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भ्रमरगीत सार पद क्रमांक 70

भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल  -  पद क्रमांक 70 की व्याख्या bhramargeet surdas pad 70 vyakhya

तौ हम मानैं बात तुम्हारी।
अपनो ब्रम्ह दिखावहु ऊधो मुकुट-पितांबरधारी।।
भजि हैं तब ताको सब गोपी सहि रहि हैं बरु गारी।
भूत समान बतावत हमको जारहु स्याम बिसारो।।
जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं ते विष क्यों अधिकारी।
सूरदास प्रभु एक अंग पर रीझि रही ब्रजनारी।


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