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भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 82

मोहन माँग्यों अपनो रूप। 
या  व्रज बसत अँचै तुम बैठीं, ता बिनु यहाँ निरुप।।
मेरो मन, मेरो अली ! लोचन लै जो गए धुपधूप। 
हमसों बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप।।
अपनो काज सँवारि सूर , सुनु हमहिं बतावत कूप। 
लेवा-देइ बरावर में है , कौन रंक को भूप।।


bhramar geet sar


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