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भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 5

Bhramar_geet_surdas_pad_5_vyakhya_by_rexgin


जदुपति लख्यो तेहि मुसकात। 
कहत हम मन रही जोई सोइ भई यह बात।। 
बचन परगट करन लागे प्रेम-कथा चलाय। 
सुनहु उध्दव मोहिं ब्रज की सुधि नहीं बिसराय।। 
रैनि सोवत, चलत, जागत लगत नहिं मन आन। 
नंद जसुमति नारि नर ब्रज जहाँ मेरो प्रान।। 
कहत हरि सुनि उपंगसुत ! यह कहत हो रसरीति। 
सूर चित तें टरति नाही राधिका की प्रीति।।


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