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भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 57

bhramar geet ramchandra shukla pad 57 vyakhya

निरख अंक स्यामसुंदर के बारबार लावति छाती। 
लोचन-जल कागद-मिसि मिलि कै है गई स्याम स्याम की पाती।।
गोकुल बसत संग गिरिधर के कबहुँ बयारि लगी नहिं ताती। 
तब की कथा कहा कहौं, ऊधो, जब हम बेनुनाद सुनि जाती।।
हरि के लाड़ गनति नहिं काहू निसिदिन सुदिन रासरसमाती। 
प्राननाथ तुम कब धौं मिलोगे सूरदास प्रभु बालसँघाती।।


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