छत्तीसगढ़ का इतिहास - Rexgin

धान का कटोरा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ आर्य और अनार्य संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है I विभिन्न स्रोतों से ज्ञात होता है की छत्तीसगढ़ का इतिहास मौर्य काल से प्राचीन नही है , लेकिन किवदंतियों तथा महाकाव्यों से जैसे रामायण महाभारत से ज्ञात होता है की छत्तीसगढ़ प्राचीन कल से ही अथवा त्रेता युग से ही भारत की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से किसी न किसी रूप से संबद्ध है।


छत्तीसगढ़ का इतिहास


छत्तीसगढ़ का प्रागैतिहासिक काल

वह काल जिसके लिए कोई साक्ष्य उपलब्ध नही है तथा उस समय मानव कम सभ्य था, प्रागेतीहासिक काल कहलाता है। प्रागैतिहासिक मानव इतिहास की उस अवधि के लिए प्रयुक्त होता है , जिसमें लेखन की व्यवस्था। न थी।  इस अर्थ मे आदि कालिन समाज के कल को ' पूर्व इतिहास ' कहते हैं।

महाकाव्य काल 

वाल्मीकि कृत 'रामायण ' के अनुसार , राम की माता कौशिल्या राजा भानुमंत की पुत्री थी I 'कोशल खण्ड ' नामक एक अप्रकाशित ग्रन्थ से ये जानकारी मिलती है की विंध्य पर्वत के दक्षिण मे नागप्ततन के पास कोशल नामक एक शक्तिसाली राजा था I इसके नाम पर ही इस छेत्र का नाम कोशल पड़ा था। राजा कोशल के रजवंस मे भानुमंत नामक राजा हुआ, जिसकी पुत्री कौशिल्या का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ था I भानुमंत का कोई पुत्र नही था, अतः कोशल [छत्तीसगढ़] का राज्य राजा दशरथ को प्राप्त हुआ। अतः राजा दशरथ के पूर्व ही इस क्षेत्र का नाम 'कोशल ' होना प्राप्त होता है।

छत्तीसगढ़ का इतिहास

माहाजनपद काल 

भारतीय इतिहास मे छटी शताब्दी ई. का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि इसी समय से भारत का सुबयवस्थित इतिहास मिलता है।  इसके साथ ही यह बुध्द एवं माहाविर का इतिहास काल है  इसमें देश अनेक जनपदों एवं महाजनपदों मे विभक्त था।  छत्तीसगढ़ का वर्तमान क्षेत्र भी [ दक्षिण ] कोशल के नाम से एक पृथक प्रशासनिक इकाई था , मौर्यकाल के पूर्व के सिक्कों की प्राप्ति से इस अवधारणा की पुष्ठी होति है।

'अवदान शतक ' नामक ग्रन्थ के अनुसार , महात्मा बुद्ध दक्षिण कोशल आये थे तथा तीन महीनों तक यहां की राजधानी मे परवाश किया था।  ऐसी जानकारी बौद्ध यात्री हैंनसांग के यात्रा वरीत्तान्त से भी मिलता है।

मौर्यकाल 

प्राचीन ध्वंसावसेसों, पुराणों और शिलालेखों से ज्ञात होता है की इस राज्य पर बौद्ध राजाओ का आधिपत्य था I
इस  क्षेत्र का इतिहास स्वावलंबी न होकर बहुत कुछ परावलम्बी है , क्योंकि यहां बहुधा ऐसे लोगों ने सासन किया है। मौर्य सम्राट अशोक ने दक्षिण कोसल की राजधानी मे स्तूप का निर्माण करवाया था I इस काल के दो अभिलेख सरगुजा जिले मे मिलते हैं।  इससे यह प्रमाणित होता है की दक्षिण कोशल [ छत्तीसगढ़ ] मे मौर्य वंश का शासन रहा , जिसका काल 323 से 184 ई. पु. के बीच रहा है।

उत्तर मौर्यकाल 

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत के विभिन्न भागों मे चार प्रमुख राजवंसों का उदय हुआ , जो इस प्रकार हैं
मगध राज्य जहां ' शुंगों ' का प्रभाव था।  कलिंग का राज्य, जहां चेदि वंश की सत्ता कायम हुई।  दक्षिण-पथ में सातवाहन का राज्य था। पश्चिम भाग में यवनों के प्रभाव का। उदय।

सातवाहन वंश 

मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात दक्षिण भारत में सातवाहन राज्य की स्थापना हुइ। दक्षिण कोशल का अधिकांश भाग सातवाहनों के क्षेत्र मे था। इस वंश के शासक अपने को दक्षिण पथ का श्वामि कहते थे। इस वंश मे अनेक शासक साम्राज्यवादी प्रवित्ति के थे। शातकर्णि प्रथम ने अपने राज्य का विस्तार जबलपुर तक किया। इस प्रकार त्रिपुरी सातवाहनों के प्रभाव मे आ गया। सातवाहन कालीन सिक्के बिलासपुर जिले मे पाये गए है। इनके शासन काल में आर्य संस्कृति का विस्तार दक्षिण मे वयापक रूप से हुआ। यह कल 200  ईसा पूर्व से 60 ईशा पूर्व के मध्य का है I सातवाहन राजा अपीलक की एकमात्र मुद्रा रायगढ़ जिले के ' बालपुर ' नामक स्थल से प्राप्त हुई है।

मेघ वंश

सातवाहनों के पश्चात कोशल में मेघ नामक वंश ने राज्य किया I पुराणों के विवरण से ज्ञात होता है की गुप्तों से उदय के पूर्व कोशल में मेघ वंश ने राज्य किया। सम्भवतः इस वंश ने द्वितीय शताब्दी ई . तक राज्य किया।

वाकाटक काल

सातवाहन के पतन के पश्चात वाकाटकों का अभ्युदय हुआ I वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय के बालाघाट ताम्र पत्र से ज्ञात होता है की उसके पिता नरेंद्र ने कोशल के साथ मालवा और मैकाल मे अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। नरेंद्रसेन और प्रिथविसेन द्वितीय का संघर्ष बस्तर कोरापुट क्षेत्र में राज्य करने वाले नल शासकों से होता रहा।
 नल शासक भवदत्त वर्मा ने नरेंद्र की राजधानी नन्दीवर्धदन [ नागपुर ] पर आक्रमण कर उसे पराजित किया था , किन्तु उसके पुत्र प्रिथविसेन द्वितीय ने इसका बदला लिया और भवदत्त के उत्तराधिकारी अर्थपति को पराजित किया।  सम्भवतः इस युद्ध मे अर्थपति की मृत्यु हो गयी थी।  कालांतर मे वाकाटकों के वट्सगुल्य शाखा के राजा हरिसेन ने दक्षिन कोसल क्षेत्र मे अपना अधिकार स्थापित किया।

गुप्तकाल 

उत्तर भारत मे शुंग एवं कुषाण सत्ता के पश्चात गुप्त वंश ने राज्य किया तथा दक्षिण भारत में सातवाहन शक्ति के पराभव के पश्चात गुप्त राज्य वंश की स्थापना हुई I चौथी सदि में समुद्रगुप्त गुप्तवंश का एक अत्यंत ही परभावशालि और साम्राज्यवादी शासक हुआ I उसने संपूण आर्यावर्त को जितने के पश्चात दक्षिण पथ की विजय यात्रा की।  उसने दक्षिण कोशल के शासकों महेंद्र और व्याघ्रराज {बस्तर शासक } को पराजित कर आगे परथान किया इन शासकों ने गुप्त शासको की आधीनता स्वीकार कर अपने अपने क्षेत्र मे शासन किया।

राजर्षितुल्य वंश

पांचवी सताब्दी के आसपास दक्षिण कोशल में राजर्षितुल्य नामक नागवंश का शासन था I इसके प्रमाण आरनग से प्राप्त ताम्र पत्र गुप्त सम्वत 182 या 282 से मिलता है।  उससे राजर्शितुल्य वंश के शासक भीमसेन द्वितीय का पता चलता है I महाराज सर ने इस वंश की वंशावली आरम्भ की।

वराह वंश 

महाराज तुष्टिकर के तेरासिंघा ताम्र पत्र से तेल घाटी मे शासन करने वाले राव वंश के विषय मे जानकारी मिलती है।  इस लेख से पता चलता है की इस वंश के लोग स्तम्भस्वरी देवी के उपासक थे , जिसका स्थान पर्वतद्वारक मे था , जिसकी समानता कालाहांडी जिले के पर्थला नामक स्थल की जाती है I परवतद्वारक वंश का नाम इसी आधार पर पड़ा था , जिसके अधिकार क्षेत्र मे दक्षिण कोशल का दक्षिणी भाग आता था।

शर्भपुरीया वंश

इस वंश का संस्थापक सर्भ नामक राजा था I सर्भ का उत्तराधिकारी उसका पुत्र नरेंद्र हुआ , जिसके काल का ताम्र पत्र कुरुद से प्राप्त हुआ I प्रसन्नमात्र इस वंश का प्रतापी  राजा था , जिसके समय के सोने के सिक्के छत्तीसगढ़ के कई स्थानों से मिले हैं I इस वंश का अंतिम नरेश प्रवरराज था।

नल नागवंश

बस्तर जिले के अड़ेगा से प्राप्त स्वर्ण मुद्राएं यह प्रमाणित करती हैं कि बस्तर कोरापुट अंचल में नलवनशिय शासकों का शासन था। नल नागवंश की स्थापना शिशुक ने सम्भवतः 290 ई. में की थी I इस वंश का प्रतापी शासन भवदत्त वर्मन था , जिसने इस वंश की सत्ता का विस्तार किया I दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कलचुरियों के आक्रमणों से पराजित होने के कारण नल शासक सत्ता विहीन हो गए।

बाल वंश 

बिलासपुर से 12 मिल उत्तर में पाली नामक स्थल के मन्दिर के गर्भ गृह के द्वार में उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होत्या हैं की इस मंदिर का निर्माण महामण्डलेश्वर मल्लदेव के पुत्र विकर्मादिय के द्वारा किया गया था I विक्रमादित्य को बाण वंश का राजा माना जाता है , जिसका काल नॉवि शताबदी माना गया है।

सोम वंश

सोम वंश के शिवगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र महाभवगुप्त प्रथम हुआ। 
इसने ' कौशलेन्द्र ' और त्रीकलिंगापति की उपाधि धारण की थी। 
इसने सुवर्णपुर, मुरसीम, आराम आदि स्थानों मे राजधानी परिवर्तित की थी। 
महाशिवगुप्त का उत्तराधिकारी ययाति प्रथम था।

पांडव वंश

अमरकंटक के आस पास का क्षेत्र मैकाल के नाम से जाना जाता है। यह पाण्डुवंशियों की एक शाखा के राज्य करने के विषय में शरतबल के बहमनी ताम्रपत्र से जानकारी मिलती है। प्रारम्भिक दो राजाओं जयबल तथा वत्सराज के साथ कोई राजकीय उपाधि प्रयुक्त नहीं हुई है I इसके बाद नागबल के लिए महाराज उपाधि का प्रयोग किया गया है। इसके पुत्र भर्टबल के समय का ऊपर उल्लेखित ताम्रपत्र में इसकी रानी लोकपरकासा का उल्लेख है , जो नरेंद्र की बहन थी। इस नरेंद्र को शर्भमपुरीय शासक नरेंद्र से समीकृत किया गया है।

बाण वंश 

छत्तीसगढ़ में पाण्डु वंशी सत्ता की समाप्ति में बाणवनशीय शासकों का भी योग था। कोरबा जिले में पाली नामक स्थल में मंदिर के गर्भगृह के द्वार में उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होता है की इस मंदिर का निर्माण महामण्डलेस्वर मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वारा किया गया था। विक्रमादित्य को बाण वंश का राजा माना गया है , जिसका काल 870 से 895 ई. माना गया है। बाणवंशी शासकों ने सम्भवतः दक्षिण कोशल के सोमवंशियों को बिलासपुर क्षेत्र में पराजित किया था। कालांतर में कलचुरी शासक शंकरगण द्वितीय मुग्धतुन्ग ने इनसे पाली क्षेत्र जीत लिया और अपने भाइयों को इस क्षेत्र में मण्डलेशवर बनाकर भेजा , जिन्होंने दक्षिण कोशल में कलचुरी राजवंश की स्थापना की।

मुख्य बिंदु 

चीनी यात्री हैंनशांग ने सिरपुर को ' किया-स-लो ' के नाम से उल्लेखित किया है। ईशानदेव का का उल्लेख खरोद { बिलासपुर } के लक्षमनेस्वर मंदिर के सिलालेख में मिलता है। अजन्ता अभिलेख में नरेंद्र सेन के चचेरे भाई हरिषेण को कोशल , कलिंग और आंध्र का विजेता बताया गया है। रोम के सोने के सिक्के बिलासपुर और चकरबेढ़ा नामक गांव से प्राप्त हुई है।


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