Earthquake in Hindi भूकम्प क्या है

Earthquake in Hindi - भूकम्प क्या है  महत्वपूर्ण अचानक होनेवाला हलचल है। इसके प्रभाव से पृथ्वी का क्षेत्र - हिलने लगता है। भूकम्प कापता उसके कम्पन और चारो ओर फैली लहरों से चलता है। जिस प्रकार पानी में पत्थर फेंकने से वहाँ से चारों दिशाओं में लहरें कर फैलने लगती हैं, उसी प्रकार चट्टानों में भी भूकंप  के प्रभाव से लहरें चारों दिशाओं में फैलती जाती हैं। इन लहरों या तंरगों की सघनता  के अनुसार ही भूकम्प की शक्ति का पता चल जाता है।

Earthquake या भूकम्प किसे कहते है 

अगर एक वाक्य में भूकंप को परिभाषित करे तो - प्राकृतिक कारणों से जब पृथ्वी की सतह कांपने लगती है तो उसे भूकम्प कहते हैं।

आर्थर होम्स के अनुसार "जब किसी तालाब में कोई पत्थर फेंका जाता है तो सभी दिशाओं की ओर लहरों की एक श्रृंखला आरम्भ हो जाती है। इसी प्रकार चट्टानों के आकस्मिक विक्षोभ द्वारा विक्षोभ स्थल से । सभी दिशाओं की ओर कम्पन प्रारम्भ हो जाते हैं। इन कम्पनों का संक्रमण ही भूकम्प कहलाता है।

Earthquake in Hindi भूकम्प क्या है


आर. एस. पवार के अनुसार "भूकम्प पृथ्वी के आन्तरिक भाग से सम्बन्धित वे धरातलीय कम्पन हैं।
जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न होते हैं।"

इस प्रकार जब भी प्राकृतिक कारणों से धरती  के नीचे की चट्टानों में किसी न किसी प्रकार की विसंगति । पैदा होने लगती है तो धरती  पर भूकम्प आने लगता है।

origin of earthquakes in hindi

भूकम्प की उत्पत्ति - सामान्यतः भूकम्प की उत्पत्ति से सम्बन्धित दो तरह की विचारधाराएँ रही हैं:

(1) प्राचीन विचारधारा 

प्राचीन मान्यता के अनुसार इसे देवीय शक्ति माना जाता था। बहुत पहले ये धारणा बनी कि जब पृथ्वी पर पाप अधिक होने लगते हैं तो उनके भार से पृथ्वी हिलने लगती है। बाद में लोगों ने माना कि पृथ्वी नाग सर्प के फन के ऊपर है, जब नाग सर्प हिलता है तो पृथ्वी में भी कम्पन होने लगता है। टर्की , कालीमण्टन, बल्गारिया आदि देशो  में पृथ्वी को भैंसे के सींग पर टिकी मानी गई है। उत्तरी अमेरिका में इसे कछुए पर, ईरान में केकडे पर, तिब्बत में मेंढक पर तथा सुलावैसी में सुअर पर आधारित मानी गयी है।

(2) आधुनिक या वैज्ञानिक विचारधारा 

आधुनिक समय में प्राचीन विचारधारा को असत्य बता दिया गया है क्योंकि यह विज्ञान से बहुत दूर है। इसमें रखी गई  बातों को मानना सम्भव नहीं है। अब भूकम्प की उत्पत्ति के लिए निम्न क्रियाओं को महत्वपूर्ण माना गया है

(1) भू-गर्भ में ऊँचे तापमान पर जल-वाष्प एवं गैसों की क्रियाशीलता - पृथ्वी की गहराइयो में दरारों से या अन्य कारणों से पानी काफी नीचे पहंचने लगता है तो वह पानी तेजी से गर्म होकर वाष्प में बदलता जाता है।  पहले से स्थित ज्वालामुखी के द्वारा पानी नीचे प्रवेश करता है तो वह तेजी से और बहुत ऊचे दबाव में बदलने लगता है,  साथ-साथ अनेको प्रकार की गैसें भी वाष्प के साथ मिल जाती है। ऐसी गैस मिश्रित उच्च दबाव वाली वाष्प गतिशील होती है। यही वाष्प और  गैस  पृथ्वी की  सतह की ओर आने का मार्ग ढूँढ़ता है। ऐसा करते समय वह भू-तल की ओर दबाव डालकर एवं भू-तल का का रास्ता खोजकर तेजी से गतिशील होने लगती है। कभी-कभी ये गैसें कमजोर पृथ्वी की पपड़ी से या दरारा से मार्ग ढूंढकर भी पृथ्वी की सतह पर ऐसे मार्गों से तेजी से बाहर आने लगती हैं। इन सारी क्रियाआ से पृथ्वी में कम्पन होने लगती है और धरती पर भूकम्प आता है।

(2) ज्वालामुखी क्रिया- पृथ्वी के असन्तुलित भागों में जहाँ निकटवर्ती गहरे सागरों की तली में सीमा (Sima) की परत सतह के काफी निकट आ गई है वहाँ स्पष्टतः असन्तुलन को स्थिति पाई जाती है। इसी कारण ऐसे देशों में ज्वालामुखी क्रिया के साथ अथवा बिना ज्वालामुखी फटे ही भूकम्प आते रहते हैं। ज्वालामुखी विस्फोट जब भी हिंसक होता है तब उसके साथ भूकम्प भी आता है। इसी भाति भू-गर्भ से जब गैसें एवं लावा तेजी से पृथ्वी की सतह की ओर बढ़ता है तो चट्टानों की व्यवस्था बिगड़न अथवा प्रवाह की तेजी के प्रभाव से भी भूकम्प आ सकता है। इसी प्रकार भू-गर्भ जहाँ कि मेग्मा के भण्डार बचोलिथ का क्षेत्र है, उनके ऊपर की चट्टानों में भी कई बार दरारें पड़ जाती हैं या वे चटक जाती है। इससे धू-तल पर खिचाव या भिंचाव (सम्पीडन या दबाव) की स्थिति बन सकती है अथवा पृथ्वी की सतह पर अव्यवस्था की स्थिति बनने से भी भूकम्प आ सकते हैं। क्राकाटोआ (1883) के ज्वालामुखी विस्फोट के प्रभाव से निकटवर्ती सागर में 120 फुट ऊंची विकराल भूकमनीय लहरें (सनाभिस) उठीं एवं हजारों किलोमीटर दर ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिणी अमेरिकी तट तक भूकम्प की तरंगों का प्रभाव देखा गया। इनके अतिरिक्त इण्डोनेशिया में ताम्बोरा (1815), कैलिफोर्निया में लासनपीक (1914) ऐसे ही ज्वालामुखी भूकम्प थे।

(3) भ्रंश एवं सम्पीडन की क्रिया- पृथ्वी की सतह पर अनेक कारणों से भ्रंश एवं सम्पीडन की क्रियाएं होती रहती है। ऐसी क्रियाओं के प्रभाव से पृथ्वी की चट्टानें भ्रंस के प्रभाव से टूटती या खिसकती है। अथवा पृथ्वी की सतह पर  दरार घाटी ब्लाक पर्वत विकसित होते रहते हैं। ये सभी तनाव सम्बन्धी क्रियाएँ हैं । इनके प्रभाव से सम्बन्धित क्षेत्रों में तेजी से चट्टानों के खिसकाव से भूकम्प आते हैं। जब ऐसी क्रियाएँ पृथ्वी की गहराई में होती हैं तो अधिक विस्तृत क्षेत्र में भूकम्प आते हैं।

इसी भाँति भिंचाव के प्रभाव से भी पृथ्वी पर मोड़ एवं भ्रंश, आदि की क्रियाएँ एक साथ पर्वत निर्माण के समय होती रहता है। इनके प्रभाव से पृथ्वी के बड़े भाग में गहरे भूकम्प आते हैं। इनका प्रभाव अपनी उत्पत्ति केन्द्रों से कई सौ किलोमीटर दूर तक अंकित किया जाता है। 

असम का 15 अगस्त, 1950 का भूकम्प एवं बिहार का सन् 1934 का भूकम्प तथा सन् 1967 में दक्षिणी पर का कोयना भूकम्प ऐसे ही भूकम्प थे।

(4) भू-सन्तुलन की अव्यवस्था - पृथ्वी के अधिकांश भागों में भू-सन्तुलन सम्बन्धी थोड़ी-बहुत अव्यवस्था पाई जाती है, किन्तु कुछ भाग ऐसे हैं जहाँ कि गगनचम्बी पर्वत एवं गहरे सागर पास-पास स्थित है । ऐसे भागों में सन्तुलन की अव्यवस्था सबसे अधिक पाई जाती है। इसी कारण वहाँ पुनः व्यवस्था की स्थिति स्थापित करने की दिशा में भू-गर्भ में आन्तरिक शक्तियों द्वारा  निरन्तर प्रभावी क्रियाएँ होती रहती हैं। इसके कारन कई बार भू-सतह पर भूकम्प भी आ सकते है। जापान में आने वाले विनाशकारी भूकम्प, फिलीपीन्स के भूकम्प एवं अफगानिस्तान में 4 मार्च, 1949 में आया हिन्दकोह (हिन्दुकुश) का भूकम्प ऐसी सन्तुलन की अव्यवस्था। एवं उसमें आये अचानक स्थानीय परिवर्तन का ही प्रभाव परिणाम माना जाना चाहिए।

(5) प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धान्त- यह सिद्धान्त डॉ. रीड का है। इसके अनुसार, प्रत्येक चट्टान में थोड़ी मात्रा में धीमी गति से होने वाली खिंचाव अथवा दबाव को सहन करने की क्षमता होती है। इसी आधार पर डॉ. रीड ने अपना सिद्धान्त चट्टानों में प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धान्त' (Elastic Rebound Theory) प्रस्तुत किया। डॉ. रीड के अनुसार, जब चट्टानों पर क्षमता से अधिक तनाव या दबाव की स्थिति आ जाती है या जब तेजी से ऐसा दबाव बढ़ने लगता है तो ऐसी अधिक शक्ति को चट्टानें सहन नहीं कर पाती तथा टूट जाती हैं। यही नहीं, ऐसी टूटी हुई चट्टानें पुनः खिंचकर अपनी पुरानी स्थिति में भी आने लगती हैं क्योंकि चट्टानों के लचीलेपन के प्रभाव से ही धीमी गति के दबाव व भिचाव को चट्टान सहन करके दबती रही या उसमें वलन (मोड़) पड़े । पर्वतों में परिवलन (Over thrust) एवं प्रीवा खण्डों में होने वाला चट्टानों का चलन इसी का उदाहरण है। चट्टानों के इस क्रिया के साथ पुनः अपनी मूल स्थिति में सिमट जाने से वहाँ कुछ स्थान खाली हो सकता है। इससे भी पृथ्वी की सतह पर । कहीं-कहीं भूकम्प आते हैं।

(6) जलीय भार- कभी-कभी किसी विषम धरातलीय ऐसे प्रदेश में जहाँ कि कभी भ्रंश एवं तेज सम्पीडन क्रिया (Process of Fault and Compression) का प्रभाव रहा हो वहा पर यदि विशाल बाँध बनाकर बड़ी झील का निर्माण किया जाये तो ऐसे क्षेत्र में स्थानीय जलीय भार की दशा से कभी-कभी भूकम्प भी आ सकता है। प्राकृतिक झीलें या तालाब सहज प्राकृतिक क्रिया से बनते हैं अतः वहाँ ऐसे भूकम्प नहीं आते । मानव निर्मित बाँध के समय के भयंकर विस्फोट, पूर्ववर्ती अंश के किनारों से जल का भू-गर्भ में प्रवेश एवं भारी मात्रा में एकत्रित जल का भार; सभी क्रियाएँ एक साथ मिलकर वहाँ भूकम्प को । स्थिति पैदा कर देती हैं। ऐसी क्रिया से भूकम्प आता ही है. इस पर विद्वानों में यद्यपि मतभेद अवश्य है, किन्तु । भारत में सन् 1967 का कोयना का भूकम्प, संयुक्त राज्य का कोलोरेडो नदी पर बना विशाल मीड बाँध एवं। झील क्षेत्र का भूकम्प एवं नील पर विशाल अस्वान बाँध बनाने के पश्चात् नदी घाटी में आया सन् 1992 का भूकम्प, सभी ऐसा ही सोचने को बाध्य करते हैं। कोयना एवं अस्वान बाँध के क्षेत्र पृथ्वी के प्राचीन एवं स्थिर स्थलखण्ड है जहाँ कि अन्य कारणों से हजारों वर्षों में भी भयंकर भूकम्प के प्रमाण नहीं पाये जाते।