bhramargeet sar surdas पद 23 व्याख्या - Rexgin

दोस्तों पिछले वाले पोस्ट में मैंने आपको बताया था आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा सम्पादित भ्रमर गीत सार के पद क्रमांक 22 के व्याख्या को आज हम पद क्रमांक 23 की व्याख्या पढ़ने वाले हैं तो यार हर समय अपडेटेड रहने के लिए हमारे ब्लॉग को सब्स्क्राइब जरूर करें चलिए शुरू करते हैं।

Bhramargeet sar ramchandra shukla

bhramargeet-ramchandra-shukla-pad-23-vyakhya
भ्रमरगीत सार आ. रामचंद्र शुक्ल 

23. राग काफी

आयो घोष बड़ो व्योपारी।
लादी खेप गुन  ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी।।
फाटक दैकर हाटक माँगत भौरे निपट सुधारि।
धुर ही तें खोटो खायो है लये फिरत सिर भारि।।
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी ?
अपनों दूध छाँड़ि को पीवै खार कूप को पानी।।
ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँहमाँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ।।

शब्दार्थ : घोष=अहीरों की बस्ती। खेप=माल का बोझ। फाटक=फ़टकन, तत्वहीन पदार्थ अनाज को फटकने से निकला हुआ भूषा, फ़टकन। हाटक=स्वर्ण। धारी=समझकर। धूर=मूल। डहकावे=धोखा खाए। अजानी=अज्ञानी। खार=खारा। कूप=कुआँ। सवार=सवेरे। साहुहि=साहूकार,महाजन। आनि=आकर।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यपुस्तक के हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र 6 के इकाई 1 सूरदास भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : निर्गुण ब्रम्ह की उपासना की शिक्षा देने आये उद्धव को गोपियाँ खरी खोटी सुनाती हुई आपस में चर्चा करते हुए कह रही हैं।

व्याख्या : गोपियाँ आपस में बात करती हुई कहती हैं की आज अहीरों की बस्ती में एक बड़ा व्यपारी आया हुआ है। उसने ज्ञान और योग के गुणों से युक्त अपनी जो गठरी है वो लाकर ब्रज में उतार दी है।
उसने हमें तो बिलकुल भोला और अज्ञानी समझ लिया है। क्योकि वह फाटक देकर हाटक चाहता है अर्थात फ़टकन के समान जो तत्व हीन पदार्थ है जो भूषा है जो बेकार का कूड़ा कचरा है वह देकर के उसके बदले में सोना चाहता है अर्थात सोने के समान बहुमूल्य श्री कृष्ण को मांग लिया है।

ऐसा लगता है। इसने आरम्भ से ही लोगों को ठगा है तभी तो इस भारी बोझ को सिर पर लिए घूम रहा है। इस व्यपारी का जो समान है वह बिलकुल व्यर्थ है और इसी कारण यह बिक नही रहा है इसे हानि उठानी पड़ रही है इसका समान कोई भी नही खरीद रहा और इसलिए इसे अपने इस भारी बोझ को लादकर इधर उधर भटकना पड रहा है।

यहां हम में से ऐसी कोन ना समझ है और अज्ञानी है जो इसका माल खरीद कर धोखा खा जाएगी। आज तक ऐसा मुर्ख हमने कहीं नही देखा है जो अपना दूध छोड़कर के और खारे जल के जो कुँए का पानी है उसे वह पिये।
और गोपियाँ अंत में कहती हैं, हे उद्धव तुम शीघ्र ही यहां से चले जाओ बिना देर किये तुम शीघ्र मथुरा चले जाओ और जो तुम्हारा महाजन है तुम्हारा जो बड़ा सेठ है यदि तुम हमसे लाकर मिला दोगे, हमारा दर्शन करा दोगे तो तुम्हें मुँह माँगा पुरस्कार प्राप्त होगा अर्थात जो भी तुम मांगोगे वह हम तुम्हें दे देंगे।

भ्रमरगीत सार की विशेषताएं

  1. इस पद में गोपियों ने उद्धव को व्यपारी बना दिया है। 
  2. जो योग और ज्ञान रूपी तुच्छ वस्तु के लिए उनसे कृष के प्रेम रूपी स्वर्ण मुद्रा ठगना चाहता है। 
  3. कृष्ण के प्रेम को दुग्ध के समान और ज्ञान योग को खारे पानी के समान बताया है। 
  4. भाषा लाक्षणिक और ब्यंजना शब्द शक्ति से सम्पन्न है सम्पूर्ण पद में  अत्यंत तिरस्कृत वाच्य ध्वनि है उद्धव के ज्ञान वस्तु को निस्सार घोषित कर दिया गया है। और उसका तिरस्कार किया गया है। 
  5. फाटक और हाटक में अत्यंत सुंदर शब्द शैली है। 
  6. खोटा खाना मुहावरे का प्रयोग किया गया है।
  7. प्रसाद और माधुर्य गुण से सम्पन्न शैली प्रयोग सूरदास जी के द्वारा किया गया है। 
  8. सम्पूर्ण पद में रूपक और अन्योक्ति का मिश्रित रूप है। 
  9. खार कूप को पानी में दृष्टांत अलंकार का प्रयोग किया गया है। 
  10. गुण ज्ञान खोटो-खायो तथा मुंह मांगी में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। 

 रिलेटेड पोस्ट -

भ्रमर-गीत-सार 1 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 2 व्याख्या  , भ्रमर गीत सार 3 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 4 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 5 व्याख्या ,  भ्रमर गीत सार 6 व्याख्या ,  भ्रमर गीत सार 7 व्याख्या ,  भ्रमर गीत सार 8 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 9 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 10 व्याख्या ,  भ्रमर गीत सार 21व्याख्या , भ्रमर गीत सार  22 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 23 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 24 व्याख्या  , भ्रमर गीत सार 25 व्याख्या , भ्रमर गीत सार 26 व्याख्या


    Related Posts

    Subscribe Our Newsletter