पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन परिचय - padum lal punnalal bakshi jivan parichay

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन परिचय

द्विवेदी युग के प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी का जन्म छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ राज्य में 21 जून, 1894 ई. में हुआ। ये पचपन वर्ष तक साहित्य साधना करते रहे। ये 28 दिसम्बर, 1971 में रायपुर के डी. के. अस्पताल में दिवंगत हो गये। इनके पिता का नाम पुन्नालाल था। वे सम्पादक तथा अध्यापक दोनों रहे। 

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन परिचय - padum lal punnalal bakshi jivan parichay

द्विवेदी जी के अवकाश ग्रहण करने के बाद बख्शी जी सरस्वती के 9 वर्ष तक सम्पादक रहे। इन्होंने बी.ए. तक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की रचना

1. निबन्ध - प्रदीप, पंचपात्र, मेरे प्रिय निबन्ध, 2. कविता - शतदल, 3. कहानी - झलमला, 4. इतिहास - हिन्दी साहित्य विमर्श, विश्व साहित्य, हिन्दी कहानी साहित्य।

विषय वस्तु - बख्शी जी के निबन्धों के विषय साहित्यिक तथा सामाजिक दोनों प्रकार के हैं। द्विवेदी युग की छाप उन पर थी। वे नवीन युग के निर्माण के लिए उत्सुक और आतुर थे। युगीन विचारों का प्रतिपादन उनके निबन्धों में हुआ। दर्शन, इतिहास तथा आध्यात्म से सम्बन्धित विषयों पर भी उन्होंने गम्भीर निबन्ध लिखे हैं। इनके अधिकांश आलोचनात्मक निबन्धों में तत्कालीन सामाजिक जीवन की आलोचना तथा साहित्य सिद्धान्तों की विवेचना हुई। भावात्मक निबन्ध भी इन्होंने लिखे हैं।

भाषा - बख्शी जी की भाषा सजीव, प्रभावपूर्ण एवं सरस है। इनकी भाषा तत्सम प्रधान है। उन्होंने उर्दू, फारसी तथा अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग किया है। भाषा को सरल बनाने का उन्होंने भरसक प्रयास किया। इनकी भाषा में मुहावरों तथा लोकोक्तियों का भी सुन्दर प्रयोग हुआ है। छोटे-छोटे वाक्यों के भावों को व्यक्त करने में ये निपुण थे। इनकी भाषा भावों के अनुकूल सरल तथा गम्भीर है।

शैली - बख्शी जी के निबन्धों में प्रमुखत: विवेचनात्मक एवं भावात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त व्यंग्यात्मक शैली, उद्धरण शैली आदि का भी प्रयोग हुआ है। हास्य का पुट बख्शी जी की विशेषता है। गम्भीर मौलिक विचारों को विनोद का पुट देकर कहानी जैसी रोचकता उत्पन्न कर देना आपकी शैली की विशेषता है।

विवेचनात्मक शैली में उन्होंने संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया है, जिसमें वह प्रवाह है, सरसता है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित पंक्तियों को देखें - आधुनिक हिन्दी साहित्य में तरुण दल के द्वारा जो नव साहित्य निर्मित होता जा रहा है, उसमें तारुण्य की स्फूर्ति है, कामना है और विद्रोह है।

भावात्मक शैली – बख्शी जी जब भावुकता के आवेश में आते हैं, तो वह गद्य में ही काव्य का आभास देने लगते हैं। इनके ‘साहित्य और विज्ञान' शीर्षक निबन्ध की ये पंक्तियाँ इस बात को सिद्ध करती हैं - साम्राज्य नष्ट हो जायेंगे, उनकी विशाल राशि क्षण भर में विलीन हो जायेगी, ऐश्वर्य की विशाल अट्टालिका पल भर में धराशायी हो जायेगी, परन्तु साहित्य के उपवन में नवीन कुसुम खिलते ही रहेंगे। स्पष्टता, गम्भीरता, प्रभावोत्पादकता और स्वाभाविकता उनकी शैली की विशेषताएँ हैं।

साहित्य में स्थान - बख्शी जी द्विवेदी युगीन प्रतिष्ठित साहित्यकारों में से हैं। 'सरस्वती' जैसी प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका का सालों सम्पादक रहना कम प्रतिष्ठा की बात नहीं है। राष्ट्र और समाज की प्रगति के लिए वे जागरूक रहे । हिन्दी साहित्य में बख्शी जी का विशिष्ट स्थान है। विषय की विविधता, भाषा की सरलता एवं सरसता के लिए आप सदैव सम्मानित रहेंगे।

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