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आदिकाल की पृष्ठभूमि एवं परिस्थितियां

Hello इस पोस्ट में हम बात करने वाले हैं। हिंदी साहित्य के आदिकाल की पृष्ठभूमि के बारे में एवं उस समय की परिस्थितियों के बारे में तो चलिए बिना देरी के शुरू करते हैं।

आदिकाल के बारे में संछिप्त जानकारी 

आदि काल का साहित्य 15 वीं शताब्दी से पहले मध्य भारत तक फ़ैल गया था। यह कन्नौज, दिल्ली, अजमेर के क्षेत्रों में विकसित हुआ। पृथ्वीराज रासो, चंद्रबरदाई द्वारा लिखित एक महाकाव्य कविता और हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली रचनाओं में से एक थी। 

चांद बरदाई घोर के मुहम्मद के आक्रमण के दौरान दिल्ली और अजमेर के प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि थे।

कन्नौज के अंतिम शासक जयचंद्र ने स्थानीय बोलियों के बजाय संस्कृत को अधिक संरक्षण दिया। नैषधीय चरित्र के रचयिता हर्ष उनके दरबारी कवि थे। जगनायक, महोबा में शाही कवि, और अजमेर में शाही कवि नाल्हा, इस अवधि के अन्य प्रमुख साहित्यकार थे। 

हालाँकि, तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद, इस अवधि से संबंधित अधिकांश साहित्यिक कृतियों को घोर के मुहम्मद की सेना द्वारा नष्ट कर दिया गया था। इस काल के बहुत कम ग्रंथ और पांडुलिपियां उपलब्ध हैं और उनकी प्रामाणिकता पर भी संदेह है।

आदिकाल की पृष्ठभूमि एवं परिस्थितियां

आदिकाल की पृष्ठभूमि 

साहित्य मानव समाज के विभिन्न भावों एवं नेक नवीन रहने वाले चेतना की अभिव्यक्ति है। किसी काल विशेष के साहित्य की जानकारी से हम उस युगीन मानव समाज के समग्रता को सकते है। दूसरे शब्दों में कहे तो किसी काल विशेष के साहित्य में पाए जाने वाले प्रवृत्तियां तत्कालीन परिस्थितियों के सापेक्ष होती हैं। 

यहां सिद्धांत इस बात की आवश्यकता पर बल देता है, कि साहित्य के प्रेरक तत्व के रूप में, हम युगीन परिवेश को आवश्यक जान लें, आदिकालीन साहित्य भी एक अपवाद नहीं है। इस काल के साहित्य में जो प्रमुख विशेषताएं उपलब्ध हो रही हैं। 

वह तनु किन परिस्थितियों से विकसित हुई हैं। आदिकालीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों से प्रचलित होने से पूर्व राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियो का आकलन कर लेना चाहिए।

हिंदी साहित्य का आदिकाल आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के अनुसार संवत 1050 विक्रमी से लेकर संवत 1375 विक्रमी तक अर्थात महाराज भोज के समय से लेकर हम्मीर देव के समय के कुछ पीछे तक माना जा सकता है। 

कुछ अन्य विद्वानों जैसे डॉ रामकुमार वर्मा ने इसका समय आठवीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक स्वीकार किया है। इस काल की विभिन्न परिस्थितियों का आकलन निम्नलिखित परिस्थितियो के अंतर्गत किया जा सकता है। 

राजनीतिक परिस्थिति

राजनीतिक दृष्टि से यहां युद्ध और शांति का काल था सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु संवाद 704 विक्रमी के उपरांत उत्तर भारत खंड राज्यों में विभक्त हो गया था। गहरवार, परमार, चौहान और चंदेल वंश के राजपूत राजाओं ने अपने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे। 

राजपूत राजा निरंतर युद्ध की आग में जलते जलते अंधता शक्ति से छिंड़ हो गए थे, और विदेशी आक्रांताओं का डटकर मुकाबला करने की स्थिति में नहीं रह गए थे। राजपूत शासकों में परस्पर युद्ध किसी आवश्यकता वश नहीं होते थे। कभी-कभी तो शौर्य प्रदर्शन मात्र के लिए भी युद्ध किये जाते थे।

भारत की उत्तर पश्चिमी सीमा पर विशेषआक्रमण बराबर बना रहता था। 10 वीं शताब्दी में मोहम्मद गजनवी ने और 12 वीं सदी में मोहम्मद गौरी ने भारत को प्राप्त किया और जनता विदेशी आक्रमणकारियों से तो त्रस्त थी, साथ ही युद्ध के कारण देशी राजाओं के अत्याचारों को भी सहन करने के लिए विवश थे। 

आक्रमण का प्रभाव मुख्यतः पश्चिम मध्य प्रदेश पर ही पड़ा था और इन्हीं क्षेत्रों की जनता युद्ध एवं अत्याचारों से आक्रांत हुई धीरे-धीरे समस्त हिंदी प्रदेश में स्थित राज्यों दिल्ली, कन्नौज, अजमेर आदि पर मुसलमानों का अधिकार हो गया।

राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर यह कहा जा सकता है, कि आठवीं सदी से 14वीं शती तक का यह कालखंड युद्ध संघर्ष एवं अशांति से ग्रस्त रहा। राजाओं में संकुचित राष्ट्रीयता थी, व्यापक रूप से समूचे भारत को एक राष्ट्र के रूप में नहीं देखा गया। 

अराजकता, गृह कलह, विद्रोह एवं युद्ध के इस वातावरण में कवियों ने एक ओर तलवार के गीत गाए, तो दूसरी ओर आध्यात्मिकता की प्रवृत्ति के कारण उपदेश और आध्यात्मिकता की बात करते थे।

धार्मिक परिस्थिति

आदिकाल में अनेक प्रकार के धार्मिक मतों अंतरों का अस्तित्व था। भारतीय धर्म साधना में उथल-पुथल मची हुई थी वैदिक एवं पौराणिक धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म भी इस काल में अपना प्रभाव जमाने के लिए प्रयासरत थी। राजपूत राजा जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म मैं विश्वास करते थे। उन पर सहमत का प्रभाव अधिक था।

गढ़वाल के राजा स्मार्थ मत स्वालंबी थे, मालवा नरेश वैदिक धर्म के अनुयाई थे। तथा कलचुरी नरेश सब धर्मावलंबी थे वस्तुतः समस्त उत्तर भारत में धीरे-धीरे स्वयं मत बौद्धों एवं स्मारकों के प्रभाव को ग्रहण करता हुआ एक रूप नाथ संप्रदाय के रूप में विकसित हो रहा था।

आदिकाल में धार्मिक दृष्टि से तीन संप्रदायों का विशेष प्रभाव परिलक्षित होता है शुद्ध संप्रदाय नाथ संप्रदाय जैन संप्रदाय बौद्ध धर्म कालांतर में विकृत होकर वज्रयान बन गया था। इन वज्रयान नियों को ही सिद्ध कहते थे। 

धर्म कि यहां विकृत अवस्था थी धर्म के वास्तविक आदर्शों के स्थान पर आचार्य हीनता चमत्कार प्रदर्शन एवं भोग विलास को प्रमुखता मिल गई थी सिद्धों का प्रभाव प्रभाव विभिन्न वर्ग के अशिक्षित जनता पर अधिक था वे तंत्र मंत्र जादू टोना एवं चमत्कार प्रदर्शन द्वारा सामान्य जनता में अपना प्रभाव जमा रहे थे।

विक्रमी की 12 वीं शताब्दी में बहुत सिद्धों की प्रतिक्रिया स्वरूप नाथ संप्रदाय का उदय हुआ जीवन को अधिक से अधिक संयम और सदाचार के अनुशासन में रखकर परम सत्ता का साक्षात्कार घाट यह ह्रदय के भीतर किया जा सकता है। 

नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ ने इसी का प्रचार प्रसार किया नाथ पंथ में भोग पर विशेष बल दिया गया है साथ ही वर्ण व्यवस्था का विरोध एवं वार्ड नंबरों का खंडन किया गया है।

 भारत के पश्चिमी प्रदेशों उसेस कर गुजरात में जनमत का बहुत अधिक प्रचार था जैन मुनि धार्मिक तत्वों का निरूपण अपभ्रंश भाषा में कर रहे थे स्वयंभू पुष्पदंत हेमचंद्र धनपाल जैसे अनेक कवियों ने अपनी रचनाएं जैन राजाओं के संरक्षण में लिखी बौद्ध धर्म की विकृति का प्रभाव जैन धर्म पर भी पढ़ रहा था और यहां भी अपने आदर्शों से दूर हट रहा था।

बौद्ध और जैन धर्म में आई विकृति से वैदिक एवं पौराणिक धर्म में भी विकृति आ गई थी वैष्णो के 5 रात्र शवों के पास ऊपर और सांसों के त्रिपुर सुंदरी संप्रदायों में बौद्ध धर्म की पूजा पद्धति एवं वामा 4 का प्रभाव परिलक्षित हो रहा था कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस काल में विभिन्न धर्मों के मूल रूप लुप्त हो चले थे और उनमें विकृतियों का समावेश हो गया था। 

जनता के समक्ष अनेक धार्मिक राय बनती जा रही थी इस देशव्यापी धार्मिक अशांति के समय इस्लाम धर्म भी भारत के द्वार खटखटा रहा था यद्यपि भारत में मुसलमानों का आगमन हो चुका था किंतु इस्लाम धर्म भी अपने जड़े नहीं जमा पाया था।

इन धार्मिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में यह कहना समीचीन है कि धार्मिक दृष्टि से आदिकाल का वातावरण अत्यंत दोषी था जनता असंतोष एवं भ्रम से ग्रस्त थी आदिकालीन साहित्य में इसी मानसिकता के अनुरूप खंडन मंडन हठयोग वीरता और श्रृंगार प्रयोग रचनाओं का देखा जा सकता है।

सामाजिक परिस्थिति

आदिकाल में राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के कारण समाज में इस श्रृंखला आ गई थी जनता शासन तथा धर्म दोनों और से निराश्रित होती जा रही थी सामान्य जनता अशिक्षित थी जो साधु सन्यासियों के सांपों और वरदान की ओर दृष्टि लगाए रहती थी।  

पूजा पाठ तंत्र मंत्र और जब तक अब करके लोग दुर्भिक्ष महामारी एवं युद्ध के संकटों को डालना चाहते थे ब्राह्मणों के प्रति पूज्य भाव में कमी आ गई थी तथा वर्ण व्यवस्था के प्रति लोगों का सम्मान नहीं रह गया था किंतु समझी जाने वाली जातियों में से अनेक सिद्ध हो जाते थे जो वेद विरोधी थे। 

समाज में क्षत्रियों का प्राधान्य था राजपूतों में शौर्य तो था परंतु वे उसका उपयोग पारस्परिक प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष में ही करते थे वह वंश गौरव एवं अभिमान को लेकर गृह कला में उलझे ही रहते थे। 

समाज में स्त्रियों के प्रति पूज्य भाव नहीं था वह मात्र भोग एवं भोग्या बन कर रह गई थी सती प्रथा इस काल का एक भयंकर कोड था तत्कालीन भारत में स्वयंवर प्रथा भी थी जो प्रायः युद्ध का कारण बनी थी और सुंदर राजकुमारियों से बलपूर्वक विवाह करने के लिए राजपूतों में युद्ध छिड़ युद्ध छेड़ जाना एक सामान्य बात हो गई थी राजा और सामंत अंतपुर की रैलियों में व्यस्त रहते थे। 

जीवन यापन के साधन दुर्लभ थे तथा निर्धनता युद्ध अशांति के कारण जनता सदैव आतंकित रहते थे और तत्कालीन रासो काव्य में भारत की इस हसन मुखी स्थित जी का पूरा वर्णन चित्रण उपलब्ध है। 

साहित्य परिस्थितियां

साहित्यिक परिस्थितियां अधिकार में साहित्य रचना की तीन धाराएं भराई थी या तीन धाराएं थी एक और तो परंपरागत संस्कृत साहित्य की रचना हो रही थी तो वहीं दूसरी ओर प्राकृत अपभ्रंश भाषा में साहित्य के सृजन कवियों के द्वारा किया जा रहा था और तीसरी धारा हिंदी में लिखे जाने वाले साहित्य की थी।

इस काल में संस्कृत के अंतर्गत पुराणों एवं एवं स्मृतियों पर टिका ही लिखी गई थी ज्योतिष एवं काव्यशास्त्र पर अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की गई थी नववी से 11वीं शती तक कन्नौज एवं कश्मीर संस्कृत साहित्य के केंद्र रहे हैं। 

आनंद वर्धन मम्मट भोज 6 मिनट कुंतल राजशेखर विश्वनाथ भवभूति एवं श्री हर्ष जैसे प्रतिमाएं इसी युग की देन है
इस काल में अपभ्रंश प्रमुखता धर्म की भाषा बन गई थी। जैन कवियों ने गुजरात में रहकर अनेक पुराणों को अपभ्रंश में नए रूपों में प्रस्तुत किया स्वयंभू पुष्पदंत धनपाल हेमचंद्र जैसे जेन कवियों ने साहित्य प्रस्तुत किया जो अपनी मौलिकता एवं साहित्यिक ता के कारण उच्च कोटि का है। 

देश भाषा हिंदी में भी जनता की मानसिक एवं भावात्मक दिशाओं की अभिव्यक्ति एक वर्ग कर रहा था। जिसे भाटिया चारण कवि कहा गया चरण कवियों की सामाजिक आवश्यकता पर बल देते हुए अचा रामचंद्र ने लिखा उस समय जो भारतीय चारण किसी राजा के पास पराक्रम विजय शत्रुघ्न हरण का अतिथि पूर्णा आलाप करता या क्षेत्रों में जाकर वीरों के हृदय में उत्साह क्यों मरा करता था।  

वही सम्मान पाता थानिरंतर युद्ध के लिए प्रोत्साहित करने वाले 1 वर्ग की आवश्यकता चारण इसी श्रेणी के कवि थे जिस प्रकार यूरोप में वीर गाथाओं का विषय युद्ध और प्रेम रहा है इसी प्रकार इन रचनाओं में भव्य एवं संघर्षों की प्रधानता रही है हिंदी भाषा में रचित काव्य ग्रंथों में एक और तो अपने आधा गांव के अतिशय उक्त पूर्ण प्रशंसा की गई है तो दूसरी ओर युद्ध को व्यक्त करने वाली घटनाओं की योजना भी की गई है।

सांस्कृतिक परिस्थिति

सम्राट हर्षवर्धन के समय भारत सांस्कृतिक दृष्टि से अपने शिखर पर था हिंदू धर्म एवं संस्कृत राष्ट्रव्यापी एकता का आधार था किंतु कालांतर में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन से भारत स्नेह स्नेह मुस्लिम संस्कृति से भी प्रभावित होता गया इस काल में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने अपने संकीर्ण दृष्टिकोण एवं धर्मांध की भावना से प्रेरित होकर भारतीय संस्कृति के मूल केंद्रों मंदिरों मठों विद्यालयों को नष्ट करने का पूरा पूरा प्रयास किया। 

हिंदुओं की स्थापत्य कला धार्मिक भावना से ओतप्रोत थी तथा अत्यंत उच्च कोटि की थी प्रसिद्ध इतिहासकार अलबरूनी के अनुसार हिंदू कलक अत्यंत उच्च सोपान पर पहुंच चुके हैं मुसलमान जब उनके मंदिर आदि को देखते हैं तो आश्चर्यचकित हो जाते हैं।  

वे न तो उनका वर्णन कर सकते हैं और ना ही वैसा निर्माण ही कर सकते हैं संपूर्ण भारत में ऐसे अनेक मंदिरों का निर्माण आदि काल में ही हुआ आबू का जैन मंदिर खजुराहो का कंद परमेश्वर पूरी भुवनेश्वर वेल्लोर कांची आदि के मंदिर इसी काल की देन है।

मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव आदिकालीन हिंदू संस्कृति पर अनेक क्षेत्र में पड़ने लगा था उत्सव मेले परिधान आहार मनोरंजन आदि अनेक बातों में मुस्लिम रंग चढ़ने लगा था।  

दूसरी ओर हिंदू संगीत कला वास्तुकला आयुर्वेद एवं गणित का प्रभाव मुस्लिम संस्कृति पर पड़ने लगा यहां निष्कर्ष निकाल लेना इस दशा में असंगत न होगा कि आदिकालीन भारतीय संस्कृति परंपरा से अवश्य होकर मुस्लिम संस्कृत पर पढ़ने लगा यह निष्कर्ष निकाल लेना में असंगत न होगा कि आदिकालीन भारतीय संस्कृति परंपरा से नौकर मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव को स्वीकार करती जा रही थी।

संगीत के क्षेत्र में दोनों संस्कृतियों ने परस्पर आदान-प्रदान पर्याप्त मात्रा में किया है गायन वादन और नृत्य पर मुस्लिम प्रभाव पड़ रहा था तथा अनेक वाद्य यंत्रों सारंगी तबला अलगोजा से हिंदू परिचित हो रहे थे आदिकालीन भारतीय संस्कृति निश्चित रूप से हासन मुक्ति यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है।


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