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भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल - पद क्रमांक 70 की व्याख्या

भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल  -  पद क्रमांक 70 की व्याख्या bhramargeet surdas pad 70 vyakhya

भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 69 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 69 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

70. राग रामकली

तौ हम मानैं बात तुम्हारी।
अपनो ब्रम्ह दिखावहु ऊधो मुकुट-पितांबरधारी।।
भजि हैं तब ताको सब गोपी सहि रहि हैं बरु गारी।
भूत समान बतावत हमको जारहु स्याम बिसारो।।
जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं ते विष क्यों अधिकारी।
सूरदास प्रभु एक अंग पर रीझि रही ब्रजनारी।

शब्दार्थ : वरु=भले ही। गरी=गाली, चरित्र हीन होने की गली। भूत-समान=छाया मात्र, आकार रहित। जारहु=दग्ध करते हो। बिसारी=भुलाकर। अँचवत=आचमन करते हैं, पान करते हैं। रीझी=मुग्द्ध हुई। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग : यहाँ गोपियाँ उद्धव के ज्ञान योग को स्वीकार करने के लिए एक शर्त रख रहीं हैं जिसका वर्णन प्रस्तुत पद में किया गया है।

व्याख्या : प्रस्तुत पद में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं की हम तुम्हारी बात को मानकर तुम्हारे ब्रम्ह को स्वीकार कर लेंगे। लेकिन एक शर्त है और शर्त ये की तुम अपने ब्रम्ह के मोर मुकुट और पीतांबर धारण किया हुआ दर्शन करा दो यानी यदि तुम्हारा ब्रह्म कृष्ण का वेश धारण करके हमारे सम्मुख आ जाता है तो हम उसे स्वीकार कर लेंगे ऐसा करते हुए हम बिलकुल भी संकोच नहीं करेंगे हम तुम्हारी बात मान जाएंगे फिर हम सब मिलकर उसे भजेंगे उसका ध्यान करेंगे चाहे हमें इसके लिए यह संसार गाली ही क्यों न दे हमें चरित्ररहीन क्यों न बताये कुलटा क्यों न बताये हम सब सहन कर लेंगी लेकिन हमें ऐसा लगता नही है कि तुम हमें अपने ब्रम्ह का कृष्ण रूप में दर्शन करा दोगे क्योंकि तुम तो अपने ब्रम्ह को छायाहीन बताते हो आकारहीन बताते हो भूत के समान बताते हो और इसलिए उनका मोर मुकुट और पीतांबर धारन करना ऐसा असम्भव है और इसलिए हम कृष्ण को भूलाकर उसे स्वीकार नहीं कर पायेंगी। 

हम तो सदा अपने मुख से अम्रृत का पान करते आई हैं और उसी मुख से आज विष का पान कैसे कर सकती हैं अर्थात हमारा मुख अमृत के समान प्राणदायक और मधुर कृष्ण का नाम स्मरण करने का आदि हो चुका है वह आज तुम्हारे विष के समान घातक और कटु ब्रम्ह का नाम कैसे जप सकता है हे उध्दव हम सम्पूर्ण ब्रज की नारियाँ अपने कृष्ण के मनोहर शरीर पर मुग्ध है और इसलिए उन्हें त्यागकर हमारे शरीर विहीन निराकार ब्रम्ह को स्वीकार नहीं कर सकती। 

विशेष :

  1. गोपियाँ उध्दव के सम्मुख ऐसी शर्त रख रही हैं। 
  2. जिसकी पूर्ति करना सम्भव नहीं हैं। प्रस्तुत पद में कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम का चित्रण किया गया है। 
  3. मधुकर भावों की अभिव्यक्ति की गई है। पराकर्षक नम्र विधान का प्रयोग किया गया है।

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