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छंद किसे कहते हैं - chhand ke prakar

हेल्लो दोस्तो आपका फिर से स्वागत है। आप इस ब्लॉग के रेगुलर पड़ने वाले है तो आपको पता होगा कि अभी हिंदी ग्रामर मै रस, दोहा और अलंकार की जानकारी दे दी गई है आज हम छंद के बारे में जानेंगे।

छंद किसे कहते है 

छंद की परिभाषा - संस्कृत में सामान्यतः लय को बताने के लिये छन्द शब्द का प्रयोग किया जाता है। विशिष्ट गीत में वर्णों की संख्या और स्थान से सम्बंधित, नियमों को छ्न्द कहते हैं।

जिनसे काव्य में लय और मधुरता आती है। छोटी-बड़ी ध्वनियां, लघु-गुरु उच्चारणों के क्रमों में, मात्रा बताती रहती हैं।जब किसी काव्य रचना में एक साथ सामंजस्य प्राप्त करती हैं, तो उसे एक शास्त्रीय नाम दिया जाता है, और लघु-गुरु मात्राओं के अनुसार वर्णों की यह व्यवस्था छन्द कहलाता है।

छंद के अंग कितने होते हैं

गति - पद्य (कविता) पाठ में जो बहाव होता है उसे गति कहते हैं।

यति - पद्य पाठ करते समय गति को तोड़कर जो विश्राम ( रुकावट) हते हैं।

तुक - समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को तुक कहा जाता है। पद्य प्रायः तुकान्त होते हैं।

मात्रा - वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है, उसे मात्रा कहते हैं। मात्रा २ प्रकार की होती है लघु और गुरु ह्रस्व (छोटी मात्रा) उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा लघु होती है। तथा दीर्घ उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा गुरु होती है। लघु मात्रा का मान 1 होता है और उसे (।) चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रकार गुरु मात्रा का मान मान 2 होता है और उसे (ऽ)चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है।

गण -इसमे मात्राओं और वर्णों की संख्या क्रम की सुविधा के लिये तीन वर्णों के समूह को एक गण मान लिया जाता है। 

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गणों की संख्या 8 है - यगण (ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।) और सगण (।।ऽ) आदि।

छंद के प्रकार बताइए

मात्रिक छंद ː जिन छंदों में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है उन्हें मात्रिक छंद कहा जाता है। जैसे - दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई

वर्णिक छंद ː वर्णों की गणना पर आधारित छंद वर्णिक छंद कहलाते हैं। जैसे - घनाक्षरी, दण्डक, मंदाक्रां

वर्णवृत ː सम छंद को वृत कहते हैं। इसमें चारों चरण समान होते हैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु तथा गुरु की मात्राओं का क्रम निश्चित रहता है। जैसे - द्रुतविलंबित, मालिनी।

मुक्त छंदː भक्तिकाल तक मुक्त छंद का अस्तित्व नहीं था, लेकिन यह आधुनिक युग की देन है। इसके प्रणेता सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' माने जाते हैं। मुक्त छंद नियमबद्ध नहीं होते, केवल स्वछंद गति और भावपूर्ण यति ही मुक्त छंद की विशेषता हैं।

काव्य में छंद के महत्व

  • छंद से हृदय को सौंदर्य का बोध होता है।
  • छंद मानवीय भावनाओं को दर्शाता करते हैं।
  • छंद में स्थायित्व की भावना होता है।
  • छंद सरल होने के कारण मन को भाते हैं।
  • छंद के निश्चित आधार होने के कारण वे सुगमता पूर्वक याद हो जाता हैं।

छंद के इतिहास

प्राचीन काल के संस्कृत ग्रंथो में कई प्रकार के छन्द मिलते हैं, जो वैदिक काल के जितने भी प्राचीन वेेद हैं। वे सभी सूक्त छन्दबद्ध हैं। पिंगल द्वारा रचित छन्दशास्त्र इस विषय का मूल ग्रन्थ है। छन्द पर चर्चा सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुई है।

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