छत्तीसगढ़ का इतिहास

छत्तीसगढ़ भारत का राज्य है जिसकी राजधानी रायपुर है छत्तीसगढ़ पहले मध्यप्रदेस से जुड़ा हुआ था सन 2000 में यह नया राज्य बना आज मै आप लागो को छत्तीसगढ़ के इतिहास के बारे में बताने जा रहा हूँ छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है । छत्तीसगढ़ के राजवंश, कबीरधाम का फणिनाग वंश मध्यकालीन भारतीय इतिहास में छत्तीसगढ़ के कवर्धा क्षेत्र में नागवंश का शासन था, जो फणिनाग वंश के नाम से जाना गया। कवर्धा से लगभग 16 किमी की दूरी पर स्थित मड़वा महल नामक मंदिर से विक्रम सम्वत 1406 अर्थात 1349 ई. का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है।

इससे ज्ञात होता है कि राजा रामचन्द्र ने यहां एक शिव मंदिर का निर्माण कर उसके लिए कुछ ग्राम दान में दिए थे। रामचन्द्र का विवाह कलचुरी राजकुमारी अम्बिका देवी के साथ हुआ था। मडवा महल शिलालेख में फणिनाग वंश में अहिराज को नागों का राजा बताया गया है।

तखतपुर एवं राजपुर की स्थापना - तखतसिंह ने तखतपुर की स्थापना सत्रहवीं सदी के अंत में की थी। इसके पश्चात राजसिंह { 1689-1712 ई.} शासन हुआ। इसने राजपुर { वर्तमान जुना शहर रतनपुर के निकट }  बसाया था।
जनश्रुतियों के अनुसार वे नि: सन्तान थे, इसका दत्तक पुत्र विष्वनाथ सिंह हुआ था। विश्वनाथ सिंह का विवाह रीवा की राजकुमारी के साथ हुआ था। प्रसिद्ध कवि गोपाल { गोपाल चन्द्र मिश्र } राजसिंह के राजाश्रय में थे , जिन्होंने प्रसिद्ध ग्रन्थ ' खूब तमाशा ' लिख था। 1721 ई. में राजसिंह की मृत्यु हो गई।

कांकेर का सोम वंश  - कलचुरी शासक प्रिथविदेव द्वितीय के राजिम अभिलेख से पता चलता है की उसके सेनापति जगपाल ने काकरय { वर्तमान कांकेर } क्षेत्र को जीता था। इसके पश्चात यहां राज्य करने वाले शासकों द्वारा कलचुरी सम्वत का प्रयोग प्रारम्भ किया गया। इस वंश के कुल पांच अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों के अध्ययन से स्पष्ट होता है की इस वंश का संस्थापक शासक सिंहराज था।

पहली शाखा के विषय में कर्णराज के सिहावा शिलालेख से जानकारी मिलती है , जिसमें उसे वोपदेव का पुत्र कहा गया है। दूसरी शाखा के विषय में पम्पराज के तहनकापारा से प्राप्त ताम्रपत्र से जानकारी मिलती है। इससे ज्ञात होता है कि पम्पराज के पिता सोमराज , वोपदेव के पुत्र थे। तीसरी शाखा के विषय में भानुदेव के शक सम्वत 1242 अर्थात 1320 ई. के कांकेर शिलालेख से विवरण प्राप्त होता है।

छत्तीसगढ़ का इतिहास

इससे ज्ञात होता है, की वोपदेव का पुत्र कृष्ण हुआ था। कृष्ण के पश्चात जैतराम हुआ था। जैतराम कांकेर में राज्य करता था। इसका पुत्र सोमचन्द्र हुआ और सोमचन्द्र के पुत्र भानुदेव के समय में यह लेख उत्कीर्ण कराया था।
अनुमान किया जाता है की सिंहराज { लगभग 1130 ई. } से भानुदेव { 1320 ई. } तक कांकेर के क्षेत्र में सोमवंशी शासकों ने शासन किया था।    

कलचुरिकालीन शासन व्यवस्था

महाकौशल क्षेत्र में शासन स्थापित करने के बाद कलचुरियों ने शासन-व्यवस्था स्थापित की थी , आरम्भ में छत्तीसगढ़ शाखा में उसी के अनुरूप व्यवस्था स्थापित की गई। किन्तु कालांतर में त्रिपुर से अलग होने के पश्चात रतनपुर के शासकों ने स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप शासन व्यवस्था विकसित की। कल्याण साय के समय की सोलहवीं सदी के मध्य की लेखपुस्तीका को आधार मानकर श्री चिशम ने 1868 ई. कलचुरी शासन प्रबन्ध पर एक लेख लिखा है , जिससे कलचुरीकालीन प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

छत्तीसगढ़ में मध्यकालीन शासन प्रबंधन को जानने के लिए कलचुरियों की शासन व्यवस्था पर विचार करना आवश्यक है। तुम्माण बिलासपुर जिले में एक सुक्षित पर्वतीय स्थान है ,जिसे तुमान-खोल कहा जाता है। गोपाल कवि रतनपुर राज्य में राजसिंह के राजदरबार में निवास करते थे। चिंतामणि तथा रामप्रसाद दोनों प्रबन्ध काव्य हैं। इनमें एक कृष्ण तो दूसरा राम काव्य है। कृष्ण राज ने हैहयवंशियों की प्राचीन राजधानी महिष्मति को ही नहीं लूटा , बल्कि उसका वंश भी ले लिया और स्वयं अपने को हैहयवंशी घोषित कर लिया।

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