भ्रमर गीत सार : सूरदास के पद 21 से 30 तक

आपका फिर से एक बार स्वागत है हमारे ब्लॉग में हमने इससे पहले लिखा था भ्र्मर गीत के एक से लेकर 10 तक के पदों को और आज हम इसी भ्र्मर गीत के 21 से 30 पदों को लिखने वाले हैं। हम आपको बता दें की हमारे ब्लॉग में अभी हम एम. ए. हिंदी साहित्य के पोस्ट लिख रहें हैं तो इसके सिलेबस में जितने भी पदों को पढ़ने के लिए कहा गया है हम उन्हीं पदों को यहां लिख रहें हैं।

bhramar-geet-sar-surdas-ke-pad-21-30

भ्रमर गीत सार : सूरदास



इसके संदर्भ प्रसंग और व्याख्या से जुड़े पोस्ट के अपडेट पाने के लिए ब्लॉग को सब्स्क्राइब जरूर कर लें। चलिए शुरु करते हैं

भ्रमर गीत सार : सूरदास

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति

21. राग केदार

गोकुल सबै गोपाल-उपासी।
जोग-अंग साधत जे उधो ते सब बसत ईसपुर कासी।।
यध्दपि हरि हम तजि अनाथ करि तदपि रहति चरननि रसरासो।
अपनी सीतलताहि न छाँड़त यध्दपि है ससि राहु-गरासी।।
का अपराध जोग लिखि पठवत प्रेम भजन तजि करत उदासी।
सूरदास ऐसी को बिरहनि माँ गति मुक्ति तजे गुनरासी ?||
bhramargeet sar ramchandra shukla के इस सम्पादित पद के व्याख्या के लिए लिंक
भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 21 सप्रसंग व्याख्या By Rexgin

22. राग धनाश्री

जीवन मुँहचाही को नीको।
दरस परस दिन रात करति है कान्ह पियारे पी को।।
नयनन मूंदी-मूंदी किन देखौ बंध्यो ज्ञान पोथी को।
आछे सुंदर स्याम मनोहर और जगत सब फीको।।
सुनौ जोग को कालै कीजै जहाँ ज्यान है जी को ?
खाटी मही नहीं रूचि मानै सूर खबैया घी को।।

bhramargeet sar ramchandra shukla के इस सम्पादित पद के व्याख्या के लिए लिंक
भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 22 सप्रसंग व्याख्या By Rexgin

23. राग काफी

आयो घोष बड़ो व्योपारी।
लादी खेप गुन  ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी।।
फाटक दैकर हाटक माँगत भौरे निपट सुधारि।
धुर ही तें खोटो खायो है लये फिरत सिर भारि।।
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी ?
अपनों दूध छाँड़ि को पीवै खार कूप को पानी।।
ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँहमाँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ।।

Bhramargeet Sar Ramchandra Shukla पद 23 व्याख्या by Rexgin

24.

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे।
यह व्योपार तिहारो ऊधो ! ऐसोई फिरि जैहै।।
जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै।
दाख छाँड़ि कै कटुक निम्बौरी को अपने मुख खैहै ?
मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै।
सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै ?।।

Bhramargeet Sar Ramchandra Shukla पद 24 व्याख्या by Rexgin

25. राग नट

आये जोग सिखावन पाँड़े।
परमारथि पुराननि लादे ज्यों बनजारे टांडे।।
हमरी गति पति कमलनयन की जोग सिखै ते राँडें।
कहौ, मधुप, कैसे समायँगे एक म्यान दो खाँडे।।
कहु षटपद, कैसे खैयतु है हाथिन के संग गाड़े।
काहे जो झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े।।
सूरदास तीनों नहिं उपजत धनिया, धान कुम्हाड़े।।

Bhramargeet Sar Ramchandra Shukla पद 25 व्याख्या by Rexgin

26. राग बिलावल

ए अलि ! कहा जोग में नीको ?
तजि रसरीति नंदनंदन की सिखवन निर्गुन फीको।।
देखत सुनत नाहि कछु स्रवननि, ज्योति-ज्योति करि ध्यावत।
सुंदर स्याम दयालु कृपानिधि कैसे हौ बिसरावत ?
सुनि रसाल मुरली-सुर की धुनि सोइ कौतुक रस भूलै।
अपनी भुजा ग्रीव पर मैले गोपिन के सुख फूलै।।
लोककानि कुल को भ्र्म प्रभु मिलि-मिलि कै घर बन खेली।
अब तुम सुर खवावन आए जोग जहर की बेली।।

BHRAMARGEET SAR SURDAS पद 26 व्याख्या - REXGIN

27. राग मलार

हमरे कौन जोग व्रत साधै ?
मृगत्वच, भस्म अधारी, जटा को को इतनौ अवराधै ?
जाकी कहूँ थाह नहिं पैए , अगम , अपार , अगाधै।
गिरिधर लाल छबीले मुख पर इते बाँध को बाँधै ?
आसन पवन बिभूति मृगछाला ध्याननि को अवराधै ?
सूरदास मानिक परिहरि कै राख गाँठि को बाँधै ?।।

28. राग धनाश्री

हम तो दुहूँ भॉँति फल पायो।
को ब्रजनाथ मिलै तो नीको , नातरु जग जस गायो।।
कहँ बै गोकुल की गोपी सब बरनहीन लघुजाती।
कहँ बै कमला के स्वामी संग मिल बैठीं इक पाँती।।
निगमध्यान मुनिञान अगोचर , ते भए घोषनिवासी।
ता ऊपर अब साँच कहो धौ मुक्ति कौन की दासी ?
जोग-कथा, पा लोगों ऊधो , ना कहु बारंबार।
सूर स्याम तजि और भजै जो ताकी जननी छार।।

29. राग कान्हरो

पूरनता इन नयनन पूरी।
तुम जो कहत स्रवननि सुनि समुझत, ये यही दुख मरति बिसूरी।।
हरि अन्तर्यामी सब जानत बुद्धि विचारत बचन समूरी।
वै रस रूप रतन सागर निधि क्यों मनि पाय खवावत धूरी।।
रहु रे कुटिल , चपल , मधु , लम्पट , कितब सँदेस कहत कटु कूरी।
कहँ मुनिध्यान कहाँ ब्रजयुवती ! कैसे जाट कुलिस करि चूरी।।
देखु प्रगट सरिता, सागर, सर, सीतल सुभग स्वाद रूचि रूरी।
सूर स्वातिजल बसै जिय चातक चित्त लागत सब झूरी।।

30. राग धनाश्री

कहतें हरि कबहूँ न उदास।
राति खवाय पिवाय अधरस क्यों बिसरत सो ब्रज को बास।।
तुमसों प्रेम कथा को कहिबो मनहुं काटिबो घास।
बहिरो तान-स्वाद कहँ जानै, गूंगो-बात-मिठास।
सुनु री सखी, बहुरि फिरि ऐहैं वे सुख बिबिध बिलास।
सूरदास ऊधो अब हमको भयो तेरहों मास।।

इसके संदर्भ प्रसंग एवं व्याख्या के लिए आपको निचे लिंक दिया जाएगा तो आपको इसका नोटिफिकेशन तब मिलेगा जब आप हमारे ब्लॉग को सब्स्क्राइब करेंगे तो इसका अपडेट पाने के लिए ब्लॉग को सब्स्क्राइब करें।

धन्यवाद !

वर्ष 2019-20 द्वितीय सेमेस्ट षष्ट प्रश्न पत्र मध्यकालीन काव्य सिलेबस पंडित रविशंकर शुक्ल यूनिवर्सिटी रायपुर।

पद 1 से 10 यहाँ है।

पद 21 से 30 यहां है।

पद 51 से 60 यहां है।

पद 61 से 70 यहां है।

पद 81 से 90 यहां है।

Related Posts


Subscribe Our Newsletter