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अलंकार किसे कहते है - अलंकार के प्रकार

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Alankar in hindi 
 

हेलो दोस्तों यहाँ हिंदी जनरल का थर्ड पद है इसमें हम अलंकार के बारे में जानेंगे। अलंकार का अर्थ होता है आभुषण। 

अलंकार किसे कहते है 

अलंकार जो भूषित करे वह अलंकार है। अलंकार, कविता के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले तत्व होते हैं। जिस प्रकार आभूषण से नारी की सुन्दरता बढ़ जाती है , उसी प्रकार अलंकार से कविता की शोभा बढ़ जाती है। कहा गया है - जो अलंकृत करता है, वही अलंकार है।

सामान्य  कथन को अच्छे से अच्छे रूप में अभिव्यक्ति (किसी किसी के सामने प्रदर्शित करना ) देने के विचार से अलंकार प्रयुक्त होते हैं। इनके द्वारा या तो भावों का विकास  किया जाता है या रूप, गुण, तथा क्रिया का  तीव्र अनुभव कराया जाता है। अत: मन का ओज ही अलंकारों का वास्तविक कारण है।

अलंकार का महत्व 

काव्य में अलंकार की महत्ता सिद्ध करने वालों में आचार्य भामह ने काव्य में अलंकार के स्थान और महत्व का व्याख्यान किया है। इस संबंध में इनका विचार, गुण, रस, ध्वनि तथा स्वयं के प्रसंग में किया जाता है। यह काव्य की शोभा बढ़ाने का मुख्य तत्व होता है इसका स्थान काव्य में महत्व पूर्ण है। 

जब तक हिन्दी में ब्रजभाषा साहित्य का अस्तित्व बना रहा तब तक अलंकार का महत्त्व सुरक्षित रहा। आधुनिक युग में इस दिशा में लोग उदासीन हो गये हैं।

अलंकार का वर्गीकरण

ध्वन्यालोक में "अनन्ता हि वाग्विकल्पा:" कहकर अलंकारों की अगणेयता की ओर संकेत किया गया है। दंडी ने "ते चाद्यापि विकल्प्यंते" कहकर इनकी नित्य संख्यवृद्धि का ही निर्देश किया है। तथापि विचारकों ने अलंकारों को शब्दालंकार, अर्थालंकार, रसालंकार, भावालंकार, मिश्रालंकार, उभयालंकार तथा संसृष्टि और संकर नामक भेदों में बाँटा है

अलंकार के प्रकार

विद्वानों ने अलंकार निम्न भागो में वर्गिकृत क्या है  शब्दालंकार की विशिष्टता रहने पर उभयालंकार होता है। अलंकारों की स्थिति दो रूपें में हो सकती है विचारकों ने अलंकारों को शब्दालंकार, अर्थालंकार, रसालंकार, भावालंकार, मिश्रालंकार, उभयालंकार तथा संसृष्टि और संकर नामक भेदों में बाँटा है। 

 भारतीय -साहित्या  में अलंकार 

1  अनुप्रास, 2  उपमा, 3 रूपक, 4 अनन्वय, 5 यमक, 6 श्लेष, 7 उत्प्रेक्षा, 8 संदेह, 9 अतिशयोक्ति, 10 वक्रोक्ति आदि प्रमुख अलंकार हैं।

उपमा अलंकार 

काव्य में जब किसी प्रसिद्ध व्यक्ति या वस्तु की तुलना दूसरे समान गुण वाले व्यक्ति या वस्तु से की जाती है तब उपमा अलंकार होता है। उदाहरण -पीपर पात सरिस मन डोला। राधा बदन चन्द्र सो सुन्र।

अतिशयोक्ति अलंकार

अतिशयोक्ति = अतिशय + उक्ति = बढा-चढाकर कहना। जब किसी बात को बढ़ा चढ़ा कर बताया जाये,तब अतिशयोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण -हनुमान की पूँछ में, लग न पायी आग। लंका सारी जल गई, गए निशाचर भाग।।

रूपक अलंकार

जहां उपमेय में उपमान का आरोप किया जाए वहाँ रूपक अलंकार होता है अथवा जहां गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में ही उपमान का अभेद आरोप कर दिया जाता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। रूपक अलंकार में गुण की अत्यंत समानता दिखाने के लिए उपमेय और उपमान को "अभिन्न" अर्थात "एक" कर दिया जाता है। अर्थात उपमान को उपमेय पर आरोपित कर दिया जाता है। 

उदाहरण - पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। ('राम' नाम में 'रतन धन' का आरोप होने से रूपक अलंकार है।) आये महंत बसंत। (महंत की 'सवारी' में 'बसंत' के आगमन का आरोप होने से रूपक अलंकार है।) जलता है ये जीवन पतंग यहां 'जीवन' उपमेय है और 'पतंग' उपमान किन्तु रूपक अलंकार के कारण जीवन (उपमेय) पर पतंग (उपमान) का आरोप कर दिया गया है।

विभावना अलंकार

जहाँ कारण के न होते हुए भी कार्य का होना पाया जाता है, वहाँ विभावना अलंकार होता है। उदाहरण - बिनु पग चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु कर्म करै विधि नाना। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।

अनुप्रास अलंकार

एक या अनेक वर्णो की पास पास तथा क्रमानुसार आवृत्ति को अनुप्रास अलंकार कहते हैं ।जहाँ एक शब्द या वर्ण बार बार आता है वहा अनुप्रास अलंकार होता है।

जैसे;- चारु-चंद्र की चंचल किरणे इसमे च वर्ण बार बार आया है

एक शब्द फिर फिर परे, जहाँ अनेकनबार । अर्थ और ही और हो, सोये यमक अलंकार।

यमक अलंकार

काव्य की सुंदरता बढ़ाने किसीशब्द की बार-बार आवृत्ति होती है उसे यमक अलंकार कहते है उदाहरण - कनक कनक ते सौ गुनी,मादकता अधिकाये। या खाये बौराये जग, बा खाये बौराये।

अर्थ: यहाँ एक कनक से तात्पर्य भांग (धतूरा) से है तथा दूसरे कनक का अर्थ स्वर्ण(सोना) है इसका अर्थ यह है की स्वर्ण अथवा धन के लोभ का नशा भांग के नसा से भी सौ गुना अधिक बावरा बना देता है। भांग को खाने से नशा चढ़ता है जबकि स्वर्ण अर्थात सोने को प्राप्त करने से लालच का नशामनुष्यको पागलबना देता है ।

श्लेष अलंकार

यह alankar शब्द अर्थ दोनो में प्रयुक्त होता हैं। श्लेष अलंकार में एक शब्द के दो अर्थ निकलते हैं। उदाहरण - रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।।

यहाँ पानी का प्रयोग तीन बार किया गया है, किन्तु सभी बार पानी का अलग-अलग अर्थ निकल रहा है इस दोहे में रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है। पानी का पहला अर्थ मनुष्य के संदर्भ में है जब इसका मतलब विनम्रता से है। पानी का दूसरा अर्थ आभा, तेज से है जिसके बिना मोती का कोईमोल नहीं होता। पानी का तीसरा अर्थ जल से है जिसे आटे (चून) से जोड़कर दर्शाया गया है।

अनन्वय अलंकार

जब उपमेय की समता में कोई उपमन नहीं आता और कहा जाता है कि उसके समान वही है, तब अनवेय अलंकार होता है। उदाहरण- यद्यपि अति आरत - मारत है। भारत के सम भारत में है।

संदेह अलंकार 

जब उपमेय में उपमान का संशय हो तब संदेह अलंकार होता है। या जहाँ रूप, रंग या गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह निश्चित न हो कि वही वस्तु है और यह संदेह अंत तक बना रहता है, वहाँ सन्देह अलंकार होता है। उदाहरण- कहूँ मानवी अगर मैं तुमको इतना संकोच कहाँ है?

वोकेशन अलंकार

जब किसी व्यक्ति के एक अर्थ में कहे गये शब्द या वाक्य का कोई दूसरा व्यक्ति जान-बूझकर दूसरा अर्थ कल्पित करे तब वक्रोक्ति अलंकार होता है। इस दूसरे अर्थ की कल्पना श्लेष या काकु द्वारा संभव होती है। वक्रोक्ति के 2 प्रकार 1. श्लेष वक्रोक्ति और 2. काकु वक्रोक्ति हैं।

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