नाटक - रीढ़ की हड्डी जगदीश चंद्र माथुर

सुपरिचित नाटककार जगदीश चंद्र माथुर का जन्म सन 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा, जिला बुलंदशहर में हुआ। उन्होंने ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक लिखें हैं और उनकी प्रमुख रचनाएं भोर का तारा, ओ मेरे सपने जो एकांकी है शारदिया कोणार्क, पहला राजा (नाटक), जिन्होंने जीना सीखा तथा 10 तस्वीरें जो रेखा चित्र है आदि रचनाओं को उन्होंने लिखा। जगदीश चंद्र माथुर का निधन 14 मई 1978 को हुआ।

रीढ़ की हड्डी : जगदीश चंद्र माथुर / नाटक


रीड_की_हड्डी

रीड की हड्डी- नाटक पात्र परिचय

रीड की हड्डी के एकांकी का पात्र परिचय इस प्रकार है-

उमा - लड़की
रामस्वरूप - लड़की का पिता
प्रेमा - लड़की की माता
शंकर - लड़का
गोपाल प्रसाद - लड़के का बाप
रतन - रामस्वरूप का नौकर

( नाटक का परिदृश्य इस प्रकार है मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे में आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आती है वह अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं। एक तख़्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं और तख्त का दूसरा सिरा उनके नौकर ने पकड़ रखा है। )

रामस्वरूप : अबे धीरे धीरे चल। .....  अबे तख्त को उधर मोड़ दे... उधर।
..... बस। ( तख़्त को रखने की आवाज आती है। )

नौकर : बिछा दूँ साहब ?

रामस्वरूप : (जरा तेज आवाज) और क्या करेगा ? परमात्मा के यहां जब अक्ल बांट रही थी, तो तू देर से पहुंचा था क्या ? ........ बिछा दूँ साब....  और यह पसीना किसलिए बहाया है ?

नौकर : तख्त बिछाता है ही-ही-ही।

रामस्वरूप : हंसता क्यों है ?.....अबे हमने भी जवानी में कसरत की है। कलसों से नहाता था लोटों की तरह। तख्त क्या चीज है ?.... उसे सीधा कर.... यों बस और सुन, बहू जी से दरी माँग ला, इसके ऊपर बिछाने के लिए। .....चद्दर भी, कल जो धोबी के यहां से आई है , वही। ( नौकर जाता है बाबू साहब इस बीच में मेजपोश ठीक करते हैं। एक झाड़न से गुलदस्ता साफ करते कुर्सियों पर भी दो-चार हाथ लगाते हैं। सहसा घर की मालकिन प्रेमा का आना। गंदूमी रंग, छोटा कद, चेहरे की आवाज से जाहिर होता है कि किसी काम में बहुत व्यस्त हैं। उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह नौकर आ रहा है।.... खाली हाथ। बाबू रामस्वरूप दोनों की तरफ देखने लगते हैं। )

प्रेमा : मैं कहती हूं, तुम्हें इस वक्त धोती की क्या जरूरत पड़ गई ? एक तो वैसे ही जल्दी जल्दी में.......

रामस्वरूप : धोती ?

प्रेमा : हाँ , अभी तो बदलकर आए हो और फिर न जाने किसलिए.....

रामस्वरूप : लेकिन धोती माँगी किसने ?

प्रेमा : यही तो कह रहा था रतन ?

रामस्वरूप : क्यों बे रतन, तेरे कानों में डाट लगी है ? मैंने कहा था- धोबी के यहां से जो चादर आई है, उसे मांग ला। .... अब तेरे लिए दिमाग कहां से लाऊं। उल्लू कहीं का !

प्रेमा : अच्छा जा, पूजावाली कोठरी में लकड़ी के बॉक्स के ऊपर भूले हुए कपड़े रखे हैं न, उन्हीं में से चद्दर उठा ला।

रतन : और दरी ?

प्रेमा : दरी तो यही रखी है कोने में। वह पड़ी तो है।

रामस्वरूप : ( दरी उठाते हुए। ) और बीबी के कमरे में से हारमोनियम उठाला और सितार भी। ....  जल्दी जा। ( रतन जाता है। पति-पत्नी तख्त पर दरी बिछाते हैं। )

प्रेमा : लेकिन वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुंह फुलाए पड़ी है।

रामस्वरूप मुँह फुलाए ? ... और तुम उसकी माँ किस मर्ज की दवा हो ? जैसे-तैसे करके तो वह लोग पकड़ में आए हैं। अब तुम्हारी बेवकूफी से सारी मेहनत बेकार जाए, तो मुझे दोष मत देना।

प्रेमा : तो मैं ही क्या करूं ? सारे जतन करके हार गई। तुम्ही ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सर चढ़ा रखा है। मेरी समझ में तो यह पढ़ाई-लिखाई का जंजाल आता नहीं। अपना जमाना अच्छा था। 'आ' 'ई' पढ़ ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो स्त्री-सुबोधिनी पढ़ ली। सच पूछो तो स्त्री-सुबोधिनी में ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं......  ऐसी बातें की क्या तुम्हारी बी.ए. एम.ए. की पढ़ाई में होगी और आजकल के लक्षण ही अनोखे हैं......

रामस्वरूप : ग्रामोफोन बाजा होता है न ?

प्रेमा : क्यों ?

रामस्वरूप : दो तरह का होता है। एक तो आदमी का बनाया हुआ उसे एक बार चलाकर चाहे रोक लो और दूसरा परमात्मा का बनाया हुआ उसका रिकॉर्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं

प्रेमा : हटो भी ! तुम्हें ठिठोली सुझती रहती है। यह तो होता नहीं कि उस अपनी उमा को राह पर लाते। अब देर ही कितनी रही है उन लोगों के आने में ?

रामस्वरूप : तो हुआ क्या ?

प्रेमा : तुम ही ने तो कहा था कि जरा ठीक-ठीक कर के नीचे लाना। आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है ? इसी मारे मैंने तो पाउडर और वौडर उसके सामने रखा था। पर उसे तो इन चीजों से न जाने किस जन्म की नफरत है। मेरा कहना था कि आंचल से मुंह लपेट लेट गई; भई मैं तो बाज आई तुम्हारी इस लड़की से।

रामस्वरूप : न जाने कैसे इसका दिमाग है। वरना आजकल की लड़कियों के सहारे तो पौडर का कारोबार चलता है।

प्रेमा : अरे मैंने तो पहले ही कहा था इंट्रेंस ही पास करा लेते- लड़की अपने हाथ रहती और इतनी परेशानी उठानी न पड़ती। पर तुम तो.....

रामस्वरूप : ( बात काटकर ) चुप, चुप....  ( दरवाजे में झाँकते हुए ) तुम्हें कतई अपनी जुबान पर काबू नहीं है।  कल ही बता दिया था कि उन लोगों के सामने जिक्र और ही ढंग से होगा। मगर तुम तो अभी से सबकुछ उगल देती हो। उनके आने तक तो न जाने क्या हाल करोगी।

प्रेमा : अच्छा बाबा, मैं न बोलूंगी, जैसी तुम्हारी मर्जी हो, करना। बस मुझे तो मेरा काम बता दो।

रामस्वरूप : तो उमा को जैसे-तैसे तैयार कर दो। न सही पाउडर। वैसे कोई बुरी है। पान लेकर भेज देना उसे और नाश्ता तो तैयार है न ? ( रतन का आना ) आ गया रतन !.....  इधर ला, इधर बाजा नीचे रख दे। चद्दर खोल।  पकड़ तो जरा उधर से। ( चददर बिछाते हैं। )

प्रेमा : नाश्ता तो तैयार है। मिठाई तो वे लोग ज्यादा खाएंगे नहीं। कुछ नमकीन चीजें बना दी हैं। फल रखे हैं ही। चाय तैयार है और टोस्ट भी। मगर हाँ मक्खन ? मक्खन तो आया ही नहीं।

रामस्वरूप : क्या कहा ? मक्खन नहीं आया ? तुम्हें भी किस वक्त याद आई है। जानती हो कि मक्खनवाले की दुकान दूर है, पर तुम्हें तो ठीक वक्त पर कोई बात सुझती ही नहीं। अब बताओ रतन मक्खन लाए कि यहाँ का काम करे। दफ्तर के चपरासी से कहा था आने के लिए सो नखरो के मारे,,,,,

प्रेमा : यहां का काम कौन-सा ज्यादा है ? कमरा तो सब ठीक-ठाक है ही, बाजा सितार आ  ही गया।
नाश्ता यहाँ बराबरवाले कमरे में करना है- ट्रे में रखा हुआ है, सो तुम्हें पकड़ा दूंगी। एकाध चीज खुद ले आना।  इतनी देर से रतन मक्खन ले ही आएगा। दो आदमी ही तो हैं।

रामस्वरूप : हाँ एक तो बाबू गोपाल प्रसाद और दूसरा खुद लड़का है। देखो, उमा से कह देना की जरा करीने से आए। यह लोग जरा ऐसे ही हैं। गुस्सा तो मुझे बहुत आता है, इनके दकियानूसी खयालों पर। खुद पढ़े-लिखे हैं, सभा-सोसायटीयों में जाते हैं, मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो।

प्रेमा : और लड़का ?

रामस्वरूप : बताया तो था तुम्हें। बाप सेर है, तो लड़का सवा सेर, बी.एस.सी. के बाद लखनऊ में ही तो पढ़ता है, मेडिकल कॉलेज में। कहता है कि शादी का सवाल दूसरा है तालीम का दूसरा। क्या करूं मजबूरी है। मतलब अपना है, वरना इन लड़कों और बापों को ऐसी कोरी कोरी सुनाता की ये भी.....

रतन : ( जो अब तक दरवाजे के पास चुपचाप खड़ा हुआ था, जल्दी-जल्दी ) बाबूजी, बाबूजी !

रामस्वरूप : क्या है ?

रतन : कोई आए हैं।

रामस्वरूप : ( दरवाजे से बाहर झाँककर, जल्दी से मुंह अंदर करते हुए ) अरे, ऐ प्रेमा, वह आ भी गए ( नौकर पर रजत नजर पड़ते ही ) और तू यही खड़ा है, बेवकूफ ! गया नहीं मक्खन लाने अब सब चौपट कर दिया।
... अबे उधर से, अंदर के दरवाजे से जा (नौकर अंदर जाता है).... और तुम जल्दी करो। प्रेमा, उमा को समझा देना थोड़ा-सा गा देगी। (प्रेमा जल्दी से अंदर की तरफ जाती है। उसकी धोती जमीन पर रखे हुए बाजे से अटक जाती है। )

प्रेमा : उँह ! यह बाजा नीचे ही रख गया है। कमबख्त।

रामस्वरूप : तुम जाओ, मैं रखे देता हूं....  जल्दी। (प्रेमा आ जाती है। बाबू रामस्वरूप बाजा उठाकर रखते हैं। किवाड़ों पर दस्तक।)

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ। आइए, आइए। ..... हँ-हँ-हँ।

(बाबू राम गोपाल प्रसाद और उसके लड़के शंकर का आना। आंखों से लोक-चतुराई टपकती है आवाज से मालूम होता है काफी अनुभवी और फितरती महाशय है। उनका लड़का कुछ खींसे निपोरने वाले नौजवानों में से है, आवाज पतली है और खिसियाहट भरी। झुकी कमर इसकी खासियत है।

रामस्वरूप : (अपने दोनों हाथ मलते हुए) हँ.. हँ इधर तशरीफ़ लाइए, इधर.... । ( बाबू गोपाल प्रसाद बैठते हैं मगर बैंत  गिर पड़ता है। )

रामस्वरूप : यह बेंत ! लाइए मुझे दीजिए कोने में रख देता हूं। (सब बैठते हैं) हँ-हँ !....  मकान ढूंढने में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई ?

गोपाल प्रसाद : (खँखारकर) नहीं तांगेवाला जानता था.... और फिर हमें तो यहां आना ही था, रास्ता मिलता कैसे नहीं?

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ, यह तो आपकी बड़ी मेहरबानी है। मैंने आपको तकलीफ तो दी।

गोपाल प्रसाद : अरे नहीं साहब! जैसा मेरा काम, वैसा आपका काम, आखिर लड़के की शादी तो करनी ही है। बल्कि ये कहिए मैंने आपके लिए खासी परेशानी कर दी।

रामस्वरूप : हँ-हँ, यह लीजिए आप तो मुझे कांटो में घसीटने लगे। हम तो आपके हँ-हँ सेवक ही हैं। हँ-हँ (थोड़ी देर बाद लड़के की तरफ मुखातिब होकर) और कहिए शंकर बाबू कितने दिनों की छुट्टियां हैं?

शंकर : जी कॉलेज की छुट्टियां नहीं है। वीक एंड में चला आया था।

रामस्वरूप : आपके कोर्स खत्म होने में तो अब साल भर रहा होगा।

शंकर : जी, यही कोई साल दो साल।

रामस्वरूप : साल दो साल?

शंकर : हँ-हँ जी एकाध साल का मार्जिन रखता हूँ......

गोपाल प्रसाद : बात यह हैं साहब कि यह शंकर एक साल बीमार हो गया था। क्या बताएं, इन लोगों को इसी उम्र में सारी बीमारियां सताती हैं। एक हमारा जमाना था कि स्कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ उड़ा जाते थे, मगर फिर जो खाना खाने बैठते, तो वैसे-की-वैसे ही भूख।

रामस्वरूप : कचौड़ियाँ भी तो उस जमाने में पैसे की दो आती थीं।

गोपाल प्रसाद : जनाब, यह हाल था कि चार पैसे में ढेर-सी मलाई आती थी और अकेले दो आने की हजम करने की ताकत थी, अकेले और अब तो बहुतेरे खेल वगैरह होते हैं स्कूलों में। तब ना बॉलीवॉल जानता था, न टेनिस, न बैडमिंटन। बस कभी हॉकी या कभी क्रिकेट कुछ लोग खेला करते थे। मगर मजाल कि कोई कह जाए कि यह लड़का कमजोर है। (शंकर और रामस्वरूप किसे खीसे निपोरते हैं। )

रामस्वरूप : जी हां, जी हां ! उस जमाने की बाद ही दूसरी थी। हँ-हँ....

गोपाल प्रसाद : (जोशीली आवाज में) और पढ़ाई का यह हाल था कि एक बार कुर्सी पर बैठे की 12 घंटे की सिटिंग हो गई, बारह घंटे की सेटिंग हो गई, बारह घंटे ! जनाब मैं सच कहता हूं कि उस जमाने का मेट्रिक भी वह अंग्रेजी लिखता था फर्राटे कि आजकल के एम.ए. भी मुकाबला नहीं कर सकते।

रामस्वरूप जी हाँ, जी हाँ ! यह तो है ही।

गोपाल प्रसाद : माफ कीजिएगा बाबू रामस्वरूप, उस जमाने की जब याद आती है, अपने को जप्त करना मुश्किल हो जाता है।

रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ ! जी हाँ, वह तो रंगीन जमाना था, रंगीन जमाना शंकर भी ही ही करता है
गोपाल प्रसाद एक साथ अपनी आवाज और तरीका बदलते हुए अच्छा तो साहब फिर बिजनेस की बातचीत हो जाए

रामस्वरूप : चौक कर बिजनेस? बिजी.... (समझकर) आह !...... अच्छा अच्छा लेकिन जरा नाश्ता तो कर लीजिए (उठते हैं।)

गोपाल प्रसाद : यह सब आप क्यों तकल्लुफ करते हैं।

रामस्वरूप : हाँ तकल्लुफ किस बात का है? हँ-हँ ! यह तो मेरी बड़ी तकदीर है कि आप मेरे यहाँ तशरीफ लाए। वरना मैं किस काबिल हूँ। हँ-हाँ- माफ कीजिएगा जरा। अभी हाजिर हुआ (अंदर जाते हैं। )

गोपाल प्रसाद : (थोड़ी देर बाद दबी आवाज में) आदमी तो भला है। मकान-वकान से हैसियत भी बुरी नहीं मालूम होती। पता चले, लड़की कैसी है?

शंकर : जी....
(कुछ खँखारकर इधर-उधर देखता है।)

गोपाल प्रसाद : क्यों क्या हुआ?

शंकर : कुछ नहीं।

गोपाल प्रसाद : झूककर क्यों बैठते हो? ब्याह तय करने आए, तो कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की बैक बोन....
(इतने में बाबू रामस्वरूप आते हैं, हाथ में चाय की ट्रे लिए हुए मैच पर रख देते हैं।)

गोपाल प्रसाद : आखिर आप माने नहीं।

रामस्वरूप : (चाय प्याले में डालते हुए) हँ-हँ-हँ?आपको विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्तानी?

गोपाल प्रसाद : नहीं नहीं साहब, मुझे आधा दूध और आधी चाय दीजिए। और चीनी भी ज्यादा डालिएगा मुझे तो भाई यह नया फैशन पसंद नहीं। एक तो वैसे ही चाय में पानी काफी होता है और फिर चीनी भी नाम के लिए डाली जाए, तो जायका क्या रहेगा?

रामस्वरूप : हँ-हँ। कहते तो आप सही हैं। (प्याला पढ़ाते हुए)

शंकर : (खंखारकर) सुना है सरकार अब ज्यादा चीनी लेने वालों पर टैक्स लगाएगी।

गोपाल प्रसाद : चाय पीते हुए हूँ। सरकार जो चाहे सो कर ले पर अगर आमदनी करनी है तो सरकार को बस एक ही टैक्स लगाना चाहिए।

रामस्वरूप : (शंकर को प्याला पकड़ाते हुए) वह क्या?

गोपाल प्रसाद : खूबसूरती पर टैक्स ! (रामस्वरूप और शंकर हंस पड़ते हैं।)

मजाक नहीं साहब, यह ऐसा टैक्स है जनाब कि देने वाली भी चूँ न करेंगी। बस शर्त यह हैं कि औरत पर यह छोड़ दिया जाए कि वह अपनी खूबसूरती के स्टैंडर्ड के माफिक अपने ऊपर टैक्स तय कर ले फिर देखिए सरकार की कैसी आमदनी बढ़ती है।

रामस्वरूप : (जोर से हंसते हुए) वाह-वाह ! खूब सोचा आपने ! वाकई आजकल यह खूबसूरती का सवाल भी बेढब हो गया है। हम लोगों के जमाने में तो यह कभी उठता भी न था। (तश्तरी गोपाल प्रसाद की तरफ बढ़ाते हैं। ) लीजिए।
गोपाल प्रसाद : (समोसा उठाते हुए) कभी नहीं साहब, कभी नहीं।

रामस्वरूप : (शंकर की तरफ मुखातिब होकर) आपका क्या ख्याल है, शंकर बाबू?

रामस्वरूप : किस मामले में?

रामस्वरूप : यही की शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्सा कितना होना चाहिए?

गोपाल प्रसाद : (बीच में ही) यह बात दूसरी है कि बाबू रामस्वरूप, मैंने आपसे पहले ही कहा था, लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पाउडर वगैरह लगाए, चाहे वैसे ही। बात यह है कि हम आप मान भी जाएं, मगर घर की औरतें तो राजी नहीं होती। आपकी लड़की तो ठीक है?

रामस्वरूप : जी हां वह तो आप देख लीजिएगा।

गोपाल प्रसाद : देखना क्या ! जब आपसे इतनी बातचीत हो चुकी है, तब तो यह रस्म ही समझिए।

रामस्वरूप : हँ हँ, यह तो आपका मेरे ऊपर भारी अहसान है। हँ-हँ।

गोपाल प्रसाद : और जायचा ( जन्मपत्री ) तो मिल ही गया होगा?

रामस्वरूप : जी जायचे का मिलाना क्या मुश्किल बात है ठाकुर जी के चरणों में रख दिया बस खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए।

गोपाल प्रसाद : यह ठीक कहा आपने बिल्कुल ठीक। (थोड़ी देर रुक कर) लेकिन हाँ, यहां जो मेरे कानों को भनक पड़ी है, यह गलत है न ?

रामस्वरूप : (चौक कर) क्या ?

गोपाल प्रसाद : पढ़ाई-लिखाई के बारे में जी हाँ, साफ़ बात है साहब, हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुकतेगा उनके नखरो को। बस हद से हद मैट्रिक पास होनी चाहिए।
क्यों शंकर?

शंकर : जी हाँ कोई नौकरी तो करनी नहीं।

रामस्वरूप : नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।

गोपाल प्रसाद : और क्या साहब ! देखिए कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि जब आप ने अपने लड़के को बी. ए. , एम. ए. तक पढ़ाया है, तब उनकी बहुवें भी ग्रेजुएट लीजिए। भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है। अरे मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगी, अंग्रेजी अब का अखबार पढ़ने लगी और पॉलिटिक्स वगैरह पर बहस करने लगी तब तो हो चुकी गृहस्ती जनाब मोर के पंख होते हैं मोरनी के नहीं सिर के बाल होते हैं शेरनी के नहीं।

रामस्वरूप : जी हां और मर्द की दाढ़ी होती है, औरतों की नहीं।
हँ-हँ-हँ।
(शंकर भी हंसता है, मगर गोपाल प्रसाद गंभीर हो जाते हैं।

गोपाल प्रसाद : हाँ-हाँ वह भी सही है। कहने का मतलब यह है कि कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं, जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं और ऊंची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।

रामस्वरूप : (शंकर से) चाय और लीजिए।

शंकर : धन्यवाद, पी चुका।

रामस्वरूप : (गोपाल प्रसाद से) आप?

गोपाल प्रसाद : बस साहब अब तो खत्म ही की कीजिए।

रामस्वरूप : आपने तो कुछ खाया ही नहीं। चाय के साथ टोस्ट नहीं है नहीं थे। क्या बताएं, वह मक्खन.....

गोपाल प्रसाद : नाश्ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं और फिर टोस्ट वोस्ट मैं खाता ही नहीं।

रामस्वरूप : हां, हां (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। फिर अंदर के दरवाजे की तरफ मुंह कर जरा जोर से) अरे, जरा पान भिजवा देना..... सिगरेट मँगवाऊँ।

गोपाल प्रसाद : जी नहीं।

(पान की तस्करी हाथों में लिए उमा आती है। सादगी के कपड़े। गर्दन झुकी हुई। बाबू गोपाल प्रसाद आंखें गड़ाकर और शंकर छिपकर उसे ताक रहे हैं।)

रामस्वरूप : हँ-हँ ... हँ-हँ,  आपकी लड़की है? लाओ बेटी पान मुझे दो।

(उमा पान की तस्करी अपने पिता को दे देती है। उस समय उसका चेहरा ऊपर को उठ जाता है, नाक पर रखा हुआ सोने की रिमवाला चश्मा दिखता है। बाप-बेटे चौक उठते हैं)

रामस्वरूप : (जरा सकपकाकर) जी, वह तो वह पिछले महीने में इसकी आंखें आ गई थी, तो कुछ दिनों के लिए चश्मा लगाना पड़ रहा है।

गोपाल प्रसाद : पढ़ाई लिखाई की वजह से तो नहीं है कुछ ?

रामस्वरूप : नहीं साहब, वहां तो मैंने अर्ज किया न।

गोपाल प्रसाद : हूँ। (संतुष्ट होकर कुछ कोमल स्वर में) बैठो बेटी !

रामस्वरूप : वहाँ बैठ जाओ उमा, उस तख्त पर अपने बाजे के पास (उमा बैठती है। )

गोपाल प्रसाद : चाल में तो कुछ खराबी है नहीं। चेहरे पर भी छवि है....  हाँ कुछ गाना-बजाना सिखा है?

रामस्वरूप : जी हाँ, सितार भी और बाजा भी। सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ।

(उमा सितार उठाती है। थोड़ी देर बाद मीराका का मशहूर गीत मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई' गाना शुरू कर देती है। स्वर से जाहिर है कि गाने का अच्छा ज्ञान है। उसकी आंखें शंकर की झेंपती-सी आंखों से मिल जाती हैं और वह गाते-गाते एकदम से रुक जाती है। )

रामस्वरूप : क्यों, क्या हुआ? गाने को पूरा करो उमा !

गोपाल प्रसाद : नहीं-नहीं साहब, काफी है। लड़की आपकी अच्छा गाती है।

( उमा सितार खकर अंदर जाने को उठती है। )
गोपाल प्रसाद : अभी ठहर, बेटी।

रामस्वरूप : थोड़ा और बैठी रहो, उमा। (उमा बैठती है)

गोपाल प्रसाद : उमा से तो तुमने पेंटिंग भी सीखी है

उमा : (चुप).

रामस्वरूप : हाँ, वह तो मैं आपको बताना भूल ही गया। यह जो तस्वीर टंगी हुई है, कुत्ते वाली इसी ने खींची है। और वह उस दीवार पर भी।

गोपाल प्रसाद : हूं यहां तो बहुत अच्छा है। और सिलाई वगैरह?

रामस्वरूप : सिलाई तो सारे घर की इसी जिम्में रहती है, यहाँ तक कि मेरी कामीजें भी- हँ-हँ-हँ।

गोपाल प्रसाद : ठीक है....  लेकिन, हाँ बेटी, तुमने कुछ इनाम जीते हैं?

(उमा चुप। रामस्वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं, लेकिन उमा चुप है, उस तरह गर्दन झुकाए। गोपाल प्रसाद अधीर हो उठते हैं और रामस्वरूप सकपकाते हैं।

रामस्वरूप : जवाब दो उमा। (गोपाल प्रसाद से) हँ-हँ जरा शरारती है। इनाम तो इसने..
गोपाल प्रसाद : (जरा रूखी आवाज में) जरा मुँह भी तो खोलना चाहिए।

रामस्वरूप : उमा, देखो आप क्या कह रहे हैं ? जवाब दो न।

उमा : (हल्की, लेकिन मजबूत आवाज में) क्या जवाब दूं बाबू जी ! जब कुर्सी, मेज बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी, मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीददार को दिखला देता है, पसंद आ गई तो अच्छा है वरना...

रामस्वरूप : (चौक कर खड़े हो जाते हैं) उमा, उमा !

उमा : अब मुझे कह लेने दो बाबूजी ! यह जो महाशय मेरे खरीददार बनकर आए हैं, उनसे जरा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उनको चोट नहीं लगती है? क्या वह बेबस भेड़-बकरियाँ हैं? जिन्हें कसाई अच्छी तरह देख-भालकर....?

गोपाल प्रसाद : (ताव में आकर) बाबू राम स्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहां बुलाया था?

उमा : (तेज आवाज में) हाँ, और हमारी बेज्जती नहीं होती, जो आप इतनी देर से नाप तोल कर रहे हैं? और जरा अपने इस साहबजादे से पूछे कि अभी पिछले फरवरी में यह लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहां से क्यों भगाए गए थे ?

शंकर : बाबू जी चलिए।

गोपाल प्रसाद : लड़कियों के हॉस्टल में क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो?
(रामस्वरूप चुप)

उमा : जी हां, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की और न आपके पुत्र की तरह ताक-झांक कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज्जत, अपने मान का ख्याल तो है, लेकिन इनसे पूछिए कि यह किस तरह नौकरानी के पैरों पड़कर अपना मुंह छुपाकर भागे थे।

रामस्वरूप : उमा, उमा?

गोपाल प्रसाद : (खड़े होकर गुस्से में) बस हो चुका। बाबू रामस्वरूप आपने मेरे साथ दगा किया। आपकी लड़की बी.ए. पास है, आपने मुझसे कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है। लाइए......  मेरी छड़ी कहाँ है? मैं चलता हूँ ! (बेंत ढूंढकर उठाते हैं। ) बी. ए. पास उफ़्फ़ोह !  गजब हो जाता ! झूठ का भी कुछ ठिकाना है, आओ, बेटे, चलो....  (दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। )

उमा : जी हाँ, जाइए, लेकिन घर जाकर जरा यह पता लगाएगा कि आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं यानी बैकबोन, बैकबोन।

(बाबू गोपाल प्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्सा है। उनके लड़के के रुआँसापन। दोनों बाहर चले जाते हैं। बाबू रामस्वरूप कुर्सी पर धन से बैठ जाते हैं। वह सहसा चुप हो जाती है, लेकिन उसकी हँसी सिसकियां में तब्दील हो जाती है। प्रेमा का घबराहट की हालत में आना।

प्रेमा : उमा, उमा...  रो रही है।

(यह सुनकर रामस्वरूप खड़े होते हैं रतन आता है। )

रतन : बाबूजी मक्खन।

(सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।

इस प्रकार से जगदीश चंद्र माथुर ने बहुत ही लोकप्रिय नाटक की रचना यहां पर की है और जो कि सराहनीय है इस पाठ से जितने भी प्रश्न बनते हैं वह मैं आपके साथ जरूर शेयर करूंगा कमेंट करके बताएं क्या सवाल है आपके हिंदी साहित्य के बारे में यहां कक्षा 9 वीं की किताब को देखकर लिखा गया है जो कि हमारे M.A. Hindi के 1st semester regular  के सिलेबस में भी है यह रीढ़ की हड्डी नाम का नाटक जो की जगदीश चंद्र माथुर के द्वारा लिखा गया है।

उम्मीद करते हैं आप दोबारा हमारे ब्लॉक में आएंगे और ऐसे ही रोचक लेख का आनंद लेते रहेंगे इसी कामना के साथ धन्यवाद और अलविदा।

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धन्यवाद इसी तरह पढ़ते रहें और अपना ज्ञान बढ़ाते रहें।