पर्यावरण की परिभाषा एवं महत्व - paryavaran in hindi

पर्यावरण की परिभाषा - पर्यावरण शब्द का शब्दकोषीय अर्थ होता है-आस-पास या पास-पड़ोस (sur-rounding) मानव, जन्तुओं या पौधों की वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाली बाह्य दशाएँ कार्यप्रणाली (working) तथा जीवन-यापन की दशाएँ आदि। इस सन्दर्भ में तीन प्रश्न सामने आते हैं-(i) क्या (वस्तु) आवृत्त या घिरा हुआ है  (What is surrounded), (ii) किसके द्वारा घिरा हुआ है  तथा (iii) कहाँ घिरा हुआ है  निश्चय ही प्रथम प्रश्न का उत्तर है सामान्य रूप में जीवित वस्तु तथा मुख्य रूप से मनुष्य। 

पर्यावरण की परिभाषा
पर्यावरण की परिभाषा 

इस तरह यदि मनुष्य घिरी हुई वस्तु है तो भौतिक गुण (physical attributes) दूसरे प्रश्न का उत्तर है तथा यह पर्यावरण हो जाता है और कहाँ घिरा हुआ है  प्रश्न का उत्तर स्थान (धरातल पर) या वास्य क्षेत्र (habitat) है। इस प्रकार किसी स्थान विशेष में मनुष्य के आस-पास भौतिक वस्तुओं (स्थल, जल, मृदा, वायु-यह रासायनिक तत्व है) का आवरण, जिसके द्वारा मनुष्य घिरा होता है, को पर्यावरण कहा जा सकता है। प्रमुख रूप से सभी भूगोलविदों का सन्दर्भ मनुष्य के पर्यावरण से होता है परन्तु मनुष्य का अन्य जीवन-रूपों (खासकर जन्तु) तथा पादप जीवन से अलग अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता (A. N. Strahler तथा A. H. Strahler, 1976), अतः सभी जैविक संख्याओं (all biological populations) को पर्यावरण भूगोलविदों का विषय सन्दर्भ होना चाहिए। 

पार्क के अनुसार, “पर्यावरण का अर्थ उन दशाओं के योग से होता है जो मनुष्य को निश्चित समय में निश्चित स्थान पर आवृत्त करती हैं। प्रारम्भ में मनुष्य के पर्यावरण की रचना इस ग्रहीय पृथ्वी के केवल भौतिक पक्षों (स्थल, वायु तथा जल) तथा जैविक समुदाय द्वारा होती थी परन्तु समय के साथ मानव-समाज में विकास के द्वारा मनुष्य ने अपने सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक कार्यों के माध्यम से अपने पर्यावरण पारस्परिक क्रियाशील (interacting) तंत्रों से इसकी रचना होती है। ये तंत्र अलग-अलग तथा सामूहिक रूप से विभिन्न रूपों में परस्पर सम्बद्ध (interlinked) होते हैं। भौतिक क्षेत्र (human habitat) की परिवर्तनशील विशेषताओं, उसके सुअवसरों तथा प्रतिबन्धक अवस्थितियों (limitations) को निश्चित करते हैं। 

जैविक तत्व (पौधे, जन्तु, सूक्ष्म-जीव तथा मानव) जीवमण्डल की रचना करते हैं। सांस्कृतिक तत्व (आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक) मुख्य रूप से मानव-निर्मित होते हैं तथा सांस्कृतिक पर्यावरण की रचना विभिन्न तंत्रों के साथ पर्यावरण कार्यशील रहता हैं। के. आर. दीक्षित का पुनः कहना है कि पर्यावरण की परिभाषा तथा विषय-क्षेत्र हमारे हित एवं अभिरुचि एवं प्राथमिकताओं द्वारा निश्चित होते हैं। हमारा तात्कालिक हित (अभिरुचि concern) स्थानों-जिस पर हम रहते हैं, वायु-जिससे हम साँस लेते हैं, आहार-जिसे हम खाते हैं, जल-जिसे हम पीते हैं तथा संसाधनों-जिसे हम अपनी अर्थव्यवस्था को पुष्ट बनाने के लिए पर्यावरण से प्राप्त करते हैं, की गुणवत्ता है। इन्होंने पर्यावरण की संकल्पना के अन्तर्गत मात्र वायु-स्थल-जल-पादप को सम्मिलित करने की राय व्यक्त की है तथा मनुष्य एवं मानव-समाज को पर्यावरण की सीमा से बाहर रखा है।

वास्तव में विभिन्न जन-समूहों द्वारा पर्यावरण का अर्थ विभिन्न दृष्टिकोणों से विभिन्न रूपों में लिया जाता है परन्तु सामान्य रूप से यह व्यक्त किया जा सकता है कि “पर्यावरण एक अविभाज्य समष्टि है तथा भौतिक, जैविक एवं सांस्कृतिक तत्वों वाले को विस्तृत करता गया है। अतः मनुष्य के पर्यावरण के अन्तर्गत भौतिक पर्यावरण, सामाजिक पर्यावरण, आर्थिक पर्यावरण, राजनैतिक पर्यावरण आदि सम्मिलित होते गये। सामान्यतया पर्यावरण की प्रकृति (nature) से समता की जाती है जिसके अन्तर्गत ग्रहीय पृथ्वी के भौतिक घटकों (स्थल, वायु, जल, मृदा आदि) को सम्मिलित किया जाता है जो जीवमण्डल में विभिन्न जीवों को आधार प्रस्तुत करते हैं, उन्हें आश्रय देते हैं, उनके विकास तथा सम्बर्द्धन हेतु आवश्यक दशाएँ प्रस्तुत करते हैं तथा उन्हें प्रभावित भी करते हैं। 

ए. गाउडी (A. Goudie, 1984) ने अपनी पुस्तक The Nature of the Environment में पृथ्वी के भौतिक घटकों को ही पर्यावरण का प्रतिनिधि माना है तथा उनके अनुसार पर्यावरण को प्रभावित करने में मनुष्य एक महत्वपूर्ण कारक है। अन्य लोगों ने पर्यावरण को और अधिक व्यापक रूप में परिभाषित किया है- 

के. आर. दीक्षित (K. R. Dikshit 1984) के अनुसार, “पर्यावरण विश्व का समग्र दृष्टिकोण (holistic view) है क्योंकि यह किसी समय सन्दर्भ में बहुस्थानिक तत्वीय एवं सामाजिक-आर्थिक तंत्रों, जो जैविक एवं अजैविक रूपों के व्यवहार-आचार पद्धति तथा स्थान की गुणवत्ता (quality) तथा गुणों (attributes) के आधार पर एक-दूसरे से अलग होते हैं, के साथ कार्य करता है।” अर्थात् पर्यावरण विश्व का समग्र दृष्टिकोण है तथा इसकी रचना स्थानिक तत्वों वाले विभिन्न सामाजिक-आर्थिक (socio-economic) तंत्रों (systems) से होती है। ये विभिन्न तंत्र अलग-अलग विशेषता वाले होते हैं। इन तत्व (स्थान, स्थलरूप, जलीय भाग, जलवायु, मृदा, शैल तथा खनिज) मानव-निवास्य करते हैं (Savindra Singh and A. Dubey, 1983)।

पर्यावरण की संरचना तथा प्रकार

चूँकि पर्यावरण भौतिक एवं जैविक संकल्पना है, अतः इसमें पृथ्वी के दोनों अर्थात्अ जीवित (भौतिक या अजैविक) तथा जीवित (जैविक) संघटकों को सम्मिलित किया जाता है। पर्यावरण को दो प्रमुख प्रकारों में विभक्त किया जाता है, जैसे-अजैविक या भौतिक पर्यावरण तथा जैविक (biotic) पर्यावरण। भौतिक विशेषताओं तथा दशा (state) के आधार पर अजैविक या भौतिक पर्यावरण को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभक्त किया जाता है-(अ) ठोस दशा, (ब) तर दशा, तथा (स) वाचव्य दशा। ये तीनों दशाएँ क्रमशः स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस आधार पर भौतिक पर्यावरण तीन प्रकार के होते हैं-(अ) स्थलमण्डलीय पर्यावरण, (ब) वायुमण्डलीय पर्यावरण, तथा (स) जलमण्डलीय पर्यावरण। विभिन्न स्थानिक मापकों पर इन तीन प्रकार के पर्यावरणों को कई स्तरीय लघु इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है। यथा-पर्वत पर्यावरण, पठार पर्यावरण, मैदान पर्यावरण, झील पर्यावरण, सरिता पर्यावरण, हिमनद पर्यावरण, मरुस्थल पर्यावरण, सागर तटीय पर्यावरण, सागरीय पर्यावरण आदि।

-जैविक पर्यावरण की संरचना पौधों (वनस्पति) तथा मानव सहित जन्तुओं द्वारा होती है। इनमें मनुष्य एक महत्वपूर्ण कारक होता है। इस आधार पर जैविक पर्यावरण को दो प्रकारों में विभक्त किया जाता है-(अ) वानस्पतिक पर्यावरण (floral environment), तथा (ब) जन्तु पर्यावरण (faunal environment)। सभी जीवधारी अपने विभिन्न स्तरीय सामाजिक समूह तथा संगठन (social groups and organisations) की रचना हेतु कार्य करते हैं। इस प्रकार सामाजिक पर्यावरण (social environment) का आविर्भाव होता है, जिसके अन्तर्गत विभिन्न जीवधारी अपने जीवन-निर्वाह, अस्तित्व तथा सम्वर्द्धन के लिये भौतिक पर्यावरण से पदार्थों को प्राप्त करने के लिये कार्य करते हैं। 

इस तरह जीवधारियों, मुख्य रूप से मानव द्वारा अपने निर्वाह तथा विकास के लिये भौतिक पर्यावरण से पदार्थों के प्राप्त करने की प्रक्रिया द्वारा आर्थिक पर्यावरण (economic environ- ment) का निर्माण होता है। उल्लेखनीय है कि मनुष्य समस्त जीवधारियों में सर्वाधिक बुद्धिमान तथा सभ्य प्राणी है, अतः इसका सामाजिक संगठन सर्वाधिक नियमित एवं व्यवस्थित होता है। मनुष्य के तीन पक्षों, यथा-भौतिक, सामाजिक तथा आर्थिक की जैविक पर्यावरण में विभिन्न विशेषताएँ, भूमिकाएँ तथा कार्य होते हैं।

भौतिक मानव (physical man) अन्य जैविक संख्या (organismic popula-tions) या जैविक समुदाय में से एक है तथा उसे अन्य जीवधारियों की भाँति ही भौतिक पर्यावरण से मौलिक तत्वों की आवश्यकता होती है (यथा-स्थान या वास्य क्षेत्र, आहार, वायु तथा जल) तथा वह पारिस्थितिक तंत्र में अपने अपशिष्ट पदार्थों (waste material- मल-मूत्र आदि) को निर्मुक्त करता है। सामाजिक मानव (social man) अपने अस्तित्व, हक या हितों तथा सामाजिक कल्याण की सुरक्षा हेतु सामाजिक संस्थानों की स्थापना करता है, सामाजिक संगठनों की रचना करता है तथा कानूनों, नियमों तथा नीतियों की व्यवस्था करता है। 

आर्थिक मानव (economic man) अपनी आर्थिक व्यवस्था को विकसित एवं सुदृढ़ बनाने के लिये अपनी बुद्धि तथा प्रौद्योगिकी द्वारा भौतिक तथा जैविक पर्यावरण से संसाधनों को प्राप्त करता है तथा उनका उपभोग करता है। मानव के इन तीनों प्रकार के कार्यों को भौतिक, सामाजिक तथा आर्थिक कार्य कहते हैं।

    मनुष्य का तीसरा कार्य (आर्थिक कार्य) उसे पर्यावरणीय अथवा भूआकृतिक प्रक्रम के रूप में भी स्थापित करता है क्योंकि वह अन्य भूआकृतिक प्रक्रमों (geomorphic processes) के समान पदार्थों तथा ऊर्जा का पारिस्थितिक तंत्र के एक संघटक से दूसरे संघटक में परिवहन करता है। मनुष्य के इस आर्थिकभूआकृतिक कार्य द्वारा पारिस्थितिक तंत्र की कार्य-प्रणाली में तब तक परिवर्तन नहीं होता जब तक कि मनुष्य के विदोहनात्मक कार्य तथा प्राकृतिक पर्यावरण के मध्य सामंजस्य (harmony) होता है परन्तु जैसे ही मनुष्य के विदोहनात्मक कार्य (exploitative functions) पर्यावरण की निश्चित सीमा को पार कर जाते हैं, पर्यावरणपारिस्थितिक तंत्र की समस्थिति (equilibrium) बिगड़ जाती है तथा विभिन्न पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं जो किसी निश्चित पारिस्थितिक तंत्र में न केवल मनुष्य के लिए वरन् समस्त जातियों की संख्या के लिये घातक बन जाती हैं।

भौतिक पर्यावरण को जलवायु-दशाओं, जो जैविक समुदायों के लिए विभिन्न प्रकार के वास्य क्षेत्र (habitats) का सृजन करती हैं, की दृष्टि से भी विभाजित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- उष्णकटिबन्धीय पर्यावरण, शीतोष्ण कटिबन्धीय पर्यावरण, ध्रुवीय पर्यावरण आदि। इन्हें पुनः लघु किन्तु विशिष्ट प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है। यदि भौतिक या अजैविक तथा जैविक पर्यावरणों को एक साथ मिलाकर देखा जाय तो बायोम पर्यावरण (biome environment) की रचना होती है यथा-टुण्ड्रा बायोम, शीतोष्ण बायोम, उष्ण कटि-बन्धीय बायोम आदि। इन प्रमुख बायोम पर्यावरणों को पुनः द्वितीय तथा तृतीय कोटि के बायोम पर्यावरण प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है। 

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण भूगोल में भौतिक पर्यावरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है, अतः इसे सामाजिक तथा आर्थिक पर्यावरणों की तुलना में अधिक महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि सामाजिक तथा आर्थिक पर्यावरण मूलरूप से भौतिक पर्यावरण पर ही आश्रित होते हैं। इसी तरह अन्य कार्यों की तुलना में मनुष्य के आर्थिक कार्य अधिक महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये पारिस्थितिक तंत्र, क्रियाशीलता से अधिक सम्बन्धित होते हैं। स्पष्ट है कि मनुष्य की अपने आर्थिक कार्यों द्वारा (अतः भूआकृतिक प्रक्रम के रूप में) प्राकृतिक पर्यावरण के साथ पारस्परिक क्रियाओं तथा उनसे उत्पन्न परिणामों का अध्ययन पर्यावरण भूगोल का मूलभूत उद्देश्य है।

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