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छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति

प्रोयगधर्मिता के आधार पर लिखित भरतमुनि नाट्यशास्त्र समूचे विश्व में रंगमंच और रंगकर्म का पहला प्रमाणित ग्रन्थ बना , जिसे ब्यापक संस्कृति मिली , किन्तु उसकी प्रेरणा श्रोत रामगढ़ की नाट्य शाला ही रही है । नाट्य शाला मे पांचवे वेद का विकास और उसी के एक गुफा अभिलेख में काब्यसर्जकों के सम्मान में प्रशस्ति मिलती है।  महाकवि कालिदास को भी सम्भवतः नाट्य लेखन की प्रेरणा रामगढ़ की नाट्य शाला से मिली थी। 

छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति

छत्तीसगढ़ी रंगकर्म - 
  • अठारहवीं सताब्दी के पूर्वार्ध छत्तीसगढ़ के रंगकर्म के इतिहास के युगांतकारी दौर के रूप में याद किया जायेगा , क्योंकि इस दौर में मराठों के प्रभाव के कारण गम्मत और नाचा आदि की विधाओं का राज्य में विकास हुआ। 
  • 20 वीं सदि के अंतिम तीन-चार दसक छत्तीसगढ़ रंगकर्म के इतिहास के युगांतकारी दौर के रूप में याद किये जाएंगे। 
  •  इस अवधि में हबीब तनवीर अपने ' नए थियेटर ' के माध्यम से रंगकर्म को एक नए स्वरूप दे रहे थे और उन्ही के कारण छत्तीसगढ़ी  ' नाचा ' को अंतराष्ट्रीय ख्याति मिलीं। 

लोकनाट्य
छत्तीसगढ़ मे लोकनाट्य की परम्परा पुरानी है , यह छत्तिसगढ की सांस्कृतिक आत्मा है I लोकनाट्य में गीत , संगीत और नृत्य होते हैं , जिसे कथा सूत्र में पिरोकर प्रेरणादायी सरस बनाया जाता है।
* छत्तीसगढ़ में विश्व की प्रथम नाट्य शाला होने का गौरव प्राप्त है I सरगुजा जिले के मुख्यालय अम्बिकापुर से 50 किमी दूर रामगढ़ की पहाड़ी पर तीसरी सताब्दी ई. पू.एक नाट्य शाला का निर्माण किया गया था।

कला एवं संस्कृति
* छत्तीसगढ़ में रंग कला का मर्मज्ञ दाऊ रामचन्द्र देशमुख को माना जाता है।
* उनके दिशानिर्देश में सन 9171 में प्रमुख लोकनाट्य चन्दैनिगोंदा ( चदैनी के गोंदा ) की प्रस्तुति हुई।
* इस नाट्य रचना के बाद में सैकड़ों प्रदर्शन किये गए।
* छत्तीसगढ़ के लोककला के पुजारी दाऊ मसीह सिंह चंद्राकर के सोहना  बिहान व लोरिक चन्दा की प्रस्तुति ने लोकनाट्य का सफलतम इतिहास बनाया।

छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य का वर्णन हम अगले पेज में देखेंगे { धन्यवाद }

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