भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 22 सप्रसंग व्याख्या By Rexgin

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भ्रमर गीत सार : सूरदास

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल

Hindi Sahitya Bhramar Geet Sar Surdas Pad 22 Vyakhya By Rexgin

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल 
भ्रमर गीत सार : सूरदास सप्रसंग व्याख्या पद क्रमांक 22 
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भ्रमर गीत सम्पादक आ. रामचंद्र शुक्ल 

22. राग धनाश्री

जीवन मुँहचाही को नीको।
दरस परस दिन रात करति है कान्ह पियारे पी को।।
नयनन मूंदी-मूंदी किन देखौ बंध्यो ज्ञान पोथी को।
आछे सुंदर स्याम मनोहर और जगत सब फीको।।
सुनौ जोग को कालै कीजै जहाँ ज्यान है जी को ?
खाटी मही नहीं रूचि मानै सूर खबैया घी को।।

शब्दार्थ : मुँहचाही=प्रियतम को प्रिय लगने वाली प्रिया। नीको=अच्छा। दरस=दर्शन। परस=स्पर्श। ज्ञान-पोथी को=पुस्तकीय ज्ञान। आछे=अच्छे। मनोहर=मनमोहक। जगत=संसार। ज्यान=जियान,हानि। मही=मठ्ठा,छाछ। खवैया=खानेवाला।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यपुस्तक के हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र 6 के इकाई 1 सूरदास भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।


प्रसंग : उद्धव के द्वारा गोपियों को निर्गुण का उपदेश सुनाये जाने के बाद गोपियानं चुप नहीं रहती वरन अनेक प्रकार से अपने प्रेम मार्ग की श्रेष्ठता को प्रतिपादित करती हुई उद्धव से कह रही हैं।

व्याख्या : गोपियाँ उद्धव से कहती हैं हे उद्धव अपने प्रीतम को अच्छा लगने वाली जो प्रेमिका है उसका जीवन ही अच्छा है। अर्थात सफल है। प्रीतम के मन में समाने के कारण वह जीवन संसार के फल को भोग लेता है इसलिए उसी का जीवन अच्छा है। उसी का जीवन सफल है।

कुब्जा से ईर्ष्या का भाव प्रकट करती हुई गोपियाँ कहती हैं जीवन तो उसका अर्थात कुब्जा सफल है क्योकि वह कृष्ण की चहिती प्रेमिका है वह अपने प्रीतम कन्हैया का प्रतिदीन दर्शन करती हैं उनको स्पर्श करती है और स्पर्श से उसे शरीरिक सुख आनंद भी प्राप्त होता है।

हे उद्धव ऐसा कौन है जिसने आँखें मूँद-मूँद करके पुस्तक के ज्ञान को प्राप्त कर लिया हो अर्थात आँखें खोलकर अध्ययन से ही ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। उसी प्रकार प्रियतम के पास रहने से दर्शन और स्पर्श से ही जीवन सफल नहीं होता यह तो तभी सम्भव है जब प्रेम की प्रीति से परिचित हो और प्रियतम को रीझाने में समर्थ हो इसलिये कुब्जा को श्री कृष्ण के पास रहकर भी उनका प्रतिदिन दर्शन करके भी उनका स्पर्श प्राप्त करके भी इतना सुख और आनंद प्राप्त नही होता क्योकि वह प्रेम करने की उचित रीति से परिचित नही है क्योकि जीवन तो सफल तभी होगा जब प्रेम की रीति से सुपरिचित हो और प्रियतम को रिझाने में समर्थ।

हे उद्धव हम तुम्हारे गया योग को लेकर क्या करें? यह हमारे किसी काम का नही क्योकि इससे तो हमें प्राणहीन का भय है। योग साधना पर अमल करने से हमें अपने प्राण प्रिय से कृष्ण से बिछुड़ना पड़ेगा और यदि हम उनसे बिछड़ गए तो उनके बिना हमारा जीवित रहना सम्भव नहीं है और इसीलिए तुम्हारे इस योग को अपना लेने में प्राणों की हानि का भय है।

सूरदास जी कहते हैं की जिस प्रकार कोई व्यक्ती जो शुद्ध घी का प्रयोग करता है वह व्यक्ति खट्टी छाछ से प्रसन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार श्री कृष्ण के प्रेमामृत का पान करने वाला यह जो हमारा हृदय है आपके योग की नीरस बातें सुनकर आनंदित नही होगा।

विशेष : 

  1. जीवन मुहचही को निको में गोपीयां कुब्जा के प्रति ईर्ष्या का भाव प्रकट कर रही हैं।
  2. ज्यान शब्द प्रदेश विषेश से संबंधित है और इसका अर्थ है हानि अथवा नुकसान।
  3. पियारे पी, स्याम सुंदर में छेकानुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद और माधुर्य गुण से लिखा सूरदास जी द्वारा प्रस्तुत पद में किया गया है।


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