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साकेत की मौलिक उद भावनाएं

साकेत के मौलिक उद भावनाएं
मौलिकता यूक सापेक्ष होती है कथानक का आधार किसी भी युग का हो जिसमें रचनाकार उसे सृजित कर रहा है उस युग की मूल्य चेतना जीवन का दृष्टिकोण और सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियां उसे प्रभावित करती हैं यहां प्रभाव ही उसे मौलिकता प्रदान करता है मैथिलीशरण का योग उदारवाद और आदर्श मूल्यों का युग था राष्ट्रीयता अपने परम चरम पर थी और समाज में मूल्यों और जीवन दृष्टि को तलाश कर रहा था अतः साकेत के रचनाकार पर भी इनका प्रभाव था और वहां इन से प्रेरित होकर ही रचना कर्म में रथ था इसलिए साकेत चिर पुरातन चीर नूतन रामकथा की पृष्ठभूमि पर लिखा गया युग सापेक्ष काव्य है।

साकेत में मौलिक उद भावनाओं का पहला कारण यह है कि अपने युग की परिस्थितियों की उपज होता है और उसकी कृतित्व पर उसके युग की छाप पढ़े बिना नहीं रहती है गुप्तजी भी युग इन परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना ना रह सके थे आधुनिक युग में राष्ट्रीयता नारी जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के जो स्वर उठ रहे थे वह साकेत में भी सुनाई पड़ते हैं दूसरी बात यह है कि कवि के ग्रंथ सृजन की मूल भावना ने उसे कथानक में मौलिक उद भावनाओं के लिए बाध्य किया गुप्तजी ने युग युग के कवियों की उपेक्षित उर्मिला स्त्री को उसके वांछित गौरव से सम्मानित करने के लिए साकेत का सृजन किया था अतः इस मूल भाव की रक्षा के लिए उन्हें कथा में जो आवश्यक है फिर करने पड़े उन्होंने भले ही पूर्व प्रचलित कथा को अपनाया था फिर भी मौलिकता की आकांक्षा उसमें थी अतएव साकेत में वाल्मीकि एवं तुलसी द्वारा वह वह इरित प्रसंगों का संक्षेप में और उनके द्वारा उपेक्षित प्रसंगों का सविस्तार वर्णन किया गया

साकेत में आकर राम सीता की कहानी लक्ष्मण उर्मिला की कहानी बन जाती है श्री रामस्वरूप दुबे नियम साकेत सुधा में लिखा है और मिला प्रथम बार नायिका के रूप में सामने आती है और राम कथा की सभी घटनाएं उर्मिला से संबंधित होकर उसी की भावना के अनुसार आती है प्रमाण अथवा मानस के घटनाक्रम के अनुसार नहीं डॉक्टर द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने भी साकेत की कथावस्तु के मौलिक प्रसंगों और भावनाओं का विवेचन किया है उनके अनुसार साकेत में मौलिक प्रसन्न निम्नलिखित है
लक्ष्मण उर्मिला के जीवन की मनमोहन झांकी
कैकई की कलम काली मां का उच्चारण चेतन
उर्मिला की विरह वेदना की अभिव्यंजना।
संजीवनी बूटी की भारत के पास उपलब्ध थी।
साकेत वासियों की लक्ष्मण शक्ति प्रसंग को सुनकर रण सज्जा और उर्मिला का वीरांगना वेश
वशिष्ठ का योग बल द्वारा साकेत वासियों को राम रावण युद्ध का दिग्दर्शन
डॉ राम रतन भटनागर ने भी साकेत के कथानक की निम्न बॉलीवुड भावनाओं का वर्णन किया है
संपूर्ण राम कथा को साकेत तक सीमित कर देना
कथा का आरंभ राम जन्म से ना होकर चारों भाइयों के विवाह उपरांत होना
गुप्तजी नेम राम को अवतारी मानते हुए भी साकेत में उनकी अपौरूषेय रूप के स्थान पर कौटुंबिक जीवन का चित्रण।
उर्मिला विषयक प्रसंगों का समावेश।
अरणीय से लेकर लंका तक की कथा का हनुमान द्वारा उल्लेख।

इस प्रकार यहां स्पष्ट है कि विभिन्न विद्वानों ने अपनी-अपनी दृष्टि से साकेत में मौलिक प्रसंगों का अन्वेषण किया है इन मऊ नेताओं के संदेश से कथा में अपूर्व संस्थाओं आ गया है डॉ नगेंद्र के अनुसार यह सभी उस भावना में उद भावनाएं कवि की गंभीर भाव था और प्राण कल्पना का परिचय देती हैं।

साकेत की मौलिक उद भावनाएं

साकेत की सबसे महत्वपूर्ण मौलिक उद भावना उर्मिला विषयक प्रसंग है कवि ने अत्यंत मनोयोग से उसके जीवन की विविध झांकियां प्रस्तुत की हैं उर्मिला लक्ष्मण के सहयोग कालीन चित्र से ही कथावस्तु आरंभ होती है तत्पश्चात राम और सीता के साथ लक्ष्मण वन गमन करते हैं और योगिनी उर्मिला के आंसुओं से लेकर लेखक ने साकेत के प्रश्नों को गिला किया है साकेत का अंत उर्मिला और लक्ष्मण पति पत्नी के पुनर्मिलन के मधु दृश्य से होती है पुष्प वाटिका में भी सीता के साथ ही उर्मिला भी राम लक्ष्मण के दर्शन करती हैं और अपना हृदय वहीं गंवा बैठती है साकेत की कथा का यह आधार ही अपने आप में अत्यंत मौलिक उसमें उर्मिला और लक्ष्मण के प्रेम और वियोग को आधार बनाया गया है इसमें उनके मिलन और वियोग और पुनः मिलन की दृश्य अंकित हैं इन सभी प्रश्नों में साकेत की मौलिकता परिलक्षित की जा शक्ति है।

साकेत की दूसरी मौलिक बुध भावना स्त्री चरित्रों को उज्जवल और युग सापेक्ष बनाने में है इसके मूल में राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्री की सक्रिय भूमिका का होना है इस प्रसंग में हम कैकेई की चरित्र की नई विशेषता यहां देखते हैं मानस की कैकेई तथा कलुषित चरित्र साकेत में पूर्ण उज्जवल बना दिया गया है चित्रकूट की सभा में वह जिस प्रकार पश्चाताप करते हैं और आत्मग्लानि की ज्वाला में झुलस दी है उससे उसका कलेवर कंचन सा निखार आता है उपेक्षित स्त्रियों को गौरव दिए जाने के प्रसंग में मांडवी का चरित्र भी है तुलसी के मानस में मांडवी उपेक्षिता रही है जबकि साकेत कार ने अंतिम सड़कों में उसके चरित्र को आवश्यक उपहार देने का प्रयास किया है

चित्रकूट सभा के अनंतर कवि ने घटनाओं को घटित होते नहीं दिखाया है अभी तो उनका वर्णन मात्र किया है बालकांड की कथा उर्मिला अरण्य की सत्रुघना तथा किष्किंधा और लंका के हनुमान ने कही है युद्ध का दृश्य साकेत वासियों को वशिष्ठ जी योग दृष्टि द्वारा दिखाते हैं यहां परिवर्तन अपेक्षित था क्योंकि काव्य की नायिका उर्मिला और ग्रंथ का नाम साकेत था इन घटनाओं का उर्मिला से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है अतएव यही यदि कवि इनका प्रत्यक्ष वर्णन करता तो इससे स्थान एक और घटना एक के में बाधा पहुंचती हैं।

हनुमान द्वारा लक्ष्मण शक्ति का प्रसंग सुनकर साकेत वासियों की रण सज्जा का वर्णन साकेत की मौलिक उद भावना है इस प्रश्न के वर्णन का कारण था गुप्ता जी का राष्ट्रप्रेम एवं उसके अंतर में हिलोरे लेती हुई राष्ट्रीयता की भावना तुलसी के मानस में यहां प्रश्न नहीं है तुलसी के राम मानव रूप में अवतरित ईश्वर थी और उनकी सर्व शक्ति संपन्नता को किसी सहायक की आवश्यकता ही न थी परंतु गुप्त जी के राम मनुष्य ही हैं देवत्व के गुणों में परिपूर्ण मानव अतः उन्हें विपत्ति में पड़ा देखकर उनके बंधु बांधव एवं उन पर मिटने वाले प्रजा जनों का उत्तेजित हो उठना स्वभाविक है इस स्थल पर कवि की भाव बताओ भरी राष्ट्रीयता की भावना मुखर होती है राष्ट्रकवि गुप्त जी के अंतर का संपूर्ण राष्ट्रप्रेम साकेत वासियों की रण सजा के मध्य से फूट पड़ा है साथ ही इस प्रसंग द्वारा उर्मिला के चरित्र का वीरांगना का पक्ष भी पाठकों के समक्ष अत्यंत भव्य रूप में उपस्थित हुआ है उर्मिला की वीरांगना वेश तत्कालीन राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की सक्रिय भूमिका का प्रतिरूप है इस तरह के स्त्री चरित्र प्रसाद के नाटकों में देखे जा सकते हैं साकेत में गुप्त जी नेम कैकई मंथरा संवाद को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान करके अपनी मौलिक विचारधारा का उद्भव किया है उद्भाव किया है कैकेई के समक्ष अपना कलुषित मंतव्य प्रकट कर मंत्रा वहां ठहरती नहीं और चली जाती हैं उसका यहां चल आ जाना सभी पर आए हैं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समीचीन हैं और इसी कारण उसके जाने के पश्चात के के को बार-बार उसके वचन याद आते हैं
भरत से सूट पर ही संदेह है
बुलाया तक ना उसी जोगिया

राजा दशरथ के दिवंगत होने के उपरांत उसकी उनकी रानियों द्वारा सती होने का प्रस्ताव कवि की मौलिक उद भावना है वास्तव में कभी किया मौलिकता वैधव्य प्राप्त रानियों के चरित्र को उज्जवल एवं गरिमा मंडित बना रही है तुलसी के मानस में इस प्रश्न का अभाव है राम भक्ति में आकंठ मांगना तुलसीदास को चारों ओर से देखने का अवकाश हीना था और यह छोटे-मोटे प्रश्न उनके लिए महत्वहीन थे परंतु गुप्तजी ने इस पर विचार किया है राक्षसों के संहार के उपरांत उनकी पत्नियां अपने पति के मृत शव के साथ सती हो गई किंतु कौशल्या सुमित्रा आदि आदर्श नंबर न्यू ने इस बात को सोचा तक नहीं यह बात उनके चरित्र के गौरव के प्रतिकूल थी इसलिए कभी नहीं दशरथ मरण के उपरांत उनके द्वारा सती होने का प्रस्ताव रखवाया है परंतु भारत की अनुनय विनय और वशिष्ठ मुनि का उद्देश इस कार्य से उन्हें रोक देता है यद्यपि सती होने का यह प्रस्ताव सती प्रथा निषेध कानून के बाद रखा जाना है कवि की सामाजिक रोड सोच का संकेत देता है तथापि उसके पीछे उसकी उच्च वर्गीय स्त्रियों को गरिमा प्रदान किए जाने का लक्ष्य इस प्रतिगामी मूल्य को प्रश्रय देने के अपराध से बचा लेता है 

साकेत में परिवारिक हास परिहास के अनेकानेक रम्य चित्र उपस्थित हैं प्रथम सर्ग में उर्मिला लक्ष्मण का वाघ विनोद पंचम सर्ग में राम सीता लक्ष्मण के वन गमन के समय के स्नेह सिक्त मधुर वचन एवं अष्टम सर्ग में राम सीता के प्रेम पूर्ण हास परिहास साकेत की सफल परिवारिक प्रेम व्यंजना के प्रतीक हैं साकेत के अष्टम सर्ग में कवि ने सीता के चरित्र को एक आभासी आवेष्ठित कर दिया है राजघराने की स्त्रियां श्रम करें यह अब तक सोचा नहीं गया था यद्यपि कृति वास रामायण में सीता को वन में श्रम करते हुए प्रस्तुत किया है तथा पर तुलसी की अपेक्षा यह मौलिक प्रश्न है कि सीता स्वयं श्रम से श्रम में संलग्न है यह है कि श्रम के स्वावलंबन की सौंदर्य में सीता के सौंदर्य में हिसाब से और भी चार चांद लग जाते हैं
अंचल पट कटी में खोज कचोटा मारे
सीता माता थी आज नहीं धंधा रे

और यहां दर्ज थी श्रम जनित वारी बिंदुओं की सक्रिय होकर विविध कार्यों के करने की

साकेत की एक अन्य मौलिक विशेषता यह है कि इसमें चित्रकूट को एक परिवारिक घटना का रूप प्रदान किया गया है
साकेत का राम रावण युद्ध संबंधी प्रश्न भी मौलिक है लक्ष्मण को शक्ति लगने पर राम चौक विह्वल हो करो विलाप करते ही अपनी नहीं करते अपितु वे क्रोधा धन हो प्रलय मचा देते हैं उनके नेत्रों के सामने जैसे ही कुंभकरण आता है मैं भाई का बदला भाई कह कर उसका संसार सहार कर देते हैं तत्पश्चात उनकी दृष्टि रावण पर पड़ती है तो देखते हैं कि कुंभकरण को मृत देख मूर्छित हो गिर पड़ा है अतः राम को लक्ष्मण के स्मरण होता है और वे रावण के सहृदयता की सराहना करते हैं कवि की इस स्थल पर वर्णित मौलिक व्यंजना निसंदेह अत्यंत प्रभावपूर्ण हैं डॉक्टर नगेंद्र के अनुसार यहां प्रश्न बड़ा महत्वपूर्ण है इस के सम्मुख राम चरित्र मानस अथवा रामायण का कुंभकरण वध ने जीव है निस प्राण है।

लक्ष्मण के शक्ति लगने पर हनुमान आकाश मार्ग से आते जाते हैं और उन्हें संजीवनी जड़ी साकेत में ही प्राप्त हो जाती है यहां भी कभी की नवीन प्रसन्न गोद भावना है।

साकेत एवं अन्य राम काव्य में अंतिम भिन्नता यहां है कि इसमें राम का चरित्र मानवीय स्तर पर और टीना किया गया है इस व्रत व स्तर पर नहीं साकेत के राम मनुष्य रूप में ईश्वर है ईश्वर रूप में मनुष्य नहीं है यहां मानवीय उद्भाव ना निराला आगे बढ़ाते हैं और राम को पुरुषोत्तम नवीन के रूप में प्रस्तुत करते हैं
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि साकेत की कथावस्तु की उपर्युक्त मौलिक उद भावनाएं हैं परंतु इनके अलावा भी सैकड़ों प्रसन्न कैसे हैं जो तुलसी के रामचरितमानस से अलग हैं दोनों का तुलनात्मक अध्ययन इनको प्रत्यक्ष कर देगा डॉ कमल कांत पाठक के शब्दों में हम कर सकते हैं नारी पात्रों की नई वस्तु कल्पना उपेक्षित स्थलों की पहचान राम का मानवता दर्शन मानवता दर्ज लोकोत्तर घटनाओं कीम बुद्धि नष्ट और विश्वास में व्याख्या तथा प्रेम कथा और आधुनिक जीवन आदर्श का भावना में निरूपण साकेत की कथावस्तु को नवीन आधार प्रदान करता है कवि ने अस्वाभाविक प्रसंगों को मनोवैज्ञानिक भित्ति दी है तथा नवयुग के राष्ट्रप्रेम की कथा तमक अभिव्यक्ति अतएव साकेत अभिनव राम काव्य की संज्ञा पा सका है निश्चय ही कभी नहीं रामायण या मान्यताओं पर नवीनता प्रेम के कारण कहीं कोई आघात नहीं किया।

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