Jaishankar prasad - पुरस्कार कहानी

सभी पाठकों का एक बार फिर से स्वागत है हमारे ब्लॉग पर आज हमने लिखा है एम. ए. हिंदी साहित्य के प्रश्न पत्र क्रमांक आठ के हिसाब से कहानी पुरस्कार को जो की द्वितीय से सेमेस्टर में पढ़ना है।  सत्र 2019-20 के अनुसार। Jaishankar prasad की कहानी सार बताने जा रहा हूं।

यह हमारे सिलेबस में दिया गया पहला कहानी है तो चलिए इस कहानी पुरस्कार को पढ़ते हैं जिसे जयशंकर प्रसाद जी ने लिखा है।

Jaishankar prasad - पुरस्कार कहानी

पुरस्कार कहानी - Jaishankar prasad

पुरस्कार कहानी का केंद्रीय भाव -
यह कहानी प्रेम और संघर्ष की कहानी है। इस कहानी की नायिका मधुलिका है। वह अरुण नामक युवक के प्रेम में आसक्त है। साथ ही जन्मभूमि के प्रति भी उसमें अपार भक्ति है। अरुण उसके राज्य पर आक्रमण करना चाहता है। पर मधुलिका कर्तव्य की बलिवेदी पर, अपने प्रेम का बलिदान कर देती है तथा आक्रमण के पूर्व कौशल नरेश को खबर देकर अपनी मातृभूमि की रक्षा करती है। वह पुरस्कार के रूप में, मृत्युदंड मांगती है

आर्द्रा नक्षत्र; आकाश में काले काले बादलों की घूमड़, जिसमें देव-दुंदुभी का गंभीर कोश घोष। प्राची के एक निरभ्र कोने से स्वर्ण पुरुष झांकने लगा था, देखने लगा महाराज की सवारी। शैलमाला के अंचल में समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास उठ रही थी। नगर-तोरण से जयघोष हुआ, भीड़ में गजराज का चामधारी शुण्ड उन्नत दिखाई पड़ा। वह हर्ष और उत्साह का समुद्र हिलोर भरता हुआ आगे बढ़ने लगा।

प्रभात की हेम किरणों से अनुरंजीत नन्हीं नन्हीं बूंदों का एक झोंका स्वर्ण मल्लिका के समान बरस पड़ा। मंगल सूचना से जनता ने हर्ष ध्वनि की।

रथों, हाथियों और अश्वारोहीयों की पंक्ति थी। दर्शकों की भीड़ भी कम न थी। गजराज बैठ गया, सीढ़ियों से महाराज उतरे। सौभाग्यवती और कुमारी सुंदरियों के दो दल, आम्रपल्लवों से सुशोभित मंगल कलश और फूल, कुसुम तथा खीलों से भरे खाल लिए, मधुर गान करते हुए आगे बढ़े।

महाराज के मुख पर मधुर मुस्कान थी। पुरोहित वर्ग ने स्वस्त्ययन किया । स्वर्ण रंजीत हल की मूठ पकड़कर महाराज ने जूते हुए सुंदर पुष्ट बैलों को चलने का संकेत किया। बाजे बजने लगे। किशोरी कुमारीयों ने खीलों और फूलों की वर्षा की। 

कौशल का यह उत्सव प्रसिद्ध था। एक दिन के लिए महाराज को कृषक बनना पड़ाता उस दिन इंद्र पूजन की धूम-धाम होती गोठ होती। नगर-निवासी उस पहाड़ी भूमि में आनंद मनाते। प्रतिवर्ष कृषि का यह महोत्सव उत्साह से संपन्न होता, दूसरे राज्यों से भी युवक राजकुमार इस उत्सव में बड़े चाव से आकर योग देते।

मगध का एक राज कुमार अरुण अपने रथ पर बैठा बड़े कुतूहल से यह दृश्य देख रहा था। बीजों का एक थाल लिए कुमारी मधुलिका महाराज के साथ थी। बीज होते हुए महाराज जब हाथ बढ़ाते, तब मधुलिका उनके सामने थाल कर देती। यह खेत मधुलिका का था, जो इस साल महाराज की खेती के लिए चुना गया था; इसलिए बीज देने का सम्मान मधुलिका को ही मिला।वह कुमारी थी, सुंदरी थी। कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे संभालती और कभी अपनी रूखी अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी, वे सब बरौयों में गुँथे जा रहे थे किंतु महाराज को बीज देने में उसने शिथिलता नहीं कि। सब लोग महाराज का हल चलाना देख रहे थे-विस्मय से, कुतूहल से। और अरुण देख रहा था कृषक कुमारी मधुलिका को। आह !कितना भोला सौंदर्य ! कितनी सरल चितवन !

उत्सव का प्रधान कृत्य समाप्त हो गया। महाराज ने मधुलिका के खेत को पुरस्कृत किया, थाल में कुछ स्वर्ण मुद्राएं। वह राजकीय अनुग्रह था। मधुलिका ने थाली सिर से लगा ली ; किंतु साथ ही उन स्वर्ण मुद्राओं को महाराज पर न्योछावर कर के बिखेर दिया। मधुलिका की उस समय की ऊर्जस्वित मूर्ति लोग आश्चर्य से देखने लगे ! महाराज की भृकुटी भी जरा चढ़ी थी कि मधुलिका  ने सविनय कहा - "देव ! यह मेरे पितृ पितामहों की भूमि है। इसे बेचना अपराध है; इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है। " महाराज के बोलने के पहले ही वृद्ध मंत्री ने तीखे स्वर से कहा- "अबोध ! क्या बक रही है ? राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार ! तेरी भूमि से चौगुना मूल्य है; फिर कोशल का तो यह सुनिश्चित राष्ट्रीय नियम है। तू आज से राजकीय रक्षण पाने की अधिकारीणी हुई इस धन से अपने को सुखी बना।"

"राजकीय रक्षण की अधिकारिणी तो सारी प्रजा है मंत्रिवर ! महाराज को भूमि समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध न था और न है ; किंतु मूल्य स्वीकार करना असंभव है" -  मधुलिका उत्तेजित हो उठती है उठी थी। 

महाराज के संकेत करने पर मंत्री ने कहा- "देव ! वाराणसी युद्ध के अंयतम वीर सिंहमित्र की एकमात्र कन्या है। " महाराज चौक उठे- "सिंहमित्र की कन्या ! जिसने मगध के सामने कोशल की लाज रख ली थी, उसी वीर की मधुलिका कन्या है ?"

"हाँ, देव !" मंत्री ने सविनय कहा।

"इस उत्सव के परंपरागत नियम क्या हैं , मंत्रीवर ? " - महाराज ने पूछा।

"देव, नियम तो बहुत साधारण हैं। किसी भी अच्छी भूमि को इस उत्सव के लिए चुनकर नियमानुसार पुरस्कार स्वरूप उसका मूल्य दे दिया जाता है। वह भी अत्यंत अनुग्रह पूर्वक अर्थात भू संपत्ति का चौगुना मूल्य उसे मिलता है। उस खेती को वही व्यक्ति वर्ष भर देखता है। वह राजा का खेत कहा जाता है। "

महाराज को विचार संघर्ष से विश्राम की अत्यंत आवश्यकता थी। महाराज चुप रहे। जयघोष के साथ सभा विसर्जित हुई। सब अपने-अपने शिविरों में चले गए, किंतु मधुलिका को उत्सव में फिर किसी ने न देखा। वह अपने खेत की सीमा पर विशाल मधुक-वृक्ष के चिकने हरे पत्तों की छाया में अनमनी चुपचाप बैठी रही। 

रात्रि का उत्सव अब विश्राम ले रहा था। राजकुमार अरुण उसमें सम्मिलित नहीं हुआ। वह अपने विश्राम भवन में जागरण कर रहा था आंखों में नींद न थी। प्राची में जैसे गुलाली खिल रही थी, वही रंग उसकी आंखों में था। सामने देखा तो मुँडेर पर कपोती एक पैर पर खड़ी पंख फैलाए अंगड़ाई ले रही थी। अरुण उठ खड़ा हुआ। द्वार पर सुसज्जित अश्व था। वहां देखते-देखते नगरतोरण पर जा पहुंचा। रक्षकगण ऊँघ रहे थे, अश्व के पैरों के शब्द से चौंक उठे।

युवक कुमार तीर से निकल गया। सिंधुदेश का तुरंग प्रभात के पवन से पुलकित हो रहा था। घूमता-घूमता अरुण उसी मधूक वृक्ष के नीचे पहुंचा, जहां मधुलिका अपने हाथ पर सिर भरे हुए निद्रा का सुख ले रही थी।

अरुण ने देखा, एक छिन्न माधवी लता वृक्ष की शाखा से च्युत होकर पड़ी है। सुमन मुकुलित, भ्र्मर निस्पंद थे। अरुण ने अपने अश्व को मौन रहने का संकेत किया, उस सुषमा को देखने के लिए ; परंतु कोकिल बोल उठी। जैसे उसने अरुण से प्रश्न किया-छि , कुमारी के सोए हुए सौंदर्य पर दृष्टिपात करने वाले दृष्ट तुम कौन ? मधुलिका की आंखें खुल पड़ी। उसने देखा, एक अपरिचित युवक। वह संकोच से उठ बैठी। "भद्रे ! तुम ही न कल के उत्सव की संचालिका रही हो ?"

"उत्सव ! हाँ , उत्सव ही तो था। "

"कल उस सम्मान ....."
"क्यों आपको कल का स्वप्न सता रहा है ? भद्र ! आप क्या मुझे इस अवस्था में संतुष्ट न रहने देंगे ?"

"मेरा ह्रदय तुम्हारी उस छवि का भक्त बन गया है, देवि। "

"मेरे उस अभिनय का मेरी विडंबना का। मनुष्य कितना निर्दय है , अपरिचित ! क्षमा करो जाओ अपने मार्ग। "

"सरलता की देवी ! मैं मगध का राजकुमार तुम्हारे अनुग्रह का प्रार्थी हूं, मेरे हृदय की भावना अवगुंठन में रहना नहीं जानती। उसे अपनी ....| "

" राजकुमार मैं कृषक बालिका हूँ। आप नंदन बिहारी और मैं पृथ्वी पर परिश्रम करके जीनेवाली। आज मेरी स्नेह की भूमि पर से मेरा अधिकार छीन लिया गया है। मैं दुख से विकल हूँ ; मेरा उपहास न करो। "

"मैं कौशल नरेश से तुम्हारी भूमि तुम्हें दिलवा दूँगा। "

"नहीं, वह कौशल का राष्ट्रीय नियम है। मैं उसे बदलना नहीं चाहती, चाहे उससे मुझे कितना ही दुःख हो।

"तब तुम्हारा रहस्य क्या है?"

"यह रहस्य मानव हृदय का है, मेरा नहीं। राजकुमार, नियमों से यदि मानव ह्रदय बाध्य होता, तो आज मगध के राजकुमार का ह्रदय किसी राजकुमारी की ओर न खींचकर एक कृषक बालिका का अपमान करने न आता। " मधुलिका उठ खड़ी हुई।

चोट खाकर राजकुमार लौट पड़ा। किशोर किरणों में उसका रत्नकिरीट चमक उठा। अश्व वेग से चला जा रहा था और मधुलिका निष्ठुर प्रहार करके क्या स्वयं आहत न हुई ? उसके ह्रदय में टीस सी होने लगी वह सजल नेत्रों से उड़ती हुई धूल देखने लगी। 

मधुलिका ने राजा का प्रतिपादन, अनुग्रह नहीं लिया। वह दूसरे खेतों में काम करती और चौथे पहर रूखी-सूखी खाकर पड़ी रहती। मधूक वृक्ष के नीचे छोटी-सी पर्णकुटीर थी। सूखे डंठलों से उसकी दीवार बनी थी। मधुलिका का वही आश्रम था। कठोर परिश्रम से जो रुखा-सुखा अन्य मिलता, वही उसकी सांसों को बढ़ाने के लिए पर्याप्त था।

दुबली होने पर भी उसके अंग पर तपस्या की कांति थी। आसपास के कृषक उसका आदर करते वह एक आदर्श बालिका थी। दिन, सप्ताह, महीने और वर्ष बीतने लगे। 

शीतकाल की रजनी, मेघों से भरा आकाश, जिसमें बिजली की दौड़-धूप। मधुलिका का छाजन टपक रहा था। ओढ़ने की कमी थी। वह ठिठुर कर एक कोने में बैठी थी। मधुलिका अपने अभाव को आज बढाकर सोच रही थी। जीवन से सामंजस्य बनाए रखने वाले उपकरण तो अपनी सीमा निर्धारित रखते हैं; परंतु उनकी आवश्यकता और कल्पना भावना के साथ बढ़ती-घटती रहती है। आज बहुत दिनों बाद उसे बीती हुई बात स्मरण हुई-दो, नहीं-नहीं 3 वर्ष हुए होंगे, इसी मधूक वृक्ष के नीचे प्रभात में तरुण राजकुमार ने क्या कहा था ?

वह अपने हृदय से पूछने लगी-उन चाटुकारी शब्दों को सुनने के लिए उत्सुक-सी वह पूछने लगी-क्या कहा था ? दुःखदग्ध हृदय उन स्वप्न सी बातों का स्मरण रख सकता था ! और स्मरण ही होता, तो भी कष्टों कि इस काली निशा में वह कहने का साहस करता ? हाय री विडंबना !

आज मधुलिका उस बीते हुए क्षण को लौटा लेने के लिए विकल थी। दारिद्र्य की ठोकरों ने उसे व्यथित और अधीर कर दिया है। मगध की प्रसाद-माला के वैभव का काल्पनिक चित्र-उन सूखे डंठलो के रंध्रों से, नभ में बिजली के आलोक में नाचता हुआ दिखाई देने लगा। खिलाड़ी शिशु जैसे, श्रावण की संध्या में जुगनू को पकड़ने के लिए हाथ लपकाता है, वैसे ही मधुलिका मन ही मन कह रही थी। अभी वह निकल गया। "वर्षा ने भीषण रूप धारण किया। गड़गड़ाहट बढ़ने लगी, ओले पड़ने की संभावना थी। मधुलिका अपनी जर्जर झोपड़ी के लिए कांप उठी। सहसा बाहर कुछ शब्द हुआ-

"कौन है यहाँ ? पथिक को आश्रय चाहिए। "

मधुलिका ने डंठलों का कपाट खोल दिया। बिजली चमक उठी। उसने देखा एक पुरुष घोड़े की डोर पकड़े खड़ा है। सहरसा वह चिल्ला उठी -'राजकुमार!'

'मधुलिका ? - आश्चर्य से युवक ने कहा। 

एक क्षण के लिए सन्नाटा सा छा गया। मधुलिका अपनी कल्पना को सहसा प्रत्यक्ष देखकर, चकित हो गई- "इतने दिनों के बाद आज फिर!"

अरुण ने कहा- "कितना समझाया मैंने- परंतु ....."
मधुलिका अपनी दयनीय अवस्था पर संकेत करने देना नहीं चाहती थी। उसने कहा - "और आज आपकी यह क्या दशा है?"

सिर झुका कर अरुण ने कहा-" मैं, मगध का विद्रोही निर्वासित, कोशल में जीविका खोजने आया हूँ। "

मधुलिका उस अंधकार में हंस पडी। मगध के विद्रोही राजकुमार का स्वागत करें एक अनाथिनी कृषक बालिका, यह भी एक विडंबना है, तो भी मैं स्वागत के लिए प्रस्तुत हूं।"

शीतकाल की निस्तब्ध रजनी कुहरे से चाँदनी हाड़ कपा देने वाला समीर, तो भी अरुण और मधुलिका पहाड़ी गहवर के द्वार पर वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए बातें कर रहे हैं। मधुलिका की वाणी में उत्साह था; किंतु अरुण जैसे अत्यंत सावधान होकर बोलता। 

"मधुलिका ने पूछा- "जब तुम इतनी विपन्न अवस्था में हो तो फिर इतने सैनिकों को साथ रखने की आवश्यकता है?"

"मधुलिका ! बाहुबल तो वीरों की आजीविका है। यह मेरे जीवन-मरण के साथी हैं, भला मैं इन्हें कैसे छोड़ देता ? और करता ही क्या?"

क्यों ? हम लोग परिश्रम से कमाते और खाते हैं तो तुम.....|"

"भूल ना करो; मैं अपने बाहुबल पर भरोसा करता हूँ। नए राज्य की स्थापना कर सकता हूँ, निराश क्यों हो जाऊं ? अरुण के शब्दों में कंपन था, वह जैसे कुछ कहना चाहता था, पर कह न सका था सकता था।

"नवीन राज्य ! ओहो ! तुम्हारा उत्साह तो कम नहीं। भला कैसे ? कोई ढंग बताओ तो मैं भी कल्पना का आनंद ले लूं। "

कल्पना का आनंद नहीं मधुलिका मैं तुम्हें राजरानी के समान सिंहासन पर बिठाऊँगा ! तुम अपने छीने हुए खेत की चिंता करके वह भयभीत हो। "

एक क्षण में सरल मधुलिका के मन में प्रमाद का अंधड़ बहने लगा द्वंद मच गया। उसने सहसा कहा- "आह मैं सचमुच आज तक तुम्हारी प्रतीक्षा करती थी, राजकुमार !"

अरुण ढिठाई से उसके हाथों को दबाकर बोला - "तो मेरा भ्रम था, तुम सचमुच मुझे प्यार करती हो ?"

युवती का वक्षस्थल फूल उठा, वहां हाँ भी नहीं कह सकी, ना भी नहीं। अरुण ने उसकी अवस्था का अनुभव कर लिया।  कुशल मनुष्य के समान उसने अवसर को हाथ से न जाने दिया। तुरंत बोल उठा-तुम्हारी इच्छा हो तो प्राणों से पण लगाकर मैं तुम्हें इस कोशल सिहासन पर बिठा दूं मधुली के अरुण की खनक का आतंक देखोगी मधुलिका एक बार कांप उठी वह कहना चाहती थी नहीं किंतु उसके मुंह से निकला क्या

सत्य मधुलिका कौशल नरेश तभी से तुम्हारे लिए चिंतित हैं यह मैं जानता हूं तुम्हारी साधारण से प्रार्थना वह अस्वीकार ना करेंगे और मुझे यह भी विदित है कि कौशल के सेनापति अधिकांश सैनिकों के साथ पहाड़ी दसों का दमन करने के लिए बहुत दूर चले गए हैं

मधुलिका की आंखों के आगे बिजलिया हंसने लगी दारुण भावना से उसका मास्टर झंकृत हो उठा अरुण ने कहा तुम बोलती नहीं हो

जो कहोगे वहां करूंगी मंत्रमुग्ध सी मधुलिका ने कहा

स्वर्ण मंच पर कौशल कौशल नरेश अर्धवृत्त अवस्था में आंखें मुकल्लीद किए है एक अमर धारिणी युवती पीछे खड़ी अपनी कलाई बड़ी कुशलता से कुमारी है चमर के शुभ आंदोलन उस पोस्ट में धीरे-धीरे संचालित हो रहे हैं तांबूल वाहिनी प्रतिमा के समान दूर खड़ी है

 प्रतिहारी ने आकर कहा जय हो देव एक स्त्री कुछ प्रार्थना करने आई है

आंखें खोलते हुए महाराज ने कहा कि स्त्री प्रार्थना करने आई है आने दो

प्रतिहारी के साथ मधुलिका आई उसने प्रणाम किया महाराज ने स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा और कहा तुम्हें कहीं देखा है

3 बरस हुए देव मेरी भूमि खेती के लिए ली गई थी

ओह तो तुमने इतने दिन कष्ट में बिताए आज उसका मूल्य मांगने आई हो क्यों अच्छा अच्छा हो तुम्हें मिलेगा प्रतिहारी

नहीं महाराज मुझे मूल्य नहीं चाहिए

मूर्ख फिर क्या चाहिए

उतनी ही भूमि दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की जंगली भूमि वही मैं अपनी खेती करूंगी मुझे एक सहायक मिल गया है वह मनुष्यों से मेरी सहायता करेगा भूमि को समतल भी तो बनाना होगा

महाराज ने कहा कृषक बालिके वह बड़ी उम्र खबर भूमि हैं 23:00 पर वहां दुर्ग के समीप एक सैनिक महत्व रखती है

तो फिर निराश लौट जाऊं सह मित्र की कन्या मैं क्या करूं तुम्हारी यह प्रार्थना

देव जैसी आज्ञा हो
जाओ तुम श्रमजीवी ओं को उसमें लगाओ मैं अमात्य को आज्ञा पत्र देने का आदेश करता हूं

जय हो देव कह कर प्रणाम करती हुई मधुलिका राज मंदिर के बाहर आई

दुर्गा की दक्षिणा भैया बने नाले के तट पर घना जंगल है आज मनुष्यों के पद संचार से सुनीता भंग हो रही थी अरुण के छिपे हुए मनुष्य स्वतंत्रता से इधर-उधर घूमते थे झाड़ियों को काटकर पत्र बन रहा था नगर दूर था फिर उधर यूं ही कोई नहीं आता था फिर अब तो महाराज की आज्ञा से वहां मधुलिका का अच्छा सा खेत बन रहा था तब इधर की किसको चिंता होती

एक घने कुंज में अरुण और मधुलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे संध्या हो चली थी उसने वीर वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षी गण अपने निर्णय को लौटते हुए अधिक कोलाहल कल कर रहे थे

प्रसन्नता से अरुण की आंखें चमक उठी सूर्य की अंतिम किरण झुरमुट में घुसकर मधुलिका के कपड़ों से खेलने लगी अरुण ने कहा चार प्रहर और विश्राम करो प्रभात में ही इस जेड कलेवर कौशल राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा और मगध से निर्वासित में एक स्वतंत्र राष्ट्र का अधिपति बनूंगा मधुलिका

भयानक अरुण तुम्हारा साहस देख मैं चकित हो रही हूं केवल 100 सैनिकों से तुम

रात की तीसरे पहर में मेरी विजय यात्रा होगी

तो तुमको इस विषय पर विश्वास है

अवश्य तुम अपनी झोपड़ी में यह रात बिताओ प्रभात से तो राजमंदिर ही तुम्हारा लीला निकेतन बनेगा

मधुलिका प्रसन्ना थी किंतु अरुण के लिए उसकी कल्याण कामना शशांक थी वह कभी-कभी उद्विग्न असी होकर बालकों के समान प्रश्न कर बैठती अरुण उसका समाधान कर देता सहसा कोई संकेत पाकर उसने कहा अच्छा अंधकार अधिक हो गया अभी तुम्हें दूर जाना है और मुझे भी प्राण प्रण से इस अभियान के प्रारंभिक कार्यों को अर्ध रात्रि तक पूरा कर लेना चाहिए तब रात्रि भर के लिए विदा मधुलिका

मधुलिका उठ खड़ी हुई कटीली झाड़ियों से गुजरती हुई क्रम से बढ़ने वाली अंधकार ने अंधकार में वह झोपड़े की ओर चली

पत्रकार में था और मधुलिका का हृदय भी नवीनतम से गिरा था उसका मन सहरसा विचलित हो उठा मधुरता नष्ट हो गई जितनी सुख कल्पना थी वह जैसे अंधकार में विलीन होने लगी वहां भयभीत थी पहला भय उसे अरुण के लिए उत्पन्न हुआ यदि वहां सफल ना हुआ तो फिर सहसा सोचने लगी वह क्यों सफल हो श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाए मगध कौशल का चीर शत्रु को ओह उसकी विजय कौशल नरेश ने क्या कहा था सी मित्र की कन्या सिंह मित्र कौशल का रक्षक वीर उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है नहीं-नहीं मधुलिका मधुलिका जैसे उसके पिता उस अंधकार में पुकार रहे थे वह पगली की तरह चिल्ला उठी रास्ता भूल गई

एक रात पर बीत चली पर मधुलिका अपनी झोपड़ी तक ना पहुंची वहां अधेड़ पुणे में विक्षिप्त से चले जा रही थी उसकी आंखों के सामने कभी सह मित्र और कभी अरुण की मूर्ति अंधकार में चित्रित होती जाती उसे सामने आलोक दिखाई पड़ा वह बीच पथ में खड़ी हो गई प्रायः एक्सो उल्का धारी अस्व आरोही चले आ रहे थे और आगे आगे एक वीर अध्यक्ष सैनिक था उसके बाएं हाथ में अश्व की वल्गर और दाहिने हाथ में नग्न खड़क अत्यंत अधीरता से वह टुकड़ी अपने पथ में चल रही थी परंतु मधुलिका बीच पद से हिली नहीं प्रमुख सैनिक पास आ गया पर मधुलिका अभी नहीं हटी सैनिक ने अश्व रोककर कहा कौन कोई उत्तर नहीं मिला तब तक दूसरे अस्व आरोही ने कड़क कर कहा तुम कौन है स्त्री तुम कौन हैं स्त्री कौशल सेना कौशल के सेनापति को उत्तर सिखा दे

रमणी जैसे विकार ग्रस्त सूरत से चिल्ला उठी बांध लो मुझे मेरी हत्या करो मैंने अपराध ही ऐसा किया है

सेनापति हंस पड़े बोले पगली हैप पगलीनहीं यदि पगली होती तो इतनी विचार वेदना क्यों होती सेनापति मुझे बांध लो राजा के पास ले चलोक्या है स्पष्ट कहा

श्रावस्ती का दुर्ग एक प्रहर में दसियों के हस्त गत हो जाएगा दक्षिणी नाले के पार उनका आक्रमण होगा सेनापति चौक उठे उन्होंने आश्चर्य से पूछा तू क्या कह रही है मैं सत्य कह रही हूं शीघ्रता करो

सेनापति ने 80 सैनिकों को नाले की ओर धीरे-धीरे बढ़ने की आज्ञा दी और स्वयं 20 अथवा रोगियों के साथ दुर्ग की ओर बढ़े मधुलिका एक अश्व आरोही के साथ बांध दी गई




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