गोस्वामी तुलसीदास के दोहे - tulsidas ke dohe

दोहा एक मात्रिक छंद है जिसके प्रथम और तृतीय चरण में 13,13 मात्राएं होती है। और दूसरे और अंतिम चरण में 11,11 मात्राएं होती है। इसमें 24 ,24 मात्रा की दो पंक्तियां होती है। 

अधिक जानकारी - दोहा की परिभाषा 

प्रसिद्ध दोहाकार कबीर दास, मीराबाई, रहीम, तुलसीदास और सूरदास हैं। सबसे लोकप्रिय तुलसीदास की रामचरितमानस है। जिसे दोहा में लिखा गया है, जो संस्कृत महाकाव्य रामायण का प्रतिपादन है। इस पोस्ट में हम तुलसीदास के महत्वपूर्ण दोहे का अर्थ सहित जानकारी देंगे। 

गोस्वामी तुलसीदास के दोहे

तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण

अर्थ - तुलसीदास जी कहते हैं, समय बड़ा बलवान होता है, समय व्यक्ति को छोटा या बड़ा बनाता है। एक बार जब महान धनुर्धर अर्जुन का समय ख़राबचल रहा था तब वह भीलों के हमले से गोपियों की रक्षा नहीं कर पाए।

काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान।
तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान

अर्थ - तुलसीदास जी कहते है की, जब तक व्यक्ति के मन में काम, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए हैं तब तक एक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति में कोई भेद नहीं रहता, दोनों एक जैसे ही हो जाते हैं।

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक
 

अर्थ - मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने के लिए अकेला होता है, लेकिन सब अंगों का पालन-पोषण करता है।

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कितनी भी हो मुश्किल थोड़ा भी न घबराना है, जीवन में अपना मार्ग खुद बनाना है।