अर्धमागधी भाषा : ardhmagdhi bhasha

अर्धमागधी भाषा मागधी और शौरसेनी के बीच के क्षेत्र की भाषा थी। अर्थात यह भाषा मगध अर्थात दक्षिण बिहार के और मथुरा के बीच के जो क्षेत्र बचते हैं वहां पर बोले जाते थे। क्योकि इन क्षेत्रों में क्रमशः मगध और शौरसेनी प्राकृत बोली जाती थीं। अर्धमागधी से ही पूर्वी हिंदी अर्थात अवधी बघेली छत्तीसगढ़ी बोलियों का विकास हुआ है।

इसके बाद अर्धमागधी का अपभ्रंश रूप विकसित हुआ जिसे क्षेत्रीय अपभ्रंश अर्धमागधी अपभ्रंश के रूप में जाना जाता है। जिससे आर्य भाषा पूर्वी हिंदी का विकास हुआ।

महावीर स्वामी के उपदेश इसी अर्धमागधी भाषा में देखने को मिलता है या दिया है । यह अर्धमागधी भाषा संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषा के बीच की कड़ी है। महावीर स्वामी के उपदेशों को उनके शिष्यों ने इसी अर्धमागधी भाषा में आगम नाम से संकलित किया है।

हेमचंद्र्र आचार्य का कहना है की यह आर्ष प्राकृत भाषा है।


इस भाषा को लेकर कुछ भ्रांतियां भी हैं जैसे - यह भाषा आधे मगध में बोली जाती थी इसलिए इसे अर्धमागधी के नाम से जाना जाता है। वह भाषा जिसमें मागधी भाषा के कुछ गुण पाए जातें जैसे की खंम्भे आदि के पुल्लिंग में एकारांत का होना।

मागधी प्राकृत भाषा पूर्वी दिशा में और शौरसेनी प्राकृत के शिलालेख उत्तर-पश्चिम दिशा में मिलते हैं।

इन भाषाओं के मिलने से एक और मागधी भाषा का जन्म हुआ जिसे अर्धमागधी भाषा कहा जाता है और अर्धमागधी भाषा से ही वर्तमान छत्तीसगढ़ी भाषा का विकास हुआ है। अर्धमागधी भाषा का बहुत बड़ा योगदान छत्तीसगढ़ी साहित्य का इतिहास एवं विकास में रहा है। 


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