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Thursday, September 19, 2019

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Hello Dosto my is Rajesh aaj Mai apko chhattisgarah ke bare me batane Wala hu kuch jaruri baten mera topic financial and education ke upar hoga.

To sabse pahle financial topic par bat karte hai..

Chhattisgarah GDP

Chhattisgarah GDP (Grass Domestic product)

Hamare state ka GDP 3.64 lakh crore (2018-19) hai, jabki madhya Pradesh ki GDP 8.26 lakh crore aur uttar Pradesh ki GDP 15.80 lakh crore hai. India ki bat kare to 2.848 trillion hai isse pata chalta hai ki chhattisgarah ki GDP kitni Kam hai other states ke comparison. Asan language me kahne to kisi desh ki GDP adhik ho to us country ki financial condition achcha hota hai.

Chhattisgarah ki GDP other states ke comparison bahut Kam hai ishka Karan yaha par manufactur and service rate bahut hi Kam hai iske like C.G me naye naye industry and services ki jarurat hai ishse yaha ki GDP rate badegi iske like mere sabhi young brather ko naye skills shikhne ki jarurat hai aur Jo Bhai apna business kar sakte hai uske like ham naye naye business idea share karenge. Youth ko bolna chahunga ki Kam Karne ki lalak honi chahiye yaar job mill hi jayega nahi Mila to apana kuch idea lagaw, naye naye skills shiko yar dekhna 10 years bad aapka life change ho jayega sath me C.G ka bhi.

Chhattisgarah per capita

Iska Matlab ek states ki per people income se hai per capita kisi desh ki Puri income ko sabhi logo me devid kar nikala jata hai. Chhattisgarah ki per capita 2017-18 me 102762 tha jabki sabse jyada Goa ka 375,554 uske bad Delhi ka per capita 329,093 hai. Per capita se state ki people ki lifestyle per effect  padta hai.




Chhattisgarah GDP growth rate

Chhattisgarah GDP growth rate

GDP growth rate desh ki future ko darsata hai agar GDP Growth rate achi hai to vaha country Future me develop country ban jata hai. Abhi 2017-18 ke acordacco cg ki GDP growth rate 11.2% hai. Sath hi sath other states ki bat
Karu to rajisthan ki 24.7% hai aur madhya Pradesh ki 7.7% hai, jish state me opportunity jyada hoti hai vaha GDP growth rate adhik hota hai.

Chhattisgarah education system

Hamare state me pahle se hi education kafi weak raha hai. Cg me school to hai lekin teachers ki kami hai aur village me to education ki quality achhi nhi hai. Student ki achi education nhi mil pati hai chhattisgarah me 2011 ke according 71.04% hai. Vahi bat ki Jaye kerla ki to 93.91% hai jabki India ka education persent 74.04 % hai. Government ko education per focus karna chahiye education hi state ki GDP per capita ko badha sakta hai indarectaly aur state bhi grow karega dekha Jaye to cg me naam matra ka education system hai.

Chhattisgarah University

Chhattisgarah University

Hamare state me 25 University hai lekin ek bhi University top level ki nhi hai yaha government college me sabhi subject according practical saman bhi nhi hota hai. Student Kai college me regular padte to hai lekin only exam ke liye hi college jate hai.




Government college me opportunity ka abhav hota hai yahi Karan hai ki student private college me education Lena pasand karte hai.

This information sorce is weakipeadia

Saturday, December 22, 2018

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साथियों आप सभी का स्वागत है मेरे ब्लॉग पर आज हम बात करने वाले हैं छत्तीसगढ़ी भाषा के वर्गीकरण के बारे में तो चलिए शुरू करते हैं छत्तीसगढ़ की बोलियों के बारे में इससे पहले मैंने आपको बताया था।

छत्तीसगढ़ी भाषा के उद्भव एवं विकास के बारे में  अगर आपने वह पोस्ट नहीं पढ़ा है तो पढ़ ले और आगे बढ़ें क्योंकि हम अभी लगातार छत्तीसगढ़ी व्याकरण के बारे में टॉपिक पोस्ट कर रहे हैं जिससे आपको कंपटीशन एग्जाम्स में पूछे जाने वाले Question के बारे में और अधिक जानकारी मिलेगी।

छत्तीसगढ़ की बोलियां

छत्तीसगढ़ की बोलियां

छत्तीसगढ़ अपनी एक अलग पहचान रखती है, पूरे भारत में और छत्तीसगढ़ की अपनी एक बोली है जिसे हम छत्तीसगढ़ी के नाम से जानते हैं छत्तीसगढ़ी बोली बहुत ही सुंदर एवं लोकप्रिय होते जा रहा है क्योंकि एक हिंदी पिक्चर दिल्ली 6 में इसे लिया गया था। जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे।

सास गारी देवे ,ननद समझा लेवे ,ससुराल गेंदा फूल।  





जो गाना बहुत ही लोकप्रिय हुआ था लेकिन आज हम जो टॉपिक पढ़ रहे हैं वह फिल्म से हटकर है आज हम जो टॉपिक पढ़ रहे हैं वह छत्तीसगढ़ी व्याकरण से जुड़ा हुआ है तो चलिए सबसे पहले मैं आपको इसके बारे में थोड़ा बहुत जानकारी दे दूं फिर उस टॉपिक के अंदर गहराई में चलेंगे कि उसको कितने वर्गों में बांटा गया छत्तीसगढ़ी भाषा को।

  • छत्तीसगढ़ में लगभग 99 बोली को व्यवहारिक रूप से प्रयोग किया जाता है छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा या बोली वह है छत्तीसगढ़ी और हल्दी जो कि ज्यादातर प्रयोग होते हैं।
  • देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में मैदानी इलाकों में मुख्यतः आर्य भाषा समूह का प्रयोग होता है और ज्यादातर जनजातिय द्रविड़ भाषा समूह मुंडा भाषा समूह की बोलियां प्रचलित है।
  • और इस प्रकार से व्याकरण के ज्ञाताओं ने छत्तीसगढ़ की बोलियों को मुख्यतः तीन भाषा परिवारों में बांटा जो कि आपके सामने हैं
chhattisgarhi bhasha ka munda parivar vargikaran

chhattisgarhi bhasha ka dravin parivar

chhattiisgarhi bhasha ka aarya parivar




छत्तीसगढ़ की भाषाओं को विभाजित करने के आधार


  • छत्तीसगढ़ी रायपुरी बिलासपुरी रूपों को पृथक का का मोल आधार जो प्रदान करता है वह शिवनाथ नदी है इन इन दोनों संभाग की सीमा रेखा बनाती है शिवनाथ नदी।
  • छत्तीसगढ़ में भाषा का वर्गीकरण करते समय ग्रियर्सन ने छत्तीसगढ़ी भाषा के वर्गीकरण का स्थान नहीं दिया है बल्कि इसे मराठी से युक्त करते हुए छत्तीसगढ़ी उड़िया तथा मराठी का एक मिश्रित रूप बताया है जो हमारी भाषा जो है वह अन्य भाषाओं से मिलकर बनी है। 
  • खल्हाती और बस्तर बोली का वर्गीकरण प्राकृतिक आधार पर किया गया है। 
  • सरगुजिया और सदरी कोरबा बोलियों का विभाजन का आधार पर पर्वत मालाये है। 
  • बैगानी , बिझवारी, कलंगा, भूलिया बोलियों के वर्गीकरण का आधार जातिगत है। 

''छत्तीसगढ़ राज्य का गठन''





छत्तीसगढ़ी विभाषाओं का वर्गीकरण -

ग्रियर्सन के अनुसार-

  • ग्रियर्सन ने भारत का भाषा सर्वेक्षण में भारतीय भाषाओं का सर्वोत्कृष्ट विश्लेषण किया है। ग्रियर्सन ने हिंदी प्रदेश को पूर्वी हिंदी के अंतर्गत केवल दो बोलियों अवधी और छत्तीसगढ़ी को शामिल किया है। 
  • उन्होंने छत्तीसगढ़ी बोली का वर्गीकरण क्षेत्रीय एवं जातीय आधार पर किया है-
  • क्षेत्रीय आधार पर - छतीसगढ़ी, खल्हाटी, सरगुजिया। 
  • जातीय आधार पर - सादरी, कोरवा, बैगानी, बिंझवारी,कलंगा। 
  • ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण के अनुसार समस्त छत्तीसगढ़ी भाषाओं की संख्या 37,55,343 थी। 


डॉक्टर ग्रियर्सन ने छत्तीसगढ़ी भाषा को नौ भागों में बांटा है जो की इस प्रकार है-

  • बिलासपुरी छत्तीसगढ़ी
  • कवर्धा छत्तीसगढ़ी
  • खैरागढ़ी छत्तीसगढ़ी
  • खल्हाटी छत्तीसगढ़ी
  • सदरी कोरवा छत्तीसगढ़ी
  • बैगानी छत्तीसगढ़ी
  • कलंगा छत्तीसगढ़ी
  • बिंझवारी छत्तीसगढ़ी 
  • सरगुजिया छत्तीसगढ़ी

भौगोलिक आधार पर छत्तीसगढ़ी का वर्गीकरण

  • उत्तरी छत्तीसगढ़ी  ( भंडार छत्तीसगढ़ी )
  • पूर्वी छत्तीसगढ़ी   ( उत्ती छत्तीसगढ़ी )
  • दक्षिणी छत्तीसगढ़ी  ( रक्सहु छत्तीसगढ़ी )
  • पश्चिमी छत्तीसगढ़ी  ( बुडती छत्तीसगढ़ी )
  • मध्य छत्तीसगढ़ी  ( केंदरी छत्तीसगढ़ी )

डॉक्टर नरेंद्र वर्मा के अनुसार छत्तीसगढ़ी भाषा का वर्गीकरण इस प्रकार उन्होंने वर्गीकृतग किया है -

  1. छत्तीसगढ़ी 
(अ) रायपुरी
(ब) बिलासपुरी
  1. ख़ल्टाही 
  2. लरिया
  3. सरगुजिया
  4. सदरी कोरवा
  5. बैगानी
  6. बिंझवारी
  7. कलंगा
  8. भूलिया
  9. बस्तरी व हल्बी

1961 ई. में की गयी जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की मातृभाषाएं इस प्रकार थी-

  • बैगानी 
  • भूलिया
  • बिलासपुरी
  • बिंझवारी
  • छत्तीसगढ़ी
  • देवार
  • धमदी
  • गौरिया
  • गोरी
  • कांकरी
  • लरिया
  • नागवंशी
  • पंडो
  • पनकी
  • सतनामी
  • सरगुजिया


Saturday, October 27, 2018

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छत्तीसगढ़ का परिचय -

 छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित है
इस राज्य का अस्तित्व 1 नवंबर सन 2000 को राज्य के रूप में हुआ!

इस राज्य का कुल क्षेत्रफल 135198 वर्ग किलोमीटर है इस राज्य में 27 जिले हैं!



छत्तीसगढ़ की सीमाएं -

 इस राज्य के दक्षिण में आंध्र प्रदेश पूर्व एवं उत्तर पश्चिम में मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश पश्चिम में महाराष्ट्र उत्तर पूर्व में उड़ीसा झारखंड स्थित है!

छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदियां - महानदी, खारुन नदी, अर्पा, pairi, हसदो और शिवनाथ है!

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति -

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति हमेशा से संपन्न रही हैं यहां पर विभिन्न अवसरों पर सुआ, करमा, नाचे, पंथी, नृत्य आदि किए जाते हैं!

धार्मिक नृत्य में जवारा, माता सेवा के नृत्य रहे हैं!

छत्तीसगढ़ भाषा -

मध्य काल में छत्तीसगढ़ के अनेक अंचलों में छत्तीसगढ़ी स्थानीय बोली के रूप में प्रचलित था

 वर्तमान में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है

प्रमुख कला केंद्र - छत्तीसगढ़ी कला के अनेक प्रमुख केंद्र है,
जैसे रतनपुर, शिरपुर राजिम, भोरमदेव, मल्हार, बस्तर और जगदलपुर आदि!

छत्तीसगढ़ की प्रमुख व्यवसाय -

 मुख्य व्यवसाय कृषि यहां के अनेक लोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय लघु उद्योग एवं कृषि के माध्यम से करते थे


छत्तीसगढ़ के प्रमुख तीर्थ स्थल -

शिरपुर, आरंग, दंतेवाडा, रतनपुर ,शिवरीनारायण, राजिम, खल्लारी,  डोंगरगढ़ आदि स्थल है!

1. छत्तीसगढ़ देश का धान का कटोरा है

2. छत्तीसगढ़ राज्य का कुल क्षेत्रफल 135191 वर्ग किलोमीटर है!

3. छत्तीसगढ़ के गठन 1 नवंबर 2000 में हुआ!

4. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर है!

5. महानदी छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा के नाम से जानी जाती है!

6. छत्तीसगढ़ उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला प्रदेश है!

Friday, October 26, 2018

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छत्तीसगढ़ : सामान्य ज्ञान
                   छत्तीसगढ़ की : मूलभूत जानकारी
1.भारतीय संघ मे राज्य का स्थान
2.स्थापना
3.भौगोलिक स्थिति
4.भौगोलिक सीमा
5.अधिकतम सीमा वाला राज्य
6.न्यूनतम सीमा वाला राज्य
7.जलवायु
8.राज्य की लम्बाई
9.राज्य की चौडाई
10.राजधानी
इन सभी का उत्तर =26 वा
1 नवम्बर,2000

17*46' उत्तरी अक्षांस से 24*5' उत्तरी अक्षांस तक तथा 80*15' पूर्वी देसांतर से 80*20' पूर्वी देशान्तर के मध्य तक ।                                                          6 राज्य (झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश)                                                                     ओडिसा
उत्तर प्रदेश
मुख्यतः उष्णाद्र तथा अर्ध आद्र प्रकार की
पूर्व से पश्चिम की ओर 140 किमी


उत्तर से दक्षिण की और 360 किमी
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प्रस्तावित नई राजधानी - नया रायपुर(कुठेर भाटा राखी गांव के समीप)
राजकीय पशु - वन भैंसा( बैबुलस ब्यूबैलिस )
राजकीय पक्षी - बस्तरिया पहाड़ी मैना ( ग्रेटि पेनिन्सुलेरिस )
राजकीय वृक्ष - साल
राज्य भाषा - हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाएँ ( प्रमुखतः छत्तीसगढ़ी )
राज्य फसल - धान
राज्य खेल - हॉकी
उच्च न्यायालय - बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय )
क्षेत्रफल - 1,35,194 वर्ग किमी ( भारत के कुल क्षेत्रफल का 4.11% )
संभाग - 5 ( बिलासपुर,रायपुर,दुर्ग,बस्तर एवं सरगुजा )
जिले - 27
ग्राम - 20126
जिला पंचायत - 18
जनपद पंचायत - 146
आदिवासी विकासखंड - 85
ग्राम पंचायत - 9,734
विकास खंड - 146
तहसील --149
नगर - 182
नगर निगम - 10 (रायपुर,बिलासपुर,दुर्ग,भिलाई,कोरबा,राजनान्दगांव,जगदलपुर,राजगढ़,अम्बिकापुर,चिरमिरी)
नगर पालिका - 32
नगर पंचायत - 127
पुलिस रेंज - 4
पुलिस जिले - 20
मेजरो-टोलो-पारों की संख्या - 72 हजार
जनगड़ना नगर - 14
जनसंख्या - 2,55,40,196 (जनसंख्या की दृस्टि से देश का 16 वाँ राज्य ) ( वर्ष 2011 की जनगड़नानुसार )
लिंगानुपात - 991 प्रति हजार पुरुषों पर
जनसंख्या घनत्व - 189 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी
अनुसूचित जाती - 24,18,722 (2001)
अनुसूचित जनजाति - 57,17,596 (20001)
सर्वाधिक जिलों वाला सम्भाग - रायपुर (10)
क्षेत्रफल मे सबसे बड़ा संभाग - बस्तर
क्षेत्रफल मे सबसे छोटा संभाग - बिलासपुर
जनसंख्या मे सबसे बड़ा संभाग - रायपुर
जनसंख्या मे सबसे छोटा संभाग - सरगुजा
क्षेत्रफल मे सबसे बाद जिला - राजनांदगाँव
क्षेत्रफल मे सबसे छोटा जिला - दुर्ग
जनसंख्या मे सबसे बड़ा जिला - बिलासपुर
जनसंख्या में सबसे छोटा जिला - सुकमा
प्रति व्यकि आय - ₹34,483 (2008-2009)
विद्युत उत्पादन - 7,8070.22 (मिलियन यूनिट)
विधानसभा क्षेत्र - 90 (सामान्य-54, अनुसूचित जाती-10 एवं अनुसूचित जनजाति-29)
लोकसभा क्षेत्र - 11 (सामान्य-6, अनुसूचित जाती-1, अनुसूचित जनजाति-4 )
राज्यसभा क्षेत्र - 5
वन क्षेत्र - 59,772 वर्ग किमी (44.2%)
देश के कुल वन क्षेत्र का राज्य में स्थित भाग - 12.2% (देश में तीसरे स्थान पर )
सर्वाधिक वन वाला जिला - सरगुजा
न्यूनतम वन वाला जिला - जांजगीर-चांपा
वर्षा - 1,328.88 मिमी
कृषि योग्य भूमि - 51.6%
शुध्द सिंचित क्षेत्र - 28%
शुद्ध बोया गया क्षेत्र - 4696 हजार हेक्टेयर
कुल बोया गया क्षेत्र - 5671 हजार हेक्टेयर
शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल - 1355 हजार हेक्टेयर
कुल सिंचित क्षेत्रफल - 1604 हजार हेक्टेयर
प्रमुख फसल - धान
टमाटर राजधानी - लुड़ेग
बहुउद्देशीय परियोजना - बांगोहसदो नदी
प्रमुख कारखाने - भिलाई स्टील प्लाण्ट,बाल्को,एन.टी.पी.सी.,सीमेन्ट फैक्ट्री
प्रमुख आय-स्रोत - धान,वन सम्पदा एवं खनिज सम्पदा
प्रमुख उध्धोग क्षेत्र - भिलाई ,बैलाडीला, कोरबा
रेलमार्ग - 1,108 किमी
कुल सड़क मार्ग - 33448.75 किमी
राष्ट्रीय मार्ग - 2,226 किमी (11 राष्ट्रीय राजमार्ग)
राज्य उच्च पथ - 5240 किमी
जिला सड़क - 10539.80 किमी
ग्रामीण सड़क-मार्ग - 15442.95 किमी
हवाई अड्डा - रायपुर (माना एयरपोर्ट)
हवाई पट्टी - 9 (भिलाई, बिलासपुर, कोरबा, रायगढ़, जगदलपुर, अम्बिकापुर, रायपुर,जशपुर नगर एवं सारंगगढ़)
विश्वविधालय - 10
कृषि विश्वविधालय - 1 (इंदिरा गांधी कृषि विश्वविधालय,रायपुर)
संगीत विश्वविधालय - 1 (इंदिरा संगीत विश्वविधालय, खैरागढ़)
इंजीनियरिंग महाविद्धालय - 16
पॉलिटेक्निक विद्यालय - 14
मेडिकल कॉलेज - 3
पशु चिकित्सा महाविद्धालय - 1( पशु चिकित्सा महाविद्धालय,अंजोरा,दुर्ग)
उद्धानिकी महाविद्धालय - (दंतेश्वरी उद्धानिकी महाविद्धालय,रायपुर)
जिला अस्पताल - 16
प्रमुख नदियां - महानदी,गोदावरी,नर्मदा,रिहन्द एवं इंद्रावती आदि
राष्ट्रीय उद्धान - 3 (इंद्रावती,कांकेर,घाटी,गुरु घासीदास)
वन्यजीव अभयारण - 11
प्रमुख धर्म - हिन्दू (88.68%)
आदुवासी समूह - 42
सर्वाधिक बड़ा आदिवासी समूह - गोण्ड
सर्वाधिक बड़ा नगर - रायपुर
सर्वाधिक बड़ी नदी - महानदी
सर्वाधिक उचि चोटी - गोरलाटा, सामरीपाट (सरगुजा) (1,225 मी)
सर्वाधिक उचा बांध - मिनीमाता बांगो परियोजना ,हसदो नदी (87 मी)
राज्य का प्रमुख ध्येय वाक्य - "सत्य तथा पारदर्शिता"
राज्य पुलिस वाक्य - "परित्राड़ाय साधुनाम"
राज्य नगर सेना वाक्य - "निष्काम सेवा"
राज्य का स्वास्थ्य नारा - "समृद्ध और स्वस्थ छत्तीसगढ़"
        इस जानकारी को मेरे द्वारा सामान्य ज्ञान को पढ़ कर लिखा गया है कोई भी त्रुटि होने पर मुझे मेल करें ।
मेरा gmail- khilawan9patel@gmail.com
                            धन्यवाद

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राज्य के सम्भाग
सन् 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के समय राज्य में तीन सम्भाग रायपुर, बिलासपुर तथा बस्तर हैं, जिन्हे अप्रैल 2008 में पुनर्गठन करके राज्य में चार सम्भाग रायपुर, बिलासपुर, बस्तर, तथा सरगुजा बनाये गए |
                      राज्य के सम्भाग एवं संबंधित जिलें
1. रायपुर = रायपुर,बलौदा ,बाजार, धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद
2. बस्तर = बस्तर, कोंडागांव, उत्तरी बस्तर{कांकेर},दक्षिण बस्तर {दंतेवाड़ा}, सुकमा, नारायणपुर, बीजापुर
3. बिलासपुर = बिलासपुर, मुंगेली, कोरबा, जांजगीर-चाम्पा,रायगढ़
4. सरगुजा = सरगुजा,सूरजपुर,बलरामपुर,कोरिया,जशपुर
5. दुर्ग = दुर्ग, कबीरधाम, राजनांदगांव, बालोद, बेमेतरा
                                              राज्य के जिले
1 नवम्बर, 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के समय राज्य में 16 जिले सामिल थे |
1 मई, 2007 में नारायणपुर एवं बीजापुर नामक दो नए जिलों का निर्माण किया गया |
1 जनवरी, 2012 में नव नए जिलों के गठन के साथ ही राज्य में कुल जिलों की संख्या 27 हो गई है |
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36गढ़ो के बीच सुरक्षित विकास की अदम्य आकांक्षा को दर्शाता गोलाकार चिन्ह, जिसके मध्य में भारत का प्रतीक चिन्ह अशोक स्तम्भ, आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते, राज्य की प्रमुख  फसल धान की सुनहली बालियों, भरपूर ऊर्जा के प्रतीक के बीच राष्ट्र ध्वज के तीन रंगों के साथ छत्तीसगढ़ की नदियों को रेखांकित करती लहरें हैं |
राजकीय व्रिक्ष = साल |
राजकीय पशु = वन भैंसा |
राजकीय पक्षी = बस्तरिया पहाड़ी मैना |


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1. बालोद =दुर्ग
2.गरियाबंद = रायपुर
3.मुंगेली = बिलासपुर
4.बेमेतरा = दुर्ग
5.सुकमा = दन्तेवाड़ा
6.बलरामपुर-रामानुजगंज = सरगुजा
7.बालौदा बाजार-भाटापारा = रायपुर
8.सूरजपुर = सरगुजा
9.कोंडागांव = बस्तर
               दोस्तों आज मैंने आप सभी को  बताया राज्य के उन नए जिलों के बारे मे जिनका निर्माण सन 2012 को हुआ था |
अब मैं आप सभी को बताने ज रहा हूँ, छत्तीसगढ़ के 27 जिलों के नाम और उनके मुख्यालय के नाम के बारे मे तो चलो जाने,
1. रायपुर = रायपुर
2. बिलासपुर = बिलासपुर
3. दुर्ग = दुर्ग
4. रायगढ़ = रायगढ़
5. बस्तर = जगदलपुर
6. सरगुजा = अम्बिकापुर
7. राजनान्दगांव = राजनांदगांव
8. कांकेर = कांकेर
9. दन्तेवाड़ा = दन्तेवाड़ा
10. कोरिया = बैकुण्ठपुर
11. जशपुर = जशपुर नगर
12. कोरबा = कोरबा
13. जांजगीर-चाम्पा = जांजगीर
14. धमतरी = धमतरी
15. महासमुंद = महासमुंद
16. कबीरधाम = कवर्धा
17. नारायणपुर = नारायणपुर
18. बीजापुर = बीजापुर
19. बालोद = बालोद
20. गरियाबंद = गरियाबंद
21. मुंगेली = मुंगेली
22. बेमेतरा = बेमेतरा
23. सुकमा = सुकमा
24. बलरामपुर-रामानुजगंज = बलरामपुर
25. बालौदा बाजार-भाटापारा = बलौदा बाजार
26. सूरजपुर = सूरजपुर
27. कोंडागांव = कोंडागांव
          क्या आप डेली अपडेट रहना चाहते हैं तो PLEASE WISIT KARTE RAHE
                  THANK"S FOR RIDING.....................
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आप सभी का फिर से ए बार स्वागत है है दोस्तों आज मैं आपके लिए लेकर आया हूँ छत्तीसगढ़ की एक खास पहचान के बारे में जिसे आप लोकोक्ति कहते है दोस्तों आज के इस आधुनिक युग में हर किसी के पास इतना समय नहीं है की वह छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति या गीत को पढ़े तो चलिए शुरुवात करते हैं छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति से -
छितका कुरिया मा बाग गुर्राए  -  इस छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति का अर्थ होता है कोई भी हो वह अपने इलाके में शेर की तरह गुर्राने लगता है |
छिटका पानी बैरी तिर के बास निंदिया तिर के रुखवा एक दिन होए विनास   -    इस पंक्ति का मतलब ये होता है की जिस प्रकार सिर्फ पानी के छीटे सेे तथा नदिया ( नदी ) केे पास लगे वृृृक्ष का एक दिन विनास हो जाता है उसी प्रकार दुुुुश्मन के नजदीक निवास करने वालेे का भी एक दिन विनास हो जाता है अर्थात बर्बाद हो जाता है। 
अब आपके सामने एक छत्तीसगढ़ी गीत प्रस्तुत है -
मुनगा फूले रे सुहावन , फुले रे लाली परसा अउ फुले तोर मोंगरा  I
चन्दा संग संग तारा हो , राम लखन दोनो प्यारा हो I
चन्दा संग संग तारा हो I
मंदारी आगे गांव मां भलवा ल लेके,
डमरू बजाए खेल देखाए ,
जुरीयाए हावय गांव भर के ,,,
मंदारी आगे गांव मे भलवा ल लेके,
जुरीयाए हावे गांव भर के ।
हरि हरि गोविंद बोल रे मनवा, हरी हरी गोविंद बोल,  मुरली मनोहर किसन कनहियां अपने हृदय का पट खोल रे मनवा I
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1. लौह अयस्क की प्रसि डल्लीरजहरा खदान बालोद जिले मे है I इस खदान से लौह             अयस्क भिलाई के इस्पात कारखाने को भेजा जाता है I
2. कपिलेस्वर मंदिर, सियादेई मंदिर तथा तांदुला जलासय बालोद जिले मे है I
3. हिरा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध खदाने बेहराडिह, पयलिखंद गरियाबंद जिले में है I
4. गरियाबंद जिले की प्रमुख सिचाई परियोजना सिकासार है I
5. घटारानी, गोडेना तथा देवधारा जलप्रपात गरियाबंद जिले में है I
6. वनभैंसा के लिए प्रशिद्ध उदयांति  अभ्यारण गरियाबंद जिले मे है I
7. राजिम कुम्भ के लिए प्रसिद्ध राजिम तथा राजीवलोचन मंदिर, सोमेश्वर मंदिर गरियाबंद जिले में है I
8. विशेस पिछड़ी जनजाति कमार एवं मुरिया जनजाति गरियाबंद जिले में रहती है I
9. खुडिया जलासय मुंगेली जिले मे स्थित है I
10. अचानकमार टाइगर रिजर्व मुंगेली जिले में अवस्थित है I
11. आगर महोत्सव मुंगेली जिले में आयोजित किया जाता है I
12. सेतगंगा प्रसिद्ध तीर्थस्थल मुंगेली जिले में है I
13. प्रसिद्ध ईसाई धर्म स्थल एवं मसीही मेला का आयोजन स्थल मदकू द्वीप मुंगेली जिले में है I
14. दुरमा जल प्रपात मुंगेली जिले में है I
15. भड़िया, बेनगंगा एवं झरिया जल प्रपात बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में है I
16. सेमरसोत, तोमर पिंगला अभ्यारण बलरामपुर-रामानुजगंज जिले मे है I
17. गर्म पानी का स्रोत तातापानी बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में है I
18. बलरामपुर-रामानुजगंज में प्रसिद्ध प्राकृतिक गुफाएं अर्जुनगढ़ एवं आरा पहाड़ में स्थित हैं I
19. बलरामपुर-रामानुजगंज जिले से कर्क रेखा गुजरती है I
20, बार नवापारा अभ्यारण बालोदा बाजार भाटापारा जिले में स्थित है I
21. चुना पत्थर एवं सीमेंट सीमेंट कारखानों के लिए बलोदा बाजार-भाटापारा जिला प्रसिद्ध है I
22. गुरु घंसिदास का जन्म गिरौदपुरी [ बलौदा बाजार-भाटापारा जिला ] में हुआ था I
23. महर्षि बाल्मीकि का आश्रम स्थल  तुरतुरिया बलोदा बाजार-भाटापारा जिले में। अवस्थित है I
24. रक्सगंडा जलप्रपात सूरजपुर जिले में स्थित है I
25.सूरजपुर जिले से कर्क रेखा गुजरती है I
26. सूरजपुर जिले के भैयाथान स्थल पर ताप विधुत केंद्र का निर्माण किया जा रहा है I
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CHHATTISGARH RAJYON KE KHANIJ WITRAN
                   क्या आपको पता है छत्तीसगढ़ के राज्यों के खनिज वितरण के बारे में नही तो आओ जाने उन राज्यो के नाम और जगहों के बारे मे..,,,,,,,,,,,
छत्तीसगढ़ में कहाँ कहाँ किस प्रकार के खनिज पाये जाते हैं।
Chhattisgarh

खनिज                                                                                                          प्राप्ति स्थल
1. लौह अयस्क = बस्तर, दुर्ग, राजनांदगांव, रायपुर, बिलासपुर
2. बॉक्साइट = बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, बस्तर, राजनांदगांव, कोरबा, कवर्धा
3. चुना पत्थर = रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, रायगढ़, दुर्ग
4.डोलोमाइट = बिलासपुर,दुर्ग,बस्तर,जांजगीर-चांपा,रायगढ़,रायपुर
5. सोना = बस्तर,सरगुजा,राजनांदगांव
6. अभ्रक = बस्तर , जसपुर
7. एस्बेस्टॉस = बस्तर,दुर्ग
8. बेरील = बस्तर,सरगुजा,रायगढ़,रायपुर
9. कवार्टजाइड = राजनांदगांव,दुर्ग,दंतेवाड़ा,रायगढ़
10. मैंगनीज = बिलासपुर,बस्तर
11. टिन अयस्क = बस्तर,दन्तेवाड़ा
12. सीसा अयस्क = दुर्ग,रायपुर,दन्तेवाड़ा
13. फ्लूओराइद =राजनांदगांव, रायपुर,रायगढ़
14. क्वार्ट्ज = बस्तर,बिलसपुर,राजनांदगांव
15. फेल्सपार = बिलासपुर,रायगढ़
16. कोरण्डम = रायपुर,दंतेवाड़ा
17. हिरा = रायपुर,बस्तर
18. गेरु = बस्तर,रायगढ़,राजनांदगांव
19. टाल्क = बस्तर,दुर्ग,राजनांदगांव,सरगुजा
20. संगमरमर = बस्तर
21. स्फटिक = राजनांदगांव
22. चीनी मिट्टी = राजनांदगांव
23. क्ले = बस्तर,बिलासपुर,रायगढ़
24. यूरेनियम = सरगुजा, बिलासपुर
25. खनिज जल = सरगुजा
26. सिलिमैनाइट = बस्तर,दन्तेवाड़ा
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धान का कटोरा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ आर्य और अनार्य संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है I विभिन्न स्रोतों से ज्ञात होता है की छत्तीसगढ़ का इतिहास मौर्य काल से प्राचीन नही है , लेकिन किवदंतियों तथा महाकाव्यों से जैसे रामायण महाभारत से ज्ञात होता है की छत्तीसगढ़ प्राचीन कल से ही अथवा त्रेता युग से ही भारत की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से किसी न किसी रूप से संबद्ध है I
                            प्रागैतिहासिक काल 
वह काल जिसके लिए कोई साक्ष्य उपलब्ध नही है तथा उस समय मानव कम सभ्य था, प्रागेतीहासिक काल कहलाता है I प्रागैतिहासिक मानव इतिहास की उस अवधि के लिए प्रयुक्त होता है , जिसमें लेखन की व्यवस्था। न थी I इस अर्थ मे आदि कालिन समाज के कल को ' पूर्व इतिहास ' कहते हैं I
वैदिक काल 
वैदिक काल की जानकारी देने वाले ग्रन्थ ऋग्वेद मे छत्तीसगढ़ की कोई जानकारी नही मिलती हैं  I
महाकाव्य काल 
वाल्मीकि कृत 'रामायण ' के अनुसार , राम की माता कौशिल्या राजा भानुमंत की पुत्री थी I 'कोशल खण्ड ' नामक एक अप्रकाशित ग्रन्थ से ये जानकारी मिलती है की विंध्य पर्वत के दक्षिण मे नागप्ततन के पास कोशल नामक एक शक्तिसाली राजा था I इसके नाम पर ही इस छेत्र का नाम कोशल पड़ा था I
राजा कोशल के रजवंस मे भानुमंत नामक राजा हुआ, जिसकी पुत्री कौशिल्या का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ था I भानुमंत का कोई पुत्र नही था, अतः कोशल [छत्तीसगढ़] का राज्य राजा दशरथ को प्राप्त हुआ I अतः राजा दशरथ के पूर्व ही इस क्षेत्र का नाम 'कोशल ' होना प्राप्त होता है I
माहाजनपद काल 
भारतीय इतिहास मे छटी शताब्दी ई. का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि इसी समय से भारत का सुबयवस्थित इतिहास मिलता है I
इसके साथ ही यह बुध्द एवं माहाविर का इतिहास काल है I
इसमें देश अनेक जनपदों एवं महाजनपदों मे विभक्त था I
छत्तीसगढ़ का वर्तमान क्षेत्र भी [ दक्षिण ] कोशल के नाम से एक पृथक प्रशासनिक इकाई था , मौर्यकाल के पूर्व के सिक्कों की प्राप्ति से इस अवधारणा की पुष्ठी होति है I
'अवदान शतक ' नामक ग्रन्थ के अनुसार , महात्मा बुद्ध दक्षिण कोशल आये थे तथा तीन महीनों तक यहां की राजधानी मे परवाश किया था I
ऐसी जानकारी बौद्ध यात्री हैंनसांग के यात्रा वरीत्तान्त से भी मिलता है I
मौर्यकाल 
प्राचीन ध्वंसावसेसों, पुराणों और शिलालेखों से ज्ञात होता है की इस राज्य पर बौद्ध राजाओ का आधिपत्य था I
इस  क्षेत्र का इतिहास स्वावलंबी न होकर बहुत कुछ परावलम्बी है , क्योंकि यहां बहुधा ऐसे लोगों ने सासन किया है I
मौर्य सम्राट अशोक ने दक्षिण कोसल की राजधानी मे स्तूप का निर्माण करवाया था I इस काल के दो अभिलेख सरगुजा जिले मे मिलते हैं I
इससे यह प्रमाणित होता है की दक्षिण कोशल [ छत्तीसगढ़ ] मे मौर्य वंश का शासन रहा , जिसका काल 323 से 184 ई. पु. के बीच रहा है I
उत्तर मौर्य काल
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत के विभिन्न भागों मे चार प्रमुख राजवंसों का उदय हुआ , जो इस प्रकार हैं
मगध राज्य जहां ' शुंगों ' का प्रभाव था I
कलिंग का राज्य, जहां चेदि वंश की सत्ता कायम हुई I
दक्षिण-पथ में सातवाहन का राज्य था I
पश्चिम भाग में यवनों के प्रभाव का। उदय I
सातवाहन वंश 
मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात दक्षिण भारत में सातवाहन राज्य की स्थापना हुइ I दक्षिण कोशल का अधिकांश भाग सातवाहनों के क्षेत्र मे था I
इस वंश के शासक अपने को दक्षिण पथ का श्वामि कहते थे I इस वंश मे अनेक शासक साम्राज्यवादी प्रवित्ति के थे I शातकर्णि प्रथम ने अपने राज्य का विस्तार जबलपुर तक किया I
इस प्रकार त्रिपुरी सातवाहनों के प्रभाव मे आ गया I
सातवाहन कालीन सिक्के बिलासपुर जिले मे पाये गए है I इनके शासन काल में आर्य संस्कृति का विस्तार दक्षिण मे वयापक रूप से हुआ I
यह कल 200  ईसा पूर्व से 60 ईशा पूर्व के मध्य का है I सातवाहन राजा अपीलक की एकमात्र मुद्रा रायगढ़ जिले के ' बालपुर ' नामक स्थल से प्राप्त हुई है I
मेघ वंश
सातवाहनों के पश्चात कोशल में मेघ नामक वंश ने राज्य किया I पुराणों के विवरण से ज्ञात होता है की गुप्तों से उदय के पूर्व कोशल में मेघ वंश ने राज्य किया I सम्भवतः इस वंश ने द्वितीय शताब्दी ई . तक राज्य किया I
वाकाटक काल
सातवाहन के पतन के पश्चात वाकाटकों का अभ्युदय हुआ I वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय के बालाघाट ताम्र पत्र से ज्ञात होता है की उसके पिता नरेंद्र ने कोशल के साथ मालवा और मैकाल मे अपना अधिकार स्थापित कर लिया था I नरेंद्रसेन और प्रिथविसेन द्वितीय का संघर्ष बस्तर कोरापुट क्षेत्र में राज्य करने वाले नल शासकों से होता रहा I नल शासक भवदत्त वर्मा ने नरेंद्र की राजधानी नन्दीवर्धदन [ नागपुर ] पर आक्रमण कर उसे पराजित किया था , किन्तु उसके पुत्र प्रिथविसेन द्वितीय ने इसका बदला लिया और भवदत्त के उत्तराधिकारी अर्थपति को पराजित किया I सम्भवतः इस युद्ध मे अर्थपति की मृत्यु हो गयी थी I कालांतर मे वाकाटकों के वट्सगुल्य शाखा के राजा हरिसेन ने दक्षिन कोसल क्षेत्र मे अपना अधिकार स्थापित किया I
गुप्तकाल 
उत्तर भारत मे शुंग एवं कुषाण सत्ता के पश्चात गुप्त वंश ने राज्य किया तथा दक्षिण भारत में सातवाहन शक्ति के पराभव के पश्चात गुप्त राज्य वंश की स्थापना हुई I चौथी सदि में समुद्रगुप्त गुप्तवंश का एक अत्यंत ही परभावशालि और साम्राज्यवादी शासक हुआ I उसने संपूण आर्यावर्त को जितने के पश्चात दक्षिण पथ की विजय यात्रा की I उसने दक्षिण कोशल के शासकों महेंद्र और व्याघ्रराज {बस्तर शासक } को पराजित कर आगे परथान किया इन शासकों ने गुप्त शासको की आधीनता स्वीकार कर अपने अपने क्षेत्र मे शासन किया I
राजर्षितुल्य वंश
पांचवी सताब्दी के आसपास दक्षिण कोशल में राजर्षितुल्य नामक नागवंश का शासन था I इसके प्रमाण आरनग से प्राप्त ताम्र पत्र गुप्त सम्वत 182 या 282 से मिलता है I उससे राजर्शितुल्य वंश के शासक भीमसेन द्वितीय का पता चलता है I महाराज सर ने इस वंश की वंशावली आरम्भ की I
परवतद्वारक वंश 
महाराज तुष्टिकर के तेरासिंघा ताम्र पत्र से तेल घाटी मे शासन करने वाले राव वंश के विषय मे जानकारी मिलती है I इस लेख से पता चलता है की इस वंश के लोग स्तम्भस्वरी देवी के उपासक थे , जिसका स्थान पर्वतद्वारक मे था , जिसकी समानता कालाहांडी जिले के पर्थला नामक स्थल की जाती है I परवतद्वारक वंश का नाम इसी आधार पर पड़ा था , जिसके अधिकार क्षेत्र मे दक्षिण कोशल का दक्षिणी भाग आता था I
शर्भपुरीया वंश
इस वंश का संस्थापक सर्भ नामक राजा था I सर्भ का उत्तराधिकारी उसका पुत्र नरेंद्र हुआ , जिसके काल का ताम्र पत्र कुरुद से प्राप्त हुआ I प्रसन्नमात्र इस वंश का प्रतापी  राजा था , जिसके समय के सोने के सिक्के छत्तीसगढ़ के कई स्थानों से मिले हैं I इस वंश का अंतिम नरेश प्रवरराज था I
नल नागवंश
बस्तर जिले के अड़ेगा से प्राप्त स्वर्ण मुद्राएं यह प्रमाणित करती हैं कि बस्तर कोरापुट अंचल में नलवनशिय शासकों का शासन था I नल नागवंश की स्थापना शिशुक ने सम्भवतः 290 ई. में की थी I इस वंश का प्रतापी शासन भवदत्त वर्मन था , जिसने इस वंश की सत्ता का विस्तार किया I दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कलचुरियों के आक्रमणों से पराजित होने के कारण नल शासक सत्ता विहीन हो गए I
बाल वंश 
बिलासपुर से 12 मिल उत्तर में पाली नामक स्थल के मन्दिर के गर्भ गृह के द्वार में उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होत्या हैं की इस मंदिर का निर्माण महामण्डलेश्वर मल्लदेव के पुत्र विकर्मादिय के द्वारा किया गया था I विक्रमादित्य को बाण वंश का राजा माना जाता है , जिसका काल नॉवि शताबदी माना गया है I
सोम वं
सोम वंश के शिवगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र महाभवगुप्त प्रथम हुआ
इसने ' कौशलेन्द्र ' और त्रीकलिंगापति की उपाधि धारण की थी I
इसने सुवर्णपुर, मुरसीम, आराम आदि स्थानों मे राजधानी परिवर्तित की थी I
महाशिवगुप्त का उत्तराधिकारी ययाति प्रथम था I
पांडव वं
अमरकंटक के आस पास का क्षेत्र मैकाल के नाम से जाना जाता है I
यह पाण्डुवंशियों की एक शाखा के राज्य करने के विषय में शरतबल के बहमनी ताम्रपत्र से जानकारी मिलती है I
प्रारम्भिक दो राजाओं जयबल तथा वत्सराज के साथ कोई राजकीय उपाधि प्रयुक्त नहीं हुई है I इसके बाद नागबल के लिए महाराज उपाधि का प्रयोग किया गया है I
इसके पुत्र भर्टबल के समय का ऊपर उल्लेखित ताम्रपत्र में इसकी रानी लोकपरकासा का उल्लेख है , जो नरेंद्र की बहन थी I
इस नरेंद्र को शर्भमपुरीय शासक नरेंद्र से समीकृत किया गया है I
बाण वंश 
छत्तीसगढ़ में पाण्डु वंशी सत्ता की समाप्ति में बाणवनशीय शासकों का भी योग था I
कोरबा जिले में पाली नामक स्थल में मंदिर के गर्भगृह के द्वार में उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होता है की इस मंदिर का निर्माण महामण्डलेस्वर मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वारा किया गया था I
विक्रमादित्य को बाण वंश का राजा माना गया है , जिसका काल 870 से 895 ई. माना गया है I
बाणवंशी शासकों ने सम्भवतः दक्षिण कोशल के सोमवंशियों को बिलासपुर क्षेत्र में पराजित किया था I
कालांतर में कलचुरी शासक शंकरगण द्वितीय मुग्धतुन्ग ने इनसे पाली क्षेत्र जीत लिया और अपने भाइयों को इस क्षेत्र में मण्डलेशवर बनाकर भेजा , जिन्होंने दक्षिण कोशल में कलचुरी राजवंश की स्थापना की I
इन सभी के अलावा मुख्य पॉइंट्स निम्न है
चीनी यात्री हैंनशांग ने सिरपुर को ' किया-स-लो ' के नाम से उल्लेखित किया है I
ईशानदेव का का उल्लेख खरोद { बिलासपुर } के लक्षमनेस्वर मंदिर के सिलालेख में मिलता है  I
अजन्ता अभिलेख में नरेंद्र सेन के चचेरे भाई हरिषेण को कोशल , कलिंग और आंध्र का विजेता बताया गया है I
रोम के सोने के सिक्के बिलासपुर और चकरबेढ़ा नामक गांव से प्राप्त हुई है I
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SHIGHNPUR KI GUFA EWAM SAIL CHITR 
सिंघनपुर गुफा के चित्रों की चित्रकारी गहरे लाल रंग से हुई है I एक रेलवे इंजीनियर ने वर्ष 1910 सबसे पहले इसका पता लगाया था I सिंघनपुर के शैल चित्र विश्वविख्यात है I
इन चित्रो में चित्रित मनुष्य की आकृति कही तो सीधी और ड़ण्डेनुमा है और कहीं सीढ़ीनुमा है I
इस काल में लोगों को लेखन की जानकारी नहीं थी I अतः इस समाज की जानकारी किसी लिखित अभिलेख के आदार पर नहीं , बल्कि पुरातत्व की सहायता , औजार, व अन्य शिल्प के आधार पर प्राप्त की जाती है I
आदिमानव के पास जीवन-यापन के बहुत कम साधन थे I धीरे-धीरे मानव मस्तिस्क का विस्तार हुआ और वह अपने ज्ञान को बढ़ाने लगा प्रकृति ने जो उसे साधन दिए थे , उसने उनका उपयोग करना ठीक से आरम्भ कर दिया I इस स्थिति में पहुचने के लिए उसे काफी समय लग गया I
इस दौरान पत्थरों को नुकीला कर  औजार और हथियार बनाना सिख लिया I वनों से आच्छादित छत्तीसगढ़ मे आज भी कही कही चट्टानों और वनों में पर प्राचीन काल की विभिन्न कला के रूप में दिखाई देते हैं I
शैलचित्र  प्राचीन मानवीय सभ्यता के विकास को प्रारम्भिक रूप से स्पष्ट करतें है I शैल चित्र मानव मन के विचारों को ब्यक्त करने के माध्यम थे  I इससे पता चलता है की इससे पहले उन्हें चित्र कला का ज्ञान था I
      तो दोस्तों आज के ज्ञान का पिटारा बस इतना ही और अधिक जानकारी के लिये मेरे ब्लॉग का अवलोकन करते रहें I
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छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास 
कलचुरी राजवंश का संस्थापक कृष्णराज था, जिसने 500 से 575 ई. तक शासन किया I
कृष्णराज के बाद उसके पुत्र शंकर गण प्रथम ने 575 से 600 ई. और शंकर गण के पश्चात उसके पुत्र बुधदराज ने 600 से 620 ई. तक शासन किया , किन्तु 620 ई. के बाद से लगभग डेढ़ सौ से पौने दो सौ वर्षों तक कलचुरियों की स्थिति अज्ञात सि बन रही थी और अपेक्षाकृत कमजोर होते गए I वैसे इस अवधि { 550-620 ई.} में कलचुरी गुजरात, कोंकण और विदर्भ के स्वामी थे I
                         छत्तीसगढ़ में कलचुरी राजवंश
नौवि शताब्दी में कलचुरियों ने साम्राज्य विस्तार किया और वामराज देव ने गोरखपुर प्रदेश पर आधिपत्य कर अपने भाई लक्ष्मण राज को। राजगद्दी पर बैठाया तथा वे सरयुपार के कलचुरी कहलाये I वामनराज देव के पुत्र ने त्रिपुरी { महिष्मति के समान नर्मदा तट पर } को अपनी। राजधानी बनाया था I
वामराज देव की कालंजर प्रथम और त्रिपुरी द्वितीय राजधानी रही थी I इस प्रकार वामनराज देव त्रिपुर के कलचुरी वंश का संस्थापक था I यह जबलपुर से  6 मिल दूरी पर स्थित है एवं इसका वर्तमान नाम तेवर है I इस समय कलचुरियों को ' चैटुय ' या ' चंदि नरेश ' कहा जाता था I
त्रिपुर में स्थाई रूप से राजधानी स्थापित करने का श्रेय कोकल्ल प्रथम को प्राप्त है I कोकल्ल अत्यंत ही प्रतापी एवं कुशल राजा था , इसकी विज्यों का उल्लेख ' बिलहरी लेख ' में मिलता है I
उसका विवाह चन्देल वंश में और उसकी पुत्री का विवाह राष्ट्रकूटवंशी कृष्ण द्वितीय के साथ हुआ था , इससे उसकी शक्ति का पता चलता है I भारत के इतिहास में कलचुरी राजवंश का स्थान महत्वपूर्ण इतिहास है I
550 से लेकर 1740 ई. तक लगभग 1200 वर्षों की अवधि में कलचुरी नरेश उत्तर अथवा दक्षिण भारत के किसी-न-किसी प्रदेश पर राज्य करते रहे I शायद ही किसी राजवंश ने इतने लम्बे समय तक राज्य किया हो I
रतनपुर के कलचुरी
रतनपुर की शाखा की स्थापना दक्षिण कोशल में कलिंगराज ने की थी , कोकल्ल देव द्वितीय का पुत्र था I उसका उत्तराधिकारी कमलराज था I उसके उत्तराधिकारी रतनदेव { प्रथम } ने रत्नपुर { रतनपुर } नामक नगर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया I
रायपुर के कलचुरी 
त्रिपुर के कलचुरियों ने कालांतर में अपना राज्य दक्षिण कोशल में स्थापित किया I बिलहरी { जबलपुर } अभिलेख से ज्ञात होता है कि कोकल्ल देव प्रथम के पुत्र शंकरगण द्वितीय ' मुघ्दतुंग ' ने लगभग 900 ई. में कोशल राजा को पराजित कर कोशल का प्रदेश छीन लिया था I
इसके पश्चात 950 ई. के आसपास सोमुँसियों ने पुनः कोशल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया I तब त्रिपुर के लक्ष्मणराज ने सेना भेज कर कोशल पर भयानक आक्रमण किया और क्षेत्र को पुनः विजीत कर लिया था I
कलचुरियों के वास्तविक साम्राज्य की स्थापना कलिंगराज द्वारा तुम्मान को राजधानी बनाकर की गई I इसने 1020 ई. तक शासन किया था I यह कोकल्ल देव द्वितीय का पुत्र था I उसका उत्तराधिकारी कमलराज था I
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छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक तिथीक्रम ( cg historical date in hindi )
* 5 वीं- 7 वीं शताब्दी में बस्तर में नलवंश का शासन था I
* 6ठी शताब्दी में शरबभपूरीय वंश को सत्ता से हटाकर पाण्डु वंश ने श्रीपुर में नियंत्रण            किया I
* चीनी यात्री हैंशांग ने 639 ई. में छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक यात्रा की I
* 10- 14वीं शताब्दी के मध्य चक्रकूट { बस्तर क्षेत्र में } छिंदक नागवंश ने शासन किया I इस वंश की राजधानी भोगवतिपुर थी I
* 14 वीं सदी के में काकतीय शासक अन्नमदेव ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया तथा दन्तेवाड़ा में प्रसिद्ध दन्तेस्वरी मन्दिर का निर्माण कराया I
* खैरागढ़ के राजा लक्षमिनिधि के दरबारी कवि दलराम द्वारा 1487 ई. में अपने साहित्य में ' छातीसगढ़ ' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया I
* रायपुर को छत्तीसगढ़ की राजधानी का दर्जा 1818 ई. में मिला I
* 1818-30 ई. तक मराठों के एजेंण्ट के रूप में अंग्रेजों के कैप्टन एडमण्ड के नियंत्रण में छत्तीसगढ़ का शासन सम्भाला I
* 1830 ई. राजनांदगांव में कपड़ा मिल की स्थापना I
* 1854 ई. में नागपुर राज्य के साथ छत्तीसगढ़ पूरी तरह ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया I
* 1856 ई. में सोनाखान के जमीदार वीर नारायण सिंह ने भीषण अकाल के कारण अनाज के गोदामों को लूटकर जनता को अनाज उपलब्ध कराने का प्रयास किया I
* 10 दिसम्बर , 1857 में उन्हें जयस्तंभ चौक रायपुर में सार्वजनिक तौर पर मृत्युदण्ड दिया गया I वे स्वतन्त्रता संग्राम के प्रथम शहीद कहे जाते हैं I
* 1887 ई. में विक्टोरिया जुबली टाउनहाल का निर्माण शुरू हुआ I
* 1904  ई. में सम्बलपुर उड़ीसा से चला गया और सरगुजा बंगाल से छत्तीसगढ़ के अंतर्गत आ गया I
* छत्तीसगढ़ में सर्व प्रथम जनजातीय विद्रोह भूमकाल { 1910 बस्तर क्षेत्र में } गुण्डाधूर द्वारा किया गया I
* छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूत पं. सुंदरलाल शर्मा थे I
* 1920 ई. में पं. सुंदरलाल शर्मा के आमन्त्रण पर महात्मा गांधी का प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन हुआ I
* 1922 ई. में सिहावा पर जंगल सत्याग्रह आरम्भ हुआ I
* 1923 ई. में झंझा सत्याग्रह का प्रभाव  छत्तीसगढ़ में भी पड़ा I
*  नवम्बर 1933 ई. में महात्मा गांधी का हरिजनोद्दार कार्यक्रम के लिए छत्तीसगढ़ आगमन हुआ I
* 1939 ई. में राजनांदगांव जिले के बदराटोला गांव में जंगल सत्याग्रह प्राम्भ हुआ I
* 1940 ई. में पं. रविशंकर शुक्ल छत्तीसगढ़ के में पहले सत्याग्रही बने I
* 8 अगस्त , 1942 के कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ I
* जून 1947 में माउंटबेटन योजना की स्वीकृति के उपरांत देश की स्वतंत्रता एवं विभाजन तय हो गया I
* गोपाल परमार द्वारा 1994 ई. में छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण सम्बन्धी अशासकीय संकल्प-पत्र मध्य प्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत किया गया I
* 1 नवम्बर , 2000 को छत्तीसगढ़ भारत के 26वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया I
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राज्य सरकार की पर्यावरण नीति इस प्रकार है-
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पर्यावरण के लिए बनाई गयी नीति
छत्तीसगढ़ राज्य की पर्यावरण नीति

* पर्यावरण प्रबन्धन के सभी। स्तरों पर स्थानीय समुदायों को जोड़ने की पहल होगी I
* नैसर्गिक संसाधनों के स्वपोषण पर बल दिया जायेगा I
* पर्यावरण आधारित संसाधन का नियोजन किया जाएगा I
* सहभागी प्रबन्धन एवं बाजार आधारित प्रक्रिया का प्रबन्धन किया जायेगा I
* खराब पानी को रिचार्जिंग का जल के संचित उपयोग को प्रोत्साहन  दिया जायेगा I
* रासायनिक उर्वरकों एवं किटनासकों के न्यायोचित उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा I
* ईंधन दक्ष उपकरणों , मशिनों को प्रोत्साहित किया जायेगा I
* वर्षा जल संरक्षण द्वारा जल प्रबन्धन किया जायेगा I
* जैविक कृषि द्वारा शाश्वत कृषि उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जायेगा I
* जैविक खाद के उपयोग को प्रोत्साहन दिया जायेगा I
* पेयजल आवर्धन योजना के लिये सरकार प्रतिबद्ध है , निर्धारण किया जायेगा I
* पर्यावरण आधारित कार्यक्रमों में वरीद्धि कर नागरिकों के जीवन में गुणात्मक सुधार के लिए पहल की जायेगी I
* पर्यावरण क्षति की वसुलि उसी से की जाएगी , जो इसके लिए जावाबदेह होगा I
* जन - सहयोग द्वारा सकारात्मक क्रियान्वयन किया जायेगा I
* अन्य विभागीय नीतियों से समन्वयन किया जाएगा I
* सक्रिय जन-सहयोग द्वारा क्रियान्वयन किया जायेगा I
* बेहतर भु उपयोग पर बल दिया जायेगा I
* परती भूमि पर कम खर्चीला वानस्पतिक प्रबन्धन किया जायेगा I
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राज्य के पुरातात्विक वैभव को जानने के प्रमुख साधन हैं -  उत्कीर्ण लेख , सिक्के स्थापत्य और शिल्प I पुरातत्व ने राज्य के इतिहास की कड़ियों को जोड़ने का काम किया है I शिलालेखों से न केवल राजनीतिक स्थिति का ही ज्ञान होता है अपितु तात्कालिन लिपि और भाषा पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है I
                            महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल
          राजिम 
राजिम को राज्य का महातीर्थ माना गया है I राज्य की प्रमुख महत्वपूर्ण और धार्मिक आस्थाओं से युक्त महानदी के दाहिने तठ पर बसा नगर है I राज्य के प्रयाग नाम से ख्यातिलब्ध राजिम रायपुर से लगभग 48 किमी दूर महानदी , पैरी एवं सोंढूर नदियों के संगम पर बसा है I
         यह बस मार्ग और रेल मार्ग से रायपुर से जुड़ा हुआ है I प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा पर यहां एक बड़ा मेला लगता है I इस मेले में प्रति वर्ष बहुत अधिक संख्या में श्रद्धालु पर्यटक पवित्र महानदी में स्नान करके पुण्य लाभ उठाते है I राजिम का विशेष धार्मिक महत्व है I जगन्नाथ की यात्रा के पश्चात ऐसी मान्यता है की इस स्थान की यात्रा करना भी अनिवार्य है I
                      चंपारण्य
वल्लभ सम्प्रदाय के प्रणेता प्रसिद्ध वल्लभाचार्य का धाम चंपारण राजिम से मात्र 9 किमी की दूरी पर स्थित है I प्रति वर्ष माघ पूर्णिमा में यहा मेला लगता है आचार्य वल्लभाचार्य को समर्पित मन्दिर के अतिरिक्त एक पुराना शिव मंदिर भी है I पुरातनता के अतिरिक्त मंदिर में स्थापित शिवलिंग में क्रमशः शिव -पार्वती , गणेश एक साथ समाहित हैं I
                     डोंगरगढ़
       राजनान्द गांव जिले के मुख्यालय राजनान्द गांव से यह 57 किमी की दूरी पर स्थित है I दक्षिण पूर्व रेलवे के नागपुर हावड़ा मार्ग पर यह रेलवे स्टेशन है I मन्दिर  का निर्माण राजा कामदेव ने करवाया था I रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किमी की दूरी पर स्थित ऊंची पहाड़ी पर ' बम्बलेस्वरी देवी ' का मंदिर स्थित है I
         मल्हार
      भारतवर्ष में 52 शक्तिपीठ हैं I उनमें से इक्यावनवा { 51 नंबर } शक्तिपीठ मल्हार में स्थापित है I मल्हार में उत्खनन से प्राप्त प्तालेश्वर, देउरी मंदिर में डिड़नेश्वरी मंदिर दर्शनीय हैं I डिडनेश्वरी मन्दिर विश्वविख्यात हो चुका है I इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1954 ई. में किया गया I मंदिर के अंदर एक ऊंचे संगमरमर के आसन पर स्थापित डिडनेश्वरी देवी की प्रतिमा मूर्तिकला का सर्बोत्तम नमूना है I यह प्रतिमा अत्यंत कीमती शुद्ध काले ग्रेनाइड से बनी है I
          सिरपुर
    सिरपुर का प्राचीन नाम ' श्रीपुर ' था ,  जिसका अर्थ है ' समृद्धि की नगरी ' I प्राचीन दक्षिण कोशल प्रदेश की राजधानी रही सिरपुर को चीनी यात्री हैंसांग ने देखा था I
          पाली 
  यह ऐतिहासिक ग्राम कोरबा जिले के अंतर्गत बिलासपुर-कोरबा सड़क मार्ग पर बिलासपुर से लगभग 43 किमी की दूरी पर स्थित है I यहां जलाशय के समीप स्थित शिव मंदिर दर्शनीय है I यह। लगभग एक हजार वर्ष पुराना मंदिर है, जिसे बाण वंश के राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था I मन्दिर का स्थापत्य एवं उकेरी गयी मूर्तियां बहुत सुंदर है I
           गिरौधपुरी
    यह सतनामी समाज का प्रमुख तर्थ स्थल है I यहा पर गुरु घासीदास का निवास स्थान एवं चरनकुण्ड , अमृत कुण्ड , छाता पहाड़ आदि दर्शनीय हैं I
           तुरतुरिया
     रायपुर से बलौदा बाजार होते हुए 84 किमी की दूरी पर स्थित है I यहां आठवीं शताब्दी के बौद्ध काल के अवशेष और हिन्दू धर्म की अनेक सुंदर मूर्तियां हैं I
          रतनपुर
      यहां अनेक सुंदर मंदिर, जलाशय, प्राचीन किलों के अवशेष हैं यहां दर्शनीय स्थलों में सिद्ध शक्तिपीठ , महामाया मन्दिर , रामटेक मंदिर , कंठीदेवल शिव मंदिर , बांध हैं , जो पिकनिक { PARTY } के लिए अच्छा स्थान है I 
            आरंग 
यह रायपुर से सम्बलपुर जाने वाले मार्ग - 6 पर 37 किमी पूर्व की ओर स्थित है I यहां ऐतिहासिक पुरातात्विक महत्व के अनेक मंदिर स्थित है , इसलिए इसे मन्दिरों का नगर कहा जाता है I इसमे जैन तीर्थकरों की अनेक प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं I नेमिनाथ , अजितनाथ व श्रेयांश की 7 फुट ऊंची ग्रेनाइड पत्थर की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं I इस मंदिर में भाई-बहन एक साथ प्रवेश नहीं करते , ऐसी जनश्रुति है I
           कुनकुरी 
यह रायगढ़ - जशपुर राजमार्ग पर जशपुर से लगभग 45 किमी पहले कुनकुरी स्थान पर स्थित है I यह चर्च देश-विदेश में प्रसिध्द है I यह कैथोलिक ईसाइयों का पवित्र स्थान हैं I
           जांजगीर
  * हैहय वंश के प्रसिद्ध शासक जाजल्यदेव द्वारा बसाई गई नगरी है I
* यहां 12 वीं सताब्दी में निर्मित विष्णु मन्दिर है, जो कलचुटि विष्णु मन्दिर की तरह एक प्राचीन शिव मन्दिर है I

  आज के पेज में बस इतना ही इसी पेज में दुबारा मिलेंगे नई जानकारी के साथ I
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राज्य संरक्षित स्मारकों की सूची
स्मारक                            अवस्थित { स्थान  }
कपिलेस्वर मन्दिर एवं बावड़ी   ==     बलौदा
घुघुसराजा मंदिर    ==    देवकर
बजरंगबली मंदिर    ==    सहसपुर
मढ़ीयापाट  ध्वस्त मंदिर       ==      डॉडि लोहरा
शिव मन्दिर        ==       सहसपुर
कुकुर देव मंदिर  ==     खपरी
शिव मन्दिर    ==       गीरौंद
आनन्द प्रभु कुटी बिहार      ==       सिरपुर
स्वास्तिक विहार       =                   सिरपुर
जगन्नाथ मन्दिर      ==          खल्लारी
कुलेश्वर मंदिर            ==         नवागांव
कर्णेश्वर महादेव मंदिर       ==       सिहावा
भोरमदेव मंदिर      ==      चौरा
महापाषाणीय स्मारक         ==       करहिभदर
महापाषाणीय स्मारक           ==        मुजगहन
शिव मन्दिर , चतुर्भुज मंदिर     ==     धमधा
महापाषाणीय स्मारक         ==        करकाभाटा
प्राचीन मंदिर     ==       डॉड़ी लोहारा
शिव मन्दिर    ==     पलारी
मड़वा महल     ==    चौरा
छेरकि महल     ==      चौरा
शिव मन्दिर       ==       बिरखा
शिव मन्दिर       ==        देव टिकरा
देऊर मन्दिर    ==         महारानिपुर
देवी का मंदिर { छेरका देऊल }      ==      देव टिकरा
सतमहला      ==    भदवाही
शिव मन्दिर {  हर्राटोला }      ==      बेलसर
शैलाश्रय        ==          सिंघनपुर
बत्तीसा मन्दिर     ==    बारसूर
शिव मन्दिर         ==        गुमड़ापाल
शिव मन्दिर         ==          छिन्दगांव
प्राचीन टीले { ईटों के }       ==           गढ़धनोरा
प्राचीन तीला स्थित बुद्ध प्रतिमा   ==       भोंगपल
शिव मन्दिर , सिंघईगुडी          ==        चित्रकूट
ध्वस्त मन्दिर        ==        बीपाडीह
शिव मन्दिर     ==   नागपुर
नागदेव मन्दिर       ==        नागपुर
महापाषाणीय स्मारक       ==       धनोरा
बहादुर कलारिन की माची       ==       चिरचारी
विष्णु मन्दिर        ==   बानबरद
महापाषाडीय स्मारक    ==       कुलिया
शिव मन्दिर           ==         चंदखुरी
सिद्धेश्वर मन्दिर   ==         पलारी
चितावरी देवी मन्दिर     ==    धोबनी
प्राचीन भग्न मन्दिर       ==      डमरू
फनीकेश्वर ना महादेव मन्दिर       ==       फिंगेश्वर
मौलिदेवी मन्दिर         ==        तरपोंगा
प्राचीन ईटों का मन्दिर       ==       नवागांव
घुढ़ियारी मन्दिर        ==      केशरपाल
महामाया मन्दिर        ==         रतनपुर
प्राचीन मन्दिर       ==        किरारीगोड़ी
देवरानी जेठानी मन्दिर         ==        अमेरीकापा
धुमनाथ मन्दिर          ==           सरगांव
शिव मन्दिर             ==        गनियारी
लक्ष्मणेश्वर मन्दिर       ==         खरौद
कबीरपंथी स्तगुरुओ की तीन मजार           ==        कुदुरमाल
           ज्ञान बाटना आच्छा होता है अपने दोस्तों को सेयर जरूर करे..........
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प्राचीन स्मारक                      अवस्थित
चन्द्रचूड़    -      शिवरीनारायण जांजगीर-चाम्पा
महादेव मंदिर      -     तुमान , कघोरा
शिव मंदिर { अड़भार मंदिर }       -         अड़भार सक्ती
चित्तौड़गढ़ लाफा        --         पाली
कोटगढ़ किला         ---        बरगवां
अजमेरगढ़ किला       --       आमनाला बिलासपुर
कांशीगढ़ किला बावनबाडी      ---            जांजगीर
मंदिर बेलपान        ---         बिलासपुर
भग्न मंदिर     --        कटघोरा , बिलासपुर
कोष्ठ निर्मित मृतक स्मृति स्तम्भ       ---         ड़ीलमीली जगदलपुर
ईंटों का टिला         --         गढ़धनौरा, बस्तर
महापाषाणीय स्मारक [ उर्सकल ]       ---        गमावाड़ा, दन्तेवाड़ा
नारायण मंदिर     ---    नारायणपाल , जगदलपुर
कारलि महादेव मंदिर।     --  समलुर , दन्तेवाड़ा
महादेव मंदिर ,पाली       --     कटघोरा
रतनपुर स्थित समस्त स्मारक     ---       रतनपुर बिलासपुर
पाली अभिलेख     ---    सेमरसल मुंगेली
केश्वनारायन मंदिर     --    शिवरीनारायण, जांजगीर-चाम्पा
चन्द्रादित्य  मन्दिर    --    बारसूर, दंतेवाड़ा
मांमा-भांजा मंदिर      ---     बारसूर, दन्तेवाड़ा
दनतेस्वरी मंदिर में रखी प्राचीन प्रतिमाऐं          ------         दन्तेवाड़ा
महादेव मंदिर       ---              बस्तर, जगदलपुर
भैरमदेव मंदिर    ---   भैरमगढ़ , बीजापुर
विशाल विष्णु मंदिर    --        जांजगीर - चांपा
छोटा मंदिर               ------       जांजगीर - चांपा
ईट निर्मित शबरी मंदिर खरौद               ------         जांजगीर-चांपा
ईट निर्मित इन्दल देउल मंदिर            ---       खरौद जांजगीर-चांपा
प्राचीन गढ़ मल्हार     -----         बिलासपुर
पातालेश्वर महादेव मन्दिर     -----     मल्हार बिलासपुर
राजीव लोचन मंदिर      ----       राजिम , गरियाबंद
सीताबाड़ी            ----           राजिम ,गरियाबंद
रामचन्द्र मंदिर    ---    राजिम , गरियाबंद
लक्ष्मण मंदिर           ----         सिरपुर -महासमुंद
सिरपुर स्थित समस्त टीले          ---      महासमुंद
सीता बेंगरा गुफा              ---         उदयपुर, अम्बिकापुर
जोगीमारा गुफा , उदयपुर        --      अम्बिकापुर
कोतमिकिला     ------           कोटमी, जांजगीर
शिव मंदिर   ---       देवबलौदा , दुर्ग
सीता देवी मंदिर     ---       देवरबिजा बेमेतरा
शिव मन्दिर       -------          धमधा ,दुर्ग
सति स्तम्भ       -------          देवरबिजा,  बेमेतरा
भाण्ड देउल           ------         आरंग, रायपुर
महादेव मन्दिर   ----         नारायणपुर, बलौदा बाजार
आदित्य को समर्पित     ---          नारायणपुर, बालौदा बाजार
कण्ठी देउल मंदिर      --      रतनपुर, बिलासपुर
     ये तो थे अपने छत्तीसगढ़ राज्य के  पुरातात्विक स्थान एवं मंदिर के बारे में जानकारी
                                  THANKS FOR READING OK 
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            छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति
प्रोयगधर्मिता के आधार पर लिखित भरतमुनि नाट्यशास्त्र समूचे विश्व में रंगमंच और रंगकर्म का पहला प्रमाणित ग्रन्थ बना , जिसे ब्यापक संस्कृति मिली , किन्तु उसकी प्रेरणा श्रोत रामगढ़ की नाट्य शाला ही रही है । नाट्य शाला मे पांचवे वेद का विकास और उसी के एक गुफा अभिलेख में काब्यसर्जकों के सम्मान में प्रशस्ति मिलती है I महाकवि कालिदास को भी सम्भवतः नाट्य लेखन की प्रेरणा रामगढ़ की नाट्य शाला से मिली थी I
          छत्तीसगढ़ी रंगकर्म
* अठारहवीं सताब्दी के पूर्वार्ध छत्तीसगढ़ के रंगकर्म के इतिहास के युगांतकारी दौर के रूप में याद किया जायेगा , क्योंकि इस दौर में मराठों के प्रभाव के कारण गम्मत और नाचा आदि की विधाओं का राज्य में विकास हुआ I
* 20 वीं सदि के अंतिम तीन-चार दसक छत्तीसगढ़ रंगकर्म के इतिहास के युगांतकारी दौर के रूप में याद किये जाएंगे I
* इस अवधि में हबीब तनवीर अपने ' नए थियेटर ' के माध्यम से रंगकर्म को एक नए स्वरूप दे रहे थे और उन्ही के कारण छत्तीसगढ़ी  ' नाचा ' को अंतराष्ट्रीय ख्याति मिलीं I
           लोकनाट्य
छत्तीसगढ़ मे लोकनाट्य की परम्परा पुरानी है , यह छत्तिसगढ की सांस्कृतिक आत्मा है I लोकनाट्य में गीत , संगीत और नृत्य होते हैं , जिसे कथा सूत्र में पिरोकर प्रेरणादायी सरस बनाया जाता है I
* छत्तीसगढ़ में विश्व की प्रथम नाट्य शाला होने का गौरव प्राप्त है I सरगुजा जिले के मुख्यालय अम्बिकापुर से 50 किमी दूर रामगढ़ की पहाड़ी पर तीसरी सताब्दी ई. पू.एक नाट्य शाला का निर्माण किया गया था I
           कला एवं संस्कृति
* छत्तीसगढ़ में रंग कला का मर्मज्ञ दाऊ रामचन्द्र देशमुख को माना जाता है I
* उनके दिशानिर्देश में सन 9171 में प्रमुख लोकनाट्य चन्दैनिगोंदा { चन्दैनी के गोंदा } की प्रस्तुति हुई I
* इस नाट्य रचना के बाद में सैकड़ों प्रदर्शन किये गए I
* छत्तीसगढ़ के लोककला के पुजारी दाऊ मसीह सिंह चंद्राकर के सोहना  बिहान व लोरिक चन्दा की प्रस्तुति ने लोकनाट्य का सफलतम इतिहास बनाया I
        छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य का वर्णन हम अगले पेज में देखेंगे { धन्यवाद }