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सुंदरकांड की चौपाई - sundar kand tulsidas

तुलसीदास जी के द्वारा लिखा गया रामचरित मानस का पंचम सोपान जिसे सुंदरकाण्ड के नाम से जाना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस सुन्दरकाण्ड की जो की हमारे हिंन्दी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के षष्ठ प्रश्नपत्र में है।

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शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रम्हाशंभुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम ।
रामाख्यं जगदीश्वरम सुरगुरुं मायामनुष्यम हरिं ।
वन्देअहं करुणाकरं रघुवरं भुपालचूडामणिम ।। 1 ।।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयासदीये
सत्यं वदामि च भवानखहिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरितं कुरु मानसं च ।। 2 ।।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम ।
सकलगुणनिधानं वनराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ।। 3 ।।

जामवंत के बचन सुहाए ।
सुनि हनुमंत ह्रदय आति भाए ।।

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई ।
सहि दुख कंद मूल फल खाई ।।

जब लगि आवौं सीतहि देखी ।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ।।

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा ।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ।।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर ।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।।

बार बार रघुबीर संभारी।
तरकेउ पवनतनय बल  भारी ।।

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता ।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता ।।

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना ।
एही भाँति चलेउ हनुमाना ।।

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी ।
तैं मैनाक होहि श्रमहारी ।।

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