Wednesday, October 30, 2019

Maithilisharan Gupt Dwara Likhit Saket ki Kathavastu

Hello and Welcome Friends मेरा नाम है खिलावन और आप पढ़ रहें हैं Rexgin.in जिसपर आपको मिलता है पढ़ाई लिखाई से जुड़े टॉपिक के बारे में ज्ञानवर्धक जानकारियां और कल मैंने आपके लिए पोस्ट किया था मैथिलीशरण गुप्त के द्वारा लिखा गया साकेत महाकाव्य का आलोचना खण्ड और आज हमने पोस्ट किया है आपके लिए साकेत का ही टॉपिक  
Maithilisharan Gupt Dwara Likhit Saket ki Kathavastu

मैथिलीशरण गुप्त द्धारा रचित साकेत की कथावस्तु 

जैसा कि हम सभी जानते हैं मैं तो मैथिलीशरण गुप्त जी हिंदी साहित्य भारतीय समाज और इतिहास के दुवेदी युग के कवि हैं और कोई भी कवि या साहित्यकार अपने युग से असंतृप्त रहकर नहीं लिख सकता। अतः गुप्त जी की रचनाएं भी युग सापेक्ष संवेदना और वस्तु को लिए हैं। उनका युग सुधार और इतिवृत्तात्मक  संवेदना का युग है। अतः गुप्त जी के साहित्य में भी यह प्रवृत्ति और संवेदना उभर कर सामने आती है। कवि ने पौराणिक रामकथा के कुछ स्थलों को लेकर उनके आधार पर साकेत के कथानक की रचना की। है कुछ परंपरागत विद्वानों ने साकेत की विशेषता को आपेक्ष के रूप में प्रस्तुत किया है कि गुप्तजी ने साकेत में रामायण के परित्यक्त, विस्मृत एवं उपेक्षित प्रसंगो व पात्रों को ही प्रकाश मिलाने का प्रयास किया है। तथाकथित विद्वानों का यह आक्षेप युगीन प्रभाव और कवि की समसामयिक प्रतिबद्धता की ओर संकेत करता है। विद्वानों का यह भी कहना है कि एक और कवि ने संपूर्ण राम-कथा भी कह देनी चाही और दूसरी ओर उपेक्षित स्थलों तथा पात्रों को भी उभारने की चेष्टा की है। इस दुवनदु में कथानक का संतुलन बिगड़ गया है और उसके सुनिश्चित प्रवाह में गतिरोध आ गया है। यह आरोप परंपराग्राही लोगों द्वारा लाया गया है जो कि युग की सापेक्षता को नहीं समझ पाते। यह भारत के इतिहास का वह समय था जब उपेक्षित इंसान को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के लिए पूरा देश संघर्ष कर रहा था और गांधीजी इसका नेतृत्व कर रहे थे तब एक राष्ट्र कवि का दायित्व इस संवेदना और समय की आवश्यकता को अभिव्यक्त करना था ना कि रामकथा को पुनर्जीवित करना। इस नुक्ते नजर-से साकेत को पढ़ा जाना चाहिए।

जब तुलसी ने वाल्मीकि रामायण में परिवर्तन करके अपने युगीन प्रभाव और संवेदनाओं को अपने रामचरित मानस का विषय बनाया तो उन पर यह आक्षेप नहीं लगा। कृतिवास ने अपनी रामायण में बहुत से नए और अपने परिवेश और मूल्यों से संबंध प्रसंग रामायण में अनुस्यूत किए तो उन पर यह आक्षेप नहीं लगा। दरअसल रामायण और राम कथा की रूढ़ मनोवृत्ति से देखने पर इस तरह के आक्षेप जन्म लेते हैं। राम का चरित्र विकासशील है और वह निराला और दुष्यंत कुमार या दुष्यंत कुमार तक विकसित होता रहा है। राम युग नायक हैं, तो हर युग में उनका महत्व तभी कायम रह सकता है जबकि हम उसे समय की आवश्यकता के अनुसार विकसित और परिवर्तित करें। मैथिलीशरण ने भी यही किया था। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में आम उपेक्षित जनता की व्यापक भागीदारी आवश्यक थी। उसे वैधता देने के लिए पौराणिक आधार देना आवश्यक था।

प्रथम सर्ग-
साकेत के प्रथम सर्ग में मैथिलीशरण गुप्त जी ने प्राचीन साहित्य परंपरा के अनुसार देवी शारदा की स्तुती से आरंभ किया है। इसके बाद कवी ने साकेत नगरी की भव्यता का वर्णन किया है। यह नगरी अवनी की अमरावती। और यहाँ इंद्र के समान दशरथ का शासन है। राजा और प्रजा का पारस्परिक संबंध सौमनस्य एवं सद्भाव का है। राजा के पुत्र- राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न हैं और उनकी एकमात्र अभिलाषा श्रीराम के शीघ्र अति शीघ्र राज्याभिषेक की है। 
रात्रि अपने अंतिम चरण में है और प्रभात का आगमन हो रहा है। राजप्रासाद में अरुण वस्त्रों को धारण किए हुए उर्मिला खड़ी है। तभी लक्ष्मण वहां आते हैं और तरुण दंपत्ति के मध्य हास-परिहास प्रेम वार्ता चलने लगती है। लक्ष्मण उर्मिला को राम राज्याभिषेक की सूचना देते हैं। 
प्रथम सर्ग से ही गुप्त जी हमें आधुनिक युग की विशेषता से परिचित कराने लगते हैं। इसमें लक्ष्मण और उर्मिला के बीच जो बातचीत होती है, वह आधुनिक नारी के प्रतीक है न कि प्राचीन और मध्यकालीन आर्य लक्ष्मण और उर्मिला के इस सुखी दांपत्य जीवन के चित्र में हमें उर्मिला के प्रेम, वाक्चातुर्य एवं लोकप्रियता का परिचय मिलता है। उर्मिला के चरित्र का यह पहलू हमें आधुनिक नारी से परिचित कराता है। प्राचीन काव्य नायिकाएँ एक गाम्भीर्य से ढकी रहती थी और उनके दांपत्य जीवन का हास्य-विनोद भी एक सीमा के भीतर रहता था, जबकि आधुनिक युग की वाक्चतुरा नारी इस दृष्टि से बहुत आगे बढ़ी हुई है। उर्मिला का यह रूप हमें इसी की झलक दिखलाता है और यही साकेत के प्रथम सर्ग की विशेषता है।

द्वितीय सर्ग-
              द्वितीय सर्ग में रामकथा का विकास होता है और राम के राज्याभिषेक की सूचना से मंथरा का चिंतित होना दिखाया गया है क्योंकि यहीं से कथा का अगला विकास होगा इस वर्ग में मंथरा कैकई का प्रसंग एवं राजा दशरथ के वरदान का प्रसंग है। राम के राज्याभिषेक की सूचना से पूरा वातावरण हर्षोल्लासमय है, परंतु दासी मंथरा खुश ना होकर चिंतित हैं, मंथना को इस दशा में देख कैकयी उसकी उदासी का कारण पूछती हैं मंथरा कैकयी के मन में संशय पैदा करती हुई कहती हैं कि भरत जैसा भाई की अनुपस्थिति में राम का राज्याभिषेक यह सिद्ध करता है कि उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा गया है। चुकी मंथरा राजनीति की समझ और चेतना से परिपूर्ण है इसलिए वह राजनीति के दांवपेच के संदर्भ में इस घटना को देखती हैं और कहती हैं की इसके मूल में राजनीतिक षड्यंत्र है जो कि आपकी सरलता के कारण रचा गया है। इस बात को सुनकर कैकयी बहुत क्रोधित होती हैं और मंथरा को डांट-फटकार कर भगा देती है। मंत्रा के जाने पर भी उसके यह शब्द कैकेयी मानस से हटते नहीं-
भरत से सूत पर भी संदेह।
बुलाया तक न उसे जो गेह। 
कैकई के संपूर्ण तन-मन में क्रोध अग्नी सुलग उठती है। दशरथ के वहाँ आने पर वह उनसे राम के 14 वर्षों के वनवास एवं भरत के राज्याभिषेक की मांग करती है। राजा दशरथ ने कैकेयी को वचन दिए थे इसलिए वे अपने वचन को झुठला नहीं पाते और इसी द्वंद पूर्ण परिस्थिति में रात्रि व्यतीत होती है।
गुप्तजी ने मंथरा के प्रसंग में तत्कालीन राजनीतिक षडयंत्रों को भी उजागर किया है और भारतीय राजाओं की वचनबद्धता को राज्य के विकास में बाधक भी बताया है।

तृतीय सर्ग-
तीसरे सर्ग में मंथरा द्वारा लगाई गई आग की लपटें राम और लक्ष्मण तक पहुंचती है। लक्ष्मण उर्मिला से विदा ले, राम के पास जाते हैं इसके बाद दोनों भाई पिता की वंदना के लिए जाते हैं। दशरथ भी उस समय अत्यंत द्वंद पूर्ण दशा में थे। वह बहुत दुखी मन से मंथरा और  कैकेयी के द्वारा की गई मांग संपूर्ण घटना की जानकारी राम-लक्ष्मण को देते हैं। इसे राम तो अत्यंत सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं परंतु लक्ष्मण क्रोध अग्नि में जल उठते हैं। राम बहुत कठिनाई से उन्हें शांत कर पाते हैं। लक्ष्मण का क्रोध तो शांत हो जाता है, परंतु वे राम के साथ वन जाने का प्रस्ताव रखते हैं और इस पर दृढ रहते हैं। इस प्रस्ताव को प्रस्ताव को राम द्वारा स्वीकार कर लिए जाने पर दशरथ बार-बार मूर्छित होते हैं तो राम और लक्ष्मण पिता को अपने सामने क्षण-क्षण मूर्छित एवं कातर होता देख वहां से चले जाते हैं।

चतुर्थ सर्ग-
चौथे सर्ग का आरंभ कौशल्या और सीता के देवार्चन की तैयारियों से होता है। इसी समय राम और लक्ष्मण वहाँ आते हैं और वहाँ राम माँ को संपूर्ण घटना और अपने निर्णय से अवगत कराते हैं। कौशल्या को सहसा विश्वास नहीं होता, परंतु लक्ष्मण का रुदन देख वे आशंकित हो उठती हैं। कौशल्या राजनीति में पटु नहीं है, वह एक माँ हैं अतः उन्हें भरत के राज्य-भार सँभालने में कोई आपत्ति नहीं है, परंतु वे राम के वन गमन को रोकना चाहती हैं और इसके लिए वह भीख मांगने को भी तैयार हो जाती हैं। इसी समय सुमित्रा वहां आ जाती है और कौशल्या द्वारा भीख मांगने को वे उचित नहीं मानती और उनके इस कार्य से गुस्से से भर उठती हैं। राम उन्हें समझाते हैं और शांत करते हैं। इसके बाद सीता वन में स्वर्ग रचाने की कल्पना करने लगती हैं और लक्ष्मण दोनों माताओं से राम के साथ वन जाने की आज्ञा प्राप्त करते हैं। तभी राजसी वस्त्र त्याग कर वल्कल वस्त्र धारण करके का प्रसंग आता है। सीता जैसे ही वल्कल वस्त्रों को लेने को हाथ बढ़ाती है, कौशल्या इसे सहन नहीं कर पातीं और बिलख उठती हैं। कौशल्या सीता के वन गमन से अत्यधिक पीड़ित हैं और राम भी सीता को बहुत समझाते हैं। ताकि वे वन जाने का विचार त्याग दें, परंतु सीता नहीं मानती और कहती हैं-
मेरी यही महामति है,
मति ही पत्नी की गति। 
तथा- अथवा कुछ भी न हो वहाँ, 
तुम तो हो जो नहीं यहां। 
 साकेत का यह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है, क्योंकि यहां पर उर्मिला की स्थिति अत्यंत करूण एवं उपेक्षित है। लक्ष्मण भाई और भाभी की सेवा के लिए अपनी पत्नी की उपेक्षा करते हैं और उसे छोड़कर जा रहे हैं। वह इस स्थिति में क्या करें और क्या कहें ? गुप्त जी यहां पत्नी को हाड़-माँस युक्त चित्रित करते हैं, न कि त्याग और समर्पण की देवी, वह एक देह है और देह पति से कुछ और चाहती है परंतु कर्तव्य की महत्ता उसे महान बना देती है और वह अपनी भावनाओं को अपने अंदर ही दफन कर देती है और अपने मन को समझाती है-
,,,,,,,,,,, है मन!

 तू प्रिय पथ का विघ्न न बन।
यह पंक्ति स्त्री के समर्पण और त्याग की टेक की तरह इस्तेमाल होती है। हमारा पितृसत्तात्मक समाज और परिवार व्यवस्था में स्त्री का इस्तेमाल इसी तरह के आदर्शों के माध्यम से होता है। वह त्याग और समर्पण की मूर्ति बना दी जाती हैं हाड़-माँस की देह की जगह। उसके अंदर की स्त्रीत्व चेतना और देह की चेतना को मन के अंधेरे कोने में दफन कर दिया जाता है। उर्मिला के माध्यम से कवि ने स्त्री की इसी स्थिति की ओर संकेत करना चाहा है।
 उर्मिला देखती है कि सीताराम के साथ वाद-विवाद और तर्क वितर्क करने में जीत गई उन्हें साथ चलने की अनुमति मिल गई। उर्मिला भी उसी सीता की बहन है, उर्मिला भी पत्नी-धर्म से परिचित हैं, उर्मिला भी पति के लिए राज्य-वैभव को ठुकराकर वन में जीवन बिता सकती है। वह जानती है कि यदि वह साथ चलने की जिद्द करेगी तो लक्ष्मण उसे नहीं ले जाएंगे। वह बड़े भाई राम की असुविधा को ध्यान में रखकर उसे साथ न चलने की बात कहेंगे। इस स्थिति में संभव है कि लक्ष्मण को भी रोक दिया जाए। यहाँ देखने लायक बात यह है की तर्क लक्ष्मण ने नहीं दिया उर्मिला ने स्वयं तर्क कर लिया और साथ चलने की बात ही नहीं की यह उस युग की सीमा है जिस युग में कभी लिख रहा है। कवि उर्मिला से साथ चलने की जिद करवा सकता था और लक्ष्मण मना करते तब उर्मिला नहीं जाती, पर ऐसा करके वे लक्ष्मण को छोटा नहीं बना सकते थे अतः उर्मिला ने स्वयं अपने मन में सोच लिया की वह पति की भ्रात्री-भक्ति में और कर्तव्य भावना में बाधा क्यों बने? उर्मिला के विवश भाव से सारी परिस्थिति को स्वीकार तो कर लेती हैं किंतु हृदय में उमड़ता स्त्रीत्व की चेतना का तूफान उसे संभलने नहीं देता, वह 'हाय' कहकर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ती है। उर्मिला की दुर्दशा देख सीता के मुख से भी निकल पड़ता है-

आज भाग्य जो है मेरा,
वह भी हुआ न हा तेरा। 
यहां हम देखते हैं कि सीता ने भी उर्मिला को साथ ले चलने की बात नहीं की। जबकि उर्मिला साथ होती तो वन में सीता को अधिक सुविधा होती। राम की असुविधा के कारण लक्ष्मण और उर्मिला को साथ नहीं ले गए, पर सीता की सुविधा का ध्यान और उर्मिला की आवश्यकता का ध्यान कवि को नहीं आया।
वस्तुतः यह प्रसंग साकेत का एक अत्यंत भावपूर्ण स्थल है और इसमें युग युग से उपेक्षित उर्मिला की महानता कवि ने अत्यंत सहृदयता से अंकित की है। उर्मिला की महानता का अंकन करके उर्मिला के प्रति करुणा पैदा करने में कवि सफल हुआ पर उसने भी उर्मिला के साथ न्याय नहीं किया। महान आदर्शों की परंपरा में एक आदर्श और जुड़ गया। यहां आवश्यकता थी उर्मिला की पीड़ा को अभिव्यक्ति देने की और उर्मिला की देह की चेतना को सार्थकता प्रदान करने की। दो स्त्रियों की पीड़ा और आवश्यकता को साथ-साथ एक ही भावभूमि पर प्रतिष्ठित करने की और उन्हें समान न्याय दिलाने की।
अंत में राम, सीता, लक्ष्मण तीनों को माता कौशल्या विवश भाव से वन-गमन की अनुमति प्रदान करती हैं।

पंचम सर्ग-
पंचम सर्ग में कथा के विकास को राम के वन में विचरण और निवास की दिशा में मोड़ दिया गया है। राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर चढ़कर वन की ओर जा रहे हैं। नगर-वासी पथ पर इधर-उधर खड़े अश्रु-पूरित नेत्रों से उन्हें विदाई दे रहे हैं और कैकेयी के कुटिल-कर्म की निंदा कर रहे हैं। राम उन्हें बार-बार समझा-बुझाकर वापस भेज देते हैं। अयोध्या की सीमा पार कर तमसा नदी के किनारे पहुंचता है। वहां से गोमती और फिर गंगा तट पहुंचा। वहां से राम लक्ष्मण और सीता को निषादराज ने गंगा पार कराई। वहां से राम लक्ष्मण सीता प्रयाग और तत्पश्चात चित्रकूट पहुंचे। लक्ष्मण ने वहाँ विश्राम कुटिया बनाई और वासियों ने उनका स्वागत किया।

षष्ठम सर्ग-
छठे सर्ग का आरंभ विरहिणी उर्मिला की करुणकातर दशा से होता है। वह मूर्छित पड़ी हैं और सखियां उसे धैर्य बँधाती हैं। राजा दशरथ और उनकी रानियां भी शोक-संतृप्त हैं दशरथ का अनुमान है कि मेरी दारुण दशा का वर्णन करके अवश्य ही पुत्र राम को सुमंत अपने साथ वापस लौटा लाएगा, परंतु जब सुमंत अकेले लौटते हैं तो दशरथ के शोक का पारावार सीमा का अतिक्रमण कर जाता है और प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। सर्वत्र हाहाकार मच जाता है। मुनिवर वशिष्ठ सबको धैर्य बांधते हैं।

सप्तम सर्ग-
भरत शत्रुघ्न की साथ आ रहे हैं, किन्तु ज्यों-ज्यों वे नगर के निकट पहुंचते हैं तो किसी अमंगल की आशंका से बेचैन हो उठते हैं। महल में आकर उनके भिन्न-भिन्न प्रश्नों व जिज्ञासाओं का शमन कैकेयी ही करती है -
तो सुनो यह क्यों हुआ परिणाम -
प्रभु गए सुर-धाम वन को राम। 
मांगे मैने ही लिया कुल-केतु,
राजसिंहासन तुम्हारे हेतु। 

यह सुनकर भरत पर वज्र-प्रहार होता है। अपने अंतर् का सम्पूर्ण आक्रोश कैकेयी पर व्यक्त करके भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती। वहाँ आत्मग्लानि से आपूर्ण हृदय से स्वयं को दण्ड का भागी स्वीकार करते हैं। कौशल्या उन्हें निर्दोष मानती हैं। भरत शोक के कारण अचेत हो जाते हैं। गुरू वशिष्ट उसी समय आते हैं और सबको धैर्य बंधाते हैं। इस शोक-संतृप्त रात्रि के बाद अगले दिन राजा दशरथ का दाह-संस्कार होता है।

अष्टम सर्ग-
चित्रकूट का दृश्य है। राम एक वृक्ष की छाया में पड़ी हुई शीला पर बैठे है और पर्णकुटी के वृक्षों को सींचती हुई सीता को निहार रहें हैं। सीता के मुख पर श्रमजन्य स्वेद कण झिलमिला उठते हैं तो राम उनसे विश्राम करने को कहते हैं। अभी पति पत्नी में वार्ता चल रही है कि सीता वन के खग-मृग को भयभीत होकर भागता देखती हैं और कोलाहल की उत्तरोत्तर तीव्र होती हुई ध्वनि की और इंगित करती हैं। लक्ष्मण आशंका व्यक्त करते हैं कि सम्भवतः भरत दल बल के साथ आक्रमण करने आ रहें हों। राम इसका निषेध करते हैं। तभी भीड़ नजदीक आ जाती है, भरत, शत्रुघ्न दौड़कर राम और सीता के पाँव तले लोट जाते हैं तभी राम की दृष्टी पड़ती है निराभरण श्वेत वस्त्र धारिणी माँ के ऊपर और वे करूण चीत्कार कर उठते हैं। वशिष्ट उन्हें धैर्य बंधाते हैं। फिर राम अपने दिवंगत पिता को श्रद्धांजली समर्पित करते हैं।
ततपश्चात रात्रि के समय सभा बैठती है और राम भरत से उनकी मनोकांछा पूछते हैं। यह सुनते ही भरत के अंदर का आवेश बाँध तोड़कर बह उठता है। उनकी ग्लानि, उनका शोक, उनका उत्पीड़न मार्मिक शब्दों में व्यक्त होने लगता है। कैकेयी भी राम से वापस लौटने का अनुरोध करती है। शोक और आत्मग्लानि से परिपूर्ण कैकेयी के अंतर् की व्यथा इन शब्दों में बह उठती है -
युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी,
रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी। 
कैकेयी का यह पश्चाताप उसके पाप की कालिमा को धो देता है और राम के मुख से ये शब्द निकल पड़ते हैं -
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
जिस जननी ने है जना भरत सा भाई। 
भरत के अभिलाषा है की राम साकेत लौटकर राज्य-भार संभालें और उनके स्थान पर भरत वनवास का जीवन व्यतीत करे। किन्तु राम के तर्कों के आगे उन्हें परास्त होना पड़ता है और अंततः राम की चरण पादुका लेकर ही भरत वापिस लौटने को विवस हो जाते हैं।
इसके बाद सीता, लक्ष्मण एवं उर्मिला का कुटी में क्षणिक मिलन करवा देती हैं पर दोनों में से कोई अपने अंतर के ज्वार-भाटे से, दूसरे को अवगत नहीं करा पाते। मिलन अल्पकालीन ही रहता हैं।

नवम एवं दशम सर्ग-
इन सर्गों में कथा परवाह की गति अवरुद्ध है। उर्मिला का विरह निवेदन ही इनमें व्यंजित हुआ है। वस्तुतः इस समय कथा में कोई ऐसा महत्वपूर्ण विषय था ही नहीं। राम-लक्ष्मण-सीता का वन्य जीवन एवं शेष सब का नगर-जीवन एक निश्चित गति से अग्रसर होने लगा था। केवल विरहिणी उर्मिला ही उन सबमें एक ऐसी थी जिसके भाग्य में चौदह वर्षों की विरह अवधि लिखी गई थी। अस्तु, कवि ने विविध छंदों में उसके अंदर की पीड़ा और आंसुओं को ही अभिव्यक्त किया।

एकादश सर्ग- राजभवन के बराबर में एक पर्ण-कुटी बनी हुई है जो की भरत का आवास है। वहां एक स्वर्ण-निर्मित मंदिर में मणिमय पाद-पीठ पर राम की दोनों चरण-पादुकाएँ रखी हैं और उनके समक्ष पुजारी रूप में भरत बैठे हैं। तभी पीतांबर धारिणी और मस्तक पर सिंदूर-बिंदु लगाए मांडवी एक थाल में फलाहार लेकर यहाँ प्रविष्ट होती है। वह भी यथेष्ट उदास है, क्योकि बहन उर्मिला को आज वह जल तक पिलाने में समर्थ नहीं हो सकी है। भरत यह बात सुनकर अत्यंत दुखी हो जाते हैं और स्वयं भी उपवास करने का विचार करते हैं, परन्तु मांडवी का कथन है की इससे प्रभु प्रसाद का तिरस्कार होगा, अतएव वे सबके साथ प्रसाद ग्रहण करने का निश्चय करते हैं। तभी शत्रुघ्न आते हैं और भरत को विविध समाचारों से अवगत कराते हैं। वे यह भी बताते हैं कि नगर में लौटकर आये हुए एक व्यवसायी ने उन्हें राम के चित्रकूट से चले जाने, दण्डक वन में विराध को जीवित गाड़ने, मुनिवर अगस्त्य से दिव्यास्त्र की प्राप्ति करने, शूर्पणखा के नाक-कान काटने तथा खर और दूषण राक्षसों के वध करने, की सूचना दी जाती है। राक्षसों के छल-बल का अनुमान कर भरत अभी आशंकित हो ही रहें हैं, तभी आकाश मार्ग से उन्हें एक मायावी राक्षस जाता प्रतीत होता है। भरत उसकी और बाण छोड़ते हैं और वह ' हा लक्ष्मण ' , ' हा सीते ' कहता हुआ भूमि पर आ गीरता है। भरत यह सोचकर व्याकुल  होते हैं की उन्होंने किसी रामभक्त को आहत तो नहीं किया है। मांडवी एक महात्मा से प्राप्त संजीवनी बूटी की परीक्षा करने को कहती है। उस उपचार से हनुमान होश में आते हैं और शत्रुघ्न और माण्डवी को वे राम, लक्ष्मण और सीता जान हर्षित हो उठते हैं। परन्तु जब तीनों का सच्चा परिचय पाते हैं, तो तेजी से उठकर संजीवनी लाने के लिए कैलास जाने को उद्धत हो जाते हैं। यह जानने पर की संजीवनी यहीं पर है वे निश्चिन्त होकर भरत आदि को सीता-हरण,जटायु संस्कार, शबरी का आतिथ्य, सुग्रीव की मैत्री, बालि का वध, प्रभु की मुद्रिका लेकर अशोक वाटिका में सीता जी के दर्शन, लंका-दहन, विभीषण का राम की शरण में आना, राम-रावण युद्ध, कुम्भकरण वध और लक्ष्मण शक्ति लगने का प्रसंग आदि संक्षेप में बताते हैं। इसके पश्चात भरत से संजीवनी ले आकाश मार्ग से वे उड़ जाते हैं।

द्वादश सर्ग-
भरत सम्पूर्ण समाचारों से अवगत हो चिंतित, दुःखी एवं कातर हो उठे हैं। मांडवी उन्हें समझाती है। भरत शत्रुओं का सामना करने के लिए तत्पर हो उठते हैं और शत्रुघ्न को सैन्य-सज्जा करने के लिए कहते हैं। शत्रुघ्न जब पहुंचते हैं तब तक मांडवी सबको सारे समाचारों से अवगत करा चुकी होती हैं। कौशिल्या अधीर एवं अशांत हैं जबकि सुमित्रा इस स्थल पर वीर क्षत्राणी का रूप प्रदर्शित करती हैं और पुत्र को आदर्श पथ का अनुगमन करने का आदेश देती है। समस्त साकेतवासी रणभूमी की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार हैं। उर्मिला भी सेना के साथ चलने के कहती है। इस पर शत्रुघ्न कहते हैं-
क्या हम सब मर गए है ! जो तुम जाती हो,
या हमको तुम आज दीन दुर्बल पाती हो। 
 उर्मिला उत्तर देती है कि वह युद्ध में आहत सैनिकों की परिचर्या करेंगीं। तभी वशिष्ट का आगमन होता है और वे सुचना देते हैं कि लंका तो प्रायः जीत ही ली गई है। वे योग-दृष्टि से सबको युद्ध के दृश्य दिखाते हैं - राम अपने स्नेह एवं करुनासिक्त स्वरों से लक्ष्मण को जगाने की चेष्टा में रत हैं तभी हनुमान संजीवनी लेकर उपस्थित होते हैं और संजीवनी से लक्ष्मण शीघ्र ही उठ बैठते हैं। राम आनंद विभोर हो उठते हैं और लक्ष्मण को विश्राम करने को कहते हैं, परन्तु लक्ष्मण शीघ्र ही युद्धोत्शाह में भरकर, सेना एकत्र कर, लंका में आक्रमण देते हैं। रावण की मोर्चा बंदी भी पर्याप्त सुदृढ़ है। लक्ष्मण मेघनाथ का वध कर देते हैं। तत्पश्चात रावण का वध होता है। गुरु वशिष्ट साकेत वासियों को आज्ञा देते हैं कि शीघ्र ही राम के स्वागत हेतु साकेत को सजाओ हर्ष और प्रसन्नता के आवेग से उल्ल्सित साकेतवासी स्वागतसाज सजाते हैं, राम और भरत का मिलाप होता है। राम अयोध्या आते हैं। माताएं अपने पुत्रों का हर्षमग्न हो स्वागत करती है। सीता अपनी बहनों से मिल प्रफुल्लित हो उठती हैं। सखी उर्मिला से इस सुअवसर पर नूतन वस्त्राभरण धारण कर प्रिय का स्वागत करने को कहती हैं, परन्तु उर्मिला कहती हैं-
 नहीं नहीं प्राणेश मुझी से छले न जावे; मैं जैसी हूँ नाथ मुझे वैसा ही पावें। 
उर्मिला को अपनी यौवन-निधि के लूट जाने का दुःख है, यौवन की खिलखिल करती बेला के चले जाने पर संताप है, किन्तु तभी लक्ष्मण आते हैं और उसे अपने धीर-गंभीर स्वर में समझाते हैं -
वह वर्षा की बाढ़ गई, उसको जाने दो। 
शुचि -गंभीरता प्रिये, शरद की यह आने दो। 
इस तरह कर्तव्य और प्रेम में जीवन की सार्थकता को तलाशती है साकेत की कथा।  एक और राष्ट्रीय मुक्ति का दायित्व है तो दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन के सुख को भोगने की लालसा। इनमें विजय राष्ट्रीय मुक्ति की भावना की होती है तत्पश्चात व्यक्तिगत जीवन की सफलता संकेतिक है।  यही मूल उद्देश्य है इस कथा का जिस्मने कवि सफल हुआ है। इस तरह एक लम्बे अंतराल के बाद युगल-दम्पत्ति का मिलन होता है और साकेत की कथा का अंत हो जाता है।

इन्हें भी पढ़ें

भारत के भूगोल संबंधी प्रश्न उत्तर 
भारत का भूगोल हिंदी में
भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते
दोहा किसे कहते  हैं ?

धन्यवाद !

No comments:

Post a Comment

Thanks for tip