिछाते हैं। )

प्रेमा : लेकिन वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुंह फुलाए पड़ी है।

रामस्वरूप मुँह फुलाए ? ... और तुम उसकी माँ किस मर्ज की दवा हो ? जैसे-तैसे करके तो वह लोग पकड़ में आए हैं। अब तुम्हारी बेवकूफी से सारी मेहनत बेकार जाए, तो मुझे दोष मत देना।

प्रेमा : तो मैं ही क्या करूं ? सारे जतन करके हार गई। तुम्ही ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सर चढ़ा रखा है। मेरी समझ में तो यह पढ़ाई-लिखाई का जंजाल आता नहीं। अपना जमाना अच्छा था। 'आ' 'ई' पढ़ ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो स्त्री-सुबोधिनी पढ़ ली। सच पूछो तो स्त्री-सुबोधिनी में ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं......  ऐसी बातें की क्या तुम्हारी बी.ए. एम.ए. की पढ़ाई में होगी और आजकल के लक्षण ही अनोखे हैं......

रामस्वरूप : ग्रामोफोन बाजा होता है न ?

प्रेमा : क्यों ?

रामस्वरूप : दो तरह का होता है। एक तो आदमी का बनाया हुआ उसे एक बार चलाकर चाहे रोक लो और दूसरा परमात्मा का बनाया हुआ उसका रिकॉर्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं

प्रेमा : हटो भी ! तुम्हें ठिठोली सुझती रहती है। यह तो होता नहीं कि उस अपनी उमा को राह पर लाते। अब देर ही कितनी रही है उन लोगों के आने में ?

रामस्वरूप : तो हुआ क्या ?

प्रेमा : तुम ही ने तो कहा था कि जरा ठीक-ठीक कर के नीचे लाना। आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है ? इसी मारे मैंने तो पाउडर और वौडर उसके सामने रखा था। पर उसे तो इन चीजों से न जाने किस जन्म की नफरत है। मेरा कहना था कि आंचल से मुंह लपेट लेट गई; भई मैं तो बाज आई तुम्हारी इस लड़की से।

रामस्वरूप : न जाने कैसे इसका दिमाग है। वरना आजकल की लड़कियों के सहारे तो पौडर का कारोबार चलता है।

प्रेमा : अरे मैंने तो पहले ही कहा था इंट्रेंस ही पास करा लेते- लड़की अपने हाथ रहती और इतनी परेशानी उठानी न पड़ती। पर तुम तो.....

रामस्वरूप : ( बात काटकर ) चुप, चुप....  ( दरवाजे में झाँकते हुए ) तुम्हें कतई अपनी जुबान पर काबू नहीं है।  कल ही बता दिया था कि उन लोगों के सामने जिक्र और ही ढंग से होगा। मगर तुम तो अभी से सबकुछ उगल देती हो। उनके आने तक तो न जाने क्या हाल करोगी।

प्रेमा : अच्छा बाबा, मैं न बोलूंगी, जैसी तुम्हारी मर्जी हो, करना। बस मुझे तो मेरा काम बता दो।

रामस्वरूप : तो उमा को जैसे-तैसे तैयार कर दो। न सही पाउडर। वैसे कोई बुरी है। पान लेकर भेज देना उसे और नाश्ता तो तैयार है न ? ( रतन का आना ) आ गया रतन !.....  इधर ला, इधर बाजा नीचे रख दे। चद्दर खोल।  पकड़ तो जरा उधर से। ( चददर बिछाते हैं। )

प्रेमा : नाश्ता तो तैयार है। मिठाई तो वे लोग ज्यादा खाएंगे नहीं। कुछ नमकीन चीजें बना दी हैं। फल रखे हैं ही। चाय तैयार है और टोस्ट भी। मगर हाँ मक्खन ? मक्खन तो आया ही नहीं।

रामस्वरूप : क्या कहा ? मक्खन नहीं आया ? तुम्हें भी किस वक्त याद आई है। जानती हो कि मक्खनवाले की दुकान दूर है, पर तुम्हें तो ठीक वक्त पर कोई बात सुझती ही नहीं। अब बताओ रतन मक्खन लाए कि यहाँ का काम करे। दफ्तर के चपरासी से कहा था आने के लिए सो नखरो के मारे,,,,,

प्रेमा : यहां का काम कौन-सा ज्यादा है ? कमरा तो सब ठीक-ठाक है ही, बाजा सितार आ  ही गया।
नाश्ता यहाँ बराबरवाले कमरे में करना है- ट्रे में रखा हुआ है, सो तुम्हें पकड़ा दूंगी। एकाध चीज खुद ले आना।  इतनी देर से रतन मक्खन ले ही आएगा। दो आदमी ही तो हैं।

रामस्वरूप : हाँ एक तो बाबू गोपाल प्रसाद और दूसरा खुद लड़का है। देखो, उमा से कह देना की जरा करीने से आए। यह लोग जरा ऐसे ही हैं। गुस्सा तो मुझे बहुत आता है, इनके दकियानूसी खयालों पर। खुद पढ़े-लिखे हैं, सभा-सोसायटीयों में जाते हैं, मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो।

प्रेमा : और लड़का ?

रामस्वरूप : बताया तो था तुम्हें। बाप सेर है, तो लड़का सवा सेर, बी.एस.सी. के बाद लखनऊ में ही तो पढ़ता है, मेडिकल कॉलेज में। कहता है कि शादी का सवाल दूसरा है तालीम का दूसरा। क्या करूं मजबूरी है। मतलब अपना है, वरना इन लड़कों और बापों को ऐसी कोरी कोरी सुनाता की ये भी.....

रतन : ( जो अब तक दरवाजे के पास चुपचाप खड़ा हुआ था, जल्दी-जल्दी ) बाबूजी, बाबूजी !

रामस्वरूप : क्या है ?

रतन : कोई आए हैं।

रामस्वरूप : ( दरवाजे से बाहर झाँककर, जल्दी से मुंह अंदर करते हुए ) अरे, ऐ प्रेमा, वह आ भी गए ( नौकर पर रजत नजर पड़ते ही ) और तू यही खड़ा है, बेवकूफ ! गया नहीं मक्खन लाने अब सब चौपट कर दिया।
... अबे उधर से, अंदर के दरवाजे से जा (नौकर अंदर जाता है).... और तुम जल्दी करो। प्रेमा, उमा को समझा देना थोड़ा-सा गा देगी। (प्रेमा जल्दी से अंदर की तरफ जाती है। उसकी धोती जमीन पर रखे हुए बाजे से अटक जाती है। )

प्रेमा : उँह ! यह बाजा नीचे ही रख गया है। कमबख्त।

रामस्वरूप : तुम जाओ, मैं रखे देता हूं....  जल्दी। (प्रेमा आ जाती है। बाबू रामस्वरूप बाजा उठाकर रखते हैं। किवाड़ों पर दस्तक।)

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ। आइए, आइए। ..... हँ-हँ-हँ।

(बाबू राम गोपाल प्रसाद और उसके लड़के शंकर का आना। आंखों से लोक-चतुराई टपकती है आवाज से मालूम होता है काफी अनुभवी और फितरती महाशय है। उनका लड़का कुछ खींसे निपोरने वाले नौजवानों में से है, आवाज पतली है और खिसियाहट भरी। झुकी कमर इसकी खासियत है।

रामस्वरूप : (अपने दोनों हाथ मलते हुए) हँ.. हँ इधर तशरीफ़ लाइए, इधर.... । ( बाबू गोपाल प्रसाद बैठते हैं मगर बैंत  गिर पड़ता है। )

रामस्वरूप : यह बेंत ! लाइए मुझे दीजिए कोने में रख देता हूं। (सब बैठते हैं) हँ-हँ !....  मकान ढूंढने में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई ?

गोपाल प्रसाद : (खँखारकर) नहीं तांगेवाला जानता था.... और फिर हमें तो यहां आना ही था, रास्ता मिलता कैसे नहीं?

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ, यह तो आपकी बड़ी मेहरबानी है। मैंने आपको तकलीफ तो दी।

गोपाल प्रसाद : अरे नहीं साहब! जैसा मेरा काम, वैसा आपका काम, आखिर लड़के की शादी तो करनी ही है। बल्कि ये कहिए मैंने आपके लिए खासी परेशानी कर दी।

रामस्वरूप : हँ-हँ, यह लीजिए आप तो मुझे कांटो में घसीटने लगे। हम तो आपके हँ-हँ सेवक ही हैं। हँ-हँ (थोड़ी देर बाद लड़के की तरफ मुखातिब होकर) और कहिए शंकर बाबू कितने दिनों की छुट्टियां हैं?

शंकर : जी कॉलेज की छुट्टियां नहीं है। वीक एंड में चला आया था।

रामस्वरूप : आपके कोर्स खत्म होने में तो अब साल भर रहा होगा।

शंकर : जी, यही कोई साल दो साल।

रामस्वरूप : साल दो साल?

शंकर : हँ-हँ जी एकाध साल का मार्जिन रखता हूँ......

गोपाल प्रसाद : बात यह हैं साहब कि यह शंकर एक साल बीमार हो गया था। क्या बताएं, इन लोगों को इसी उम्र में सारी बीमारियां सताती हैं। एक हमारा जमाना था कि स्कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ उड़ा जाते थे, मगर फिर जो खाना खाने बैठते, तो वैसे-की-वैसे ही भूख।

रामस्वरूप : कचौड़ियाँ भी तो उस जमाने में पैसे की दो आती थीं।

गोपाल प्रसाद : जनाब, यह हाल था कि चार पैसे में ढेर-सी मलाई आती थी और अकेले दो आने की हजम करने की ताकत थी, अकेले और अब तो बहुतेरे खेल वगैरह होते हैं स्कूलों में। तब ना बॉलीवॉल जानता था, न टेनिस, न बैडमिंटन। बस कभी हॉकी या कभी क्रिकेट कुछ लोग खेला करते थे। मगर मजाल कि कोई कह जाए कि यह लड़का कमजोर है। (शंकर और रामस्वरूप किसे खीसे निपोरते हैं। )

रामस्वरूप : जी हां, जी हां ! उस जमाने की बाद ही दूसरी थी। हँ-हँ....

गोपाल प्रसाद : (जोशीली आवाज में) और पढ़ाई का यह हाल था कि एक बार कुर्सी पर बैठे की 12 घंटे की सिटिंग हो गई, बारह घंटे की सेटिंग हो गई, बारह घंटे ! जनाब मैं सच कहता हूं कि उस जमाने का मेट्रिक भी वह अंग्रेजी लिखता था फर्राटे कि आजकल के एम.ए. भी मुकाबला नहीं कर सकते।

रामस्वरूप जी हाँ, जी हाँ ! यह तो है ही।

गोपाल प्रसाद : माफ कीजिएगा बाबू रामस्वरूप, उस जमाने की जब याद आती है, अपने को जप्त करना मुश्किल हो जाता है।

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ ! जी हाँ, वह तो रंगीन जमाना था, रंगीन जमाना शंकर भी ही ही करता है
गोपाल प्रसाद एक साथ अपनी आवाज और तरीका बदलते हुए अच्छा तो साहब फिर बिजनेस की बातचीत हो जाए

रामस्वरूप : चौक कर बिजनेस? बिजी.... (समझकर) आह !...... अच्छा अच्छा लेकिन जरा नाश्ता तो कर लीजिए (उठते हैं।)

गोपाल प्रसाद : यह सब आप क्यों तकल्लुफ करते हैं।

रामस्वरूप : हाँ तकल्लुफ किस बात का है? हँ-हँ ! यह तो मेरी बड़ी तकदीर है कि आप मेरे यहाँ तशरीफ लाए। वरना मैं किस काबिल हूँ। हँ-हाँ- माफ कीजिएगा जरा। अभी हाजिर हुआ (अंदर जाते हैं। )

गोपाल प्रसाद : (थोड़ी देर बाद दबी आवाज में) आदमी तो भला है। मकान-वकान से हैसियत भी बुरी नहीं मालूम होती। पता चले, लड़की कैसी है?

शंकर : जी....
(कुछ खँखारकर इधर-उधर देखता है।)

गोपाल प्रसाद : क्यों क्या हुआ?

शंकर : कुछ नहीं।

गोपाल प्रसाद : झूककर क्यों बैठते हो? ब्याह तय करने आए, तो कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की बैक बोन....
(इतने में बाबू रामस्वरूप आते हैं, हाथ में चाय की ट्रे लिए हुए मैच पर रख देते हैं।)

गोपाल प्रसाद : आखिर आप माने नहीं।

रामस्वरूप : (चाय प्याले में डालते हुए) हँ-हँ-हँ?आपको विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्तानी?

गोपाल प्रसाद : नहीं नहीं साहब, मुझे आधा दूध और आधी चाय दीजिए। और चीनी भी ज्यादा डालिएगा मुझे तो भाई यह नया फैशन पसंद नहीं। एक तो वैसे ही चाय में पानी काफी होता है और फिर चीनी भी नाम के लिए डाली जाए, तो जायका क्या रहेगा?

रामस्वरूप : हँ-हँ। कहते तो आप सही हैं। (प्याला पढ़ाते हुए)

शंकर : (खंखारकर) सुना है सरकार अब ज्यादा चीनी लेने वालों पर टैक्स लगाएगी।

गोपाल प्रसाद : चाय पीते हुए हूँ। सरकार जो चाहे सो कर ले पर अगर आमदनी करनी है तो सरकार को बस एक ही टैक्स लगाना चाहिए।

रामस्वरूप : (शंकर को प्याला पकड़ाते हुए) वह क्या?

गोपाल प्रसाद : खूबसूरती पर टैक्स ! (रामस्वरूप और शंकर हंस पड़ते हैं।)

मजाक नहीं साहब, यह ऐसा टैक्स है जनाब कि देने वाली भी चूँ न करेंगी। बस शर्त यह हैं कि औरत पर यह छोड़ दिया जाए कि वह अपनी खूबसूरती के स्टैंडर्ड के माफिक अपने ऊपर टैक्स तय कर ले फिर देखिए सरकार की कैसी आमदनी बढ़ती है।

रामस्वरूप : (जोर से हंसते हुए) वाह-वाह ! खूब सोचा आपने ! वाकई आजकल यह खूबसूरती का सवाल भी बेढब हो गया है। हम लोगों के जमाने में तो यह कभी उठता भी न था। (तश्तरी गोपाल प्रसाद की तरफ बढ़ाते हैं। ) लीजिए।
गोपाल प्रसाद : (समोसा उठाते हुए) कभी नहीं साहब, कभी नहीं।

रामस्वरूप : (शंकर की तरफ मुखातिब होकर) आपका क्या ख्याल है, शंकर बाबू?

रामस्वरूप : किस मामले में?

रामस्वरूप : यही की शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्सा कितना होना चाहिए?

गोपाल प्रसाद : (बीच में ही) यह बात दूसरी है कि बाबू रामस्वरूप, मैंने आपसे पहले ही कहा था, लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पाउडर वगैरह लगाए, चाहे वैसे ही। बात यह है कि हम आप मान भी जाएं, मगर घर की औरतें तो राजी नहीं होती। आपकी लड़की तो ठीक है?

रामस्वरूप : जी हां वह तो आप देख लीजिएगा।

गोपाल प्रसाद : देखना क्या ! जब आपसे इतनी बातचीत हो चुकी है, तब तो यह रस्म ही समझिए।

रामस्वरूप : हँ हँ, यह तो आपका मेरे ऊपर भारी अहसान है। हँ-हँ।

गोपाल प्रसाद : और जायचा ( जन्मपत्री ) तो मिल ही गया होगा?

रामस्वरूप : जी जायचे का मिलाना क्या मुश्किल बात है ठाकुर जी के चरणों में रख दिया बस खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए।

गोपाल प्रसाद : यह ठीक कहा आपने बिल्कुल ठीक। (थोड़ी देर रुक कर) लेकिन हाँ, यहां जो मेरे कानों को भनक पड़ी है, यह गलत है न ?

रामस्वरूप : (चौक कर) क्या ?

गोपाल प्रसाद : पढ़ाई-लिखाई के बारे में जी हाँ, साफ़ बात है साहब, हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुकतेगा उनके नखरो को। बस हद से हद मैट्रिक पास होनी चाहिए।
क्यों शंकर?

शंकर : जी हाँ कोई नौकरी तो करनी नहीं।

रामस्वरूप : नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।

गोपाल प्रसाद : और क्या साहब ! देखिए कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि जब आप ने अपने लड़के को बी. ए. , एम. ए. तक पढ़ाया है, तब उनकी बहुवें भी ग्रेजुएट लीजिए। भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है। अरे मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगी, अंग्रेजी अब का अखबार पढ़ने लगी और पॉलिटिक्स वगैरह पर बहस करने लगी तब तो हो चुकी गृहस्ती जनाब मोर के पंख होते हैं मोरनी के नहीं सिर के बाल होते हैं शेरनी के नहीं।

रामस्वरूप : जी हां और मर्द की दाढ़ी होती है, औरतों की नहीं।
हँ-हँ-हँ।
(शंकर भी हंसता है, मगर गोपाल प्रसाद गंभीर हो जाते हैं।

गोपाल प्रसाद : हाँ-हाँ वह भी सही है। कहने का मतलब यह है कि कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं, जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं और ऊंची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।

रामस्वरूप : (शंकर से) चाय और लीजिए।

शंकर : धन्यवाद, पी चुका।

रामस्वरूप : (गोपाल प्रसाद से) आप?

गोपाल प्रसाद : बस साहब अब तो खत्म ही की कीजिए।

रामस्वरूप : आपने तो कुछ खाया ही नहीं। चाय के साथ टोस्ट नहीं है नहीं थे। क्या बताएं, वह मक्खन.....

गोपाल प्रसाद : नाश्ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं और फिर टोस्ट वोस्ट मैं खाता ही नहीं।

रामस्वरूप : हां, हां (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। फिर अंदर के दरवाजे की तरफ मुंह कर जरा जोर से) अरे, जरा पान भिजवा देना..... सिगरेट मँगवाऊँ।

गोपाल प्रसाद : जी नहीं।

(पान की तस्करी हाथों में लिए उमा आती है। सादगी के कपड़े। गर्दन झुकी हुई। बाबू गोपाल प्रसाद आंखें गड़ाकर और शंकर छिपकर उसे ताक रहे हैं।)

रामस्वरूप : हँ-हँ ... हँ-हँ,  आपकी लड़की है? लाओ बेटी पान मुझे दो।

(उमा पान की तस्करी अपने पिता को दे देती है। उस समय उसका चेहरा ऊपर को उठ जाता है, नाक पर रखा हुआ सोने की रिमवाला चश्मा दिखता है। बाप-बेटे चौक उठते हैं)

रामस्वरूप : (जरा सकपकाकर) जी, वह तो वह पिछले महीने में इसकी आंखें आ गई थी, तो कुछ दिनों के लिए चश्मा लगाना पड़ रहा है।

गोपाल प्रसाद : पढ़ाई लिखाई की वजह से तो नहीं है कुछ ?

रामस्वरूप : नहीं साहब, वहां तो मैंने अर्ज किया न।

गोपाल प्रसाद : हूँ। (संतुष्ट होकर कुछ कोमल स्वर में) बैठो बेटी !

रामस्वरूप : वहाँ बैठ जाओ उमा, उस तख्त पर अपने बाजे के पास (उमा बैठती है। )

गोपाल प्रसाद : चाल में तो कुछ खराबी है नहीं। चेहरे पर भी छवि है....  हाँ कुछ गाना-बजाना सिखा है?

रामस्वरूप : जी हाँ, सितार भी और बाजा भी। सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ।

(उमा सितार उठाती है। थोड़ी देर बाद मीराका का मशहूर गीत मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई' गाना शुरू कर देती है। स्वर से जाहिर है कि गाने का अच्छा ज्ञान है। उसकी आंखें शंकर की झेंपती-सी आंखों से मिल जाती हैं और वह गाते-गाते एकदम से रुक जाती है। )

रामस्वरूप : क्यों, क्या हुआ? गाने को पूरा करो उमा !

गोपाल प्रसाद : नहीं-नहीं साहब, काफी है। लड़की आपकी अच्छा गाती है।

( उमा सितार खकर अंदर जाने को उठती है। )
गोपाल प्रसाद : अभी ठहर, बेटी।

रामस्वरूप : थोड़ा और बैठी रहो, उमा। (उमा बैठती है)

गोपाल प्रसाद : उमा से तो तुमने पेंटिंग भी सीखी है

उमा : (चुप).

रामस्वरूप : हाँ, वह तो मैं आपको बताना भूल ही गया। यह जो तस्वीर टंगी हुई है, कुत्ते वाली इसी ने खींची है। और वह उस दीवार पर भी।

गोपाल प्रसाद : हूं यहां तो बहुत अच्छा है। और सिलाई वगैरह?

रामस्वरूप : सिलाई तो सारे घर की इसी जिम्में रहती है, यहाँ तक कि मेरी कामीजें भी- हँ-हँ-हँ।

गोपाल प्रसाद : ठीक है....  लेकिन, हाँ बेटी, तुमने कुछ इनाम जीते हैं?

(उमा चुप। रामस्वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं, लेकिन उमा चुप है, उस तरह गर्दन झुकाए। गोपाल प्रसाद अधीर हो उठते हैं और रामस्वरूप सकपकाते हैं।

रामस्वरूप : जवाब दो उमा। (गोपाल प्रसाद से) हँ-हँ जरा शरारती है। इनाम तो इसने..
गोपाल प्रसाद : (जरा रूखी आवाज में) जरा मुँह भी तो खोलना चाहिए।

रामस्वरूप : उमा, देखो आप क्या कह रहे हैं ? जवाब दो न।

उमा : (हल्की, लेकिन मजबूत आवाज में) क्या जवाब दूं बाबू जी ! जब कुर्सी, मेज बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी, मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीददार को दिखला देता है, पसंद आ गई तो अच्छा है वरना...

रामस्वरूप : (चौक कर खड़े हो जाते हैं) उमा, उमा !

उमा : अब मुझे कह लेने दो बाबूजी ! यह जो महाशय मेरे खरीददार बनकर आए हैं, उनसे जरा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उनको चोट नहीं लगती है? क्या वह बेबस भेड़-बकरियाँ हैं? जिन्हें कसाई अच्छी तरह देख-भालकर....?

गोपाल प्रसाद : (ताव में आकर) बाबू राम स्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहां बुलाया था?

उमा : (तेज आवाज में) हाँ, और हमारी बेज्जती नहीं होती, जो आप इतनी देर से नाप तोल कर रहे हैं? और जरा अपने इस साहबजादे से पूछे कि अभी पिछले फरवरी में यह लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहां से क्यों भगाए गए थे ?

शंकर : बाबू जी चलिए।

गोपाल प्रसाद : लड़कियों के हॉस्टल में क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो?
(रामस्वरूप चुप)

उमा : जी हां, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की और न आपके पुत्र की तरह ताक-झांक कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज्जत, अपने मान का ख्याल तो है, लेकिन इनसे पूछिए कि यह किस तरह नौकरानी के पैरों पड़कर अपना मुंह छुपाकर भागे थे।

रामस्वरूप : उमा, उमा?

गोपाल प्रसाद : (खड़े होकर गुस्से में) बस हो चुका। बाबू रामस्वरूप आपने मेरे साथ दगा किया। आपकी लड़की बी.ए. पास है, आपने मुझसे कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है। लाइए......  मेरी छड़ी कहाँ है? मैं चलता हूँ ! (बेंत ढूंढकर उठाते हैं। ) बी. ए. पास उफ़्फ़ोह !  गजब हो जाता ! झूठ का भी कुछ ठिकाना है, आओ, बेटे, चलो....  (दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। )

उमा : जी हाँ, जाइए, लेकिन घर जाकर जरा यह पता लगाएगा कि आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं यानी बैकबोन, बैकबोन।

(बाबू गोपाल प्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्सा है। उनके लड़के के रुआँसापन। दोनों बाहर चले जाते हैं। बाबू रामस्वरूप कुर्सी पर धन से बैठ जाते हैं। वह सहसा चुप हो जाती है, लेकिन उसकी हँसी सिसकियां में तब्दील हो जाती है। प्रेमा का घबराहट की हालत में आना।

प्रेमा : उमा, उमा...  रो रही है।

(यह सुनकर रामस्वरूप खड़े होते हैं रतन आता है। )

रतन : बाबूजी मक्खन।

(सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।

इस प्रकार से जगदीश चंद्र माथुर ने बहुत ही लोकप्रिय नाटक की रचना यहां पर की है और जो कि सराहनीय है इस पाठ से जितने भी प्रश्न बनते हैं वह मैं आपके साथ जरूर शेयर करूंगा कमेंट करके बताएं क्या सवाल है आपके हिंदी साहित्य के बारे में यहां कक्षा 9 वीं की किताब को देखकर लिखा गया है जो कि हमारे M.A. Hindi के 1st semester regular  के सिलेबस में भी है यह रीढ़ की हड्डी नाम का नाटक जो की जगदीश चंद्र माथुर के द्वारा लिखा गया है।

उम्मीद करते हैं आप दोबारा हमारे ब्लॉक में आएंगे और ऐसे ही रोचक लेख का आनंद लेते रहेंगे इसी कामना के साथ धन्यवाद और अलविदा।

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साकेत महाकाव्य की कथा वस्तु 
आदिकाल से जुड़े प्रश्न उत्तर 

धन्यवाद इसी तरह पढ़ते रहें और अपना ज्ञान बढ़ाते रहें।

Sunday, November 10, 2019

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Questions - Ans Bhakti Kal

HELLO Welcome my Friends मेरा नाम है खिलावन और आप देख रहे हैं हमारा ब्लॉग Rexgin.in जिस पर हम आपसे हर रोज बात करते हैं। इन्हीं ज्ञानवर्धक जानकारी से जुड़े विषयों के बारे में। आज जो टॉपिक हम आपके लिए लेकर आये हैं, वह हिंदी साहित्य के इतिहास से जो की इतिहास का दुसरा चरण है और इस चरण को भक्ति काल के नाम से जाना जाता है।




इससे पहले हमने एक पोस्ट लिखा था जिसमें मैंने आपको बताया था। आदिकाल के बारे में अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो निचे दिए लिंक पर क्लिक करें और पढ़ें आदिकाल और आदिकाल से पूछे गए प्रश्न के बारे में।

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भक्तिकाल की कवयित्री मीराबाई 


आदिकाल से महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
 


    चलिए शुरू करते हैं आज का विषय जिसमें हम आपसे चर्चा करेंगे भक्ति काल से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों के बारे में आज हमारे कॉलेज में टेस्ट हुआ जिसमें इस प्रकार के सवाल पूछे गए थे उसी को मैंने आपके सामने रखा है हो सकता है की ये आपके फाइनल एक्साम में भी आ जाए तो इसे अंत तक पढ़े और जाने भक्ति काल के बारे में।
    सहीं विकल्प वाले प्रश्न इस प्रकार से थे यहाँ मैं सिर्फ उत्तर को ही लिखने वाला हूँ उसके विकल्प को नहीं तो चलिए देखें।

    प्रश्न १. अवधि भाषा के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य का क्या नाम है ?
    उत्तर - रामचरित मानस

    प्रश्न २. हिंदी साहित्य का धर्मध्वज कवि किसे कहते हैं ?
    उत्तर - तुलसीदास।

    प्रश्न ३. फना का शाब्दिक अर्थ क्या होता है ?
    उत्तर -

    प्रश्न ४. सबसे प्राचीन वेद का नाम बताइये ?
    उत्तर - ऋग्वेद।

    प्रश्न -५. मुललादाऊ की प्रसिद्ध कृति का नाम बताइये।
    उत्तर - चंदायन।

    प्रश्न ६. मीराबाई कहाँ की कवियित्री थीं ?
    उत्तर - राजस्थान।

    प्रश्न ७. सूरदास जी के गुरु का नाम लिखिए।
    उत्तर - वल्ल्भाचार्य।

    प्रश्न ८. कबीरदास जी का जन्म कहाँ हुआ था ?
    उत्तर - मगहर, कांशी नामक स्थान पर इनका जन्म हुआ था।

    प्रश्न ९. संत सुन्दरदास के गुरु का नाम लिखिए।
    उत्तर - दादूदयाल उनके गुरु का नाम था।

    प्रश्न १०. मधुमालती के रचयिता कौन थे ?
    उत्तर - मंझन नामक कवि ने इसकी रचना की थी।

    प्रश्न ११. पद्मावत क्या है ?
    उत्तर - पद्मावत एक महाकाव्य है।

    प्रश्न १२. राघव, चेतन और पंडित किस कहानी के पात्र हैं ?
    उत्तर - ये सभी पात्र पद्मावती के हैं।

    प्रश्न १३. आखिरीकलाम और चित्ररेखा किसकी रचना है ?
    उत्तर - मलिकमुहमम्द जायसी की रचना है।

    प्रश्न १४. वैराग्य संदीपनी एवं कृष्ण गीतावली किसकी रचना है ?
    उत्तर - तुलसी दास ने इसकी रचना की थी।

    प्रश्न १५. कवित्त रत्नाकर किसकी रचना है ?
    उत्तर - यह सेनापती की रचना है।

    दीर्घ उत्तरीय प्रश्न जिसको की पांच नंबर के लिए पूछा गया था। इसके उत्तर आप अपने तरिके से भी लिख सकते हैं।




    प्रश्न १. भक्तिकाल के समाजिक परिस्थितियों को समझाइये।

    उत्तर - इस काल में हिन्दू समाज की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। यह असहाय, दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहा था। स्वार्थवश या बलात्कार के कारण हिन्दू मुस्लिम धर्म स्वीकार कर रहे थे। हिन्दू कन्याओं का यवनों से बलात विवाह का क्रम चल रहा था। दास प्रथा भी प्रचलित थी। सम्पन्न मुसलमान हिन्दू कन्याओं को क्रय रहे थे। कुलीन नारियों का अपहरण कराके अमीर लोग अपना मनोरंजन किया करते थे। परिणाम स्वरूप हिन्दू जनता ने इस सामाजिक आक्रमण से बचने के लिए अनेक उपाय किये। बाल विवाह और पर्दा प्रथा इस आक्रमण से बचने का ही उपाय था। वर्णाश्रम (जाति-प्रथा) व्यवस्था सुदृढ़ हो गई थी। रोजी-रोटी के साधन छीन जाने से वह गरीब होता गया और जीविकोपार्जन के लिए मुसलमानों के सम्मुख आत्मसमर्पण करता रहा।

    इस प्रकार भक्तिकाल राजनितिक दृष्टि से युद्ध, संघर्ष और अशांति का काल था। हिन्दू-समाज पर होने वाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों का समय था।

    टीप :- ध्यान रखें यह प्रश्न आपको पांच नंबर के लिए पूछा गया है तो इसे आपको उसके हिसाब से लिखना है।

    प्रश्न २. भक्तिकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिये।

    उत्तर - भक्तिकाल का समय संवत १३५० (1350) से सम्वत १७०० (1700) तक माना गया है। यह दौर युद्ध, संघर्ष और अशांति का समय था। मुहम्मद बिन तुगलक से लेकर शाहजहां तक का शासन काल इस समय में आता है।  इस अवधि में तीन प्रमुख मुस्लिम वंशों-पठान, लोदी और मुगल का साम्राज्य रहा। छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने और साम्राज्य विस्तार की अभिलाषा ने युद्धों को जन्म दिया। इस राज्य संघर्ष परम्परा का आरम्भ सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक से आरम्भ हुआ। तुगलक के बाद सुलतान मुहम्मद शाह गद्दी पर बैठा। सन 1412 में उसकी मृत्यु के साथ तुगलक वंश समाप्त हुआ। इसके बाद लोदी वंश के बादशाहों ने साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। अंतिम बादशाह इब्राहिम लोदी था, जिसका अंत सन 1526 में हुआ। इसके बाद मुगल वंश का शासन आरम्भ हुआ। जिसमें क्रमशः बाबर, हुमायूं, अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने राज्य किया।

    मुगलवंशीय बादशाह यद्द्पी काव्य और कला प्रेमी थे, किन्तु निरंतर युद्धों, अव्यवस्थित शासन-व्यवस्था और पारिवारिक कलहों से देश में अशांति ही रही। मुगलवंशीय शासकों में अकबर का राज्य सभी दृष्टियों  से सर्वोपरि और व्यवस्थित रहा। इसका प्रभाव उसके उत्तराधिकारी शासकों पर भी रहा।

    प्रश्न ३. ज्ञानमार्गी निर्गुण काव्य की प्रमुख विशेषताओं को समझाइये।

    उत्तर - इस ज्ञानमार्गी निर्गुण काव्यधार की विशेषता इस प्रकार है -

    1. गुणातीत की ओर संकेत - निर्गुण शब्द का अर्थ गुण रहित होता है। जब इस पंथ के संतों के संदर्भ में इसे देखते हैं तो यह गुणातीत की ओर संकेत करता है।

    2. परब्रम्ह को महत्व - यह किसी निषेधात्मक सत्ता का वाचक न होकर उस परब्रम्ह के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो सत्व, रजस और तमस तीनों गुणों से अतीत है।

    3. स्वरूप वर्णन में असमर्थ - वाणी उसके स्वरूप का वर्णन करने में असमर्थ है। जो रूप, रंग, रेखा से परे है। यह निर्गुण ब्रम्ह घट-घट वासी है फिर भी इन्द्रियों से परे है। वह अवर्ण होकर भी सभी वर्णों में है। अरूप होकर भी सभी रूपों में मौजूद है।

    4. समानता का संदेश - वह अवर्ण होकर भी सभी वर्णों में है। अरूप होकर भी सभी रूपों में मौजूद है। वह देशकाल से परे है, आदि- अंत से रहित है , फिर भी पिंड और ब्रम्हांड सभी में व्याप्त है। निर्गुण भक्ति ने  समानता का संदेश दिया। निर्गुण भक्त संतों का सपना एक ऐसे समाज का निर्माण करना था, जहां किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं है।

    5. हिन्दू मुस्लिम दोनों प्रभावित - मध्य काल में हिन्दू जाति वर्णाश्रम धर्म की जटिलताओं से युक्त थी , तो इस्लाम भी धार्मिक कटटरता की भावना से ग्रस्त था। उधर उत्तर भारत में सिद्धों, नाथों के कर्मकांड के कारण सच्ची धर्म भावना का हास हो रहा था। व्यवस्था के इस दुष्चक्र में सामान्य जन लगातार पीस रहा था। दक्षिण से आनेवाली भक्ति की लहर ने हिन्दू-मुसलमान दोनों को प्रभावित किया। दक्षिण भारत में भक्ति के प्रणेता रामानंद थे और इसे उत्तर में कबीर ने प्रसारित किया।

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    Saturday, November 9, 2019

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    भक्ति काल संवत 1350 से 1700 तक


    Hello and welcome guys आज हम बात करने वाले हैं, भक्ति काल के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में और उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के बारे में।

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    हिंदी साहित्य भक्तिकाल का इतिहास 

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

    अगर हम बात करें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की तो भक्ति काल का समय सम्वत 1350 से 1700 तक माना गया है। यह दौर युद्ध संघर्ष और अशांति का समय था। मोहम्मद बिन तुगलक से लेकर शाहजहां तक का शासन काल इस समय में आता है।




    भक्ति काल का इतिहास - हिंदी साहित्य
    इस अवधि में तीन प्रमुख मुस्लिम वंशों-पठान, लोदी और मुगल का साम्राज्य रहा। छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने और साम्राज्य विस्तार की अभिलाषा ने युद्धों को जन्म दिया। अर्थात जो बड़े राजा थे वह छोटे राज्यों को हड़पने की कोशिश किया करते थे जिससे कि उनका साम्राज्य बढ़ सके और इस कारण से वहां युद्ध होने लगे तो इस राज्य संघर्ष परंपरा का आरंभ मोहम्मद बिन तुगलक से हुआ था और तुगलक के बाद सुल्तान मोहम्मद साहब गद्दी पर बैठा था। सन 1412 में उनकी मृत्यु हुई जिसके साथ ही तुगलक वंश समाप्त हो गया। इसके बाद लोदी वंश के बादशाहों ने साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया और अंतिम बादशाह इब्राहिम लोदी था। जिसका अंत 1526 में हुआ इसके बाद मुगल वंश का शासन प्रारंभ होता है मुगल वंश के शासन में जैसे कि हम सभी जानते हैं अकबर के बारे में और आगरा के ताजमहल को किसने बनवाया था शाहजहां ने तो उसी के शासनकाल में बना था। यानी कि भक्ति काल के दौरान ही यह बना था। जिसमें मुगल वंश के शासक थे बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां तो इन सभी ने भक्ति काल के दौरान राज्य किए।


    मुगल वंश के बादशाह काव्य और कला के प्रेमी थे जिसमें से ताजमहल एक बहुत ही सुंदर उदाहरण है। लेकिन उस समय जो निरंतर युद्ध चल रहे थे और जो बड़े राजा थे वह छोटे राज्यो को हड़पने में लगे हुए थे। इस कारण अव्यवस्थित शासन व्यवस्था और परिवारों में भी कलह थी। तो इस कारण से परिवारिक कलहों से देश में अशांति ही रही मुगल वंश के शासकों में अकबर का राज्य सभी दृश्यों से सर्वोपरि और व्यवस्थित रहा मुगल वंश के सभी शासकों में से मुगल के शासक मुगल वंश के शासक अकबर का जो राज्य था सभी दृष्टि से अन्य शासकों की तुलना में इसका प्रभाव उनके उत्तराधिकारी शासकों पर भी रहा। साथ ही सुब्यवस्थित शासन व्यवस्था थी। तो यह तो थी भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।

    सामाजिक परिस्थितियां

    भक्ति काल में हिंदू समाज की स्थिति अत्यंत ही सोचने लायक थी और उस समय यह हिंदू समाज असहाय दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहे थे और स्वार्थ वश वहां पर बलात्कार के कारण हिंदू धर्म स्वीकार कर रहे थे। उनकी मजबूरी हो गई थी हिंदू धर्म को अपनाने की हिंदू कन्याओं का यवनों से बलात विवाह का क्रम चल रहा था। यानी की बाल्यकाल में ही विवाह का क्रम जारी था। दास प्रथा भी प्रचलित थी और संपन्न मुसलमान हिंदू कन्याओं को, क्रय कर रहे थे यानी कि उनको खरीद रहे थे। कुलीन नारियों का अपहरण करा के वहां जो अमीर मुसलमान जो थे वे लोग अपना मनोरंजन किया करते थे।

    परिणाम स्वरूप हिंदू जनता ने इस सामाजिक आक्रमण से बचने के लिए अनेक उपाय किए बाल विवाह और पर्दा प्रथा इस पर आक्रमण से बचने का उपाय था। जो बाल विवाह उस समय कराए जाते हैं और जो पर्दा प्रथा चल रही थी उससे बचने के लिए ही वहां पर यह सभी किए जाते थे। वर्णाश्रम यानी की जाति प्रथा व्यवस्था वहां पर सुदृढ़ हो गई थी और रोजी रोटी के साधन छिन जाने से वहां गरीब होता गया और जीवन गुजारने के लिए मुसलमानों के सम्मुख आत्मसमर्पण वे करते रहे।

    अर्थात इस काल में हिंदू समाज जो था वह अत्यंत ही दुखदाई स्थिति में था।

    अब इस प्रकार हम देखे तो भक्ति काल राजनीतिक दृष्टि से युद्ध संघर्ष और अशांति का काल रहा था और हिंदू समाज पर होने वाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों का समय भी इसे हम कह सकते हैं।
    अगर आपके कोई सुझाव हो तो कमेंट में बताएं अगर कोई जानकारी में त्रुटि हो तो हमें कमेंट करके अवश्य ही अवगत कराएं धन्यवाद।

    सारांश

    इस प्रकार देखा जाए तो भक्ति काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उतनी सुदृण या सुरक्षित नहीं थी काव्य रचना (पद्ध), गद्य रचना कला के क्षेत्र में देखें तो। क्योंकि उस समय युद्ध और अशांति फैली हुई थी बड़े राजाओं द्वारा छोटे छोटे राज्यों को हड़पने के लिए और अपने साम्राज्य के विस्तार के अभिलाषा के कारण तो इस कारण से वहां काव्य और कला के क्षेत्र में कोई उन्नति देखने को हमें नहीं मिलती है और उस समय देश में अशांति व्याप्त रही। जिसके कारण भक्ति काल में वहां के कवि लोगों को भक्ति की ओर ले जाने का प्रयास करते रहे।

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    Tuesday, November 5, 2019

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    Jaishankar Prasad Jivan Prichay Aalochna Khand


    Hello and welcome आप सभी पाठकों का एक बार फिर से स्वागत आज हम बात करने वाले हैं जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य कामायनी के बारे में इसमें उसकी आलोचना खंड की चर्चा हम इस पोस्ट के माध्यम से करेंगे। मतलब यहां पर जयशंकर प्रसाद के जीवन और व्यक्तित्व के बारे में बताया गया है।

    jaishankar Prasad

    आलोचना खंड 

    जयशंकर प्रसाद : जीवन और व्यक्तित्व

    कवि का जीवन उसकी कृतियों में परोक्ष रूप से झांका करता है। जो कार्य साधारण व्यक्ति व्याख्या से करता है, उसे वह संकेत मात्र से कर लेता है। वह जिस संसार से अनुप्राणित होता है, उसकी व्याख्या भी अपने आदर्शों के अनुसार करता है। प्राचीन युग का ऋषि कवि तथा आज का स्वच्छंदतावादी कलाकार, दोनों ही अनुभूति और कल्पना से अपनी कृति का निर्माण करते हैं। विश्व के सभी महान कवियों के काव्य में उनके जीवन की छाया परोक्ष रूप से दिखाएं देती है।

    कवि प्रसाद की पितामह बाबू शिवरतन साहू काशी के अत्यधिक प्रतिष्ठित नागरिक थे। वे तंबाकू के बड़े व्यापारी थे और एक विशेष प्रकार की सुरती बनाने के कारण "सुंघनी साहू" के नाम से विख्यात थे। धन-धान्य से परिवार भरा पूरा रहता था। कोई भी धार्मिक अथवा विद्वान काशी में आता तो साहू जी उसका बड़ा स्वागत करते। उनके यहां पर प्रायः कवियों, गायकों, कलाकारों की गोष्ठी होती रहती थी। वे इतने अधिक उदार थे कि मार्ग में बैठे हुए भिखारी को अपने वस्त्र उतार कर देना साधारण सी बात समझते थे। लोग उन्हें "महादेव" कहकर प्रणाम करते थे। कवि के पिता बाबू देवी प्रसाद साहू ने पितामह का-सा ही ह्रदय पाया था।


    ऐसे वैभव पूर्ण और सर्वसंपन्न वातावरण में प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल दशमी, 1946 विक्रम संवत को हुआ था। उस समय व्यापार अपने चरम उत्कर्ष पर था, किसी प्रकार का कोई अभाव ना था। तीसरे वर्ष में केदारेश्वर के मंदिर में प्रसाद का सर्वप्रथम क्षौर संस्कार हुआ। उनके माता-पिता तथा समस्त परिवार ने पुत्र के लिए इष्ट देव शंकर से बड़ी प्रार्थना की थी। वैधनाथधाम के झारखंड से लेकर उज्जयिनी के महाकाल तक के ज्योतिर्लिंगों की आराधना के फल-स्वरूप पुत्र रत्न का जन्म हुआ।

    शिवप्रसाद के शिव के प्रसाद स्वरूप इस महान कवि का जन्म हुआ था। जीवन के प्रथम चरण में ही अपने पाणि-पल्ल्वों के लेखनी उठा लेना उसके आगामी विकास का परिचायक है। 5 वर्ष की अवस्था में संस्कार संपन्न कराने के लिए प्रसाद को जौनपुर सौंदर्य ने कवि की शैशवकालीन स्मृतियों पर अपनी छाया डाल दी। सुंदर पर्वत श्रेणियां, बहते हुए निर्झर, प्रकृति नव-नव रूप सभी ने उनके नादान ह्रदय में कुतूहल और जिज्ञासा भर दी।

    नौ वर्ष की अवस्था में प्रसाद ने 1 लंबी यात्रा की। चित्रकूट, नैमिषारण्य, मथुरा, ओमकारेश्वर, धारा क्षेत्र, उज्जैन तक का पर्यटन किया। इस अवसर पर परिवार के अधिकांश व्यक्ति भी साथ थे। चित्रकूट की पर्वतीय शोभा, नैमिषारण्य का निर्जर वन, मथुरा की वनस्थली तथा अन्य क्षेत्रों के मनोरम सौंदर्य पर वे अवश्य रीझ उठे होंगे।

    कवि के विशाल भवन के सम्मुख ही एक शिवालय है, जिसे उनके पूर्वजों ने बनवाया था। उनका परिवार शैव था। उनके अनेक अवसरों पर मंदिर में नृत्य हुआ करते थे। बालक प्रसाद भी भागवद भक्ति में तन्मय होकर भक्तों का स्तुतिपाठ करना देखते रहते थे। प्रातः काल वातावरण को मुखरित कर देने वाली घंटे की ध्वनि उनके लिए उस समय केवल एक जिज्ञासा, कुतूहल का विषय था। जीवन के आरंभ में शिव की भक्ति करने वाला कवि अंत में शैव दर्शन से प्रभावित हुआ।




    आरम्भ से ही प्रसाद की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। पिता ने घर पर संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, फारसी आदि भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था कर दी। कवि की प्रारंभिक शिक्षा प्राचीन परिपाटी के अनुसार हुई। घर पर उन्हें कई अध्यापक पढ़ाने आया करते थे।

    प्रसाद लगभग 12 वर्ष के ही थे कि 1921 में उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। घर का समस्त भार बड़े भाई शम्भुरतन पर आ पड़ा वे स्वतंत्र इच्छा के निर्भीक व्यक्ति थे। हृष्ट-पुष्ट शरीर के साथ ही उन्हें पहलवानी का शौक था। सायंकाल अपनी टमटम पर घूमने निकल जाते। रोब के कारण यदि कोई दौड़ लगाता, तो उसे पछाड़ देते। उनका ध्यान व्यवसाय की ओर अधिक न था। धीरे-धीरे उसे व्यापार में हानि पहुंचने लगी और पूर्वजों की थाती को संभालना भी कठिन हो गया।

    प्रसाद जी के पिता देवीप्रसाद की मृत्यु के पश्चात ही गृहकलह आरंभ हो गया। कुछ समय तक प्रसाद की माता ने इसे रोका, पर वह उग्र रूप धारण करता गया। शंभूरतन जी ने अपनी उदारता और सहृदयता से उसे कम करने का पूर्ण प्रयत्न किया, किंतु वह बढ़ता ही गया। अंत में प्रसाद के चाचा और बड़े भाई में मुक्केबाजी हुई। यह मुकदमा लगभग 3 से 4 वर्ष तक चलता रहा। अंत में शंभूरतन जी की विजय हुई। समस्त संपत्ति का बंटवारा हो गया। इस बीच ध्यान न देने के कारण सारा पैतृक व्यवसाय भी चौपट हो गया। अन्य व्यक्ति लूट मचा रहे थे, जब शंभूरतन जी ने बंटवारे के पश्चात अपने घर में प्रवेश किया, तब वहां भोजन आदि के पात्र न थे। इस अवसर पर प्रसाद जी ने अपने एक चित्र को बताया था कि जब कभी घर से कोई काम-काज होता था, तो दुकान का टाट उलट दिया जाता था। उसके नीचे बिखरी हुई पूंजी मात्र से वह कार्य भली-भांति संपन्न हो जाता था। जिस घर में रजत पात्रों में भोजन किया जाता था, वहीं शंभूरतन जी ने एक नवीन की हस्ती का निर्माण किया।




    दुकान के साथ ही लाखों के ऋण का भार भी शंभूरतन जी पर आ पड़ा। एक-एक करके सम्पत्ति विक्रय की जाने लगी। बनारस में चौक पर खड़ी हुई भारी इमारत भी बेंच देनी पड़ी। इन्हीं झंझटों के बीच प्रसाद की कॉलेज-शिक्षा भी छूट गई। वे आठवीं तक पढ़ सके। अब प्रसाद जी को प्रायः नारियल बाजारवाली दुकान पर बैठना पड़ता था। घर पर अब भी शिक्षा का क्रम बराबर चल रहा था। अपने गुरु रसमयसिद्ध ने उन्हें उपनिषद पुराण, वेद, भारतीय दर्शन का अध्ययन करने की प्रेरणा मिला। प्रसाद का समस्त साहित्य इसी का विस्तृत अध्ययन और चिंतन से अनुप्रमाणित है।

    बनारस चौक से दाल मंडी में जो गली दाईं ओर मुड़ती है, उसी में लगभग चार हाथ पर नारियल बाजार में  सुंघनीसाहू की दुकान थी। उसी पर प्रसाद को बैठना पड़ता।

    शंभूरतन जी शरीर की ओर ध्यान देते थे। स्वयं प्रसाद जी भी खूब कसरत करते थे। वह उन इने-गिने साहित्यकारों में से थे, जिन्हें स्वस्थ शरीर में एक स्वस्थ मस्तिष्क प्राप्त हुआ था। प्रसाद जी के पास सौंदर्य, धन और यश तीनों ही थे।

    अब प्रसाद जी का परिवार एक वैभवशाली परिवार न रह गया था। ऋण के कारण सभी कुछ समाप्त हो गया था। किसी प्रकार शम्भुरतन जी बिखरे हुए व्यापार को सुधारने का प्रयास कर रहे थे। इसी समय प्रसाद जी की माता का देहांत हो गया। कवि माता के पुनीत दुलार और स्नेह से भी वंचित हो गया। संघर्षों के बीच भी प्रसाद जी का अध्ययन चल रहा था। इसी बीच उन्होंने ब्रजभाषा में सवैया, धनाक्षरी आदि लिखना आरंभ कर दिया था।

    जयशंकर प्रसाद की अवस्था इस समय केवल सहस्त्र वर्ष वर्ष की थी। उन्हें जीवन का अधिक अनुभव न था। वे अपनी भावक्ता का आनंद हि ले रहे थे कि उन पर यह ब्रजपात हुआ। इस प्रकार केवल 5-6 वर्षों के भीतर ही प्रसाद ने तीन अवसान देखें पिता, माता और भाई। स्नेह-देवालय के महान श्रृंग गिर गए। वे अकेले ही रह गए, निः सहाय। ऐसे संकट काल में भारतीय दर्शन ने प्रसाद जी को नवीन प्रेरणा दी। सम्भवतः कामायनी का "शक्तिशाली हो विजयी बनो" उनके मस्तिष्क में उस समय गूंज उठा होगा। उनके चारों ओर विषमताएं खेल रही थी। लोग उन्हें अल्पावस्था का जानकर लूट लेना चाहते थे, पर उनके हाथों में यश था। उन्हें स्वयं अपना विवाह भी करना पड़ा। इसके अनन्तर उनके दो और विवाह हुए।

    17 वर्ष की अल्पायु में ही एक भारी व्यवसाय और परिवार का उत्तरदायित्व भावुक प्रसाद पर आ पड़ा प्रसाद जी ने अपने व्यवसाय को देखना आरंभ किया। बाहर जब भी कोई व्यापारी आता तो वे स्वयं उससे बातचीत करते।  इत्र आदि बनाने के समय वह जाकर उनका पाग देख लिया करते और इसमें तो वे कन्नौज के व्यापारियों को भी मात दे देते थे। अपने पैतृक व्यापार को संभालने का उन्होंने भरसक प्रयास किया। गृह-कलह के पश्चात व्यापार की दशा बड़ी जर्जर हो गई थी। सुँघनी साहू का काशी में अब भी वही नाम था, किंतु व्यवसाय की दृष्टि से निःसंदेह वह पीछे था। प्रसाद जी ने आजीवन अपने विगत वैभव को पाने का प्रयास किया और अंत में सभी कुछ नियति के भरोसे पर छोड़ दिया। उन्होंने धीरे-धीरे समस्त ऋण चुका दिए थे।

    बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात ही उन्होंने अपने जीवन में अनेक परिवर्तन कर लिए थे। किसी प्रकार का कोई व्यसन उन्हें नहीं था। प्रातः काल उठकर वे गंगा नदी की ओर भी भ्रमण के लिए निकल जाते थे। यदि उतना समय न होता, तो बेनियाबाग तक ही चले जाते। वहां से लौटकर कसरत करने के पश्चात ही नियमित रूप से लिखने बैठ जाते। स्नान-पूजन के पश्चात दुकान चले जाते। यहां पर भी रसिकों की मंडली जमा रहती। इसी दुकान के सामने प्रसाद जी ने एक खाली बरामदा अपने मित्रों के बैठने के लिए ले लिया था। नित्यप्रति संध्या समय वहीं पर बैठक होती थी। अच्छा खासा दरबार जमा रहता था। दुकान से लौटकर वे रात को देर तक लिखा करते थे। उनकी अधिकांश साहित्य-साधना संसार के प्रमुख कलाकारों की भांति रजनी के प्रहरों में ही निर्मित हुई।




    कवि-जीवन के आरंभ में जिन व्यक्तियों से उन्होंने विशेष प्रेरणा ली, उनमें से एक उनके पड़ोसी मुंशी कालिन्दी प्रसाद और दूसरे रीवा निवासी श्री रामानंद थे। मुंशी कालिंदी प्रसाद उर्दू-फारसी के अच्छे विद्वान थे। प्रसाद ने इन विषयों के अध्ययन में उनसे प्राप्त पर्याप्त सहायता ली थी।

    प्रसाद का साहित्यिक जीवन "इंदु" पत्रिका से प्रकाश में आया। इंदु मासिक पत्रिका थी जिसका समस्त कार्य प्रसाद की योजना के अनुसार होता था। इसके संपादक और प्रकाशक उनके भांजे अंबिका प्रसाद गुप्त थे।

    प्रसाद जी का जीवन एक साधक के समान था। किसी प्रकार की सभा आदि में जाना उन्हें प्रिय ना था। इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि वे अभिमानी थे। वास्तव में वे संकोचशील व्यक्ति थे प्रायः घर अथवा दुकान पर ही अपने मित्रों के साथ बैठकर बातचीत किया करते थे। नियमित रूप से साहित्यिक व्यक्ति उनके पास आ जाते और फिर देर रात को देर तक कार्यक्रम चलता रहता। प्रसाद दूसरों को प्रायः उत्साहित करते रहते। वे मित्रों के साथ कभी-कभी नौका विहार के लिए चले जाते और सारनाथ भी घूम आते। उनके यहां बैठे हुए व्यक्ति प्रायः एक दूसरे से हास-परिहास किया करते और उन्हें कभी-कभी बिलकुल दरबारी ढंग से काम होने लगते। इस अवसर पर भी प्रसाद जी सदा मुस्कुराया करते। स्वयं हास-परिहास अथवा बातचीत में प्रायः खुलकर भाग नहीं लिया करते थे। भांग-बूटी नित्यप्रति ही छनती थी, किंतु वे प्रायः उसका सेवन नहीं करते थे। उनमें शिष्टता और शालीनता अधिक थी। वह संयत स्वभाव के व्यक्ति थे और उनके मित्रों का कथन है कि प्रायः मुखर नहीं होते थे।

    अपने राजनीतिक जीवन में प्रसाद पूर्ण देशभक्त थे। उन्होंने स्वयं राजनीति में सक्रिय भाग नहीं लिया, किंतु अपने विचारों में वे पूर्णतया देशप्रेमी थे। कांग्रेस की अपेक्षा गांधी जी के व्यक्तित्व ने उन्हें अधिक प्रभावित किया था। वह देश भक्ति के साथ ही सांस्कृतिक उत्थान के भी पक्षपाती थे। अपने ऐतिहासिक नाटकों के द्वारा उन्होंने इसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पुनरुत्थान का प्रयास किया। भारतीय संस्कृति के प्रति मोह रखते हुए भी वे रूढ़िवादी नहीं थे जीवन में दीर्घ समय तक शुद्ध खद्दर पहनते रहे। जाती-पाती, छुआछूत, पाखंड आदि से वे कोसों दूर थे। एक बार जब उनकी जाति के व्यक्तियों ने उन्हें सभापति बना दिया तब उन्होंने उसे ऊपरी मन से स्वीकार कर लिया और बाद में तार दे दिया कि मैं न आ सकूंगा। काशी में अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर उन्होंने गांधी जी के दर्शन किए थे। शक्ति के उपासक होते हुए भी वे अहिंसा के पुजारी थे और बौध्द दर्शन की ओर अधिक झुके थे। उनकी धारणा थी कि करुणा ही मानव का कल्याण कर सकती है। आंसू में (आंसू उनके काव्य का नाम है) उन्होंने अपनी भावना का प्रतिपादन किया है। प्रसाद के संपूर्ण साहित्य में करुणा ममता का स्वर मिलता है।

    प्रसाद के सम्पूर्ण जीवन की प्रेम-घटना को लेकर विद्वानों में पर्याप्त वाद विवाद हो चुका है। कुछ लोग तो अनर्गल धारणाएं बना लेते हैं। इसमें संदेह नहीं कि "आंसु" के वियोग-वर्णन के मूल में कोई अलौकिक आलंबन है। उसकी अनुभूति इतनी प्रत्यक्ष है कि उससे कवि की व्यक्तिक भावना का स्पष्ट परिचय मिल जाता है। उनके साहित्य में बिखरी हुई प्रेम और अतृप्ति की भावना इसका प्रमाण है कि जीवनानुभूति में कोई ऐसा प्रसंग अवश्य था, किंतु प्रसाद के काव्य में उक्त भावना का उदात्तीकरण भी होता गया है और अंत में वह वैयक्तिक घटना उच्चतर मानसिक और दार्शनिक भूमि पर रखी जा सकी है। उनके परवर्ती काव्य को देखने से पता चलता है कि सौंदर्य और प्रेम के विषय में उनकी बड़ी उदात्त भावना थी। प्रसाद ने अपने जीवन में अनेक उत्थान-पतन देखे थे। वैभव और अकिंचनता एक साथ उनके जीवन में आए थे। रजतपात्रों में भोजन करने वाले प्रसाद को अनेक वर्ष तक ऋणी रूप में रहना पड़ा। उनके आंतरिक जीवन में भी यही स्थिति थी। तीन-तीन नारियों का उनके जीवन में समावेश हुआ था। माता का दुलार उनसे यौवन के आरंभ के पूर्व ही विदा ले चुका था। मां के चले जाने के पश्चात जीवन पर्यंत उन्होंने अपनी भाभी की पूजा की। कवि के साहित्य पर दृष्टिपात से इतनी करने से इतना अनुमान अवश्य होता है कि उसे अपने जीवन में अधिक प्रेम और स्नेह मिला था।

    प्रसाद जी की रचनाएं-

    • कानन कुसुम 
    • प्रेम पथिक
    • आंसू
    • झरना
    • लहर
    • कामायनी
    इन्हें भी पढ़ें अगर मन है तो-

    Thursday, October 31, 2019

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    मेरे सभी पाठकों का एक बार फिर से स्वागत है आज हम आपको हमारे कॉलेज में लिए गए परीक्षा में पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर के बारे में बताने वाले हैं हो सकता है ये आपके लिए उपयोगी हों और यह मुख्य परीक्षा में भी पूछे जा सकते हैं। तथा यह आपके कॉम्पिटिशन परीक्षा के लिए भी उपयोगी हो सकता है। ये प्रश्न इस प्रकार है -




    aadikal veergatha kal ke mahatvpurn prashn uttar

    आदिकाल या वीरगाथाकाल से लिए गए प्रश्न और उनके उत्तर 

    अति लघु उत्तरीय प्रश्न

    प्रश्न 1. हिंदी का आदि कवि किसे माना जाता है?
    उत्तर - स्वयंभू।

    प्रश्न 2. हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य किसे कहा जाता है।
    उत्तर - पृथ्वीराज रासो।

    प्रश्न 3. देवताओं की लिपि किसे कहा जाता है?
    उत्तर - देवनागरी लिपि।

    प्रश्न 4. संसार की सबसे प्राचीन भाषा का नाम क्या है?
    उत्तर - संस्कृत।

    प्रश्न 5. रामचंद्रिका किसकी रचना है?
    उत्तर - केशवदास।

    प्रश्न 6. नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक किसे माना जाता है?
    उत्तर - आदिनाथ।

    प्रश्न 7. हिंदी साहित्य का प्रथम कवि किसे माना गया है?
    उत्तर - स्वयंभू।

    प्रश्न 8. हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का पहला सफल प्रयास किसने किया ?
    उत्तर - जॉर्ज ग्रियर्सन।

    प्रश्न 9. हिंदी साहित्य का इतिहास किसने लिखा?
    उत्तर - आचार्य रामचंद्र शुक्ला




    प्रश्न 10. त्रिपिटक किनका महाग्रंथ है?
    उत्तर -  बौद्ध धर्म का।

    प्रश्न 11. कौटिल्य ने किस ग्रंथ की रचना की थी?
    उत्तर - अर्थशास्त्र।

    प्रश्न 12. आधुनिक हिंदी भाषा का विभव किससे माना जाता है?
    उत्तर - अपभ्रंश के द्वारा

    प्रश्न 13. अपभ्रंश का दुलारा छंद कौन सा है?
    उत्तर - दोहा चौपाई।

    प्रश्न 14. अधिकार का राजनीतिक परिवेश कैसा था?
    उत्तर - पतन का।

    प्रश्न 15. श्रावक 4 किसकी रचना है?
    उत्तर - आचार्य समन्तभद्र।

    प्रश्न 16. महामुद्रा किसे कहते हैं?
    उत्तर -  
    महामुद्रा बौद्ध धर्म के साधकों द्वारा की जाने वाली एक कठिन साधना है। जिसमें स्त्रियों का उपभोग किया जाता था। 
    प्रश्न 17. विजयपाल रासो किसकी रचना है?
    उत्तर - नल्लसिंह भाट

    प्रश्न 18. खम्माण रासो के रचयिता कौन थे?
    उत्तर - दलपति विजय।




    प्रश्न 19. संदेश रासो के रचयिता क्या है नाम बताइए।
    उत्तर - अब्दुर्रहमान।

    प्रश्न 20. उपदेश रसायन रास के रचयिता के नाम बताइए
    उत्तर -  श्री जिनदत्त सूरी।  

    लघु उत्तरीय प्रश्न

    प्रश्न 1. इतिहास की पुनर्लेखन की समस्या पर अपना विचार व्यक्त कीजिए !
    उत्तर -

    प्रश्न 2. वीरगाथा काल की प्रमुख प्रवृत्तियों का वर्णन कीजिए।
    उत्तर - चाटुकारिता - इस काल में कवि धन, उपहार एवं सम्मान के लालच में आश्रयदाता राजाओं की चाटुकारिता की प्रवित्ति पायी जाती थी जो की उस समय की रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।
    कल्पना की प्रधानता - इस काल के कवियों में राष्ट्रीय भक्ति का आभाव था लेकिन उनमें कल्पना करने की प्रवित्ति बहुत ज्यादा मात्रा में व्याप्त थी।
    आंखोदेखा रचना - इस काल के कवि केवल वीर रस की रचना ही नहीं किया करते थे बल्कि वे युद्ध के स्थान पर जाकर वहां कि स्थिति को देखकर उनका वैसा ही वर्णन किया करते थे।

    प्रश्न 3. आदिकाल की सांस्कृतिक परिवेश को समझाइए
    उत्तर - हर्षवर्धन के समय हिंदू संस्कृति की उन्नति अपने शिखर पर थी सभी कलाओं में धार्मिक छाप देखी जा सकती थी। मुसलमानों के आगमन के साथ ही भारतीय संस्कृति पर मुस्लिम प्रभाव भी देखा जाने लगा था, हिंदू मुस्लिम साथ रहते हुए भी एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखते थे किंतु उत्सव और सांस्कृतिक प्रमुख पर्वों में हिंदू संस्कृति का प्रभाव अधिक था। इस प्रकार जहां एक और परंपराओं का मिलाजुला रूप उभर कर सामने आ रहा था वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति और साहित्य के लिए सुदृढ़ पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी।
    इस प्रकार का सुखद परिवेश उस समय देखने को मिलता है।




    प्रश्न 4. सिद्ध साहित्य पर प्रकाश डालिए।
    उत्तर - सिद्ध साहित्य का तात्पर्य वज्रयानी परंपरा के उन सिद्ध आचार्य के साहित्य से है जो अपभ्रंश दोनों तथा चर्यापदों के रूप में उपलब्ध हैं और जिन्होंने बौद्ध तांत्रिक सिद्धांतों को मान्यता दी है। शैव नाथपंथियों को भी सिद्ध कहा जाता था जो उन्हीं के समकालीन थे। किंतु बाद में शैव  योगियों के लिए नाथ और बौद्ध तांत्रिकों के लिए सिद्ध कहा जाने लगा। सिद्धों की रचनाएं प्रायः दोहा कोश और चर्यापदों के रूप में मिलती है। दोहा कोश दोहों से युक्त चतुष्पदियों की कड़क शैली में मिलते हैं।  कुछ दोहे टिकाओं में उपलब्ध हैं और कुछ दोहागीतियां बौद्ध तंत्रों और साधनाओं में मिलते हैं। चर्यापद बौद्ध तांत्रिक चर्या के समय गाए जाने वाले पद हैं जो विभिन्न सिद्धाचार्यों के द्वारा लिखे गए हैं।
    सिद्धों का संबंध बौद्ध धर्म की ब्रजयानी शाखा से है।  यह भारत के पूर्वी भाग में सक्रिय थे।  इनकी संख्या 84 मानी जाती है जिनमें सरहप्पा, शबरप्पा, लुइप्पा, डोम्भिप्पा, कुक्कुरिप्पा आदि मुख्य हैं।  सरहप्पा प्रथम सिद्ध कवि थे।  उन्होंने ब्राह्मणवाद, जातिवाद और बाह्यचारों पर प्रहार किया।  देहवाद का महिमा मंडन किया और सहज साधन पर बल दिया।  यह महासुख वाद द्वारा ईश्वरत्व की प्राप्ति पर बल देते हैं।

    प्रश्न 5. रासो साहित्य से आप क्या समझते हैं?
    उत्तर - हिंदी साहित्य में 'रास' या 'रासक' का अर्थ लास्य से है जो नृत्य का एक भेद है।  अतः इसी अर्थ के आधार पर गीत नृत्य परक रचनाएँ 'रास' के नाम से जानी जाती हैं ' रासो ' या ' राउस ' में विभिन्न प्रकार के अडिल्ल, ढूसा, छप्पर, कुंडलियां पद्धटिका आदि छंद प्रयुक्त होते हैं इस कारण ऐसी रचनाएं ' रासो ' के नाम से जानी जाती हैं।
    रासो गानयुक्त परम्परा से विकसित होते होते उपरूपक और  उपरूपक से वीर रस से पद्यात्मक प्रबंधों में परिवर्तित हो गया है। इस रासो काव्य में युद्ध वर्णन से भरा हुआ रचना है।

    दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

    प्रश्न 1. आदिकाल के नामकरण की समस्या पर प्रकाश डालिए।
     उत्तर - हिंदी साहित्य के इतिहास के काल विभाजन के नामकरण को देखा जाए तो इसे नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा आचार्य रामचंद्र के द्वारा किये गए काल विभाजन को स्वीकार किया गया और उन्होंने इसे चार भागों में बांटा था। आदिकाल प्रथम भाग है तथा शेष क्रमश: भक्तिकाल , रीतिकाल और आधुनिक काल हैं। और इसी प्रकार के काल विभाजन को इस सभा ने मान्य किया।
    काल विभाजन के संबंध में विद्वानों के मत
    जार्ज ग्रियरसन - इन्होंने ने ही सबसे पहले काल विभाजन का प्रयास किया और इनके अनुसार इन्होने आदिकाल को चारण काल का नाम दिया और इन्होने ने इसका आरम्भिक समय 700 से 1300 ई. तक माना है।
    मिश्रबंधुओं के अनुसार - मिश्रबंधुओं ने इस काल को आरम्भिक काल का नाम दिया और यह ग्रियरसन के काल विभाजन से कहीं अधिक प्रोढ़ था। इन्होने इसे आरम्भिक काल का नाम दिया था।
    इसके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे 1920 में वीरगाथा काल का नाम दिया और यह आज भी उपयोग में लाया जाता है।
    साहित्य के इतिहास के प्रथम काल का नामकरण विद्वानों ने इस प्रकार किया है -
    1. डॉ. ग्रियर्सन - चारणकाल
    2. मिश्रबन्धु - प्रारम्भिक काल
    3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल - वीरगाथाकाल
    4. राहुल संकृत्यायन - सिद्ध सामंत युग
    5. महावीर प्रसाद द्वेदी - बीजवपन काल
    6. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र - वीरकाल
    7. हजारी प्रसाद द्वेदी - आदिकाल
    8. रामकुमार वर्मा - चारण काल




    इस प्रकार सभी विद्वानों के मत अलग अलग हैं जैसे की आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने इसे वीरगाथा काल इसलिए कहा क्योकि इस समय वीरगाथात्मक ग्रंथों की प्रधानता थी। आचार्य ने यहां पर 12 रचनाओं का वर्णन किया जिसमें कुछ इस प्रकार हैं -

    1. विजयपाल रासो - नल्लसिंह कृत सं. 1355 
    2. हम्मीर रासो - शार्ङधर की रचना 1357 
    3. कीर्तिलता - जिसके रचनाकार हैं -विद्यापति सं. 1460 
    4. कीर्तिपताका - विद्यापति 1460 की रचना है। 
    5. खुमाण रासो - दलपति विजय ने इसकी रचना 1180 
    6. बीसलदेव रासो - नरपति नाल्ह ने इसकी रचना 1212 में की थी। 
    7. पृथ्वीराज रासो - चंद बरदाई ने इसकी रचना 1225-1249 के लगभग किया था। 
    8. जयचंद्र प्रकाश - भट्ट केदार के द्वारा रचित सन 1225 में प्रकाशित काव्य। 
    9. जयमयंक जस चंद्रिका - मधुकर कवि ने इसकी रचना की थी यह 1240 सम्वत की रचना हैं। 
    10. परमाल रासो - की रचना जगनिक ने की थी यह सं. 1230 की रचना है। 
    11. खुसरों की पहेलियाँ - इसकी रचना अमीर खुसरो ने की थी सं. 1350 में 
    12. विद्यापति की पदावली - इसे खुद विद्यापति ने सं. 1460 में लिखा था। 
    इस प्रकार इस काल को लेकर विद्वानों में इश्पष्ठ्ता का आभाव है। आचार्य महाविर प्रसाद द्वेदी के अनुसार।
    यह काल तो पूर्ववर्ती परिनिष्ठित अपभृंश की साहित्य प्रवित्तियों का विकास है। 

    आज इस लेख में बस इतना ही मिलते हैं अगले पोस्ट के साथ कोई सुझाव हो तो अवश्य बताएं।