सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय - jivan parichay of suryakant tripathi nirala

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय

हिन्दी साहित्य जगत एवं हिन्दी काव्य की विलक्षण प्रतिभा वाले महाकवि पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म सन्न 1897 में पं. बंगाल के महिषादल नामक राज्य में हुआ। इनके पिता का नाम श्री रामसहाय त्रिपाठी था। इन्होंने घर पर ही रहकर अंग्रेजी, बंगला एवं संस्कृत भाषा का अध्ययन किया । इनका जीवन आर्थिक विपन्नता एवं असाध्य रोगों के बीच गुजरा। इनकी मृत्यु 15 अक्टूबर, 1961 में हुई। 

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय - jivan parichay of suryakant tripathi nirala

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रमुख रचनाएं

(1) काव्य – परिमल, गीतिका, तुलसीदास, अनामिका, कुकुरमुत्ता, बेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज। 
(2) उपन्यास – अप्सरा, अल्का, प्रभावती, निरूपमा, चमेली। 
(3) कहानी संग्रह - लिली, सखी, सुकुल की बीबी, चपुरी चमार। 
(4) रेखाचित्र – बकरिहा, कुल्लीमार, बिल्लेसुर। 
(5) आलोचना एवं निबन्ध - प्रबन्ध पद, प्रबन्ध प्रतिभा, प्रबन्ध परिचय, पल्लव, चालुक्य पंथ। 
(6) जीवनी साहित्य - राणा प्रताप, भीष्म, शकुंतला, ध्रुव। 
(7) अनुवाद - विवेकानन्द साहित्य, आनंदमठ, रजनी, गोविन्द पदावली, दुर्गेश नंदनी । 

भाव-पक्ष

(1) प्रकृति चित्रण - इन्होंने अपने काव्य में प्रकृति चित्रण में अत्यंत माधुर्य एवं मानवीय क्रिया-कलापों को उभारने का प्रयास किया है। प्रकृति के रम्य और सुकुमार रूपों की अवतरणा व भीषण एवं सहायक चित्र प्रस्तुत किये हैं।

सखि बसंत आया, आवृत सरसी-उर सर सिज उठे। 
केशर के केश कली के छूटे, स्वर्ण शस्य अंचल पृथ्वी का लहराया।

(2) राष्ट्रीय भावना - निराला जी का काव्य देश प्रेम तथा राष्ट्रीयता की पावन भावनाओं से ओत-प्रोत है। 'जागो फिर एक बार' कविता जैसी कविता के माध्यम से उन्होंने देशवासियों को गौरवमयी अतीत का स्मरण दिलाते हुये बलिदान का आव्हान किया है -

जागो फिर एक बार, अरूण पशरुण किरण
खड़ी खोलती है द्वार स्मरण करो बार-बार
वहाँ हो तुम, पद रज भर भी है नहीं पूरा यह विश्व-भार।

(3) भक्ति एवं दार्शनिक भावना – निराला जी की दार्शनिक ऊष्मा छायावादी कवियों से थोड़ी-सी भिन्न है। उन्होंने आत्मा और परमात्मा की एकता का प्रतिपादन किया है। तुम और मैं कविता की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं। 

तुम शिव हो, मैं हूँ शक्ति 
तुम रघुकुल गौरव, रामचन्द्र
मैं सीता अचला भक्ति। 

(4) प्रगतिवादी दृष्टिकोण – निराला जी छायावाद और रहस्यवाद के सर्जक ही नहीं बल्कि, ‘प्रगतिवाद’ के प्रणेता भी हैं। उनकी 'विधवा' का यह मार्मिक चित्र देखें। 

वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा सी, 
वह दीप शिखा सी शांत, भाव में लीन। 
वह क्रूरकाल तांडव की स्मृति रेखा सी, वह टूटे तरू की धूरी 
लता सी दीन । दलित भारत की ही विधवा है। 

कला-पक्ष 

(1) भाषा - इनकी भाषा परिष्कृत संस्कृत की तत्सम शब्दावली है । यह ओज, माधुर्य व प्रसाद गुणों से अलंकृत है। कहीं-कहीं अत्यधिक सामासिक और अत्यंत तत्सम शब्दों की प्रधानता के कारण कठिन और दुर्बोध हो गयी है।

आज तीक्ष्ण विकृत क्षिप्रकर वेग प्रखर।
शतमेल सम्बरणशील नील नभ गर्जित स्वर॥

(2) शैली – इनकी शैली विविधता लिये है। प्रेम, सौन्दर्य में गीत शैली, राष्ट्रीय भावनाओं में ओजपूर्ण शैली, शोषित और पीड़ितों में संवेदना और सहानुभूति में व्यंग्य शैली का कुशलता से प्रयोग हुआ है। 

रस - निराला जी ने मुख्य रूप से शृंगार, रौद्र, वीर, शांत, भयानक रसों का प्रयोग किया है। 

छंद - हिन्दी कविता की बँधी छंद परम्परा के बंधन को निराला जी ने ही तोड़ा । इन्होंने मुक्त छंदों का प्रयोग किया है। इसके साथ पुराने छंदों, चौपाई, दोहा, रोला आदि का प्रयोग किया है।

अलंकार - इन्होंने भारतीय व पाश्चात्य दोनों ही अलंकारों का प्रयोग किया है। अनुप्रास, उपमा, रूपक, पुनरूक्ति के साथ मानवीकरण, विशेषण, विपर्यय, ध्वन्यार्थ व्यंजना आदि अलंकारों का प्रयोग अधिक हुआ है।

(1) वह संध्या सुन्दर परी सी  - उपमा
(2) किसलय वसना, नव वय लतिका  - रूपक
(3) शैल सुता अपर्ण अशना -  विरोधाभास

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का साहित्य में स्थान

निराला जी युगांतकारी एवं महामानव थे। आधुनिक काल के प्रगतिवादी कवि थे निराला जी छायावादी काव्य युग के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं और उनमें छायावाद की समस्त प्रवृत्तियों का विकास देखा जा सकता है, किन्तु उनको निराला बनाने वाला है।

उनका क्रांतिकारी प्रगतिशील, विद्रोही और बेबाक व्यक्तित्व । काव्य के अतिरिक्त गद्य साहित्य को भी संपन्न करने में निराला ने योगदान दिया है। निराला आधुनिक हिन्दी के सबसे बड़े क्रांतिकारी और प्रयोगधर्मी कवि है।

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