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भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 3 सप्रसंग व्याख्या By Rexgin

Hindi Sahitya Bhramar Geet Sar Surdas Pad 3 Vyakhya By Rexgin


सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल 
भ्रमर गीत सार : सूरदास सप्रसंग व्याख्या पद क्रमांक 3

आपका आज फिर से स्वागत है मेरे ब्लॉग में जिसमें हम हर रोज ज्ञान विज्ञान से जुड़े विषयों को लेकर ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश करते रहते हैं, आज हम पढ़ने वाले हैं एम. ए. हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र क्रमांक 6 के भ्रमर गीत के बारे में जिसमे हम आपको बताने वाले हैं पद क्रमांक तीन की सप्रसंग व्याख्या।
        तो चलिए शुरू करते हैं-

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भ्रमर गीत सम्पादक आ.रामचन्द्र शुक्ल

पद कुछ इस प्रकार है-

तबहिं उपंगसुत आय गए। 
सखा सखा कछु अंतर नाही भरि-भरि अंक लए।। 
अति सुंदर तन स्याम सरीखो देखत हरि पछताने। 
एसे को वैसी बुधि होती ब्रज पठवै तब आने।। 
या आगे रस-काव्य प्रकासे जोग-वचन प्रगटावै। 
सुर ज्ञान दृढ़ याके हिरदय जुवतिन जोग सिखावै।।

शब्दार्थ - उपंगसुत = उद्धव। अंक लाए = आलिंगन बध्द होकर, भेट। सरीखो = समान। वैसी बुधि = रागात्मक चेतना। आने = अन्य विषयों को लेकर। पठवै = भेजे। या = इसके। रस काव्य = प्रेम की कवित्त्व पूर्ण बातें। प्रकासे = प्रकट करते समय। याके हृदय = इसके हृदय में।

संदर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग- श्री कृष्ण ब्रज को याद करते हुए निम्न हैं और उसी समय उद्धव का आगमन होता है उस समय के बात को इस पद में सूरदास जी ने बताया है।

व्याख्या- श्री क्रृष्ण ब्रज की सुधि में निमग्न हैं, और किसी को ब्रज भेजना चाहते हैं। कृष्ण ब्रज की स्मृतियों में भाव विभोर हो रहे थे। और उसी समय वहाँ उद्धव आ गए। दोनों में शारीरिक रूप से दृष्टिगत अंतर नहीं हो रहा है। और दोनों परस्पर स्नेह पूर्वक आलिंगन बध्द हो गये। एक दूसरे से स्नेहपूर्वक मिले। उद्धव का शरीर अत्यं सुंदर और श्री कृष्ण के समान श्यामदूती वाला था।

ये देखकर श्री कृष्ण मन ही मन पछताये यदि शारीरिक सौंदर्य के साथ बुद्धि और विवेक भी होता तो कितना अच्छा होता अर्थात इसकी बुद्धि ज्ञान पर आधारित न होकर प्रेम मार्गीय भक्ति भावना पर आधारित होती तो उत्तम था और इसीलिए उन्होने उद्धव को किसी अन्य कारण हेतु ब्रज भेजने का निश्चय किया क्योंकि वहां जाने पर ही इनकी योगमार्ग बुद्धि का संस्कार होना सम्भव था और तभी यह प्रेमानुराग भक्ति का भली-भाँति परिपालन कर सके।

यूं तो ऐसे है की यदि इनके आगे प्रेम की सिक्त वाणी सुनाएँ अयोग्य नीरस चर्चा करने लगेंगे और इस प्रकार पक्का श्रोताओं को ऊबा देगी उनके  ह्रृदय में ज्ञान अर्थात योगमार्गी आसन इतने दृढ हैं। यदि इन्हें ब्रज भी भेजा जाये तो ये ब्रजवासियों को भी योग की शिक्षा दीक्षा देना प्रारम्भ कर देंगे। किन्तु सम्भव है वहां गोपियों के अनन्य प्रेमानुराग को देखकर इनका योग खंडित हो जाए और यह प्रेममार्गी महत्ता स्वीकार करके उसे अपना लें।

विशेष -

  1. इस पद के भाव को देखकर लगता है की यह भ्रमर गीत का आरम्भिक पद है। पर शुक्ल जी ने इसे ठीक क्रम में नही रखा।
  2. क्योकि इसी पद में कृष्ण ने अभी उद्धव को ब्रज भेजने का निश्चय किया है।
  3. जबकि पूर्व पदों में उन्हें ब्रजरीति बताई है। भेजने के निश्चय से गोपियाँ किस प्रकार सम्हरती हैं।
  4. वैसी बुद्धि से तात्पर्य प्रेम मार्गी भक्ति से भ्रमर गीत की मूल भावना को अभिव्यक्त करता है वस्तुतः कवि का उद्देश्य उद्धव के माध्यम से प्रेमानुगाभक्ती से प्रतिपादन कराना है।

डॉ. शंकर देव अवतरे इस पद पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं की इस प्रकार लिखावट अक्षर शीघ्र अति शीघ्र सुंदर मुख वाला व्यक्ति के द्वारा पढ़ा लिखा होने पर  ज्ञानियों के लिए सोच्य होता है। उसी प्रकार नीरस होने पर वह सहृदयों के लिए दुःख दायी होता है किन्तु वह सुंदर पर नीरस भक्ति के साथ सरस् भक्ति की घनिष्ठता हो तो उसका दर्द भी उसी अनुपात में सघन हो जाता है यहाँ उद्धव के समान कृष्ण के मन में वही भाव प्रस्तुत है।

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