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शब्द भंडार के कितने स्रोत है?

 शब्द भंडार के स्रोत

दो या दो से अधिक वर्णो के सार्थक मेल को शब्द कहते हैं जिसका एक निश्चित अर्थ होता है। इस प्रकार अर्थ पूर्ण शब्दों का कोष या खजाना शब्द भंडार कहलाता है। 

शब्द भंडार का तात्पर्य किसी भाषा में शब्दों का कितनी अधिक मात्रा में पाए जाने से है। हिंदी में भंडार का मतलब खजाना होता है। 

शब्द भंडार के कितने स्रोत

शब्द भंडार के स्त्रोत उतने ही है जितने की विश्व में भाषाऐं बोली जाती हैं। आज पुरे विश्व में एक नहीं बल्कि अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। इस प्रकार शब्द भंडार के भी अनेक स्त्रोत हैं। 

अगर हम बात करें हिंदी भाषा में शब्द भंडार की तो मुख्य रूप से इसमें जो शब्द लिए गए हैं वो शब्द संस्कृत भाषा से है। साथ ही अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के शब्द भी इसमें शामिल हैं। 

आइये जानते हैं विस्तार से 

हिंदी में शब्द भंडार के कितने स्त्रोत हैं -

भाषा की उन्नति तथा बढ़ते रहे ऐसे विकास के लिए उसका शब्द-समूह विशेष स्थान रखता है। भाषा-विकास के साथ उसकी किसी भी तरह के हाल बताने की शक्ति में भी वृध्दि होती है। इस प्रकार भाषा में हमेशा नए नए परिवर्तन होते रहते हैं। किसी भी एक भाषा का सम्बन्ध विश्व भर की अन्य भाषाओं से होता ही है इस बात से अब नकारा नहीं जा सकता। विभिन्न भाषा-भाषाओं के अपने विचार होते हैं, और उनके भावों के आदान-प्रदान से भाषाओं के जो विशिष्ट शब्द होते हैं उनका भी एक साथ मिलन हो जाता है। इस प्रकार जो भाषाओं के शब्द-भण्डार या शब्दों के भंडार को उस भाषा का या कोई भी भाषा हो उस भाषा का शब्द-समूह कहा जाता है। विश्व भर की अनेक भाषाओं की तरह हिन्दी के जो शब्द-समूह हैं उनको तीन भागों में बांटा जा सकता है जो की इस प्रकार है -- 

  1. परम्परागत शब्द 
  2. देशज(देशी) शब्द 
  3. विदेशी शब्द। 

1.) परम्परागत शब्द:- जैसे की नाम से ही पता चलता है परम्परा (मतलब पीढ़ी दर पीढ़ी आने वाला कोई कार्य या नियम कुछ भी जो हमारे पूर्वजों से आता है) परम्परागत शब्द हिंदी भाषा को विरासत में मिलते हैं। हिन्दी में ये शब्द संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश की परम्परा से आए हैं। 

ये शब्द तीन प्रकार के हैं- 

  1. तत्सम शब्द, 
  2. अर्द्ध तत्सम, 
  3. तद्भव शब्द। 
 1.  तत्सम शब्द:- तत्सम शब्द उन शब्दों को कहा जाता है जो की हिंदी अर्थ में संस्कृत के समान ही नहीं , अपितु शुध्द संस्कृत के शब्द जो हिन्दी में ज्यों के त्यों प्रयोग किये जाते हैं। उन्हें ही तत्सम शब्द कहा जाता है। हिन्दी में स्त्रोत की दृष्टि से तत्सम शब्दों के चार प्रकार हैं-- 

1. संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश से होकर हिन्दी में आने वाले तत्सम शब्द; जैसे- अचल, अध, काल, दण्ड आदि। 

2. संस्कृत से सीधा-सीधा हिन्दी में आने वाले शब्द जो की भक्ति काल, आधुनिक काल जैसे आदि विभिन्न कालों में लिए गए शब्द शब्द हैं; जैसे- कर्म, विधा, ज्ञान, क्षेत्र, कृष्ण, पुस्तक आदि। 

3. संस्कृत व्याकरण के नियमों के आधार पर हिन्दी के समय में निर्मित तत्सम शब्द; जैसे- जलवायु (आब हवा), वायुयान (ऐरोप्लेन), प्राध्यापक (Lecturer) आदि। 

4. अन्य भाषाओं से हिंदी में आए तत्सम शब्द। इस वर्ग के शब्दों की संख्या बहुत कम है। कुछ या कहें बहुत कम शब्द बंगाली तथा मराठी के माध्यम से हिन्दी में आ गए हैं। जैसे- उपन्यास, गल्प, कविराज, सन्देश, धन्यवाद आदि उसी प्रकार बात करें बंगाली शब्द की तो वो इस प्रकार है , प्रगति, वाड्मय आदि मराठी शब्द है। 

2. अर्ध तत्सम शब्द:- जैसे की नाम से पता चलता है ऐसे अर्ध तत्सम शब्द मतलब जो आधे आधे  हैं मतलब की जो न तो पूरी तरह तत्सम है और न नहीं किसी तरह के अन्य भाषा के भाव को व्यक्त करता है। अन्य शब्दों में कहें  तो तत्सम शब्द और तद्भव शब्द के बीच या मध्य की स्थिति के शब्द अर्थात् जो पूरी तरह तद्भव भी नहीं है और पूरी तरह से तत्सम भी नहीं है। ऐसे शब्दों को ही डा. ग्रियर्सन, डा. चटर्जी आदि भाषा वैज्ञानिकों ने 'अर्ध तत्सम' कहा है आगे देखें; जैसे- 'कृष्ण' तत्सम शब्द है यह आपको पता होगा, लेकिन कान्हा, और कन्हैया जैसे शब्द उसके तद्भव रूप हैं, परन्तु हम इन शब्दों को देखें जैसे किशुन, किशन जो की न तो तत्सम है और न तद्भव शब्द हैं; अत: इन्हें अध्र्द तत्सम कहा गया है। 

3. तद्भव शब्द:- तद्भव जैसे की इसका हिंदी अर्थ है जैसे भाव मतलब की तद्भव शब्द का अर्थ संस्कृत से उत्पन्न शब्द या संस्कृत से विकसित शब्द, अनेक कारण से संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं की ध्वनियाँ घिस-पीट कर हिन्दी भाषा तक आते-आते बदल गयी हैं। जिसका परिणाम यह हुआ की पूवर्वती आर्य भाषाओं के शब्दों के जो रूप हमें प्राप्त हुए हैं, उन्हें तद्भव कहा जाता है। हिन्दी में प्राय: सभी शब्द की बात करें तो सारे शब्द तद्भव शब्द हैं। बात करें हिंदी भाषा में इन शब्दों की तो संज्ञापदों या संज्ञा शब्दों की संख्या सबसे अधिक हमें देखने को मिलती है, किन्तु इनका व्यवहार देश, काल, पात्र आदि के अनुसार थोडा़ बहुत कम-ज्यादा होता रहता है। जैसे- अंधकार से अंधेरा, अग्नि से आग, अट्टालिका से अटारी, रात्रि से रात आदि। 

2.) देशज (देशी):- देशी शब्द का अर्थ है अपने देश (भारत) में, उत्पन्न जो शब्द न विदेशी है, न तत्सम हैं और न तद्भव हैं। देशज या देशी शब्द के नाम निर्धारण के विषय में विभिन्न विद्दानों में पर्याप्त मतभेद देखने को मिलता है। विभिन्न विद्वानों ने इसे निम्न नाम दिए हैं भरतमुनि ने इसे 'देशीमत' नाम दिया है, चण्ड ने 'देशी प्रसिध्द' तथा मार्कण्डेय तथा हेमचन्द्र जैसे कवि ने इसे 'देशा' या देशी कहा है। डा. शयामसुन्दरदास तथा डा. भोलानाथ तिवारी ने इसे 'अज्ञात व्युत्पत्तिक' कहा है। अत: देशज शब्द दो प्रकार के हैं-- 

1. एक वे जो अनार्य भाषाओं अर्थात द्रविड़ भाषाओं से लिए गये हैं और दूसरे 

2.) वे जो लोगों ने ध्वनियों की नकल से अपना लिए हैं। 

(क) द्रविड़ भाषाओं से शब्द-- उड़द, ओसारा, कच्चा, कटोरा कुटी आदि। 

(ख) अपनी गठन से बने शब्द-- अंडबंड, ऊटपटाँग, किलकारी, भोंपू आदि। 

3.) विदेशी शब्द:- जो शब्द विदेशी भाषाओं जैसे - अंग्रेजी, कनैडियन, चीनी आदि से हिंदी भाषा के शब्दों में लिये गये हैं अथवा आ गये हैं, वे विदेशी शब्द कहलाते हैं। मुस्लिम तथा अंग्रेज शासकों के वजह से उनकी भाषाओं के शब्द हिन्दी में बहुत अधिक मात्रा में आये हैं। फारसी, अरबी तथा तुर्की शब्द भी हिन्दी में लिए गये हैं। वाणिज्य, व्यवसाय, शासन, ज्ञान-विज्ञान तथा भौगोलिक आदि का अध्ययन इसके कारण हो सकते हैं, साथ ही ऐतिहासिक,सांस्कृतिक, आर्थिक कारण भी हो सकते हैं। 

डा. धीरेन्द्र वर्मा ने ऐसे शब्दों के लिए 'उध्दत शब्द' का प्रयोग किया है। और डा. हरदेव बाहरी ने इन्हें 'आयात' शब्द कहा है। हिन्दी में इसके लिए 'विदेशी शब्द' संज्ञा बहुप्रयुक्त होती रही है, यह शब्द तुर्की, अरबी, फारसी आदि एशिया की भाषाओं से, और अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली आदि यूरोपीय भाषाओं से आये हैं। 

उदाहरण-- (क) तुर्की शब्द जो हिंदी में प्रयुक्त किये जाते हैं :- तुर्कीस्तान, विशेषत: पूर्वी प्रदेश से भी भारत का जो सम्बन्ध वह प्राचीन है। यह सम्बन्ध धर्म, व्यापार तथा राजनीति आदि स्तरों पर था। ई.स. 100 के बाद तुर्क बादशाहों के राज्यस्थापना के कारण हिन्दी में तुर्की से बहुत से शब्द आए। 

डा. चटर्जी, डा. वर्मा ने तुर्की शब्दों को प्राय: फारसी माध्यम से आया ऐसा मानते हैं, किन्तु डा.भोलानाथ तिवारी जी का यह मानना  है की तुर्की से ही हिंदी में आया मानते है। हिन्दी में तुर्की शब्द कितने हैं, इस सन्दर्भ में मतभेद हैं। डा. चटर्जी के अनुसार लगभग 100 है। जैसे- उर्दू, कालीन, काबू, कैंची, कुली, चाकू, चम्मच, चेचक, तोप, दरोगा, बारूद, बेगम, लाश, बहादुर आदि। 

(ख) अरबी भाषा से हिंदी भाषा में आये शब्द:- 1000 ई. के बाद मुसलमान शासकों के साथ फारसी भाषा भारत में आई और उसी भाषा में पढ़ाई-लिखाई होने लगी जिसके फ़ारसी के शब्द हिंदी में आ गए। कचहरियों में भी इन शब्दों को स्थान मिलने लगा। इसी प्रकार उन शब्दों का हिन्दी पर बहुत गहरा प्रभाव पडा़। हिन्दी में जो फारसी शब्द आए, उनमें काफी शब्द अरबी भाषा के भी थे। अरब से कभी भारत का सीधा सम्बन्ध हुआ करता था, और आज जो शब्द हमारी भाषाओं के महत्वपूर्ण अंग या कहें भाग बन चुके हैं, डा. भोलानाथ तिवारी के अनुसार छ: हजार जो शब्द है हिंदी भाषा में वह फारसी भाषा के शब्द हैं जिनमें 2500 अरबी के है। जैसे कि-- अजब, अजीब, अदालत, अक्ल, अल्लाह, आखिर, आदमी, इनाम,एहसान, किताब, ईमान आदि। 

(ग) फ्रांसीसी भाषा से हिंदी भाषा में आये शब्द:- अगर हम इतिहास की बात करें तो भारत और ईरान के सम्बन्ध बहुत पुराने हैं। इससे भाषा विज्ञान जगत इस बात से पूर्णत: अवगत है कि ईरानी और भारतीय आर्य भाषाएँ एक ही मूल भारत-ईरानी से विकसित हैं। यही कारण है कि अनेकानेक शब्द कुछ थोडे़ परिवर्तनों के साथ संस्कृत और फारसी दोनों में हमें देखने को मिलते है; डा. भोलानाथ तिवारी के अनुसार हिन्दी में छ: हजार शब्द फारसी भाषा के माने है। अंग्रेजी के माध्यम से बहुत सारे फ्रांसीसी शब्द हिन्दी में आ गये हैं; जैसे- आबरू, आतिशबाजी, आमदनी, खत, खुदा, दरवाजा, जुकाम, मजबूर, फरिश्ता लैम्प, टेबुल आदि। 

(घ) अंग्रेजी से हिंदी में आये शब्द:- लगभग ई.स. 1500 से यूरोप के लोग भारत में आते-जाते रहे हैं, किन्तु करीब तीन सौ वर्षों तक हिन्दी भाषी इनके सम्पर्क में नहीं आए, क्योकि यूरोपीय लोग समुद्र के रास्ते से भारत में आये थे; अत: इनका कार्यक्षेत्र प्रारम्भ में समुद्र के किनारे वाले प्रदेशों में ही रहा है, लेकिन 18 वी. शती के उत्तरार्ध से अंग्रेज समूचे देश में फैलने लगी। ई.स. 1800 के लगभग हिन्दी भाषा प्रदेश मुगलों के हाथ से निकलकर अंग्रेजी शासन में चला गया। 

तब से लेकर ई.स. 1947 तक अंग्रेजों का शासन रहा। इस शासन काल के दौरान अंग्रेजी भाषा और सभ्यता को प्रधानता प्राप्त होना स्वभाविक था। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी अंग्रेजी भाषा का महत्व कम नहीं हुआ इसका कारण है कुछ ऐसे गिने चुने लोग जो अंग्रेजी भाषा को महत्व देते हैं। इसका परिणाम यह हुआ की सभी भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के बेशुमार शब्दों का प्रयोग होता आज भी आ रहा है। 

यद्यपि डा. हरदेव बाहरी के अनुसार अंग्रेजी के हिन्दी में प्रचलित शब्दों की संख्या चार-पाँच सौ से अधिक नहीं है, लेकिन वास्तव में यह संख्या लगभग तीन हजार से कम नहीं होगी। तकनीकी शब्दों को जोड़ने पर यह संख्या दुगुनी हो जायेगी। जैसे- अपील, कोर्ट, मजिस्टेट, जज, पुलिस, पेपर, स्कूल, टेबुल, पेन, मोटर, इंजिन आदि। इस प्रकार हिन्दी भाषा ने देश-विदेश की अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहणकर अपने शब्द भण्डार में महत्वपूर्ण वृध्दि कर ली है।

आपको जानकारी कैसे लगी हमारे साथ अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें क्या आप हिंदी बोलना पसंद करते हैं? हिंदी भाषा को विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा की प्रथम पंक्ति में लाने में अपना योगदान दें। राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने और विश्व में एक विशिष्ट पहचान दिलाने में मदद करें!

धन्यवाद आपका दिन शुभ हो!

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