भारतीय टेक्टोनिक प्लेट - Indian tectonic plate

भारतीय टेक्टोनिक प्लेट पूर्वी गोलार्ध में स्थित एक अपेक्षाकृत छोटी महाद्वीपीय प्लेट है, जो कभी प्राचीन गोंडवाना महाद्वीप का हिस्सा थी। लगभग 10 करोड़ वर्ष पहले यह प्लेट गोंडवाना के अन्य भागों से अलग हो गई और द्वीपीय भारत को साथ लेकर उत्तर दिशा में बढ़ने लगी।

भारतीय टेक्टोनिक प्लेट

एक समय भारतीय प्लेट और ऑस्ट्रेलियाई प्लेट मिलकर इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट मानी जाती थीं, लेकिन हाल के अध्ययनों से संकेत मिलता है कि दोनों प्लेटें कम से कम 30 लाख वर्षों से अलग-अलग व्यवहार कर रही हैं।

आज भारतीय टेक्टोनिक प्लेट में दक्षिण एशिया का अधिकांश भाग, हिंद महासागर के नीचे का एक हिस्सा, पाकिस्तान का कोहिस्तान और बलूचिस्तान, पश्चिमी इंडोनेशिया तथा दक्षिण चीन के कुछ भाग शामिल हैं।

लगभग 14 करोड़ वर्ष पूर्व, भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका के साथ मिलकर गोंडवाना का हिस्सा था। इन भूखंडों के अलग-अलग वेगों से अलग होने के कारण हिंद महासागर का निर्माण हुआ। बाद में, क्रेटेशियस काल के उत्तरार्ध में, भारत मेडागास्कर से भी अलग हो गया और स्वतंत्र द्वीपीय प्लेट बन गया।

भारतीय प्लेट ने लगभग 20 सेमी प्रति वर्ष की तीव्र गति से उत्तर की ओर यात्रा की। सामान्यतः माना जाता है कि इसका एशिया से टकराव लगभग 5.5 करोड़ वर्ष पहले इओसीन युग में शुरू हुआ, हालाँकि कुछ विद्वान इसे 3.5 करोड़ वर्ष पूर्व का मानते हैं।

इस टकराव के परिणामस्वरूप हिमालय पर्वत श्रृंखला और तिब्बती पठार का निर्माण हुआ। इस प्रक्रिया में भू-पर्पटी सिकुड़ी और तलछट पर्वतों के रूप में ऊपर उठी।

कुछ वैज्ञानिकों ने दो चरणों वाले टकराव का सिद्धांत दिया पहला मृदु टकराव (लगभग 50 मिलियन वर्ष पूर्व) और दूसरा कठोर टकराव (लगभग 25 मिलियन वर्ष पूर्व)। हालाँकि, दक्षिणी तिब्बत से प्राप्त नए पुराचुंबकीय प्रमाण इस सिद्धांत का समर्थन नहीं करते है।

2007 में यह प्रस्ताव रखा गया कि भारतीय प्लेट की तेज़ गति का कारण इसका अन्य प्लेटों की तुलना में कम मोटा होना और मेंटल प्लम का प्रभाव था। डेक्कन और राजमहल ट्रैप जैसे विशाल ज्वालामुखीय विस्फोट इसी से जुड़ी मानी जाती हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इन विस्फोटों से निकली गैसों ने क्रेटेशियस-पैलियोजीन विलुप्ति में योगदान दिया।

हालाँकि, 2020 के नए शोध बताते हैं कि प्लेट की तीव्र गति का विचार संभवतः भू-चुंबकीय समय निर्धारण की त्रुटियों के कारण उत्पन्न हुआ भ्रम है।

वर्तमान में, भारतीय टेक्टोनिक प्लेट लगभग 5 सेमी प्रति वर्ष की गति से उत्तर-पूर्व दिशा में बढ़ रही है, जबकि यूरेशियन प्लेट केवल 2 सेमी प्रति वर्ष की गति से आगे बढ़ती है। इसी कारण हिमालय क्षेत्र में निरंतर भूकंपीय गतिविधियाँ और भू-पर्पटी का संकुचन (लगभग 4 मिमी प्रति वर्ष) हो रहा है।

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