सुंदरकांड की 11 चौपाई - sundar kand tulsidas

सुंदरकाण्ड के पाठ करने से बल बुद्धि की प्राप्ति होती हैं। इसमें भगवान राम के भक्त हनुमान की गुण और शक्ति का बखान किया गया हैं। सुन्दरकाण्ड गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस के सात अध्याय में से पांचवा अध्याय है।

सुंदर काण्ड का पाठ शनिवार को करने से शनि का प्रभाव कम हो जाता हैं। कहा जाता हैं की शनि महाराज हनुमान जी के भक्त को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। और सुंदरकांड का पाठ करने वालो की मनोकामना जल्द पूर्ण हो जाती हैं।

सुंदरकांड की 11 चौपाई - sundar kand tulsidas

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रम्हाशंभुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम ।
रामाख्यं जगदीश्वरम सुरगुरुं मायामनुष्यम हरिं ।
वन्देअहं करुणाकरं रघुवरं भुपालचूडामणिम ।। 

अर्थ: इस चौपाई में भगवान रामचन्द्र की वंदना किया गया हैं। तुलसीदास जी कहते है। शान्त, सनातन, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप लेने वाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि राम की मैं वंदना करता हूँ।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयासदीये
सत्यं वदामि च भवानखहिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरितं कुरु मानसं च ।। 

अर्थ: हे भगवान राम! मैं सत्य कह रहा हूँ और आप सबके मन की बात जानने वाले हैं। और मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी पूर्ण भक्ति का वरदान दीजिए और मेरे मन को काम क्रोध जैसे दोषों से दूर कीजिए।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम ।
सकलगुणनिधानं वनराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ।। 

अर्थ: अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत के समान कांतियुक्त शरीर वाले, दैत्यरूपी वन के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवनपुत्र हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूं।

सुंदरकांड की 11 चौपाई

जामवंत के बचन सुहाए ।
सुनि हनुमंत ह्रदय आति भाए ।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई ।
सहि दुख कंद मूल फल खाई ।।1

जब लगि आवौं सीतहि देखी ।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा ।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ।।2

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर ।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।।
बार बार रघुबीर संभारी।
तरकेउ पवनतनय बल  भारी ।।3

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता ।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता ।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना ।
एही भाँति चलेउ हनुमाना ।।4

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी ।
तैं मैनाक होहि श्रमहारी ।।5

जात पवनसुत देवन्ह देखा। 
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। 
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥6

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। 
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। 
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।7

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। 
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। 
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥8

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। 
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। 
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥9

मसक समान रूप कपि धरी। 
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी।
 सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥10

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। 
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। 
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥11

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कितनी भी हो मुश्किल थोड़ा भी न घबराना है, जीवन में अपना मार्ग खुद बनाना है।