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छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्भव और विकास कैसे हुआ 


तो चलिए शुरू करते हैं,,, भाषा शब्द की उत्पत्ति भाष धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है बोलना कहना या अपनी वाणी से कुछ कहना भाषा कहलाता है। जिन का कुछ अर्थ निकलता है भाषा का निर्माण जिन व्यक्त ध्वनियों से होता है उसे वर्ण कहते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा का विकास भी अन्य आधुनिक भाषाओं की तरह ही प्राचीन आर्य भाषा से हुआ है। आर्यों की भाषा प्राचीन भाषा समय के साथ साथ परिवर्तित होती गई और उसे अन्य उप भाषाओं का विकास होता गया। उन भाषाओं के विकास में छत्तीसगढ़ी भाषा भी एक बोली के रूप में पनपी भाषाओं तथा बोलियों के इस विकास की यात्रा को हम इस प्रकार से समझ सकते हैं और उन्हें इसे प्रकार से समझाने का प्रयास मैंने यहां पर किया है- 

भारतीय भाषाओं के विकास क्रम को व्याकरण आचार्यो ने तीन भागों में विभाजित किया है-


  1.  प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल जो 1580 500 ईसा पूर्व तक चला।
  2.  मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा काल 500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व।
  3.  आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल जो कि 1000 ईसा पूर्व से अब तक चल रहा है।


 अब चलिए इसको हम विस्तार से जानते हैं कि
प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल मध्यकालीन आर्य भाषा काल और आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल के बारे में,,   

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल 1500 से 500 ईसा पूर्व

 इस युग के भारतीय आर्यों के भाषाओं के उदाहरण हमें प्राचीनतम ग्रंथों में देखने को मिलता है प्राचीन युग के अंतर्गत वैदिक और लौकिक दोनों भाग आते हैं संस्कृत सिस्ट समाज के प्रश्न पर विचार विनिमय की भाषा हुआ करती थी उस समय वह यह काम कई सदी तक करती रही संस्कृत का प्रथम शिलालेख हमें 150 ईसवी रुद्रदामन का गिरनार शिलालेख है तब से प्रायः 12 वीं सदी तक इसको राज दरबारों से विशेष प्रश्रय मिलता रहा.
 बौद्ध धर्म के उदय के साथ ही स्थानीय बोलियों को महत्व मिला भगवान बुद्ध ने धर्म प्रचार को प्रभावी बनाने के लिए जन बोलियों को चुना जिसमें पाली सर्वोपरि थी। पाली में जन भाषा और साहित्यिक भाषा का मिश्रित रूप मिलता है। 

 मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा काल जो कि 500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक चला

 इस पाली भाषा का प्रतिनिधि उदाहरण हमें अशोक की धर्म लिपियों और पाली ग्रंथों से मिलती है। और धीरे-धीरे हमारे भारत में प्रादेशिक विभिन्नता बढ़ती गई जिसके कारण अलग-अलग प्राकृतिक भाषाओं का विकास होता गया।संस्कृत ग्रंथों में भी विशेषतः नाटकों में इन प्राकृतिक भाषाओं का प्रयोग हमें देखने को मिलता है और सामान्य जनता द्वारा इनका प्रयोग हुआ इन प्राकृतिक भाषाओं में शौरसेनी माग्धी अर्धमगधी महाराष्ट्री पैशाची आदि प्रमुख रहीं ।साहित्य में प्रयुक्त होने पर व्याकरण आचार्य ने प्राकृतिक भाषाओं को कठिन अस्वाभाविक नियमों से बांध दिया किंतु जिन मूल्यों के आधार पर उनकी रचना हुई वह व्याकरण के नियमों से नहीं बांधी जा सकी। व्याकरण आचार्य ने इन बोलियों को अपभ्रंश नाम दिया।

अपभ्रंश:- मध्यकालीन भारतीय भाषा का चरण विकास अपभ्रंश से हुआ। आधुनिक आर्य भाषा और हिंदी ,मराठी, पंजाबी , उड़िया आदि भाषा की उत्पत्ति इन ही अपभ्रंश भाषाओं से हुई है।इस प्रकार यह अपभ्रंश भाषा में प्राकृतिक भाषाओं और आधुनिक भाषाओं के बीच की कड़ियां हैं। 

1. मागधी अपभ्रंश भाषा से बिहारी, उड़िया, बंगाली, असमिया इन भाषाओं का उद्भव हुआ है। 
2.अर्धगधी अपभ्रंश:- से पूर्वी हिंदी, अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी, आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। 3.शौरसेनी:- से पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, ब्रजभाषा ,खड़ी बोली का विकास हुआ।
4.पैशाची अपभ्रंश से लहंदा पंजाबी भाषा अस्तित्व में आए। 
5.ब्राचड़ अपभ्रंश से सिंधी भाषा बना है। 
6.खस अपभ्रंश से पहाड़ी कुमाऊनी भाषा बना है। 
7.महाराष्ट्री अपभ्रंश से मराठी भाषा का विकास हुआ है या मराठी भाषा अस्तित्व में आया है। 
इस प्रकार की आर्य भाषा को एक सारणी के रूप में मैं यहां पर बता रहा हूं , 

3.आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल जो कि 1000 ई. से वर्तमान तक चल रहा है, 

भारतीय आर्य भाषा के वर्तमान युग का प्रारंभ कराया 1000 इससे माना जाता है जिसमें महत्त्व की दृष्टि से आर्य परिवार की भाषाएं सर्वोपरि हैं इनके बोलने वालों की संख्या भारत में सबसे अधिक है बोलने वालों कोबोलने वालों को संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो धर्मेंद्र परिवार की भाषाएं इसके बाद आती हैं। 
पैशाची शौरसेनी महाराष्ट्र अर्धमगधी आदि अपभ्रंश भाषा ओं ने क्रमशः आधुनिक सिंधी पंजाबी हिंदी राजस्थानी गुजराती मराठी पूर्वी हिंदी बिहारी बांग्ला उड़िया भाषाओं को जन्म दिया। 
शौरसेनी प्राकृत अपभ्रंश से हिंदी की पश्चिमी शाखा का जन्म हुआ.

 इसकी दो प्रधान बोलियां हैं-

 पहला ब्रज और दूसरी खड़ी बोली।हिंदी की दूसरी शाखा है पूर्वी हिंदी जिसका विकास अर्धमागधी से हुआ है। इसकी तीन प्रमुख बोलियां हैं अवधि बघेली व छत्तीसगढ़ी। अवधि में साहित्यिक परंपरा रही है तुलसी व जायसी ने इसमें अमर काव्य लिखे हैं बघेली और छत्तीसगढ़ी में प्राचीन समय में उल्लेखनीय साहित्य सृजन नहीं हुआ जिसकी क्षतिपूर्ति अब हो रही है। मतलब कि अब उल्लेखनीय साहित्य सृजित किए जा रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ी की पड़ोसी भाषाएं उड़िया, मराठी, बिहारी आदि हैं साथ ही छत्तीसगढ़ में अनेक आदिवासी बोलियां भी बोली जाती हैं जिनकी वजह से छत्तीसगढ़ी में अनेक विषमताओं उत्पन्न हो गई है.
 उसी को सुधारने के लिए अब छत्तीसगढ़ी व्याकरण बनाया गया है। 

पूर्वी हिंदी में छत्तीसगढ़ी के साथ साथ कौन सी दो बोलियां सम्मिलित हैं ?

यह प्रश्न पीएससी मैंस 2012 में पूछा गया था। तो चलिए जानते हैं इसका अर्थ या उत्तर  

भारतीय आर्य भाषाओं की मध्यवर्ती शाखा के अर्धमगधी से पूर्वी हिंदी का विकास हुआ जो आगे चलकर - 
अवधि बघेली एवं हिंदी में विभक्त हो गई अर्थात पूर्वी हिंदी के अंतर्गत 3 बोलियां अवधि बघेली एवं छत्तीसगढ़ी आते हैं। 
पुर्वी हिंदी को भाषाओं का नहीं बल्कि बोलियों का समुदाय माना गया और ग्रियर्सन के अनुसार भारतीय आर्य भाषाओं की मध्यवर्ती शाखा भाशाओ का नहीं वरन गोलियों का एक समुदाय है। 
इस अध्ययन का विषय पूर्वी हिंदी की प्रमुख बोली छत्तीसगढ़ी से है बघेली तो अवधि के बहुत निकट भाषा है ग्रियर्सन के अनुसार तो बघेली केवल स्थानीय प्रेम के कारण अलग-अलग बोली मानी जाती है अन्यथा यह अवधि का ही दक्षिणी रूप है। 
तुलसीदास की अमर कृति रामचरितमानस एवं जायसी कृत पद्मावत किस भाषा की अमर कृति है पूर्वी हिंदी की तीन गोलियां एक दूसरे से बहुत मिलती-जुलती हैं 
जैसे कि 
यहां पर मैं बताने जा रहा हूं अब मैं आपको छत्तीसगढ़ी भाषा का वर्गीकरण बताने जा रहा हूं जिसमें वर्तमान में छत्तीसगढ़ी कहनी क्षेत्रीय स्वरों प्रचलित हो गए हैं जिन्हें हम निम्नानुसार अधिकृत कर सकते हैं

 1.केंद्रीय छत्तीसगढ़ी -छत्तीसगढ़ी मानक हिंदी के प्रभावों से युक्त है इस पर स्थानीय बोलियों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ा है इसे ही कुल 18 नामों से जाना जाता है जिनमें कवर्धा कांकेर ई खैरा गिरी बिलासपुरी रतनपुरी रायपूरी धमतरी पारदी बहेलिया बेगानी सतनामी इस समूह में सर्वोपरि मानी गई है छत्तीसगढ़ी। 

2.पश्चिमी छत्तीसगढ़ी- छत्तीसगढ़ी बुंदेली व मराठी का प्रभाव पड़ा है कमारी खलहाटी पनकी मुरारी आदि इन में आती हैं जिनमें सर्वोपरि खल्ताही है। 

3.उत्तरी छत्तीसगढ़ी इस पर बघेली भोजपुरी और उरांव जनजाति की बोली कुडुख का प्रभाव पड़ा है। इन में कुल 5 नाम शामिल है पन्नों सदरी कोरबा जस पुरी सरगुजिया व नागवंशी इस समूह में सर्वोपरि मानी जाती है. सरगुजिया। 

4.पूर्वी छत्तीसगढ़ी- इस पर उड़िया का व्यापक प्रभाव पड़ा है इसमें कुल 6 नाम शामिल है कलंगा, कलनजिया, बिहारी, भूरिया चर्मशिल्पी, लरिया इसमें प्रमुख लरिया भाषा है। 
5.दक्षिणी छत्तीसगढ़ी -  इस पर मराठी उड़िया और गोंडी का प्रभाव पड़ा है जिसमें कुल 9 नाम शामिल है - अद्कुरी चंदारी, जोगी, धाकड़, बस्तरी, मगरी , मिर्गनी और हल्दी। इनमें सर्वोपरि हल्बी है। 

 तो आज के पोस्ट में बस इतना ही कल मिलेंगे एक नए छत्तीसगढ़ी व्याकरण टॉपिक के साथ जिसमें हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ की बोलियों के बारे में।

 धन्यवाद।