bhukamp kya hai भूकंप कितने प्रकार के होते हैं ?

Bhukamp kya hai सामान्यता प्राकृतिक कारणों से आने वाले भूकम्प को ही भूकंप कहते हैं। ये भी कई प्रकार से उत्पन्न है। इसके अतिरिक्त, मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव के हाथ में विनाशकारी एवं विस्फोटक औजार का उपयोग बढ़ने से उसके प्रभाव से धक्के आ सकते हैं। अत: भूकम्प को दो वर्गों में रखा जा सकता है 

bhukamp kya hai

(A) मानवीय क्रियाओं से उत्पन्न भूकंप

(B) प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न भूकंप

(A) मानवीय क्रियाओं से उत्पन्न bhukamp(earthquakes) इन्हें बनावटी या कृत्रिम bhukamp भी कहते हैं। ऐसे bhukamp । स्थानीय प्रभाव  वाले हल्के धक्कों की भाँति होते हैं। भवनों के समीप स्थित रेल की पटरी से गुजर रही एक्सप्रेस । सवारी या मालगाड़ी से भी मकानों के टेबलों पर रखा सामान अपना स्थान छोड़ने लगता है। कुओं या खान बोदते समय भारी विस्फोट का उपयोग  करने पर निकटवर्ती भाग कुछ क्षणों के लिए हल्का कम्पन महसूस कर सकते है।

वर्तमान में TNT श्रेणी के विस्फोट से एवं भमिगत आणविक विस्फोट से भी स्पष्टतः भूकम्प जैसा दृश्य आ सकता है। इसमें काँच की खिड़कियों में कम्पन की आवाज सुनाई देती है एवं रखा हुआ सामान हिलने लगता है। मानव का यह खोज भी काफी महत्वपूर्ण किन्तु विनाशकारी मानी जाती है। इस प्रकार के भूकंप (earthquakes) बहुत हल्के होते है, इनसे जान-माल की हानि नहीं होती। आणविक परीक्षणों में भी ऐसा ही होता है।

Bhukamp ke prakar

(B) प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न भूकम्प विविध प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं से भू-तल पर कम्पन होने लगता है प्रकृति के आधार पर भूकम कितने प्रकार के होते है - Types of earthquakes .

इस आधार पर भूकंप चार प्रकार के होते हैं

(1) ज्वालामुखी भूकम्प (Volcanic Earthquakes)-जब किसी स्थल पर केन्द्रीय उद्गार द्वारा जालामुखी विस्फोट होता है तो विस्फोट एवं तेज गति से गैस व लावा के निकलने से वहाँ भूकम्प आ सकता है। इसी भांति मेग्मा एवं उससे सम्बन्धित गैसें जब तेज गति से दौड़ते हुए चट्टानों पर विशेष दबाव डालती है तो इसके प्रभाव से भू-तल पर भूकम्प आ सकता है । क्राकाटाओं के अतिरिक्त सन् 1969 का एटना का भूकम्प भी ज्वालामुखी भूकम्प था।

(2) विवर्तनिक या अभिवर्तनिक भूकम्प (Tectonic Earthquakes)- पृथ्वी की ऊपरी परत व सियाल परत में होने वाली अंश शक्तियों को विवर्तनिक शक्तियाँ कहते हैं। इनके प्रभाव से चट्टानें अपने मूल स्थान से ऊपर-नीचे अथवा क्षैतिज स्थिति में ही इधर-उधर होने लगती हैं। इससे भू-गर्भ एवं भू-तल में दरारें व अंश, भ्रंश घाटी तथा ब्लॉक पर्वत बनते हैं। उस समय विनाशकारी भूकम्प आते हैं। इससे कई बार भू-गर्भ के पदार्थ रेत, चट्टानें, गैसें आदि अनियमित रूप से निकलने लगती हैं। भारत में असम का 15 अगस्त, 1950 का भूकम्प ऐसा ही था। पेरू में क्वीचेस (1946), जापान में सगामी की खाड़ी एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलिफ्रेनिया (1986) में आने वाले भूकम्प ऐसे ही थे।

(3) पातालीय भूकम्प (Plutonic Earthquakes)-जब भूकम्प की उत्पत्ति भू-गर्भ में अधिक गहराई पर हो तो इसे पातालीय भूकम्प कहते हैं। सामान्यतः ऐसे भूकम्प का मूल (Focus) 250 से 680 किलोमीटर के मध्य रहता है। ऐसे भूकम्प की उत्पत्ति एवं विशेष शक्तियों के बारे में बहुत कम ज्ञान है। क्योंकि अधिक गहराई में होने वाली क्रियाओं का अनुमान लगाना आज भी कठिन है फिर भी गुटेनबर्ग के अनुसार, अधिक गहराई से उत्पन्न भूकम्प की तरंगें भू-तल पर अपनी गति व फैलने के स्वरूप आदि विशेषताओं में अन्य भूकम्पों से भिन्न रहती हैं।

(4) भू-सन्तुलन से सम्बन्धित भूकम्प (Isostatic Earthquakes)-पृथ्वी के कमजोर भागों में जैसे परिप्रशान्त प्रदेश एवं नवीन या अल्पाइन क्रम के पर्वतीय प्रदेशों में भू-सन्तुलन अव्यवस्थित स्थिति में रहने से वहाँ के भू-गर्भ में अपेक्षित या अचानक विविध प्रकार की गतियाँ कार्य करती रहती हैं। इससे चट्टानें टूटती व पुनः व्यवस्था में आने का प्रयास करती हैं। गहराई के अनुसार भूकम्पों को गुटेनबर्ग ने तीन भागों में बाँटा है :

(i) छिछले या साधारण भूकम्प (Shallow or Simple Earthquakes)-जिन भूकम्पों की उत्पत्ति का आधार या मूल (Focus) 30 किलोमीटर तक की गहराई पर रहता है, उन्हें छिछले या साधारण भूकम्प कहते हैं। इससे भूकम्पकेन्द्र (Epicentre) से कुछ किलोमीटर की परिधि में ही सबसे अधिक नुकसान होता है।

(ii) मध्यम गहराई वाले भूकम्प (Earthquakes of Medium Depth)-इन भूकम्पों की उत्पत्ति का मूल (Focus) 35 से 150 किलोमीटर के मध्य रहता है। ऐसे भूकम्प सामान्यतः भू-विवर्तनिक कारणों से उत्पन्न होते हैं। इनसे भूकम्पकेन्द्र से अधिक दूर के क्षेत्रों में कमजोर चट्टानी क्षेत्रों में अधिक नुकसान होता है।

(iii) पातालीय या गहरे भूकम्प (Plutonic or Deepseated Earthquakes)-इन भूकम्पों की सात या मूल 150 से 500 किलोमीटर के बीच रहता है। ऐसे भूकम्पों की उत्पत्ति का कारण अभी भी अज्ञात। सम्भवतः असन्तुलन की दशा तथा सीमा क्षेत्र में विशेष घटनाएँ और उनका ऊपरी तल पर प्रभाव तथा। विकसित ज्वालामुखी सम्बन्धी घटनाएँ सभी मिलकर इसका प्रभावी कारण रही हों। प्लेट विवर्तनिकी (plate tectonics) को भी इसके लिए महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

प्राकृतिक स्थिति के अनुसार भूकम्प दो प्रकार के होते हैं

(i) स्थलीय भूकम्प (Land Earthquakes) स्थलमण्डल पर या महाद्वीपों एवं बड़े द्वीपों पर आने वाले या प्रभाव डालने वाले भूकम्प को स्थलीय भूकम्प कहते हा ऐसे भूकम्प जो कि प्रायः अल्पाइन पर्वतीय भागों में बार-बार आते रहे है, अधिक घातक एवं विशेष हानिकारक रहे हैं। अधिक गहराई पर उत्पन्न ऐसे भूकम्पों का प्रभाव कुछ लाख वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है। 12 जून, 1897 एवं 15 अगस्त, 1950 को आये असम के भूकम्प विशेष विनाशकारी एवं विशाल क्षेत्र को कुप्रभावित करने वाले रहे। इससे 5 से 20 किलोमीटर लम्बी एवं 8 से 10 मीटर चौड़ी दरारें पड़ गई। भूमि का स्वरूप ही बदल गया। अनेक नगर एवं हजारों वर्ग किलोमीटर पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा।

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(ii) सामुद्रिक भूकम्प (Oceanic Earthquakes)-ऐसे भूकम्पों की उत्पत्ति महासागरीय क्षेत्र, अपतटीय एवं तटीय भागों के आस-पास होती है क्योंकि अपतटीय एवं तटीय भागों में उत्पन्न होने वाले ऐसे भूकम्पों का सीधा प्रभाव द्वीपीय देशों पर विशेषकर प्रशान्त महासागर के पश्चिमी तट पर घनी आबादी के द्वीपों एवं तटों पर सबसे अधिक महसूस किया जाता है। अकेले प्रशान्त महासागरीय प्रदेश में सीस्मोग्राफ पर तट एवं तट के आस-पास व द्वीपों के निकट प्रतिदिन 150 से 200 भूकम्प अंकित किये जाते हैं। अकेले जापान में ही 10 से 12 भूकम्प प्रतिदिन अंकित किये जाते हैं। कई विद्वानों का विश्वास है कि महासागरों के विशेष भागों में जो दरारें एवं गहरे गर्त (केनियन) व खाड़ियाँ पाई जाती हैं इससे समुद्री तल में असन्तुलन की दशाओं के कारण आकस्मिक भू-गतियों होती रहती हैं। इसी से वहाँ भूकम्प विकसित होते रहे हैं। इससे यहाँ लहरें उठती है। ऐसी घातक या सर्वनाशी लहरों को जापान में सुनामी (Tsunami) कहा जाता है। क्राकाटाओ के महाहिंसक ज्वालामुखी विस्फोट के पश्चात् भी ऐसी घातक लहरें उठी थीं। इनसे कुछ ही मिनटों में जावा व सुमात्रा तट के लगभग 35 हजार व्यक्ति मारे गये। टोकियो में सन् 1925 के भूकम्प से भी 25 हजार व्यक्ति मारे गये।

भूकम्प एवं भूकम्प विज्ञान

भूकम्प एक ऐसी प्राकृतिक व दुखान्त घटना है जिस पर मानव का कोई वश नहीं है। अनेक क्षेत्रों में वैज्ञानिक विकास की ऊंची उड़ान भरने वाला मानव आज भी भूकम्प व ज्वालामुखी की घटना को 'भगवान भरोसे ही मानता रहा है फिर भी इनके आने की घटनाओं का अध्ययन, उनकी प्रकृति, प्रवृत्ति, भूकम्प तरंगों का अध्ययन एवं ऐसे ही अन्य अनेक तथ्यों के कारणों की वैज्ञानिक विधि से व्याख्या कर उनका अध्ययन करने का विशेष प्रयास किया गया है। भूकम्प का अध्ययन करने वाले विज्ञान को भूकम्प विज्ञान या सीस्मोलोजी (Seismology) कहा जाता है। भूकम्प विज्ञान के विकास का उद्देश्य विश्व में निरन्तर आबादी बढ़ने के साथ-साथ भू-वैज्ञानिक दृष्टि से असन्तुलित भागों में भी मानव बसाव बढ़ते रहने से वहाँ आने वाले भूकम्पों से निरन्तर जनधन हानि से बचाव को आगे बढाना भी रहा है क्योंकि विश्व में यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 50 से 60 हजार भूकम्प या भू-कम्पन होते हैं। इनमें 6 से 8 प्रतिशत ही विशेष महसूस करन। वाले होते हैं।


भूकम्पमापी (Seismograph) भूकम्प से सम्बन्धित सभी तथ्यों का अध्ययन जिस यन्त्र द्वारा किया जाता है उसे  भूकम्पमापी या भूकम्पलेखी कहते हैं। भूकम्पलेखी को बताया गया है। इस यन्त्र में लगे हल्के तारों वाले लटकते पदार्थों पर जो क्रिया होती है वह विशेष रोशनी एवं दर्पण की सहायता से विशेष प्रभावकारी फिल्म या ग्राफ पर अंकित होती जाती है। वहाँ बने विशेष घेरों की सहायता एवं कम्पन की रेखाओं से भूकम्प की दिशा, भूकम्प प्रभावित क्षेत्र एवं भूकम्प लहरों की क्षमता आदि का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। सभी बड़े नगरों में वहाँ स्थिर स्थापित किये जाते हैं।

भूकम्प से होने वाली हानि की समानता एवं भूकम्प तरंगों की विशेष गति व क्रियाशीलता के अनुसार भकम्प के भू-तल पर माने गये केन्द्र से समविनाश रेखाएं खींची जाती है। भूकम्प तरंगों (Eartha.net Maves) का अध्ययन भी इसी यन्त्र से किया जाता है। आजकल अधिक विकसित यन्त्र में फोटो फिल्म पतं विशेष उच्च स्तर की व्यवस्था होती है। इससे आस-पास के हल्के झटका का भी आसानी से अध्ययन किया जा सकता है।

भूकम्प मूल एवं अधिकेन्द्र (Focus and Epicentre)- भू-गर्भ में जिस स्थान से चट्टानों में होने वाली विशेष परिवर्तन या विवर्तन की क्रियाओं से उद्वेग या हलचल की शुरूआत होती है, उसे भूकम्प मूल या भूकम्प उत्पत्ति केन्द्र (Focus) कहते हैं। यहाँ से जिस स्थान पर सबसे पहले पृथ्वी की सतह पर लम्बवत्ध क्का महसूस किया जाता है उसे भूकम्प अधिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं ।

 भूकम्प मूल या उत्पत्ति केन्द्र से सभी दिशाओं में जो तरंगें फैलती हैं वही अभिकेन्द्र के जारों ओर वत्ताकार घेरे बनाती है। इनसे भूकम्प से होन वाली हानि का ज्ञान होता है। भूकम्प का मूल अधिकेन्द्र से हमेशा समान गहराई पर नहीं होता। यह कुछ किलोमीटर से लेकर एक सौ से भी अधिक किलोमीटर की गहराई पर हो सकता है। वैसे अधिकांश कम हानि पहुंचाने वाले भूकम्पों के उत्पत्ति केन्द्र की गहराई पृथ्वी से 5 से 8 किलोमीटर के मध्य रहती है। भूकम्प से सबसे अधिक नुकसान केन्द्र से हटकर बनने वाले भीतरी वृत्तों में होता है।

भूकम्प तरंगें (Earthquake Waves)-भूकम्प उत्पत्ति केन्द्र से चारों ओर चलने वाली विभिन्न प्रकार की तरंगों या लहरों या कम्पन के प्रकार को ही भूकम्प तरंगें कहते हैं। इनकी गति, प्रभाव एवं निरन्तरता समान नहीं रहती। यह रुक-रुककर एवं अनेक प्रकार से तथा चट्टानों का स्वरूप या घनत्व बदलने पर भी बदलकर आगे बढ़ती रहती है। अतः भूकम्प तरंगें या तरंग (लहरें) कई प्रकार से प्रभावी होती हैं। किसी भी मुख्य उत्पत्ति केन्द्र से तीन प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं :-

(i) प्राथमिक, प्रधान या 'P' तरंगें (Primary or 'P' Waves) -ये तरंगें सबसे अधिक तेज गति से चलती हैं। इनकी गति 8 से 14 किलोमीटर प्रति सेकण्ड तक रहती है। ये तरंगें ठोस एवं तरल दोनों ही प्रकार के पदार्थों में समान रूप से गतिशील रहती हैं। ऐसी लहरें आगे-पीछे धक्के देती हुई।

समान गति से बढ़ती हैं। उन्हें संक्षेप में 'P' तरंगें भी कहा जाता है । इनसे पदार्थों एवं भू-तल पर बराबर दबाव बना रहता है। यही तरंगें पृथ्वी के मध्यवर्ती केन्द्र (Core of the earth) में प्रवेश कर पाती हैं। यद्यपि वहाँ इनकी गति कम होती जाती है।

(i) द्वितीयक, आड़ी, गौण या 'S' तरंगें (Secondary, Transverse or 'S' Waves) इन लहरों या तरंगों की गति जल में उठने वाली लहरों जैसी होती है। इनकी गति 5 से 7 किलोमीटर प्रति सेकण्ड रहती। तेज भूकम्प के झटकों से इन लहरों के कारण पृथ्वी पर फटन या दरारें शीघ्र पड़ जाती हैं।