भूकंपों के प्रभाव effects of earthquakes in hindi

भूकम्प सबसे अधिक विनाशकारी एवं ऐसी आकस्मिक प्राकृतिक घटना है जिसके आगे आज भी मानव एवं विज्ञान पूरी तरह असहाय है। जहाँ ज्वालामुखी का प्रभाव मात्र स्थान विशेष के आस-पास ही रहता है, वहीं भूकम्प की तरंगों का घातक प्रभाव कुछ सौ वर्ग किलोमीटर से लाखों वर्ग किलोमीटर तक अंकित किया जाता है। सन् 1737 के कोलकाता के भूकम्प में 3 लाख के लगभग कि व्यक्ति मारे गये एवं सन् 1923 के सगामी खाड़ी व टोकियो के भूकम्प में 5 लाख मकान नष्ट हए तथा 25 हजार व्यक्ति मारे गये। सन् 1869 के असम भूकम्प का प्रभाव लगभग 12 लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक के विशाल प्रदेश में देखा गया।

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भूकम्पों के प्रभाव (EFFECTS OF EARTHQUAKES IN HINDI)

ये अनेक प्रकार से घातक प्रभाव डालते हैं। इनसे होने वाले घातक प्रभाव मुख्यतः निम्न प्रकार के हैं:

(i) मानव निर्मित वस्तुओं या सांस्कृतिक भू-दृश्यों का नाश-भूकम्प आते ही मकान गिर जाते हैं, सड़क व रेल मार्ग टूट-फूट जाते हैं तथा भवनों व खेत-खलिहानों में आग लग सकती है। सन् 1923 के टोकियो-याकोहोमा क्षेत्र के भूकम्प से 5 लाख भवन नष्टप्रायः हो गये, हजारों व्यक्ति मारे गये और अरबों की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचा। इससे उस क्षेत्र की सम्पूर्ण अर्थ-व्यवस्था पंगु बनकर रह जाती है। कई बार भूकम्प के साथ भयंकर आग लगने से भी सभी कुछ स्वाहा हो जाता है।

(ii) नगरों का नष्ट होना कभी-कभी भयंकर भूकम्पों का सबसे घातक प्रभाव नगर विशेष पर ही पड़ता है। इससे कुछ ही सेकण्ड में वह नगर नष्ट हो जाता है। यूगोस्लाविया का स्कोपजी नगर, जापान के टोकियो नगर का अधिकांश भाग, टर्की में टेन्जियर्स नगर, आदि सभी नगर कुछ ही सेकण्ड में नष्ट हो गये। सन् 1737 के भूकम्प में कलकत्ता नगर ही नष्ट नहीं हुआ बल्कि इससे तीन लाख व्यक्ति मारे गये।

(iii) नदियों द्वारा मार्ग परिवर्तन एवं भयंकर बाढ़ें-भूकम्प के प्रभाव से जब नदी का मार्ग ही ऊपर उठने लगता है या उनके मार्ग में भू-स्खलन (Land slide) व अन्य बाधाओं के कारण पानी का बहाव अस्थायी तौर पर रुक जाता है, तब या तो नदी अपना मार्ग बदल लेती है अथवा वहाँ अस्थायी झील बन जाती है। दोनों ही दशाओं में निचले क्षेत्रों एवं नवीन क्षेत्रों में भयंकर बाढ़ें आती हैं। वर्तमान काल में सन् 1950 में असम के भूकम्प से दिहांग एवं ब्रहापुत्र के मार्ग बदल गये, सुबंसिरी नदी का बाँध टूट गया। इसी प्रकार अनेक स्थानों पर गढ़वाल-टेहरी के भूकम्प से राफ्ट झीलें बनने से एवं उनके शीघ्र टूट जाने से आई बाढ़ से निचले क्षेत्रों को बहुत अधिक हानि उठानी पड़ती है।

(iv) भू-तल पर दरार, धंसाव एवं उभार का घातक प्रभाव विनाशकारी भूकम्पों से धरती पर दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों में गाँव, भवन, सड़कें आदि समा जाते हैं। मिसीसिपी डेल्टा प्रदेश में सन् 1817 के भूकम्प से, असम में सन् 1897 एवं सन् 1950 के भूकम्प से इसी प्रकार की कई किलोमीटर लम्बी एवं 5 से 20 मीटर चौड़ी दरारें पड़ जाने से महाप्रलय जैसी हानि होने लगती है। कई बार भूमि से रेत बाहर आने लगती है । सन् 1819 के सिन्धु डेल्टा के भूकम्प से अपतटीय समुद्र में 80 किलोमीटर लम्बा व 26 किलोमीटर चौड़ा द्वीप बन गया। जापान में सगामी खाड़ी में सन् 1923 के भूकम्प से एवं कच्छ की खाड़ी में सन् 1890 के भूकम्प से सागर तल एवं तटीय भाग नीचे धंस गये । इस प्रकार ऐसे अभूतपूर्व परिवर्तन से सम्पूर्ण प्रदेश के संसाधनों पर अनेक प्रकार से बुरा प्रभाव पड़ता है।

सागर में भयंकर लहरें उठना-महासागरीय तली में अथवा तटीय भागों में भूकम्प आने पर जल लहरें ज्वार लहर की भाँति ऊपर उठती हैं । इससे सम्पूर्ण तटीय भाग में सभी प्रकार की रचनाएँ-भवन सडकें रेलमार्ग, खेत, उद्योग कुछ ही सेकण्डों में नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। अपार जन-धन की हानि होती है। क्राकाटोआ के ज्वालामुखी विस्फोट के पश्चात् भूकम्प एवं भयंकर विस्फोट के सम्मिलित प्रभाव से ज्वारीय लहरों से जावा व सुमात्रा तट के हजारों व्यक्ति मारे गये। कच्छ की खाड़ी के सन् 1819 के भूकम्प से एवं सन् 1755 के पुर्तगाल के तटीय भूकम्प से अधिकांश तटीय कस्बे व लिस्बन नगर नष्ट हो गया।

26 दिसम्बर, 2004 को हिन्द महासागर के तल के नीचे आये भूकम्प से उत्पन्न शक्तिशाली सुनामी . समुद्री लहरों ने भारत, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, मलेशिया, बांग्लादेश, श्रीलंका व मालदीव आदि कुल 11 देशों के तटीय क्षेत्रों में भीष्म कहर बरपाया है।