छत्तीसगढ़ का इतिहास - chhattisgarh ka itihaas

धान का कटोरा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ आर्य संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है। विभिन्न स्रोतों से ज्ञात होता है की छत्तीसगढ़ का इतिहास मौर्य काल का है। लेकिन महाकाव्यों जैसे रामायण महाभारत से ज्ञात होता है की छत्तीसगढ़ प्राचीन कल से ही अथवा त्रेता युग से ही भारत की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा रहा है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर है। छत्तीसगढ़ पहले मध्यप्रदेस हिस्सा हुआ करता था। 1 नवम्बर सन 2000 को छत्तीसगढ़ का गठन किया गया था। यह 135,192 किमी 2 के क्षेत्रफल के साथ भारत का 9 वां सबसे बड़ा राज्य है। 2020 तक राज्य की आबादी लगभग 29.4 मिलियन थी।

 छत्तीसगढ़ का इतिहास

छत्तीसगढ़ के राजवंश, कबीरधाम का फणिनाग वंश मध्यकालीन भारतीय इतिहास में छत्तीसगढ़ के कवर्धा क्षेत्र में नागवंश का शासन था। जो फणिनाग वंश के नाम से जाना गया। कवर्धा से लगभग 16 किमी की दूरी पर स्थित मड़वा महल नामक मंदिर से विक्रम सम्वत 1406 अर्थात 1349 ई. का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है।

इससे ज्ञात होता है कि राजा रामचन्द्र ने यहां एक शिव मंदिर का निर्माण कर उसके लिए कुछ ग्राम दान में दिए थे। रामचन्द्र का विवाह कलचुरी राजकुमारी अम्बिका देवी के साथ हुआ था। मडवा महल शिलालेख में फणिनाग वंश में अहिराज को नागों का राजा बताया गया है।

तखतपुर एवं राजपुर की स्थापना - तखतसिंह ने तखतपुर की स्थापना सत्रहवीं सदी के अंत में की थी। इसके पश्चात राजसिंह का शासन हुआ। इसने रतनपुर को बसाया था।

जनश्रुतियों के अनुसार वे नि: सन्तान थे, इसका दत्तक पुत्र विष्वनाथ सिंह हुआ था। विश्वनाथ सिंह का विवाह रीवा की राजकुमारी के साथ हुआ था। प्रसिद्ध कवि गोपाल राजसिंह के राजाश्रय में थे। जिन्होंने प्रसिद्ध ग्रन्थ खूब तमाशा लिख था। 1721 ई. में राजसिंह की मृत्यु हो गई।

कलचुरी शासक प्रिथविदेव द्वितीय के राजिम अभिलेख से पता चलता है की उसके सेनापति जगपाल ने वर्तमान कांकेर क्षेत्र को जीता था। इस वंश के कुल पांच अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों के अध्ययन से स्पष्ट होता है की इस वंश का संस्थापक शासक सिंहराज थे।

पहली शाखा के विषय में कर्णराज के सिहावा शिलालेख से जानकारी मिलती है। जिसमें उसे वोपदेव का पुत्र कहा गया है। दूसरी शाखा के विषय में पम्पराज के तहनकापारा से प्राप्त ताम्रपत्र से जानकारी मिलती है। इससे ज्ञात होता है कि पम्पराज के पिता सोमराज , वोपदेव के पुत्र थे। तीसरी शाखा के विषय में भानुदेव के शक सम्वत 1242 अर्थात 1320 ई. के कांकेर शिलालेख से विवरण प्राप्त होता है।

छत्तीसगढ़ का इतिहास - history of Chhattisgarh in Hindi

इससे ज्ञात होता है, की वोपदेव का पुत्र कृष्ण हुआ था। कृष्ण के पश्चात जैतराम हुआ था। जैतराम कांकेर में राज्य करता था। इसका पुत्र सोमचन्द्र हुआ और सोमचन्द्र के पुत्र भानुदेव के समय में यह लेख उत्कीर्ण कराया था।
अनुमान किया जाता है की सिंहराज से भानुदेव तक कांकेर के क्षेत्र में सोमवंशी शासकों ने शासन किया था।    

कलचुरिकालीन शासन 

महाकौशल क्षेत्र में शासन स्थापित करने के बाद कलचुरियों ने शासन-व्यवस्था स्थापित की थी , आरम्भ में छत्तीसगढ़ शाखा में उसी के अनुरूप व्यवस्था स्थापित की गई। किन्तु कालांतर में त्रिपुर से अलग होने के पश्चात रतनपुर के शासकों ने स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप शासन व्यवस्था विकसित की। कल्याण साय के समय की सोलहवीं सदी के मध्य की लेखपुस्तीका को आधार मानकर श्री चिशम ने 1868 ई. कलचुरी शासन प्रबन्ध पर एक लेख लिखा है , जिससे कलचुरीकालीन प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

छत्तीसगढ़ में मध्यकालीन शासन प्रबंधन को जानने के लिए कलचुरियों की शासन व्यवस्था पर विचार करना आवश्यक है। तुम्माण बिलासपुर जिले में एक सुक्षित पर्वतीय स्थान है ,जिसे तुमान-खोल कहा जाता है। गोपाल कवि रतनपुर राज्य में राजसिंह के राजदरबार में निवास करते थे। चिंतामणि तथा रामप्रसाद दोनों प्रबन्ध काव्य हैं। इनमें एक कृष्ण तो दूसरा राम काव्य है। कृष्ण राज ने हैहयवंशियों की प्राचीन राजधानी महिष्मति को ही नहीं लूटा , बल्कि उसका वंश भी ले लिया और स्वयं अपने को हैहयवंशी घोषित कर लिया।

छत्तीसगढ़ का मध्यकाल इतिहास 

जैसे की उनका शसन काल 550 से 1740 ई. तक लगभग 1200 वर्ष तक था जो सायद ही किसी और ने इतने दिन शासन किया हो। रतनपुर से रायपुर में का शासन 1020 ई. तक किया इसके बाद कोल्ल देव द्वितीय था जिसका उत्तरा धिकरी कमलराज था।

कमलराज - 1020-45 ई.कलिंगराज का उत्तरा धिकरी उसका पुत्र कमलराज 1020 ई. में शासन हुआ था। त्रिपुरी कलचुरी के शासन गांगेयदेव द्वारा उड़ीसा पर आक्रमण के समय कमलराज ने उसकी सहायता की थी। 

रतनदेव अथवा रतन राज प्रथम - 1045-65 ई. इसने 1050 ई. में रतनपुर नामक नगर कि स्थापना कर राजधानी तुममान से रतनपुर स्थानांतरित कि थी । प्रसिद्ध महामाया मन्दिर का निर्माण रतनदेव द्वारा कराया गया था।

पृथ्वी देव प्रथम - 1065-95 ई.इसके शासनकाल की सर्व प्रथम तिथी रायपुर ताम्र पत्र से कलचुरी सम्वत 821 अर्थात 1095 ई. ज्ञात होती है। इसने ' सकल कोशलाधिपति ' की उपाधि धारण की थी तथा वह कोशल के इक्कीस हजार ग्रामों का अधिपति था।

जाजल्लदेव प्रथम - 1095-1120 ई. जाजल्लदेव प्रथम अपने पिता प्रिथविदेव प्रथम के बाद लगभग 1095 ई. में रतनपुर का शासक हुआ। इसके रतनपुर के शिलालेख में इसकी विजयों का विवरण मिलता है। जाजल्लदेव ने चक्रकोट के छिंदक नागवंशी शासक सोमेश्वर को दण्ड देने के उद्देश्य से उसकी राजधानी को जला दिया तथा उसे मंत्रियों और रानियों सहित कैद कर लिया था , किन्तु उसकी माता के अनुरोध पर मुक्त भी कर दिया था।

इसने जाजल्यदेव नगर { वर्तमान जांजगीर } की स्थापना की तथा पाली के शिव मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया था , जो आज भी सुरक्षितः है। इसने अपने स्वर्ण सिक्कों पर  ' श्रीमज्जाजल्यदेव ' एवं ' गजशार्दूल ' अंकित करवाया था।

रतनदेव द्वितीय - 1120-35 ई. जाजल्लदेव प्रथम। के के पश्चात रंतनदेव द्वितीय कलचुरी सम्वत 878 अर्थात 1127 ई. में शासक हुआ था। इसने त्रिपुर के कलचुरियों की अधिसत्ता को अस्वीकार कर दिया। अतः त्रीपुर के राजा गयाकर्ण ने इस पर आक्रमण किया था , किन्तु उसे सफलता नही प्राप्त हुई।

इसी समय गंग वंशी राजा अन्नंत वर्मा चोड़गंग ने भी रतन पुर के कलचुरी राज्य पर आक्रमण किया , किन्तु शिवरीनारायण के पास हुए युद्ध में उसे पराजित होकर लौटना पड़ा। इसके पश्चात जाजल्लदेव ने गोंड देश पर आक्रमण कर वहां के राजा को पराजित किया था।

पृथ्वी देव द्वितीय - 1135-65 ई.रतनदेव द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका पुत्र प्रिथविदेव द्वितीय हुआ था। उसका सरवपर्थम अभिलेख कलचुरी सम्वत 890 अर्थात 1138 ई. का है। इसके शासनकाल में रतनपुर का कलचुरी साम्राज्य अत्यंत विस्तृत हो गया था। उसका अंतिम रतनपुर अभीलेख कलचुरी सम्वत 915 अर्थात 1163 ई. का है।

जाजल्यदेव द्वितीय - 1165-78 ई. रतनपुर के सिंहासन पर प्रिथविदेव द्वितिय का उत्तराधिकारी जाजल्लदेव द्वितीय हुआ था। इसके शासन की सरवपर्थम ज्ञात तिथियाँ मल्हार शिलालेख से कलचुरी सम्वत 919 अर्थात 1167 ई. से मिलती है। इसके शासन काल में त्रिपुरी के कलचुरी राजा जयसिंह ने आक्रमण किया था , किन्तु वह असफल रहा था।

रतनदेव तृतीय - 1178-98 ई. जगददेव के पश्चात उसके पुत्र रतन देव तृतीय के विषय में जानकारी खरौद शिलालेख से मिलती है। यह जगददेव की सोमल्ला का पुत्र था। इसके शासनकाल में अराजकता की स्थिति निर्मित हो गई थी , इससे निपटने के लिए उसने एक ब्राम्हण गंगाधर को प्रधानमंत्री बनाया और उसकी सहायता से उसने स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त किया था। गंगाधर ने खरौद के लखनेश्वर मन्दिर के सभी मण्डपों का जीर्णोद्धार कराया था।

प्रतापमल्ल - 1198-1222 ई.रतनदेव द्वितीय के पश्चात शासक हुआ था। उसके तीन ताम्रपत्र पेंण्ड्राबंध कोनारी एवं बिलाईगढ़ नामक स्थानों से क्रमशः 1213, 1216 एवं 1217 ई. {सम्वत 965, 968 एवं 969 } के प्राप्त हुए हैं। इसके ताँबे के चक्राकार एवं षटकोणाकार सिक्के प्राप्त हुए हैं , जिसमें सिंह और कटार की आकृति मिलती हैं।

इसी शासन काल में जसराज अथवा यशोराज नामक एक कलचुरियों का सामन्त हुआ था। इसका उल्लेख बोरिया मूर्तिलेख कवर्धा के निकट कलचुरी सम्वत 910 तथा सहसपुर के सहस्रबाहु प्रतिमा लेख कलचुरी सम्वत 934 में मिलता है। इस प्रकार इसका काल 1158 से 1182 ई. ज्ञात है।

वाहरेंद्र अथवा बाहरसाय - 1480-1525 ई. इसका एक। अभिलेख रतनपुर के विक्रम सम्वत 1552 {1495-96 ई.} तथा दो शिलालेख कोसंगई से प्राप्त हुए हैं ,इनमें से एक विक्रम सम्वत 1570 अर्थात 1513 ई. का है तथा दूसरा तिथीहीन हैं।

वाहरेंद्र रतनदेव का पुत्र था। वाहरेंद्र के काल में राजधानी रतनपुर से कोसंगा { कोसंगईगढ़ वर्तमान छुरी } स्थानांतरित कर दी गी थी। इसके शासनकाल में पठानों का आक्रमण हुआ था तथा इसने उन्हें सोन नदी तक खदेड़ दिया था। सिंघण के पूर्ववर्ती एक शासक लक्षमिदेव का उल्लेख रायपुर के ब्रम्हदेव के अभिलेखों से मिलता है। वाहरेंद्र का शासनकाल 1480-1525 ई. तक माना जाता है।

कल्याण साय - कल्याण साय मुगल सम्राट अकबर का समकालीन शासक था तथा उसके दरबार में लगभग आठ वर्ष रहा था। इसके समय राज्य की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। इस समय सम्पूर्ण राज्य से होने वाली वार्षिक आय ₹ 6.50 लाख थी। उसका शासन 1581 ई. तक चलता रहा और इस समय तक रतनपुर का कलचुरी राज्य अपनी प्रौढ़ता को प्राप्त कर चुका था। बाद के शासकों का शासन उल्लेखनीय नहीं रहा और यह क्रमशः क्षीणता की ओर अग्रसर होने लगा था। 

इस प्रकार कलचुरी वंश का शासन काल बस यही तक मालूम है अगर आपको इस बारे में कुछ पता हो तो शेयर जरूर करें। 

छत्तीसगढ़ का प्रागैतिहासिक काल

वह काल जिसके लिए कोई साक्ष्य उपलब्ध नही है तथा उस समय मानव कम सभ्य था, प्रागेतीहासिक काल कहलाता है। प्रागैतिहासिक मानव इतिहास की उस अवधि के लिए प्रयुक्त होता है , जिसमें लेखन की व्यवस्था। न थी।  इस अर्थ मे आदि कालिन समाज के कल को ' पूर्व इतिहास ' कहते हैं।

महाकाव्य काल

वाल्मीकि कृत 'रामायण ' के अनुसार , राम की माता कौशिल्या राजा भानुमंत की पुत्री थी I 'कोशल खण्ड ' नामक एक अप्रकाशित ग्रन्थ से ये जानकारी मिलती है की विंध्य पर्वत के दक्षिण मे नागप्ततन के पास कोशल नामक एक शक्तिसाली राजा था I इसके नाम पर ही इस छेत्र का नाम कोशल पड़ा था। राजा कोशल के रजवंस मे भानुमंत नामक राजा हुआ, जिसकी पुत्री कौशिल्या का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ था I भानुमंत का कोई पुत्र नही था, अतः कोशल [छत्तीसगढ़] का राज्य राजा दशरथ को प्राप्त हुआ। अतः राजा दशरथ के पूर्व ही इस क्षेत्र का नाम 'कोशल ' होना प्राप्त होता है।

माहाजनपद काल 

भारतीय इतिहास मे छटी शताब्दी ई. का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि इसी समय से भारत का सुबयवस्थित इतिहास मिलता है।  इसके साथ ही यह बुध्द एवं माहाविर का इतिहास काल है  इसमें देश अनेक जनपदों एवं महाजनपदों मे विभक्त था।  छत्तीसगढ़ का वर्तमान क्षेत्र भी [ दक्षिण ] कोशल के नाम से एक पृथक प्रशासनिक इकाई था , मौर्यकाल के पूर्व के सिक्कों की प्राप्ति से इस अवधारणा की पुष्ठी होति है।

'अवदान शतक ' नामक ग्रन्थ के अनुसार , महात्मा बुद्ध दक्षिण कोशल आये थे तथा तीन महीनों तक यहां की राजधानी मे परवाश किया था।  ऐसी जानकारी बौद्ध यात्री हैंनसांग के यात्रा वरीत्तान्त से भी मिलता है।

मौर्यकाल

प्राचीन ध्वंसावसेसों, पुराणों और शिलालेखों से ज्ञात होता है की इस राज्य पर बौद्ध राजाओ का आधिपत्य था I
इस  क्षेत्र का इतिहास स्वावलंबी न होकर बहुत कुछ परावलम्बी है , क्योंकि यहां बहुधा ऐसे लोगों ने सासन किया है। मौर्य सम्राट अशोक ने दक्षिण कोसल की राजधानी मे स्तूप का निर्माण करवाया था I इस काल के दो अभिलेख सरगुजा जिले मे मिलते हैं।  इससे यह प्रमाणित होता है की दक्षिण कोशल [ छत्तीसगढ़ ] मे मौर्य वंश का शासन रहा , जिसका काल 323 से 184 ई. पु. के बीच रहा है।

उत्तर मौर्यकाल

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत के विभिन्न भागों मे चार प्रमुख राजवंसों का उदय हुआ , जो इस प्रकार हैं
मगध राज्य जहां ' शुंगों ' का प्रभाव था।  कलिंग का राज्य, जहां चेदि वंश की सत्ता कायम हुई।  दक्षिण-पथ में सातवाहन का राज्य था। पश्चिम भाग में यवनों के प्रभाव का। उदय।

सातवाहन वंश 

मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात दक्षिण भारत में सातवाहन राज्य की स्थापना हुइ। दक्षिण कोशल का अधिकांश भाग सातवाहनों के क्षेत्र मे था। इस वंश के शासक अपने को दक्षिण पथ का श्वामि कहते थे। इस वंश मे अनेक शासक साम्राज्यवादी प्रवित्ति के थे। शातकर्णि प्रथम ने अपने राज्य का विस्तार जबलपुर तक किया। इस प्रकार त्रिपुरी सातवाहनों के प्रभाव मे आ गया। सातवाहन कालीन सिक्के बिलासपुर जिले मे पाये गए है। इनके शासन काल में आर्य संस्कृति का विस्तार दक्षिण मे वयापक रूप से हुआ। यह कल 200  ईसा पूर्व से 60 ईशा पूर्व के मध्य का है। सातवाहन राजा अपीलक की एकमात्र मुद्रा रायगढ़ जिले के ' बालपुर ' नामक स्थल से प्राप्त हुई है।

मेघ वंश

सातवाहनों के पश्चात कोशल में मेघ नामक वंश ने राज्य किया I पुराणों के विवरण से ज्ञात होता है की गुप्तों से उदय के पूर्व कोशल में मेघ वंश ने राज्य किया। सम्भवतः इस वंश ने द्वितीय शताब्दी ई . तक राज्य किया।

वाकाटक काल

सातवाहन के पतन के पश्चात वाकाटकों का अभ्युदय हुआ I वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय के बालाघाट ताम्र पत्र से ज्ञात होता है की उसके पिता नरेंद्र ने कोशल के साथ मालवा और मैकाल मे अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। नरेंद्रसेन और प्रिथविसेन द्वितीय का संघर्ष बस्तर कोरापुट क्षेत्र में राज्य करने वाले नल शासकों से होता रहा।
 नल शासक भवदत्त वर्मा ने नरेंद्र की राजधानी नन्दीवर्धदन [ नागपुर ] पर आक्रमण कर उसे पराजित किया था , किन्तु उसके पुत्र प्रिथविसेन द्वितीय ने इसका बदला लिया और भवदत्त के उत्तराधिकारी अर्थपति को पराजित किया।  सम्भवतः इस युद्ध मे अर्थपति की मृत्यु हो गयी थी।  कालांतर मे वाकाटकों के वट्सगुल्य शाखा के राजा हरिसेन ने दक्षिन कोसल क्षेत्र मे अपना अधिकार स्थापित किया।

गुप्तकाल 

उत्तर भारत मे शुंग एवं कुषाण सत्ता के पश्चात गुप्त वंश ने राज्य किया तथा दक्षिण भारत में सातवाहन शक्ति के पराभव के पश्चात गुप्त राज्य वंश की स्थापना हुई I चौथी सदि में समुद्रगुप्त गुप्तवंश का एक अत्यंत ही परभावशालि और साम्राज्यवादी शासक हुआ I उसने संपूण आर्यावर्त को जितने के पश्चात दक्षिण पथ की विजय यात्रा की।  उसने दक्षिण कोशल के शासकों महेंद्र और व्याघ्रराज {बस्तर शासक } को पराजित कर आगे परथान किया इन शासकों ने गुप्त शासको की आधीनता स्वीकार कर अपने अपने क्षेत्र मे शासन किया।

राजर्षितुल्य वंश

पांचवी सताब्दी के आसपास दक्षिण कोशल में राजर्षितुल्य नामक नागवंश का शासन था I इसके प्रमाण आरनग से प्राप्त ताम्र पत्र गुप्त सम्वत 182 या 282 से मिलता है।  उससे राजर्शितुल्य वंश के शासक भीमसेन द्वितीय का पता चलता है I महाराज सर ने इस वंश की वंशावली आरम्भ की।

वराह वंश 

महाराज तुष्टिकर के तेरासिंघा ताम्र पत्र से तेल घाटी मे शासन करने वाले राव वंश के विषय मे जानकारी मिलती है।  इस लेख से पता चलता है की इस वंश के लोग स्तम्भस्वरी देवी के उपासक थे , जिसका स्थान पर्वतद्वारक मे था , जिसकी समानता कालाहांडी जिले के पर्थला नामक स्थल की जाती है I परवतद्वारक वंश का नाम इसी आधार पर पड़ा था , जिसके अधिकार क्षेत्र मे दक्षिण कोशल का दक्षिणी भाग आता था।

शर्भपुरीया वंश

इस वंश का संस्थापक सर्भ नामक राजा था I सर्भ का उत्तराधिकारी उसका पुत्र नरेंद्र हुआ , जिसके काल का ताम्र पत्र कुरुद से प्राप्त हुआ I प्रसन्नमात्र इस वंश का प्रतापी  राजा था , जिसके समय के सोने के सिक्के छत्तीसगढ़ के कई स्थानों से मिले हैं I इस वंश का अंतिम नरेश प्रवरराज था।

नल नागवंश

बस्तर जिले के अड़ेगा से प्राप्त स्वर्ण मुद्राएं यह प्रमाणित करती हैं कि बस्तर कोरापुट अंचल में नलवनशिय शासकों का शासन था। नल नागवंश की स्थापना शिशुक ने सम्भवतः 290 ई. में की थी I इस वंश का प्रतापी शासन भवदत्त वर्मन था , जिसने इस वंश की सत्ता का विस्तार किया I दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कलचुरियों के आक्रमणों से पराजित होने के कारण नल शासक सत्ता विहीन हो गए।

बाल वंश 

बिलासपुर से 12 मिल उत्तर में पाली नामक स्थल के मन्दिर के गर्भ गृह के द्वार में उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होत्या हैं की इस मंदिर का निर्माण महामण्डलेश्वर मल्लदेव के पुत्र विकर्मादिय के द्वारा किया गया था I विक्रमादित्य को बाण वंश का राजा माना जाता है , जिसका काल नॉवि शताबदी माना गया है।

सोम वंश

सोम वंश के शिवगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र महाभवगुप्त प्रथम हुआ। 
इसने ' कौशलेन्द्र ' और त्रीकलिंगापति की उपाधि धारण की थी। 
इसने सुवर्णपुर, मुरसीम, आराम आदि स्थानों मे राजधानी परिवर्तित की थी। 
महाशिवगुप्त का उत्तराधिकारी ययाति प्रथम था।

पांडव वंश

अमरकंटक के आस पास का क्षेत्र मैकाल के नाम से जाना जाता है। यह पाण्डुवंशियों की एक शाखा के राज्य करने के विषय में शरतबल के बहमनी ताम्रपत्र से जानकारी मिलती है। प्रारम्भिक दो राजाओं जयबल तथा वत्सराज के साथ कोई राजकीय उपाधि प्रयुक्त नहीं हुई है। इसके बाद नागबल के लिए महाराज उपाधि का प्रयोग किया गया है। इसके पुत्र भर्टबल के समय का ऊपर उल्लेखित ताम्रपत्र में इसकी रानी लोकपरकासा का उल्लेख है , जो नरेंद्र की बहन थी। इस नरेंद्र को शर्भमपुरीय शासक नरेंद्र से समीकृत किया गया है।

बाण वंश 

छत्तीसगढ़ में पाण्डु वंशी सत्ता की समाप्ति में बाणवनशीय शासकों का भी योग था। कोरबा जिले में पाली नामक स्थल में मंदिर के गर्भगृह के द्वार में उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होता है की इस मंदिर का निर्माण महामण्डलेस्वर मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वारा किया गया था। 

विक्रमादित्य को बाण वंश का राजा माना गया है , जिसका काल 870 से 895 ई. माना गया है। बाणवंशी शासकों ने सम्भवतः दक्षिण कोशल के सोमवंशियों को बिलासपुर क्षेत्र में पराजित किया था। कालांतर में कलचुरी शासक शंकरगण द्वितीय मुग्धतुन्ग ने इनसे पाली क्षेत्र जीत लिया और अपने भाइयों को इस क्षेत्र में मण्डलेशवर बनाकर भेजा जिन्होंने दक्षिण कोशल में कलचुरी राजवंश की स्थापना की।

चीनी यात्री हैंनशांग ने सिरपुर को ' किया-स-लो ' के नाम से उल्लेखित किया है। ईशानदेव का का उल्लेख खरोद { बिलासपुर } के लक्षमनेस्वर मंदिर के सिलालेख में मिलता है। अजन्ता अभिलेख में नरेंद्र सेन के चचेरे भाई हरिषेण को कोशल , कलिंग और आंध्र का विजेता बताया गया है। रोम के सोने के सिक्के बिलासपुर और चकरबेढ़ा नामक गांव से प्राप्त हुई है।

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