भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 54 की व्याख्या - Rexgin

भ्रमरगीत सार (व्याख्या)


bhramargeet surdas
भ्रमरगीत सम्पादक रामचंद्र शुक्ल 

पद क्रमांक 54 व्याख्या 

 54. राग जैतश्री 

प्रेमरहित यह जोग कौन काज गायो ?
दीनन सों निठुर बचन कहे कहा पायो ?
नयनन निज कमलनयन सुंदर मुख हेरो। 
मूँदन ते नयन कहत कौन ज्ञान तेरो ?
तामें कहु मधुकर ! हम कहाँ लैन जाहीं। 
जामें प्रिय प्राणनाथ नंदनंदन नाहीं ?
जिनके तुम सखा साधु बातें कहु तिनकी। 
जीवैं सुनि स्यामकथा दासी हम जिनकी।।
निरगुन अविनासी गुन आनि भाखौ। 
सूरदास जिय कै जिय कहाँ कान्ह राखौ ?।।

शब्दार्थ :
प्रेम रहित=अनुराग रहित, नीरस। काज=कार्य। कौन काज=किस कारण, किसलिए। दीनन=द्खिओं, विरह-ग्रस्त, अबलाओं। निठुर=कठोर। निज=अपने। हेरो=निहारो, देखो। लैन=लेने के लिए। तिनकी=उनकी। आनि-आनि=अन्य-अन्य। भाखौ=कहते हो। जिय के पिय=प्राणों के प्राण। 

संदर्भ : 
प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। जिसे उन्होंने सूरसार से उद्घृत किया है। 

प्रसंग :
अपनी वियोग स्थिति का वर्णनं बड़े ही मार्मिक ढंग से गोपियाँ कर रहीं हैं। 

व्याख्या :
गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव तुमने नीरस योग के गीतों को हमारे सामने क्यों गाया इनकी यहाँ क्या आवश्यकता है। उद्धव इनमें प्रेम का अभाव है और इसलिए ये हमारे लिए त्यक्त हैं। हे उद्धव बताओ हम अबलाओं विरहणि नारियों के सम्मुख, हम दुखियों के सम्मुख इस प्रकार की कठोर बातें कहकर तुम्हें क्या मिला। हमारे इन नयनों ने कमल नेत्रों वाले सुंदर मनमोहक सुंदर कृष्ण के मुंह के दर्शन किये हैं। 

ये तुम्हारा किस प्रकार का ज्ञान है कैसा विवेक है कि तुम इन नेत्रों को बंद करके और निर्गुण ब्रम्ह की साधना करने को कहते हो। हम अपने नेत्र बंद करके तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह के पीछे क्यों भटकती रहें। 

हे उद्धव हमें बाइये की आपके इस योग साधना को किस लालसा से अपनाये। क्योंकि हम जानती हैं की इससे हासिल कुछ नहीं होने वाला और इसमें नंदनंदन कृष्ण की भी हानि है। क्योंकि उन्हें त्यागकर ही इसे अपनाना होगा और इसलिए तुम्हारी यह साधना निरर्थक है। 

हे उद्धव हमें तो उन्हीं कृष्ण की बातें सुनाओ जिनके तुम सच्चे मित्र हो और हम उनकी दासी और सेविकाएँ हैं। उन श्याम की कथा और रसभरी हुई बातें सुनकर हम जी उठेंगी हमें प्राण मिल जाएंगे और हमारा विरह भी जाता रहेगा। 

लेकिन तुम उस कृष्ण की बातें न करके किसी निर्गुण अविनाशी ब्रम्ह के विषय में कुछ कहकर इस प्रकार की बातें करते  हो अन्यान्य बातें करते हो ऐसी बातें करते हुए न जाने तुम हमारे प्राणों के प्राण कृष्ण को कहाँ छुपाकर रखे हो उनके बारे में हमें कुछ नहीं बताते। 

विशेष :

  1. प्रस्तुत पदों में उद्धव पर आरोप है की वे गोपियों से कुछ छुपा रहे हैं। 
  2. प्रेमरहित ज्ञान योग की अवहेलना की गई है। 

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