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सूरदास भ्रमरगीत सार रामचंद्र शुक्ल - पद क्रमांक 58

सूरदास भ्रमरगीत सार रामचंद्र शुक्ल - पद क्रमांक 58 की व्याख्या bhramargeet surdas

मोहिं अलि दुहूँ भाँति फल होत। 
तब रस-अधर लेति मुरली अब भई कूबरी सौत।।
तुम जो जोगमत सिखवन आए भस्म चढ़ावन अंग। 
इत बिरहिन मैं कहुँ कोउ देखी सुमन गुहाये मंग। 
कानन मुद्रा पहिरि मेखली धरे जटा आधारी।।
यहाँ तरल तरिवन कहैं देखे अरु तनसुख की सारी।।
परम् बियोगिन रटति रैन दिन धरि मनमोहन-ध्यान। 
तुम तों चलो बेगि मधुबन को जहाँ-जहाँ जोग को ज्ञान। 
निसिदिन जीजतु है या ब्रज में देखि मनोहर रूप। 
सूर जोग लै घर-घर डोली, लेहु लेहु धरि सूप।।


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