Doha ki paribhasha दोहा किसे कहते हैं । दोहा अर्थ सहित - Hindi Grammar

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आज मैं आप लोगो को हिंदी जनरल का फोर्थ पार्ट में Doha ki paribhasha के बारे में बताने वाला हूं तो इस ब्लॉग को पूरा पढ़िए अगर आप 10 वी या 12वी में  है तो आप के लिए यह ब्लॉग बहुत फायदे का हो सकता है।

दोहा की परिभाषा 

दोहा एक मासिक छंद है जिसके प्रथम और तृतीय चरण में 13,13 मात्राएं होती है।और दूसरे और अंतिम चरण में 11,11 मात्राएं होती है।इसमें 24 ,24 मात्रा की दो पंक्तियां होती है।

दोहा को कैसे पहचाने 

दोहा में 24,24 मात्रा की दो पंक्ति होती है तथा अंतिम में एक गुरु और (s की तरह ) एक लघु (l की तरह) होता है।

दोहा अर्थ सहित 

Doha ki paribhasha

बुरा जो देखन मैं चला , बुरा न मिलिया कोय। 
जो दिल खोजा अपना , मुझसे बुरा न कोय


अर्थ: जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

पोथी पड़ी पड़ी जग मुआ Doha ki paribhasha




पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ , पंडित भय न कोय। 
ढाई आखर प्रेम का , पढ़े सो पंडित होय॥

अर्थ: इस दोहा में बताया गया है की बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ ले। वह लोग मृत्यु के द्वार पहुँच जाते है, पर सभी विद्वान नही बन पते। कबीर कहते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर हको अच्छी तरह से समझ जाये तो उससे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं होता, अर्थात प्यार को  वास्तविक रूप में पहचान ले वही सच्चा ज्ञानी होगा।


साईं इतना दीजिए

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
 मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

अर्थ - इस दोहे में कबीर दास जी भगवान से विनती करते हुए कहते हैं.  "हे ईश्वर! मेरे ऊपर इतनी कृपा बनाए रखना कि मेरे परिवार का भरण-पोषण अच्छे से होता रहे. मैं ज्यादा धन की इच्छा नहीं रखता. बस इतनी नजर रखना कि मेरा परिवार और मैं भूखा ना सोए और मेरे दरवाजे पर आने वाला कोई भी जीव भूखा ना जाए."





मन  मनोरथ छड़ी दे , तेरा किया कोई। 
पानी में घीव निकसे , तो रुखा खाये न कोई 

अर्थ: मनुष्य को समझाते हुए कबीर जी कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो, उन्हें तुम अपने बाल बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई नहीं खाएगा।



जाती न पूछो साधु की , पूछ लीजिये ज्ञान। 
मोल करो तलवार का , पड़ा रहन दो म्यार

अर्थ: कबीर जी कहते है, की सज्जन की जाती नहीं पूछनी चाहिए उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।



पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत। 
सब सखिया में यो दिपै ज्यों सूरज की जोट

अर्थ: पतिव्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो भी अच्छी है. चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला ही क्यों न हो. फिर भी वह अपनी सब सखियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है !



प्रेम न बाड़ी उपजे प्रेम न हाट बिकाई। 
राजा परजा जेहि रुचे सीस देहि ले जाई

अर्थ: प्रेम खेत में नहीं उपजता प्रेम बाज़ार में नहीं बिकता चाहे कोई राजा हो या साधारण प्रजा – यदि प्यार पाना चाहते हैं तो वह आत्म बलिदान से ही मिलेगा. त्याग और बलिदान के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता. प्रेम गहन- सघन भावना है – खरीदी बेचे जाने वाली वस्तु नहीं !


हाड़ जले लकड़ी जले जलवान हर। 
कौतिकहरा भी जले कासों करू पुकार



अर्थ: दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक दिन जल जाता है. समय आने पर उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है. जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दू? किससे  गुहार करूं – विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं ! सभी का अंत एक है !