Friday, October 26, 2018

भारत के प्रमुख सामाजिक सुधार एवं सुधारक

दोस्तों मैंने आपने पिछले ब्लॉग पोस्ट में भारत में सामाजिक सुधार के बारे में बताया था अब मैं आपको कुछ सुधार के बारे में बताने जा रहा हूँ-
सती प्रथा 
आप तो जानते ही हैं भारत में बहुत सारी प्रथाएं हुआ करती थी उन्ही में से एक प्रथा सति प्रथा था तो आओ जाने सती प्रथा होता क्या था इस प्रथा में लोगों की ये भावना थी की पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी को जीने का कोई अधिकार नहीं। इस कारण पत्नी को पति की मृत्यु के पश्चात,उसके साथ ही चिता में बैठा कर जला दिया जाता था।
सती प्रथा का समापन एक पुर्तगाली वायसराय अल्बुकर्क ने सर्व प्रथम वर्ष 1510 में गोवा मे इस प्रथा को बन्द करवाया था। राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंण्टिक ने 4 दिसम्बर ,1829 को 17वें नियम के तहत बंगाल में सती प्रथा पर रोक लगा दी। साथ ही 1830 में मुम्बई एवं मद्रास सहित अन्य क्षेत्रों में भी सती प्रथा पर रोक लगा दी गई। इस प्रकार सती प्रथा का समापन हुआ।
बाल विवाह
आप जानते ही होंगे की बाल विवाह क्या होता है अगर नहीं जानते तो चलिए मैं आपको बताता हूँ बाल विवाह में होता क्या था बाल विवाह में बच्चों की शादियां कर दि जाती थीं और उसे बचपन से ही विवाहित मान लिया जाता था। जिसके कारण अगर दुर्घटना वश उसके पति की मृत्यु भी हो जाती तो वह बचपन में ही विधवा हो जाती और अन्य के साथ विवाह नहीं कर पाती और उम्र भर उसे विधवा बनकर रहना पड़ता था कई सारी मुस्किलो का सामना करना पड़ता था।
तो आइये जानते हैं की बाल विवाह का अंत कैसे हुआ। बाल विवाह के विरुद्ध सर्व प्रथम आवाज राजा राममोहन राय ने उठाई थी,परन्तु  केशवचन्द्र सेन व बीएम मालाबारी के प्रयासों से सर्व प्रथम वर्ष 1872 में देसी बाल विवाह अधिनियम पारित हुआ था। इस अधिनियम मे 14 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं तथा 18 वर्ष से कम आयु के बालकों के विवाह को प्रतिबंधित किया गया।
            एसएस बंगाली के प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 1891 में ब्रिटिश सरकार ने एज ऑफ़ कन्सेंट एक्ट पारित किया,जिसमें 12 वर्ष से कम आयु की कन्याओं के विवाह पर रोक लगा दी गई। वर्ष 1930 में बाल विवाह को रोकने के लिए शारदा अधिनियम पारित किया गया , जिसमें विवाह की आयु बालिकाओं के लिए 14 वर्ष तथा बालकों के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई।
विधवा
उनको कहा जाता है जिनकी पति मर गए होते हैं। पहले विधवाओं को फिर से विवाह करने का अधिकार नहीं हुआ करता था जिसके कारण महिलाओं को उम्र भर अकेले ही गुजारना पड़ता था। तथा अनेक कठनाइयों का सामना करना पड़ता था। तो फिर इस प्रथा का अंत कैसे हुआ आओ जानते हैं इस प्रथा के अंत को एक नाम दिया गया विधवा पुनर्विवाह का।
विधवा पुनर्विवाह 
के क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान कलकत्ता के एक संस्कृत कॉलेज के आचार्य ईश्वरचन्द्र विधासागर ने दिया। उन्होंने एक हजार हस्ताक्षरों से युक्त-पत्र,डलहौजी को भेजकर विधवा विवाह को कानूनी रूप देने का अनुरोध किया था। ईश्वरचन्द्र विधासागर के प्रयासों के फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार (लॉर्ड कैनिग के समय) ने वर्ष 1856 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 15 पारित किया,जिसमें विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दी गयी। डी के  कर्वे एवं वीरेसलिंगम पुनतालु ने भी विधवा पुनर्विवाह के लिए कार्य किया।
बाल-हत्या प्रथा 
यह प्रथा बंगाल के राजपूतों में अधिक प्रचलित थी। इनमें बालिका शिशुओं को बेरहमी से मार दिया जाता था। वर्ष 1975 में बंगाल नियम-21 और वर्ष 1804 में नियम-3 के तहत इस कुप्रथा को रोकने के प्रयास किए गए।       
दास प्रथा 
वर्ष 1789 में दासों के निर्यात को बन्द कर दिया गया। वर्ष 1833 के चार्टर ऐक्ट द्वारा ब्रिटिश सरकार ने दासता पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया था तथा प्रतिबन्ध को वर्ष 1843 में सम्पूर्ण भारत पर लागू किया गया। वर्ष 1860 में दासता को भारतीय दण्ड सहिंता के द्वारा अपराध घोषित कर दिया गया।
           इस प्रकार यदि देखा जाये तो भारत के सामाजिक सुधार में भारतीयों के साथ-साथ अंग्रेजी शासन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसकी वजह से ही भारत आज इतनी दूर निकल आया है लेकिन आभी भी भारत में कुछ ऐसी प्रथाए जिनका निवारण करना बाँकी है।
जैसे-जाती वाद अभी भी कहीं न कहीं देखने को मिलता।
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,सब हैं भारत में लेकिन एकता थोड़ी कम हो रही हैं इसलिए एकता बनाकर चले तभी जीने का मजा है।  

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