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भ्रमर गीत सार - सूरदास पद क्रमांक 65 की व्याख्या

bhramargeet_pad_65_vyakhya भ्रमर गीत सार - सूरदास पद क्रमांक 65 की व्याख्या

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 64 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग rexgin.in में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 65 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

65. राग केदारा

नाहिंन रह्यो मन में ठौर।
नंदनंदन अछत कैसे आनिए उर और ?
चलत, चितवन, दिबस, जागत,सपन सोवत राति।
हृदय ते वह स्याम मूरति छन न इत उत जाति।।
कहत कथा अनेक ऊधो लोक-लाभ दिखाय।
कहा करौं तन प्रेम-पूरन घट न सिंधु समाय।।
स्याम गात सरोज-आनन ललित अति मृदु हास।
सूर ऐसे रूप कारन मरत लोचने प्यास।।

शब्दार्थ :

नाहिन=नहीं है। ठौर=स्थान। अछत=रहते हुए। आनिए=लाए। उर=हृदय। दिवस=दिन। राति=रात। छन=एक पल भी। इत=इधर। उत=उधर। लोक-लाभ=सांसारिक लाभ। समाय=समाहित होना। गात=शरीर। सरोज-आनन=कमल के समान मुख। ललित=आकर्षक। मृदु=मधुर। हास=हँसी। रूप-कारन=रूप के लिए। लोचन=नेत्र। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

निर्गुण ब्रम्ह को स्वीकार करने में अपनी विवस्ता प्रकट करते हुए गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं। की 

व्याख्या :

उद्धव मन में किसी के लिए स्थान नहीं रहा है हे उद्धव तुम ही बताओ की नंदनंदन श्री कृष्ण के इस हृदय में रहते हुए। हम किसी अन्य को अर्थात निर्गुण ब्रम्ह को अपने हृदय में कैसे ला सकती हैं और इसलिए हे उद्धव तुम्हारे इस निर्गुण ब्रम्ह को स्वीकार करने में हम असमर्थ हैं। 

हमें तो चलते फिरते इधर उधर देखते दिन में जागृत अवस्था में तथा रात को सोते समय स्वप्न अवस्था में भी श्री कृष्ण की मधुर मूर्ति लुभाती है। और 

हमारे हृदय से यह मोहनी मूरत छड़ भर के लिए इधर उधर नहीं जातीं ओझल नहीं होती। हम तो जीवन के प्रत्येक अवस्था में श्री कृष्ण के ध्यान में मग्न रहती हैं। 

हे उद्धव आप योग और निर्गुण ब्रम्ह के संबंध में अनेक कथाएं सुनाकर हमें सांसारिक लाभ का मार्ग सुझा रहे हैं हमारे लिए मोक्ष प्राप्ति का साधन उपलब्ध करा रहें हैं हमारे लिए मोक्ष प्राप्ति का साधन उपलब्ध करा रहे हैं किन्तु हम क्या करें इस मार्ग को नहीं अपना सकते। 

हम तो कृष्ण प्रेम के लिए पुनः शरीर धारण करने के लिए भी तैयार हैं तत्पर हैं क्योकि हमारा यह तन कृष्ण प्रेम से परिपूर्ण है। 

और जिस प्रकार सागर का जल सिंधु का जल एक छोटे से घड़े में नहीं समा सकता उसी प्रकार हमारे इस छोटे से हृदय में तुम्हारा अनंत ब्रम्ह नहीं समा सकता। 

हे उद्धव हमारे श्री कृष्ण का शरीर सांवला है मुख कमल के समान सुंदर है मनमोहक है उनकी हंसी मधुर है और बर्बश अपने ओर खीचते वाली है और इसलिए हमारे जो नेत्र हैं कृष्ण की ऐसी आकर्षक रूप माधुर्य का पान करके तृप्त होने के लिए व्याकुल बने रहते हैं। 

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद में गोपियों की कृष्ण प्रेम विषयक विवशता एकांत दृढ प्रेमनिष्ठा की अभिव्यक्ति अत्यंत मार्मिक रूप से प्रस्तुत हुई है। 
  2. सरोज आनन में रूपक अलंकार है। 
  3. चलत चितवन कहत कथा में अनुप्रास अलंकार है। 
  4. आकर्षक बिम्ब विधान का प्रयोग सूरदास जी द्वारा किया गया है। 

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