छत्तीसगढ़ी साहित्य का इतिहास एवं विकास


साथियों आप सभी का स्वागत है मेरे इस ब्लॉग पर आज मैं आपके लिए लेकर आया हूँ छत्तीसगढ़ी व्याकरण से जुड़ा एक और टॉपिक जो की छत्तीसगढ़ के भाषा साहित्य के विकास को बताता है।

 इस टॉपिक में मैंने ये बताने का प्रयास किया है की छत्तीसगढ़ के भाषा का साहित्य का इतिहास एवं विकास किस प्रकार हुआ है। सामान्य भाषा में कहूँ तो इसका साहित्य के क्षेत्र में इसका विकास कैसे हुआ इसके बारे में यहां पर बताया है। छत्तीसगढ़ी भाषा के उद्भव एवं विकास के बारे में मैंने अपने पिछले पोस्ट में बताया था इसके साथ ही मैंने एक और पोस्ट लिखा था जिसमें  छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली बोलियों के बारे में बताया था। तो चलिए शुरू करता हूँ आज का  टॉपिक



छत्तीसगढ़ के भाषा साहित्य का इतिहास एवम् विकास 

छत्तीसगढ़ में भाषा का विकास इसा पूर्व छठी शताब्दी से माना जाता है क्योकि मागधी प्राकृतिक भाषा पूर्वी दिशा में और शौरसेनी प्राकृत के शिलालेख उत्तर-पश्चिम दिशा में मिलते हैं। इन भाषाओं के मिलने से एक और मगधी भाषा का जन्म हुआ जिसे अर्धमागधी भाषा कहा जाता है और अर्धमागधी भाषा से ही वर्तमान छत्तीसगढ़ी भाषा का विकास हुआ है। छत्तीसगढ़ी भाषा पर आदिवासियों के द्वारा बोली जाने वाली बोलियों के अलवा निम्न जातियों का भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ा वे जातियां हैं- गोंडी, उड़िया और मराठी। छत्तीसगढ़ी भाषा में साहित्य की रचना लगभग 1000 वर्ष से प्रारम्भ हो चुकी थी जिसे डॉक्टर नरेंद्र देव वर्मा ने कालकर्मों में

निम्नानुसार विभाजित किया है

(1.) गाथा युग - ( संवत 1000 से 1500 )
(2.) भक्ति युग   ( संवत 1500 से 1900 )
(3.) आधुनिक युग   ( संवत 1900 से वर्तमान तक )

1. गाथा युग 

संवत 1000 से 1500 तक छ. ग. में विभिन्न गाथाओं की रचना हुई। ये गाथाएं प्रेम व वीरता के भाव से परिपूर्ण रही है। इन यह गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और यह लिपीब्ध परम्परा नहीं थी बल्कि मौखिक परम्परा थी और और यह आधुनिक युग में लिपिबद्ध किया गया। छत्तीसगढ़ की प्राचीन गाथाओं को देखा जाये तो इन ग्रन्थों में केवला रानी . अहिमन रानी, रेवा रानी और वीर राजा वीर सिंह की गाथाये प्रमुख हैं। छत्तीसगढ़ की प्रमुख गाथाओं जिनको दो भागों में बांटा गया है पौराणिक और धार्मिक कथाओं में फूलबासन और पण्डवानी आते हैं।

फुलबासन में सीता और लक्ष्मण की गाथा है, जिसमें सीता लक्ष्मण को स्वप्न में देखे गए फुलबासन नामक फ़ूल को लाने का अनुरोध करती है और लक्ष्मण कठिनाईयों को सहते हुए इस कार्य को करता है।

पण्डवानी में द्रौपदी के जरिये हस्तालिका या तीजा के अवसर पर छत्तीसगढ़ की नारी के मायके जाने की इच्छा को निरूपित करती है। अर्जुन द्रौपती को मायके पहुचाने जाते है तो मार्ग में उन्हें बंदी बना लिया जाता है। इस प्रकार से इसका विकास होता जा रहा है धीरे धीरे।

छत्तीसगढ़ी आदिकालीन साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ 

  1.  प्रेम प्रधान, नारी प्रधान, और वीर गाथा का वर्णन इस काल में देखने को मिलता है।
  2. इस काल की गाथाओं को प्रबन्ध शैली में रखा गया है।
  3. आदिकालीन की गाथाये नारी प्रधान एवं नारी जीवन के असहाय दुखपूर्ण क्षणों को विशेष महत्व देती है।
  4. तन्त्र-मन्त्र और पारलौकिक शक्तियों का विस्तृत वर्णन इस आदिवासी काल में किया गया है।
  5. धार्मिक एवम् पौराणिक गाथाओं के मध्य से लोक जीवन की मैलिक इच्छाओं का वर्णन किया गया है।

2. भक्ति युग - संवत 1800 से 1900 तक 

इस दौरान छत्तीसगढ़ी भाषा में हिंदी भाषा के ही समान भक्ती तथा मुस्लिम आक्रमण को दर्शाने वाली रचनाओं की रखना हुई। क्योकि इस समय भारत के समान ही यहां की भी स्थिती ऐसे ही राजनीतिक दृष्टी से उलट फेर होता रहा। मध्य युग की वीर गाथाओं में फुलकुंवर देवी गाथा और कल्याण साय की वीरगाथा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त गोपल्ला गीत, रायसिंह के पावरा, धोलामारू और नगेसर कइना के नाम से छोटी गाथाये भी लिखी गयी थी। साथ ही इस दौर में लोरिक चन्दा व सरवन गीत के नाम से गाथाओं की रचना हुई।

छत्तीसगढ़ी मध्यकालीन साहित्य की प्रमुख विशेषतायें 

  1. प्रमुख गाथाएं वीर रस एवं श्रृंगार रस से ओतप्रोत हुआ करती थीं।
  2. फुलकुंवर की गाथाओं में मुसलमानों से वीरंगना फुलकुँवर के युध्द का चित्रण किया गया है।
  3. इस काल की एक और विशेषता कबीर पंथी की स्थापना रही है।
  4. इस काल में भक्ति आंदोलन की धारा प्रवाहित हुई, जिससे भक्तिपरक साहित्य का सृजन हुआ।
  5. इस युग में धार्मिक एवं सामाजिक गीत धारा शुभारम्भ कबीर प्रभावित आंचलिक सम्प्रदायों एवं पन्थों के माध्यम से होता है।

प्रमुख मध्यकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य के रचनाकार 

1.) सन्त धर्मदास -
2.) गोपाल मिश्र - कलचुरी वंशीय राजा राजसिंह के दरबारी कवि रहे थे।
रचनाएं  -  खूब तमाशा, सुदामा चरित्र, भक्ति चिंतामणि, रातप्रताप (अधूरी), रतनपुर माहात्म्य,
3.) माखन मिश्र  -   गोपाल मिश्र के मित्र के पुत्र थे।
गोपाल मिश्र की अधूरी काव्य ' रामप्रताप ' को पूरा किया।
4.) बाबू रेवाराम - छत्तीसगढ़ी में भजनों की रचना गीता माधव, गंगा लहरी, सार रामायण, दीपिका, ब्रम्ह स्त्रोत ( सभी संस्कृत में)
विक्रम विलास, रत्न परीक्षा ( हिन्दी में ) एवं तरीख हैहैवंशीय।
5.) प्रह्लाद दुबे  -   इनकी रचना में छत्तीसगढ़ी का प्राजरीतिक स्वरूप अभिव्यक्त हुआ है।
ये सारंगढ़ निवासी और इनकी रचना जय चन्द्रिका है।

3. आधुनिक छत्तीसगढ़ी साहित्य  1900 से अब तक 

हिंदी के आधुनिक काल के साहित्य की ही तरह छतीसगढ़ी में भी आधुनिक काल में काव्य साहित्य गध , साहित्य , उपन्यास, कहानी , निबन्ध, नाटक आदि का सम्यक विकास हुआ।

छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य के उद्भव एवं विकास 

छत्तीसगढ़ी काव्य, छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य की संस्कृति व हिंदी के शिष्ट काव्य की सभ्यता का समन्वित स्वरूप है। छत्तीसगढ़ी शिष्ट साहित्य का प्रारम्भ 20 वीं शताब्दी से माना जाता है। यद्धपि छत्तीसगढ़ी के प्रथम प्रमाणित कवी को लेकर समिक्षोंको में मतभेद है तथापि छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य की परम्परा को अलग कर दिया जाये तो छत्तीसगढ़ी - कविता का इतिहास सौ वर्षों से अधिक का नहीं है।

छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम कवि कौन हैं इसके मनांतर विभिन्न प्रकार मतभेद हैं विदद्वानों और समालोचकों के बीच जो की इस प्रकार है

  1. श्री हेमनाथ के अनुसार - उन्होंने कबीरदास के शिष्य धर्मदास को कहा है जिसका ( खण्डन- डॉ. विनय पाठक द्वारा किया गया। 
  2. डॉ. नरेंद्र देव वर्मा - पं. सुंदरलाल शर्मा को  रचना -  दानलीला , प्रह्लाद चरित्र, करुणा पच्चीसी, सतनामी , भजन माला आदि। 
  3. श्री नन्दकिशोर तिवारी - पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय को ( छत्तीसगढ़ी कविता के लिए 
  4. श्री दयाशंकर शुक्ल
  5. डॉ. विनय कुमार पाठक  - नरसिंह दास वैष्णव को शिवायन ( 1904 ) की रचना के लिए।

इस आधार पर डॉ. विनय एवं अधिकांश छत्तीसगढ़ी और इसके रचनाकार नरसिंह दास को छत्तीसगढ़ी का प्रथम कवि मानते हैं। 

छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य को प्रमुखतः तीन कालों में विभाजित किया जा सकता है

1.) शैशव काल - ( सन 1900 - 1925 तक ) प्रमुख काव्य साहित्यकार - पं. सुंदरलाल शर्मा, नरसिंह दास वैष्णव, लोचन प्रसाद पाण्डेय , शुकलाल पाण्डेय आदि।
2.) छत्तीसगढ़ी साहित्य का विकास काल - ( 1925 - 1950 तक ) इस काल के अंतर्गत- प्यारेलाल गुप्त, द्वारिका प्रसाद तिवारी 'वीप्र' आदि आते हैं।
3.) छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रगति प्रयोगवादी युग - ( 1950 से अब तक )

इस काल के अंतर्गत- कुंजबिहारी चौबे, हेमनाथ यदु , हरी ठाकुर , विनय कुमार पाठक आदि आते हैं। हिंदी के आधुनिक काल की ही तरह छत्तीसगढ़ी में भी आधुनिक काल में कव्य साहित्य व गद्य साहित्य का सम्यक विकास हुआ।